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संसद में 10% आरक्षण वाले बिल का समर्थन नहीं करना हमारी भूल: रघुवंश प्रसाद सिंह, RJD

राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने कोटा बिल पर पार्टी के फ़ैसले के खिलाफ़ बयान दिया है। रघुवंश प्रसाद ने कहा: “लालू यादव ने मुझसे कहा था कि वो गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के ख़िलाफ़ नहीं हैं। हमारी पार्टी ने तो हमेशा गरीबों के लिए काम किया है। हम तो यह चाहते थे कि ओबीसी, दलित व अति पिछड़ा वर्ग को आबादी के हिसाब से उनका आरक्षण बढ़ाया जाए। संसद में कोटा बिल का समर्थन न करना हमारी भूल थी। हमसे चूक तो हुई है।”  

रघुवंश प्रसाद के इस बयान को सुनने के बाद मुझे हिंदी की एक कहावत याद आ गई “अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।” लेकिन नहीं, रघुवंश सिंह को पूरा भरोसा है कि चिड़िया उनके खेत को अभी नहीं चुग पाई है। इसीलिए रघुवंश सिंह ने कोटा बिल पर पार्टी के स्टैंड के खिलाफ़ बयान देकर राजपूत जाति के लोगों को अपनी तरफ झुका कर रखने का प्रयास किया है।

संसद में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए लाए गए बिल के विरोध का झुनझुना बजाकर राजद प्रवक्ता मनोज झा ने विरोध किया। अपने भाषण में मनोज झा ने संविधान संशोधन बिल के महत्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया था।

यही नहीं राजद के सभी सांसदों ने भी इस बिल के विरोध में वोट किया था। राजद के नेता तेजस्वी यादव चिल्ला-चिल्लाकर इस बिल पर सरकार का विरोध करते रहे हैं। ऐसे में रघुवंश सिंह का पार्टी से अलग हटकर इस बिल पर बयान देना एक तरह से उनके वोट बैंक पॉलिटिक्स का ही एक हिस्सा हैा

सोचने वाली बात यह भी है कि सवर्णों के खिलाफ ‘भूरा बाल साफ़ करो’ का नारा देने वाले लालू यादव के साथ हमेशा खड़े रहने वाले रघुवंश प्रसाद को इस बिल के समर्थन में बयान देने की लाचारी आखिर क्यों आ पड़ी।

दरअसल बिहार में ‘MY’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण की राजनीति करने वाले लालू यादव की पार्टी में रघुवंश सवर्ण समुदाय से आने वाले इकलौते बडे़ नेता हैं। रघुवंश की यह लाचारी है कि वो पार्टी स्टैंड से अलग हटकर बयान दें। यदि वो ऐसा नहीं करते हैं तो अपनी वजूद को बचा पाना रघुवंश के लिए बहुत मुश्किल होगा।

रघुवंश को राजद व राजनीति में अपनी वजूद कायम रखने के लिए हर हाल में अगला चुनाव जीतना होगा। रघुवंश सिंह बिहार के वैशाली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते हैं। वैशाली लोकसभा से ही चुनाव जीतकर रघुवंश सिंह केंद्र की यूपीए सरकार में कैबिनेट मंत्री बन चुके हैं।

लोकसभा चुनाव के दौरान वैशाली लोकसभा में तीन जाति भूमिहार, राजपूत व यादव के लोग मुख्य भूमिका निभाते हैं। रघुवंश राजपूत जाति से आते हैं और राजद के टिकट पर चुनाव लड़ते हैं, इसलिए राजपूत व यादव दोनों ही जातियों का समर्थन रघुवंश को मिलता है। लेकिन पिछले चुनाव में मोदी लहर के दौरान लोजपा कैंडिडेट ने रघुवंश सिंह को चुनाव मैदान में पस्त कर दिया था।

2014 लोकसभा चुनाव में रघुवंश के हारने की मुख्य वजह राजपूत समुदाय का वोट दो हिस्सों में बँट जाना था। ऐसे में जब चुनाव नजदीक है और राजद झुनाझुना बजाकर आर्थिक रूप से पिछड़ों के आरक्षण वाले बिल का विरोध कर रही है तो बेचारे रघुवंश सिंह हड़बड़ी में ग़ड़बड़ी की बात तो करेंगे ही।

अब देखने वाली बात यह है कि रघुवंश सिंह रोने-धोने के बावजूद राजपूतों के वोट को अपने पाले में ला पाएँगे या नहीं ला पाएँगे। ऐसा इसलिए क्योंकि जब बिहार विधानसभा चुनाव से पहले संघ प्रमुख ने आरक्षण पर पुनर्विचार करने की बात कही थी तो राजद व कॉन्ग्रेस के नोताओं ने इसका गलत तरीके से लोगों के प्रचार कर दिया था।

भाजपा व संघ विरोधियों ने संघ प्रमुख के बयान को आरक्षण खत्म करने की साजिश बताकर दुष्प्रचार किया था। इस चुनाव में हुकुमदेव नारायण यादव के बेटे अशोक कुमार यादव भी भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे। राजद के इस आरोप को हुकुमदेव नारायण यादव व दूसरे भाजपा नेताओं ने खारिज किया इसके बावजूद यादवों ने भाजपा को वोट नहीं किया था।

अब देखना यह है कि जब आर्थिक रूप से पिछड़ों के आरक्षण वाले बिल पर जनता राजद नेताओं की नौटंकी को जान चुकी है तो रघुवंश प्रसाद सिंह अपने बचाव में बयान देकर भी राजपूतों को अपने पक्ष में कर पाते हैं या नहीं।

