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माघी अमावस्या पर मौन साधना का महत्व, कुम्भ का दूसरा शाही स्नान

हिंदी कैलेंडर के माघ महीने की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मौनी या माघी अमावस्या कहते हैं। यह तिथि अगर सोमवार के दिन पड़ती है, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। कहते हैं, सोमवार हो और साथ ही कुम्भ लगा हो तब इसका प्रभाव अनन्त गुना फलदाई हो जाता है।

इस साल 2019 में मौनी अमावस्या सोमवार 4 फरवरी को है। इस दिन चंद्रमा मकर राशि में सूर्य, बुध, केतु के साथ हैं और वृहस्पति वृश्चिक राशि में हैं, जिससे कुम्भ का प्रमुख शाही स्नान का योग भी बन रहा है। इस बार मौनी अमावस्या पर कई योग मिलकर महायोग बना रहे हैं। सोमवती योग के साथ, यह श्रवण नक्षत्र में भी है। ज्योतिष के हिसाब इस बार पाँच दशकों में अति दुर्लभ योग बन रहा है। कुम्भ मेले का दूसरा शाही स्नान माघ मौनी अमावस्या के दिन ही है।

इस माह को भी कार्तिक माह के समान पुण्य प्रद माना गया है। गंगा तट पर इसी पुण्य प्रताप के लिए भक्त जन, साधु-संत एक महीने तक कुटी बनाकर गंगा सेवा, ध्यान, तप एवं आध्यात्मिक साधना करते हैं। कहते हैं कि इस दिन पवित्र संगम में देवताओं का निवास होता है, इसलिए इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है।

प्रयागराज कुम्भ में मौनी अमावस्या के विशेष स्नान के लिए एकत्रित श्रद्धालु

मौनी अमावस्या शरद-संक्रांति के बाद की दूसरी या महाशिवरात्रि से पहले की अमावस्या होती है। मौनी अर्थात मौन साधना का दिवस, आमतौर पर मकर संक्रांति से लेकर शिवरात्रि तक का समय योगिक परम्परा में साधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है।

मौनी अमावस्या पर मौन साधना के माहात्म्य पर प्रकाश डालते हुए सदगुरु कहते हैं, “अस्तित्व की हर वो चीज जिसको पाँचों इंद्रियों से महसूस किया जा सके, वह दरअसल ध्वनि की एक गूँज है। हर चीज जिसे देखा, सुना, सूँघा जा सके, जिसका स्वाद लिया जा सके या जिसे स्पर्श किया जा सके, ध्वनि या नाद का एक खेल है। मनुष्‍य का शरीर और मन भी एक प्रतिध्वनी या कंपन ही है। लेकिन शरीर और मन अपने आप में सब कुछ नहीं है। वे तो बस एक बड़ी संभावना की ऊपरी परत भर हैं, वे एक दरवाजे की तरह हैं। बहुत से लोग ऊपरी परत के नीचे नहीं देखते, वे दरवाजे की चौखट पर बैठकर पूरी ज़िंदगी बिता देते हैं। लेकिन दरवाजा अंदर जाने के लिए होता है। इस दरवाजे के आगे जो चीज है, उसका अनुभव करने के लिए चुप रहने का अभ्यास ही मौन कहलाता है।”

मौन क्या है? कितना प्रभावी है, इसका अनुभव आप सभी ने किया होगा। आमतौर पर अंग्रेजी शब्द ‘साइलेंस’ मौन के बारे में बहुत कुछ नहीं बता पाता है। संस्कृत में ‘मौन’ और ‘नि:शब्द’ दो महत्वपूर्ण शब्द हैं। मौन का अर्थ आम भाषा में चुप रहना होता है, यानी आप कुछ बोलते नहीं हैं। ‘नि:शब्द’ का अर्थ है, जहाँ शब्द या ध्वनि नहीं है। अर्थात, शरीर, मन और सारी सृष्टि के परे। ध्वनि के परे जाने का मतलब ध्वनि की गैरमौजूदगी नहीं, बल्कि ध्वनि से आगे जाना है।

कुम्भ में विचरण करते साधु-संत

आज जब हर जगह विज्ञान का बोलबाला है तो कहीं न कहीं सनातन ज्ञान-विज्ञान की परम्परा को गौड़ साबित करने की होड़ मची है। ऐसा वे लोग कर रहे हैं जिन्होंने कुछ भी स्वतः तलाशा नहीं है। उनकी नज़र में भौतिकता ही जीवन का पर्याय है। बस एक को अच्छा साबित करने के चक्कर में दूसरी सभी परम्पराओं, मान्यताओं को खारिज़ करने में ख़ुद को खपाए जा रहे हैं।

माना कि विज्ञान ने प्रचलित ज्ञान को तकनीक के माध्यम से सुलभ बनाकर लोगों तक पहुँचाया, आज वही लोग सुविधाभोगी होकर, भौतिकता में ही सुख खोजने लगे। निरंतर ख़ोज की सनातन परम्परा विलुप्त सी होती गई। जिसे सुखद कहा जाए या दुःखद, पर उसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज कुछ भी समझाने के लिए विज्ञान की भाषा में बात करनी पड़ती है। जबकि विज्ञान स्वयं निरंतर ख़ोज की प्रक्रिया में आगे बढ़ता हुआ उन्नति करता गया और लोग अपनी मूलभूत सनातन क्षमता खोते गए। विशेष पर्वों से जुड़ी मान्यताएँ, आध्यात्मिक साधनाएँ हमें पुनः अपने गौरव और उनके पीछे छिपी रहस्यों के प्रति जागरूकता के साथ पुनः उन्हें समझने में योगदान देती हैं।

कुम्भ जैसे पर्व हमारी धार्मिक, आध्यात्मिक साधना पद्धतियों को समझने के केंद्र भी हैं। सनातन परम्परा में गूढ़ हमारी सारी साधनाएँ अस्तित्व की अनुभूति के साथ उसके परे जाने के विज्ञान पर ही आधारित हैं। आज यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि पूरा अस्तित्व ही ऊर्जा की एक प्रतिध्वनि या कंपन है। इंसान हर कंपन को ध्वनि के रूप में महसूस कर सकता है। सृष्टि के हर रूप के साथ एक खास ध्वनि जुड़ी हुई है। ध्वनियों के इसी जटिल संगम को ही हम सृष्टि के रूप में महसूस कर रहे हैं। सभी ध्वनियों का आधार ‘नि:शब्द’ है। नि:शब्द अर्थात शून्यता। सृष्टि के किसी अंश का सृष्टि के स्रोत में रूपांतरित होने की कोशिश ही मौन है। एक ऐसा आयाम जो जीवन और मृत्यु के परे हो, मौन या नि:शब्द कहलाता है। कमाल की बात ये है कि मौन की साधना इंसान कर नहीं सकता, इसमें सिर्फ़ हुआ जा सकता है।

सद्गुरु इस बात पर जोर देते हैं कि मौन का अभ्‍यास करने और मौन होने में अंतर है। अगर आप किसी चीज का अभ्यास कर रहे हैं, तो निश्चित रूप से आप वह नहीं हैं। अगर आप पूरी जागरूकता के साथ मौन में प्रवेश करने की चेष्‍टा करते हैं तो आपके मौन होने की संभावना बनती है।

शाही स्नान को जाते अखाड़े

संगम में स्नान और इसके माहात्म्य के संदर्भ में प्रचलित है सागर मंथन की कथा। कहते हैं जब सागर मंथन से भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, उस समय देवताओं एवं असुरों में अमृत कलश के लिए खींचा-तानी शुरू हो गई। इससे अमृत की कुछ बूंदें छलक कर प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में जा गिरी। यही कारण है कि यहाँ की नदियों में स्नान करने पर अमृत स्नान का पुण्य प्राप्त होता है।

माघ की महिमा शास्त्रों में भी बखानी गई है। कहा गया है, सत युग में जो पुण्य तप से मिलता था, द्वापर में हरि भक्ति से, त्रेता में ज्ञान से, कलियुग में दान से, लेकिन माघ महीने में संगम स्नान हर युग में अन्नंत पुण्यदायी होगा।

ऐसे में माघ माह की मौनी अमावस्या पर प्रयागराज कुम्भ में हैं तो बहुत अच्छा, नहीं तो कहीं भी गंगा स्नान कर इस दिन के माहात्म्य का स्वतः अनुभव करें। हो सके तो मौन रहें और ख़ुद अनुभव करें कि क्यों मौन को नाद से भी प्रभावशाली माना गया है।

तिरुपति में 12वीं शताब्दी के मंदिर से तीन हीरे-जड़ित स्वर्ण मुकुट गायब

तिरुपति स्थित गोविंदराजा स्वामी मंदिर से तीन स्वर्ण मुकुट के चोरी होने की ख़बर आई है। सभी मुकुट में हीरे जड़े हुए थे। इन मुकुटों का वजन 1.3 किलोग्राम बताया जा रहा है। मुकुट के चोरी होने का समाचार फैलते ही मंदिर प्रशासन में हड़कंप मच गया। तिरुमाला तिरुपति देवस्थान मंदिर के संयुक्त कार्यकारी अधिकारी पी भास्कर के अनुसार, पुजारियों ने देखा कि श्री गोविंदराजा स्वामी मंदिर में स्थित 18 मंदिरों में से एक मंदिर में रखा मुकुट गायब हो गया है।

नियमानुसार, मंदिर शाम 5 बजे श्रद्धालुओं के लिए बंद हो जाता है। प्रतिदिन की तरह जब पूजा-अनुष्ठान संपन्न हुआ, तब मंदिर को बंद कर दिया गया। इसके 45 मिनट बाद जब पुजारियों ने मंदिर का गेट खोला, तो उन्होंने देखा कि तीन मुकुट गायब हैं। आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में स्थित यह मंदिर वैष्णव सम्प्रदाय के प्रमुख मंदिरों में से एक है। साप्ताहिक शोभा-यात्रा से पहले देवताओं के सर से मुकुट का चोरी हो जाना बहुत से सवाल खड़े करता है।