आप नेता गुरप्रीत घुग्गी ने भी किया पार्टी से किनारा

आम आदमी पार्टी के अंदरुनी खेमें में आपसी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। आए दिन पार्टी के अंदर चल रहे घमासान की तस्वीरें उजागर होती रहती हैं। इस बार आप पार्टी की विवादित ख़बरों में एक और नाम जुड़ गया है और वो नाम है गुरप्रीत घुग्गी का। जानकारी के मुताबिक आप नेता गुरप्रीत घुग्गी ने भी पार्टी से अपना किनारा कर लिया है। पार्टी से किनारा किए जाने संबंधी अपने फ़ैसले पर घुग्गी ने कहा कि उनका व्यक्ति विशेष से किसी भी प्रकार का विरोध नहीं है। उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि उन्होंने भगवंत मान के साथ लंबे समय से काम किया है, उनसे उन्हें कोई शिक़ायत नहीं है।

बता दें कि हाल ही में गुरप्रीत को हटाकर पंजाब की कमान भगवंत मान को सौंप दी गई थी। अनुमान यह लगाया जा रहा है कि कमान सौंपने संबंधी पार्टी के इस फ़ैसले से ख़फ़ा चल रहे घुग्गी इस नतीजे पर पहुँचे हैं। हालाँकि उन्होंने अपने बयान में यह साफ़ कर दिया कि पार्टी छोड़ने का निर्णय उनका व्यक्तिगत है।

इसके पहले भी आम आदमी पार्टी के ख़फ़ा नेताओं नें इस्तीफ़े दिए हैं। जिनमें कई नाम शामिल हैं। पार्टी से किनारा करने वाले नेताओं की यह स्थिति अगर आगे भी बरक़रार रही तो भविष्य में इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे।

पंजाब में ‘आप’ पार्टी के विधायक बलदेव सिंह ने बुधवार (जनवरी 16, 2019) को पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है। बता दें कि आप पार्टी के बलदेव सिंह पंजाब में ‘जैतो’ से विधायक थे।

पार्टी को छोड़ने से पहले बलदेव सिंह ने अरविंद केजरीवाल को भेजे ई-मेल में लिखा है कि वो बेहद दुखी मन के साथ आम आदमी पार्टी की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे रहे हैं। उन्होंने अपने पत्र में शिक़ायत भी की, कि आम आदमी पार्टी अपनी तय हुई विचारधारा से बिलकुल भटक चुकी है।

उन्होंने कहा कि वो अन्ना हज़ारे द्वारा शुरू किए गए आंदोलन से काफ़ी प्रेरित होकर ही ‘आप’ के साथ जुड़ने का फ़ैसला किया था, जिसके लिए उन्होनें बतौर प्रधान शिक्षक अपनी सरकारी नौकरी छोड़ने का फ़ैसला लिया था। इसका पीछे उनका उद्देश्य देश की (ख़ासकर पंजाब की) सामाजिक-राजनीतिक स्थिति को सुधारने का था। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने ये फ़ैसला लिया था तब उनके पूरे परिवार में खलबली सी मच गई थी। लेकिन, फिर भी उन्होंने ‘आप’ के बुलंद इरादों और वायदों पर ये जोख़िम लेना ज़रुरी समझा।

बलदेव सिंह के अलावा पंजाब के ही एक और विधायक सुखपाल खैरा ने आम आदमी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दिया था। इन्होंने भी अपने इस्तीफ़े में केजरीवाल की पार्टी पर कई आरोप लगाए थे, कि पार्टी अपने निर्धारित किए हुए सिद्धांतों और विचारधारा से भटक चुकी है। जिस समय खैरा ने इस्तीफ़ा दिया उस समय वो पार्टी से निलंबित चल रहे थे, क्योंकि उन्होंने पार्टी के ख़िलाफ़ बग़ावत शुरू कर दी थी। जिसके कारण ही उनका पार्टी से निलंबन किया गया था। अब ख़बरें हैं कि बलदेव, सुखपाल खैरा की ‘पंजाबी एकता पार्टी’ से जुड़ सकते हैं।

इन दो विधायकों के अलावा हरविंदर सिंह फुलका जो पंजाब आदमी पार्टी के नेता और सिख विरोधी दंगे के वकील हैं, वो भी पार्टी को लेकर अपनी शिक़ायतों की वजह से सदस्यता छोड़ चुके हैं।

‘गॉड पार्टिकल’ की खोज के बाद बनने जा रही है LHC से बड़ी मशीन

ब्रह्माण्ड का निर्माण किन कणों से हुआ? पदार्थ की संरचना की सबसे छोटी इकाई कौन सी है? हमारे आसपास सभी चीज़ें किससे बनी हैं? इन प्रश्नों का उत्तर सैद्धांतिक रूप से पीटर हिग्स और सत्येंद्रनाथ बोस द्वारा कई दशक पहले दे दिया गया था किंतु प्रयोगों द्वारा हिग्स बोसॉन कणों के अस्तित्व की पुष्टि की घोषणा 4 जुलाई 2012 को की गई थी।

हिग्स बोसॉन कणों से ही समूचा ब्रह्माण्ड निर्मित हुआ है इसीलिए लीओन लेडरमैन ने 1993 में प्रकाशित हुई अपनी पुस्तक में इन कणों को ‘गॉड पार्टिकल’ नाम दिया था। यह प्रयोग विश्व की सबसे बड़ी प्रयोगशाला CERN के ‘लार्ज हैड्रन कोलाइडर (LHC)’  में किया गया था।

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात अमेरिका आदि धनी देशों ने कुछ अत्यंत बड़ी वैज्ञानिक परियोजनाओं में निवेश किया था जिसे ‘बिग साइंस’ या ‘बिग फ़िज़िक्स’ कहा जाता है। स्विट्ज़रलैंड और फ़्रांस की सीमा पर स्थित CERN पार्टिकल फ़िज़िक्स प्रयोगशाला अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से निर्मित एक बिग साइंस प्रोजेक्ट है जिसमें यूरोपीय करदाताओं के करोड़ों डॉलर का निवेश हुआ है।

ब्रह्माण्ड के निर्माण की प्रक्रिया को समझने के लिए यहाँ बड़ी-बड़ी मशीनों में पदार्थ के अत्यंत छोटे कण तीव्र गति पर दौड़ाए जाते हैं और उनके व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। इसी क्रम में लार्ज हैड्रन कोलाइडर को 2008 में प्रारंभ किया गया था जिसने कथित गॉड पार्टिकल के अस्तित्व को प्रयोगों द्वारा 2012 में प्रमाणित किया था।

लेकिन अब CERN लार्ज हैड्रन कोलाइडर (LHC) से भी चार गुना बड़ी मशीन बनाने की तैयारी में है। इस मशीन को ‘फ्यूचर सर्कुलर कोलाइडर’ या FCC कहा जाएगा। CERN की वेबसाइट पर जारी की गई आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार FCC 100 किमी लंबी सुपरकंडक्टिंग प्रोटॉन एक्सेलरेटर रिंग होगी जिसमें करीब 100 टेरा इलेक्ट्रॉन वोल्ट ऊर्जा उत्पन्न होगी। यह पूरी परियोजना कई चरणों में पूरी होगी जिसपर लगभग 24 अरब यूरो का कुल खर्च आएगा।

FCC एक अंतर्राष्ट्रीय परियोजना है जिसमें यूरोपीयन यूनियन के राष्ट्र सम्मिलित हैं। भविष्य की इस परियोजना का अध्ययन 2014 में प्रारंभ किया गया था जिसके बाद अब इसकी ‘कॉन्सेप्चुअल डिज़ाइन रिपोर्ट’ प्रकाशित की गई है। यह अध्ययन रिपोर्ट 150 शोध संस्थानों के 1300 विशेषज्ञों ने पाँच वर्ष की अवधि में बनाई है। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस परियोजना का आकार कितना बड़ा है।

LHC से आगे बढ़कर FCC बनाने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि अभी तक हम एंटी मैटर और डार्क मैटर को नहीं समझ पाए हैं। भौतिकी के कुछ अनसुलझे रहस्यों में से एक यह भी है कि हम यह नहीं जानते कि हिग्स बोसॉन में द्रव्यमान कहाँ से आता है। पदार्थ के मूलभूत कणों की सर्वमान्य थ्योरी जिसे हम ‘स्टैण्डर्ड मॉडल ऑफ़ पार्टिकल फिजीक्स’ कहते हैं उसके बहुत से प्रश्न आज भी अनुत्तरित हैं जिनका उत्तर प्राप्त करने के लिए हमें LHC में उत्पन्न ऊर्जा से अधिक ऊर्जा पर कणों का अध्ययन करने की आवश्यकता है।

इसलिए FCC परियोजना में कुल चार स्थितियों का वृहद् अध्ययन किया जाएगा। पहले चरण में एक 100 किमी लंबी सुरंग में लेप्टॉन कोलाइडर (FCC-ee) बनाया जाएगा जिसमें हिग्स बोसॉन और क्वॉर्क नामक अन्य कणों का सूक्ष्म अध्ययन किया जाएगा। दूसरे चरण में प्रोटॉन तथा हेवी आयन के अध्ययन के लिए FCC-hh बनाया जाएगा जहाँ उच्च ऊर्जा पर कणों के बीच काम करने वाली फ़ोर्स का अध्ययन किया जाएगा।

ऐसे वातावरण में अरबों कण उत्पन्न होंगे जिनमें डार्क मैटर के संभावित कण WIMPS (Weakly Interacting Massive Particles) भी हो सकते हैं। कुल मिलाकर उच्च दाब और तापमान पर पदार्थ के कण कैसा व्यवहार करते हैं इसका अध्ययन किया जाएगा। तीसरे चरण में एक इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन कोलाइडर FCC-he का निर्माण किया जाएगा जिसमें प्रोटॉन न्यूट्रॉन के भीतर मौजूद क्वॉर्क और ग्लूऑन कणों के व्यवहार का अध्ययन किया जाएगा।

अंत में LHC को अपग्रेड कर उसे दो से तीन गुना अधिक ऊर्जा पर कार्य करने की क्षमता तक लाया जाएगा। यह पूरी परियोजना सात दशक में पूरी होगी अर्थात इसे इक्कीसवीं शताब्दी का मेगा प्रोजेक्ट कहा जा सकता है। CERN की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद डॉक्यूमेंट Writing the Future में इस परियोजना के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभावों का भी आंकलन किया गया है जिसके अनुसार उद्योग जगत को इसमें निवेश करने पर तीन गुना तक लाभ कमाने का अवसर मिलेगा।  

ध्यातव्य है कि वर्ल्ड वाइड वेब की खोज टीम बर्नर ली ने CERN में ही की थी। यह एक अंतर्विषयक बड़ी परियोजना है जिससे वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों, उद्योग जगत तथा साधारण जनमानस को भी भविष्य में कई समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान मिलने की आशा है।  

वीडियो: रिवाल्डो ने समझाया राहुल गाँधी हैं जीनियसों में श्रेष्ठ

राहुल गाँधी का राफ़ेल प्रेम जग-जाहिर है। उन्होंने लगातार रैलियों में, संसद में, प्रेस वार्ताओं में, माइक के आगे, माइक के पीछे… हर जगह एक ही बात कही की इस डील में घपला है। देश का चिरयुवा व्यक्ति, कद्दावर नेता, पार्टी अध्यक्ष, और तो और, सोनिया गाँधी का पुत्र जब ये सवाल पूछता हो तो पूरे देश को इस पर अपने स्तर पर सोचने की ज़रूरत है। इसी कारण हमने रिवाल्डो से पता करने की कोशिश की कि ये मामला क्या है।

राफ़ेल डील पर रिवाल्डो

रिवाल्डो के और वीडियो देखने के लिए आप उनसे जुड़ सकते हैं इन जगहों पर:

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जामिया का इंजीनियरिंग छात्र 3 देसी पिस्तौल के साथ गिरफ़्तार, व्यापारी को लूटने की थी योजना

जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के एक 20 वर्षीय मैकेनिकल इंजीनियरिंग छात्र को पुलिस टीम ने गिरफ़्तार किया और उसके पास से पुलिस ने तीन देसी पिस्तौल भी बरामद किए। यह घटना बीते मंगलवार (15 जनवरी 2019) की है। पुलिस के मुताबिक़ हिरासत में लिए गए अमन ख़ान ने अपने दो सहयोगी के साथ कथित तौर पर एक व्यापारी को लूटने की साज़िश रची थी।

पुलिस के अनुसार, एक पेट्रोलिंग टीम (गश्त करने वाली पुलिस टीम) मुख्य चाँदनी चौक रोड पर वाहनों की जाँच कर रही थी, तब उनकी नज़र उस आदमी पर पड़ी जब एक आदमी को नीले स्कूटर पर बैठाकर ले जाया जा रहा था। पुलिस उपायुक्त (उत्तरी क्षेत्र) नूपुर प्रसाद ने कहा कि जब गश्त करने वाले वैन के पुलिसकर्मियों ने उसे रुकने का इशारा किया, तो स्कूटर सवार भागने की कोशिश करने लगा और फिर यू-टर्न ले लिया।

इसके बाद पुलिसकर्मी उस आदमी का पीछा करने के लिए अपने वाहन से उतरे। भागने से पहले उन्होंने सड़क पार की और ख़ान को पकड़ लिया। जानकारी के मुताबिक ख़ान पूर्वी दिल्ली के मंडावली क्षेत्र का निवासी है।

गश्त कर रहे पुलिसकर्मियों ने जब ख़ान से पूछा कि वह भागने की कोशिश क्यों कर रहा था, तो वह पुलिस को संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। इसके बाद उसे दोपहिया वाहन के दस्तावेज़ दिखाने को कहा गया, लेकिन उसके पास कुछ भी नहीं था। उसके बाद पुलिस ने ख़ान के बैग की जाँच की और इसी जाँच के दौरान तीन देसी पिस्तौल बरामद किए गए। जिसके बाद उसे हिरासत में ले लिया गया।

ख़ान से पूछताछ के बाद पुलिस को पता चला कि वो अपने दोस्तों के साथ मंडावली से एक व्यापारी को लूटने के लिए लाहौरी गेट आया था। इसके बाद ख़ान ने बताया कि उसे व्यापारी द्वारा भारी मात्रा में नकदी ले जाने की ख़बर मिली थी। जिसके बाद उसने उस व्यापारी को लूटने की योजना बनाई।

पुलिस के अनुसार, ख़ान का पिता एक ऑटो-रिक्शा चालक है और उसकी माँ एक गृहिणी है। इसके अलावा पुलिस ने यह भी जानकारी दी कि जिस दोपहिया स्कूटर पर सवारी की जा रही थी वो चोरी की नहीं थी बल्कि ख़ान के ही दोनों दोस्तों में से किसी एक की थी। लूट की इस वारदात को अंजाम देने के लिए इन्हीं तीनों में से किसी एक ने देसी पिस्तौल की व्यवस्था भी की थी। फ़िलहाल पुलिस हथियारों से जुड़ी अधिक जानकारी जुटाने का प्रयास कर रही है।

इस घटना को अंजाम दे रहे ख़ान के दोस्त फ़िलहाल पुलिस की पकड़ से दूर हैं लेकिन पुलिस नें जानकारी दी है कि ख़ान के फ़रार दोस्तों की पहचान कर ली गई है। दोस्तों की धर-पकड़ के लिए पुलिस टीम का गठन भी किया जा चुका है। पुलिस ने इस ओर इशारा भी किया कि उनके पास ख़ान के दोस्तों को पकड़ने के लिए पर्याप्त सुराग उपलब्ध हैं जिनकी बदौलत उन्हें जल्द ही ग़िरफ़्तार किया जाएगा।

जामिया मिलिया इस्लामिया के जनसंपर्क अधिकारी अहमद अज़ीम ने कहा कि विश्वविद्यालय को इस वारदात के संबंध में पुलिस से कोई सूचना अब तक नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय अपने स्तर पर इस घटना का अवलोकन करेगा और पुलिस से शिक़ायत मिलने पर ही किसी तरह की कार्रवाई को अंजाम देगा।

मंदिर में घुसकर तोड़ डाली हनुमान जी की मूर्ति, पूछने पर कहा- अल्लाह का था हुक्म!

हमारे समाज में कुछ समुदाय के लोग ऐसे हैं जिनसे ताल्लुक़ रखने वाले आला नेताओं से लेकर IAS अफ़सर तक कहना होता है कि उनका धर्म और उनके लोग ख़तरे में हैं। भारत देश में दूसरी सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद, खुद को अल्पसंख्यक सूची में रखकर अन्यों पर निशाना साधने वाले अक्सर ये भूल जाते हैं कि जितनी सुधरी हुई स्थिति उनकी भारत में है उतनी शायद ही किसी अन्य देश में होगी। फिर भी इस समुदाय विशेष से जुड़ी ख़बरें अक्सर सामने आती ही रहती हैं कि ये लोग ‘सेकुलर-सेकुलर’ जपते हुए दूसरों के धर्म और उनके प्रतीकों पर वार करने से भी नहीं चूकते।

हाल ही में आई ख़बरों के अनुसार बताया गया है कि मंगलवार की सुबह प्रतापगढ़ के पट्टी कोतवाली अन्तर्गत उडईयाडीह बाज़ार में स्थित हनुमान मंदिर में एक ‘समुदाय विशेष’ के युवक ने मंदिर का ताला तोड़कर उसमें रखी हनुमान जी की मूर्ति को खंडित करके बाहर फेंक दिया, इसके बाद उसने नमाज़ पढ़ी और फिर धार्मिक नारे लगाने लगा।

इस मामले पर भड़की वहाँ की भीड़ ने पहले उसे मंदिर से निकालकर पीटा और फिर उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया। उसकी इस हरकत पर जब उससे सवाल किया गया कि उसने ऐसा क्यों किया है तो उसका साफ़ कहना था ऐसा करने का हुक्म उसे उसके अल्लाह ने सपने में आकर दिया था।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस घटना के आरोपित के साथ दो और लोग भी थे, जिनकी गिरफ़्तारी के लिए वहाँ के लोगों ने पुलिस से माँग की है। फ़िलहाल, इस पूरे मामले में युवक पर मुक़दमा दर्ज़ कर लिया गया है। मामले को अपने हाथ में लेते हुए एसपी एस आनंद ने आरोपितों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।

बता दें कि इस घटना के आरोपित के पकड़े जाने के बाद मंदिर में हनुमान जी की दूसरी मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा का कार्य शुरू हो गया है।

‘द वायर’, NDTV किंकर्तव्यविमूढ़ हैं मोदी राज में, महँगाई बढ़े तब संकट, घटे तब संकट!

पिछले दिनों खुदरा मुद्रास्फीति के डेढ़ साल में सबसे निचले स्तर पर आने की ख़बरें आईं थीं। ज़ाहिर-सी बात है कि महँगाई घटने की ख़बर सकारात्मक है। लेकिन कुछ मीडिया पंडित (या मौलवी, जैसी आपकी श्रद्धा) इसे अब किसानों पर संकट के तौर पर देख रहे हैं।

‘द वायर’ की एक रिपोर्ट में हेडलाइन कुछ ऐसी थी: ‘खुदरा मुद्रास्फीति 18 माह के निचले स्तर पर, खाद्य वस्तुएँ सस्ती होने से संकट में किसान’। पहले पैराग्राफ़ में कुछ यूँ लिखा गया: “फल, सब्जियाँ और ईंधन कीमतों में गिरावट से मुद्रास्फीति घटी है। सब्जियों वगैरह के दामों में गिरावट आने का मतलब है कि किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। इसकी वजह से किसानों को संकट का सामना करना पड़ सकता है।”

‘द वायर’ के रिपोर्ट की हेडलाइन

ये रिपोर्टिंग वाक़ई अलग स्तर की है क्योंकि लिखने वाले ने सिवाय हेडलाइन और पहले पैराग्राफ़ के ये बताने की कोशिश नहीं की कि उसके ‘किसान संकट’ वाली बात का आधार क्या है? हेडलाइन में तो कोई प्रश्नचिह्न, या ‘संकट में पड़ सकता है किसान’ भी नहीं लिखा। सीधे किसान को संकट में डाल दिया गया और पहले पैराग्राफ़ में बताया गया कि ‘पड़ सकता है’।

अगर यही लिख दिया होता कि 18 महीने में कितना ‘संकट’ मुद्रास्फीति के घटने से आया है, तो भी एक बात होती

रिपोर्ट लिखने वाले ने कोई आँकड़ा नहीं दिया, किसी मंडी के किसान से बात नहीं की, कहीं से पता नहीं किया कि क्या वाक़ई महँगाई घटने से किसान ‘संकट’ में आ गया है? कहीं यही लिखा मिल जाता कि किसान पर कितने रुपए का संकट आ गया। या यही मिल जाता कि कितने रुपए के ऊपर नीचे-होने से किसान संकट में जाता है, और बाहर आ जाता है।

ऐसे ही, एनडीटीवी पर एक एंकर ने किसानों की बात करनी शुरू कर दी कि कैसे किसान को आपके द्वारा रेस्तराँ में पैसे कम ख़र्च करने पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। भले ही ये तर्क एब्सर्डिटी कही जाएगी लेकिन उसने दर्शकों को बरगलाने के लिए ही सही, कम से कम 1000 रुपए, 50 रुपए और थोड़ी गणित की बात तो की। ‘वायर’ वालों को कुछ तो सीखना चाहिए।

ये लोग अपनी बात सही तरह से कह नहीं पाते। ये सब एक गिरोह के लोग हैं जो हेडलाइन में झूठ और कल्पना का सहारा लेकर भ्रम की स्थिति पैदा करते हैं। अगर इसी रिपोर्ट में ये स्वीकारा जाता कि तेल के दाम बढ़ने से महँगाई बढ़ती है, और महँगाई बढ़ने से देश का किसान संकट से बाहर आ जाता है, तो माना जा सकता था कि ऊपर जो भी लिखा गया, वो सही बात है।

हमने ‘द वायर’ पर ‘महँगाई’ लिख कर सर्च किया कि कहीं ये ज्ञान मिल जाए कि ‘वाह मोदी जी, महँगाई बढ़ा कर आपने कमाल किया’। लेकिन नहीं मिली। हर जगह तेल के दाम बढ़ने से, महँगाई बढ़ने से कैसे जनता त्राहिमाम कर रही है, यही मिला। अभी ये लोग किसानों का संकट देख रहे हैं, और जब टमाटर-प्याज 80 रुपए प्रति किलो हो जाता है तो उस समय ‘बाज़ार मूल्य’ और किसानों की आय में कोई सम्बन्ध नहीं दिखता इन्हें। तब इन्हें याद आ जाता है कि किसान तो उतने में ही बेचता है, बीच में कोई और खेल भी होता है।

इनका यह कह देना कि दामों में गिरावट के कारण किसानों को ‘उनके उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है’, बताता है कि किसान और अर्थव्यवस्था के साथ-साथ मुद्रास्फीति आदि की कितनी समझ है इस पत्रकार को। वस्तुओं के मूल्य के निर्धारण में कई कारक होते हैं, और हो सकता है कि किसी एक कारक पर प्रभाव पड़ने से ही किसान संकट में नहीं आता। इससे भी इनकार नहीं है कि किसानों की स्थिति बेहतरीन नहीं है आज के दौर में, लेकिन सरकार ने लगातार उनको केंद्र में रखकर कई कल्याणकारी योजनाएँ बनाई हैं। उनका फ़र्क़ दिखता है।

आम भाषा में समझने की कोशिश करें तो सब्ज़ियों के दाम गिरने के कारणों में ज़्यादा उत्पादन से लेकर, बिक्री के लिए ले जाते हुए वाहन में डलने वाले तेल के दामों में कमी, मंडी में दलालों के कमीशन में कमी, और उस सब्ज़ी की डिमांड तक को देखना ज़रूरी है। ये समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। हाँ, अगर पत्रकार को यह लगता हो कि दूध गाय से नहीं, ‘मदर डेरी’ से आता है तो उनका आकलन सही है।

पिछले दिनों जब मोदी ने एक पुल का उद्घाटन किया तो यही गिरोह ये बता रहा था कि नाव चलाने वाले लोगों की नौकरी पर संकट आन पड़ा है। पता चला कि गंगा में जल परिवहन हेतु जलमार्ग बना है, तो इनके गिरोह के लोगों ने बताया कि नीचे मछलियों को संकट हो जाएगा इससे।

ऐसी बेकार मानसिकता लेकर चलने से पत्रकारिता करना संभव नहीं है। अगर आपको लगता है कि सच में महँगाई घटने से किसान संकट में आ जाता है तो आप उन किसानों की बात कीजिए, लोगों से पूछिए कि कल तक उनके खेत से गोभी किस रेट पर तौली जा रही थी, और अभी ‘संकट’ के समय में ये रेट कितना है?

आपको ये भी लिखना चाहिए कि तेल के दाम बढ़ना देश की अर्थव्यवस्था के लिए कितना ज़रूरी है क्योंकि उससे महँगाई बढ़ती है और, आपके तर्कानुसार, महँगाई बढ़ने से किसानों का संकट दूर हो जाएगा क्योंकि अब उन्हें सब्ज़ियों और फलों के दाम ज़्यादा मिलने लगेंगे।

बिहार में हुआ गर्भवती बकरी के साथ बलात्कार, शराब-बंद प्रदेश में नशे में था मोहम्मद सिमराज़

पटना में मंगलवार की शाम एक आदमी को नशे में धुत होकर गर्भवती बकरी के साथ बलात्कार करने पर पकड़ा गया है। ये घटना पटना के ग्रामीण इलाके परसा बाज़ार की है।

रिपोर्ट के अनुसार इस मामले की पूरी छानबीन उस समय शुरू हुई जब बकरी के मालकिन ने मोहम्मद सिमराज़ नाम के व्यक्ति पर आरोप लगाया कि सिमराज़ ने उसकी बकरी का बलात्कार किया है।

मोहम्मद सिमराज़ ने खुद पर लगे इस इल्ज़ाम के बाद अपने गुनाह को कबूला है। ये पूरा मामाला आईपीसी धारा और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1971 के तहत दर्ज किया गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार मोहम्मद सिमराज़ ने मालकिन के घर के बाहर ही तीन महीने गर्भवती बकरी के साथ नशे की हालत में बलात्कार किया, जिसकी वजह से बकरी की मौत हो गई। इस पूरी बात की ख़बर बकरी का मालकिन को उस समय लगी जब वो अपने घर से निकलकर आई और घर के बाहर बकरी के शव को पड़ा पाया।

मालकिन का दावा है कि मोहम्मद को ये काम करते हुए कई लोगों ने देखा है, इस पूरी छानबीन के अलावा अब पुलिस इस बात की जाँच में भी जुटी है कि आरोपित के हाथ शराब लगी कहाँ से, जबकि बिहार में तो शराब बैन है।

बता दें कि इससे पहले भी हरियाणा के मेवात इलाके से एक बकरी का बलात्कार होने की खबर आई थी। जाँच के बाद पता चला कि 8 नशे में धुत लोगों ने सुनसान इलाके में बकरी का रेप किया जिसके कारण उसकी मौत हो गई।

इसके अलावा आंध्र प्रदेश से भी खबर आई कि एक गर्भवती गाय, पेड़ से बँधी पाई गई जिसके गुप्तांग से खून बह रहा था। उसके पहले मध्य प्रदेश में छोटू खान नाम के एक व्यक्ति ने भी एक गाय का बलात्कार किया था। उत्तर प्रदेश में भी आरिफ़ नाम के व्यक्ति पर आरोप था कि उसने 4 गायों के साथ बलात्कार किया है।

पटना में हुई ये घटना और अन्य जगहों पर होती ऐसी घटनाएँ इस बात का सबूत हैं कि हमारे समाज में किस तरह के दरिंदे खुले आम हमारे आस-पास घूम रहे हैं, जिन्हें लड़कियों की इज्ज़त करना सिखाओ तो वो जानवरों पर अपना जोर आज़माने लगते हैं और ऐसी अनसुनी घटनाओं को अंजाम देते हैं।

मेक इन इंडिया के तहत ऑटोमेटेड ट्रेन एग्जामिनेशन सिस्टम से रेलयात्रा होगी पहले से अधिक सुरक्षित

भारतीय रेलवे द्वारा रेल यात्रा को सुगम, सरल व सुरक्षित बनाने की दिशा में लगातार काम कर रहा है। आधुनिक तक़नीक को अपनाते हुए रेल यात्रा को पहले के मुक़ाबले अधिक सुरक्षित बनाया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक़ रेलवे यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कैमरे, सेंसर आदि का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे रेल दुर्घटनाओं पर लगाम लग सकेगी और साथ ही ट्रैक की निगरानी भी की जा सकेगी।

कोंकण रेलवे द्वारा मेक इन इंडिया के तहत ऑटोमेटेड ट्रेन एग्जामिनेशन सिस्टम तैयार किया गया है। यह एक ऐसा सिस्टम है जो रेल और रेलयात्रियों के लिए सुरक्षा चक्र के रूप में काम करेगा। रेलवे को आधुनिक तक़नीकों से लैस करने संबंधी यह जानकारी केंद्रीय मंत्री पीयुष गोयल के ट्विटर हैंडल से आज ही यानि 17 जनवरी को एक वीडियो के माध्यम से शेयर की गई है।

आमतौर पर देखा गया है कि ट्रेन में सफर के दौरान यात्रियों को सबसे बड़ा ख़तरा सामान के चोरी हो जाने का लगा रहता है। ऐसे में उनकी इस चिंता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने ट्रेन में सीसीटीवी जैसी आधुनिक तक़नीक का इस्तेमाल किया है। इससे इस तरह की घटनाओं पर लगाम लग सकेगी और रेलयात्री बेख़ौफ़ होकर यात्रा का आनंद उठा सकेंगे।

रेलवे के सफर को बेहतर बनाने की दिशा में इस तरह की तक़नीक से एक तरफ तो यात्रा के बेहतर परिणाम सामने आएंगे और दूसरी तरफ यात्रियों का सफर भी सुविधाजनक और सुरक्षित बन सकेगा। इसके अलावा रेल मंत्री पीयूष गोयल द्वारा अधिकारियों और जवानों के बेहतर प्रशिक्षण पर भी ज़ोर दिया गया है। उन्होंने रेलवे सुरक्षा के लिए आरपीएफ (रेलवे पुलिस फोर्स) और जीआरपी (गवर्मेंट रेलवे पुलिस) को मिल-जुलकर एक साझा रणनीति बनाने और साथ में मिलकर काम करने पर ज़ोर भी दिया।

इस बेहतर रणनीति और प्रशिक्षण से रेलवे के माहौल को पहले से अधिक चुस्त-दुरुस्त किया जा सकेगा जिसका सीधा संबंध यात्रियों की सुरक्षा से है। बता दें कि सरकार द्वारा उठाए गए इन ठोस और कारगर क़दमों का उद्देश्य यात्रियों की हर समस्या का निदान करना है। सरकार द्वारा ऐसी तक़नीकों के इस्तेमाल से न सिर्फ़ देश प्रगति की राह पर आगे बढ़ेगा बल्कि दुनिया में भी अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल होगा।

शबनम-सलीम की वो प्रेम कहानी जिसने एक ही परिवार के 7 लोगों की जान ले ली

शिक्षा एक ऐसा साधन है जो किसी इंसान की ज़िन्दगी बदलने की ताक़त रखता है, उसकी शक्लोसूरत बदल देता है, उसे एक नई पहचान देता है और उसका भविष्य उज्ज्वल बनाता है। जो जितने ज़्यादा शिक्षित होते हैं, जिनके पास जितनी ज़्यादा डिग्रियाँ होती है – उनसे उतनी ही ज़्यादा शालीनता की उम्मीद की जाती है, उनसे राष्ट्र-निर्माण में भागीदारी की कामना की जाती है। अशिक्षित होना पाप नहीं है क्योंकि कोई व्यक्ति जब अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाता तब हो सकता है उसे उचित साधन न मिले हों। लेकिन शिक्षित होकर भी अपराधी बन जाना, आतंकवादी बन जाना, अपने देश-समाज को बदनाम करना – महापाप है, गुनाह है और अस्वीकार्य है।

ऐसी ही एक कहानी है शबनम की। शबनम एक ऐसा नाम है जिसकी कहानी सुन कर लोग अपनी बच्ची का नाम शबनम न रखें। शबनम एक ऐसी स्त्री है- जिसके कुकृत्यों की दास्तान सुन कर किसी की भी रूह काँप जाए। कहते हैं, एक स्त्री की समाज के निर्माण में और परिवार की संरचना में वो भूमिका होती है जो किसी और के बस की बात नहीं। एक शिक्षित स्त्री दो या उस से अधिक परिवारों का भविष्य बदलने की ताक़त रखती है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी भी कहते हैं– “बालिकाओं की शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। एक लड़की की शिक्षा से दो परिवार शिक्षित होते हैं।”

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक जिला है- अमरोहा। अमरोहा के हसनपुर तहसील में एक गाँव है- बावनखेड़ी। 14-15 अप्रैल की रात को ये गाँव एक ऐसी घटना की निशानी बना जिसे याद कर उस इलाक़े के लोग आज भी सिहर उठते हैं। उस रात एक लड़की के परिवार के सभी सात लोगों की हत्या कर दी गई। बिलखते-बिलखते उसने आसपास के लोगों को जानकारी दी। क्षेत्र के लोग उस लड़की से सहानुभूति जता रहे थे क्योंकि उसके पिता, माँ, बड़ा भाई, छोटा भाई, भाभी, कजिन और बड़े भाई का 10 महीने का बेटा आर्ष- इन सबकी हत्या कर दी गई थी। लोग उस लड़की के भाग्य को कोस करे थे और कामना कर रहे थे कि भगवान ऐसी नियति किसी को भी न दे।

पुलिस ने करवाई शुरू की। इस पूरी घटना की एक ही गवाह थी- वही लड़की जो अब अपने भरे-पूरे परिवार की इकलौती जीवित व्यक्ति थी। पुलिस को औपचारिकता पूरी करनी थी और मामले की तह तक भी जाना था- ये सब कैसे हुआ, किसने किया और क्यों किया। पुलिस से पूछताछ में उस लड़की ने बताया कि कैसे लुटेरे छत के रास्ते से घर में घुसे और उसके परिवार के लोगों की निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी। एक बुज़ुर्ग पड़ोसी ने बताया कि जब उसने उस लड़की के चिल्लाने की आवाज सुनी, तब उन्हें लगा कि उसके घर में डकैती हो गई है।

बुज़ुर्ग पड़ोसी और उनके बेटों ने कुछ अन्य पड़ोसियों के साथ दीवार फाँदकर देखा कि वो लड़की पहली मज़िल के बालकॉनी में खड़ी हो कर चिल्ला रही थी। उन्होंने उसे नीचे आने को कहा लेकिन वो रोती रही। रोते-रोते उसने पड़ोसियों को बताया कि ‘वो’ उसे भी मार देंगे। पड़ोसियों द्वारा बार-बार दिलासे देने के बाद उसने नीचे उतर कर मेन गेट का दरवाज़ा खोला। जब वो घर के अंदर घुसे तो उन्हें जो दृश्य दिखा वो भयावह ही नहीं बल्कि वीभत्स भी था। मास्टर साहब (लड़की के पिता) और उनके पूरे परिवार की लाशें खून से लथपथ पड़ी हुई थी।

उस लड़की के चाचा सत्तार अली वहाँ जाने वाले लोगों को अभी भी खून के निशान दिखाते हुए बताते हैं कि यही वो जगह है जहाँ उन्होंने अपने भाई की लाश पड़ी देखी थी। बुज़ुर्ग पडोसी ने उस रोती-बिलखती लड़की को सांत्वना दी और अपने घर ले कर गए। पुलिस ने तहक़ीक़ात शुरू की। पुलिस को उस लड़की ने बताया कि वो रोज़ अपनी माँ के साथ ही सोती थी लेकिन उस रात उसने गर्मी ज्यादा होने की वज़ह से छत पर सोना ज्यादा उचित समझा। फिर रात को अचानक से बारिश शुरू हो गई और मज़बूरन उसे नीचे आना पड़ा। नीचे घर में आने पर उसे पूरे परिवार की लाशें दिखी।

15 अप्रैल को इस केस की जाँच की जिम्मेदारी SHO आरपी गुप्ता के हाथों में गई। उन्होंने जब तहक़ीक़ात शुरू की तो उन्हें घर में Biopose के 10 टेबलेट्स मिले। घर के अंदर से नशीली गोलियों का मिलना संदेह खड़ा कर रहा था। जब लाशों को पोस्टमॉर्टेम के लिए भेजा गया तब गुप्ता ने डॉक्टर को इस बारे में बताया। उनका अंदेशा सही निकला और सभी लाशों के पेट लाल थी। इसका सीधा मतलब यह था कि उन सभी को सोने से पहले कोई नशीला ड्रग खिलाया गया है जिस कारण सब अचेत हो गए। पुलिस ने सोचा कि अगर खाने के साथ इन्हे ड्रग दिया गया तो फिर उस लड़की पर इसका असर क्यों नहीं हुआ, जबकि बाकी सब अचेत हो गए।

पहले पुलिस ने डकैती के एंगल से जाँच शुरू की थी लेकिन उसे लुटेरों के घर में घुसने के कोई निशान नहीं मिले। जमीन और घर की ऊँचाई 14 फुट की थी। पुलिस को सीढ़ी लगाने के भी कोई निशाँ नहीं मिले। हर एक कदम पर पुलिस का ये शक और पुख़्ता होता जा रहा था कि ये काम किसी बाहर वाले ने नहीं, बल्कि घर के अंदर रहने वाले किसी व्यक्ति ने किया है। जब पुलिस ने परिवार में एकमात्र ज़िन्दा बची उस लड़की का मोबाइल फोन खँगाला तो उसे पता चला कि इस काण्ड के पहले उस फोन से किसी व्यक्ति को एक ही दिन में 50 से भी अधिक कॉल किए गए थे।

यहीं से इस कहानी में ऐसा मोड़ आया जिसने सभी को हिला कर रख दिया। परिवार में एकमात्र ज़िंदा बची उस लड़की का नाम शबनम था। वही शबनम, जो आज मुरादाबाद जेल में बैठ कर अपने बेटे को पत्र लिखती रहती है। जिस व्यक्ति को वो उस दिन बार-बार कॉल कर रही थी, उसका नाम था सलीम- शबनम का प्रेमी। सलीम भी पहले उसी जेल में था लेकिन बाद में उसे कहीं और स्थानांतरित कर दिया गया। सलीम पाँचवी पास था और रोज़ाना आमदनी के जुगाड़ में मजदूरी करता था जबकि शबनम डबल MA थी। उसने अंग्रेजी के साथ-साथ भूगोल में भी मास्टर्स की डिग्री पा ली थी। लेकिन इतनी शिक्षित होने के बाद भी उसने जो किया, उसकी जितनी निंदा की जाए कम है।

कोर्ट में पुलिस ने बताया कि परिवार के लोग शबनम और सलीम के रिश्ते से खुश नहीं थे क्योंकि दोनों अलग-अलग बिरादरी से आते थे। शबनम ने रात को सोने से पहले खाने या चाय के साथ अपने परिवार के सभी लोगों को नशीली दवाइयाँ खिला दी। सोने के बाद वो सभी अचेत हो गए जिसके बाद सलीम वहाँ आया और उसने शबनम की मदद से सबकी हत्या कर दी। शबनम ने सभी के बाल पकड़े और सलीम ने सबका गला काट दिया। 10 महीने के बच्चे तक को उन्होंने नहीं छोड़ा और उसका भी गला घोंट दिया गया। इस प्रेम कहानी का खून से सना यह एक ऐसा अध्याय था, जो वीभत्सता की सारी हदें पार कर जाता है।

अदालत ने उन दोनों को मौत की सज़ा सुनाई। उन्होंने राष्ट्रपति को दया याचिका भी दी लेकिन उसे अस्वीकृत कर दिया गया। अदालत ने पुलिस को इस मामले की तह तक पहुँचने के लिए बधाई भी दी। अगर पुलिस ने समय रहते इसका पर्दाफ़ाश नहीं किया होता तो शायद आज शबनम मायावती के घोषणानुसार पाँच लाख का मुआवज़ा लेकर सज़ा से बच जाती और हो सकता था किसी निर्दोष को सज़ा हो जाती। लेकिन पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए बिना ज़्यादा समय लिए जाँच निपटाया।

शबनम जब जेल गई तब वो सात महीने की गर्भवती थी। उसे एक बेटा हुआ जिसका पालन-पोषण एक पत्रकार और उनकी पत्नी कर रहे हैं। इस्लाम में गोद लेने का कोई आधिकारिक कांसेप्ट नहीं है, इसीलिए अगर शबनम कभी जेल से निकलती है तो उसे उसका बेटा वापस मिल जाएगा।