‘मंदिरों का शहर’ नाम से प्रसिद्ध तिरुपति के गोविंदराजा स्वामी मंदिर में 18 उप-मंदिर हैं। पुलिस ने रात को मंदिर में तलाशी अभियान भी चलाया। सुरक्षा अधिकारियों को शक है कि ये मुकुट शनिवार (जनवरी 2, 2019) की सुबह होने वाले सुप्रभात सेवा के बाद ही चोरी कर लिए गए थे, लेकिन पुजारियों ने बाद में ध्यान दिया। इसमें मंदिर के किसी कर्मचारी की मिलीभगत हो सकती है।

तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के अधिकारियों के अनुसार, जाँच के दौरान मंदिर के कर्मचारियों से भी पूछताछ की जाएगी। ‘द न्यूज़ मिनट’ वेबसाइट के अनुसार, तिरुपति शहरी क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक ने बताया कि उन्हें सतर्कता अधिकारियों द्वारा इस मामले की शिकायत मिली है और पुलिस ने केस भी दर्ज कर लिया है। उन्होंने कहा:

“हालाँकि, अभी तक हमें कोई सफलता नहीं मिली है, लेकिन 2 डिप्टी एसपी के नेतृत्व में पुलिस की 6 टीम सभी दिशाओं में लगातार नज़र बनाई हुई है। मुख्य सतर्कता अधिकारी से आधिकारिक शिकायत मिलने के बाद मामला दर्ज किया गया है।”

TTD के सतर्कता अधिकारी सीसीटीवी फुटेज को भी खंगाल रहे हैं, ताकि चोरों का पता लगाया जा सके। मामले के प्रकाश में आते ही भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया और राज्य सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए। उन्होंने चंद्रबाबू नायडू सरकार पर मंदिरों की देखरेख में कोताही बरतने का आरोप मढ़ा और माँग की कि जल्द से जल्द मामले की तह तक पहुँचा जाए।

गोविंदराजा स्वामी मंदिर को 12वीं शताब्दी में संत रामानुजाचार्य द्वारा बनवाया गया था। यह तिरुपति के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है और चित्तूर जिले के सबसे बड़े मंदिर परिसरों में से एक है। भगवन विष्णु के इस मंदिर में वह योग-निद्रा की मुद्रा में विराजमान हैं। मुकुटों के चोरी होने के बाद इलाक़े में यह ख़बर तेजी से फ़ैल गई, जिसके बाद मंदिर परिसर के बाहर स्थानीय लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई।

ग्राउंड रिपोर्ट #2: नमामि गंगे योजना से लौटी काशी की रौनक – सिर्फ अभी का नहीं, 2035 तक का है प्लान

30 जनवरी 2019 जो मेरी बनारस यात्रा का दूसरा दिन था। इससे पहले शाम को अस्सी घाट पर धीरेंद्र और गोरखनाथ ने स्वच्छ व अविरल गंगा के लिए मोदी सरकार की जमकर तारीफ़ की थी। ऐसे में बनारस के लोग जिस नमामि गंगे परियोजना की तारीफ़ कर रहे थे, उसकी वास्तविकता को जानना मेरे लिए कई मायनों में ज़रूरी था।

दूसरे दिन अपने कुछ साथियों  के साथ मैं वाराणसी शहर से कुछ दूरी पर स्थित रमना नाम के एक गाँव में पहुँचा। इस गाँव में नमामि गंगे परियोजना के तहत शहर से निकलकर गंगा में मिलने वाले गंदे पानी को साफ़ करने के लिए एक सीवेज ट्रीमेंट प्लांट (STP) बनाया जा रहा है। रमना में बन रहे इस एसटीपी की कुल क्षमता हर रोज़ 5 करोड़ लीटर गंदे पानी को साफ़ करने की होगी। इस एसटीपी को बनाने का कॉन्ट्रैक्ट ऐसेल इंफ्रा नाम की कंपनी को दी गई है।

रमना में बन रहे सीवेज प्लांट में मेरी मुलाक़ात नमामि गंगा योजना के सीनियर स्पेशलिस्ट पदाधिकारी रजत गुप्ता से हुई। रजत गुप्ता अगले दो दिन बनारस से लेकर प्रयाग तक हमारे साथ रहे। इस आर्टिकल में नमामि गंगे परियोजना के तहत बनारस में मैंने जो कुछ भी देखा, उसका ज़िक्र मैं यहाँ सचित्र करुँगा।

रजत गुप्ता ने मुझे और मेरे साथियों को वाराणसी शहर से निकलने वाले गंदे पानी और उसके साफ़-सफ़ाई के बारे में गहराई से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गंगा के पानी और गंगा घाट को निर्मल बनाने के लिए सरकार ने नमामि गंगे के तहत कई योजनाओं का शुभारंभ किया है। इनमें प्रमुख रूप से सीवेज ट्रीटमेंट, नदी के घाट की सफ़ाई, नदी के किनारे पेड़ों को लगाया जाना, औद्योगिक कचरे का निपटारा, जलीय जीवों की सुरक्षा, गंगा ग्राम आदि के लिए लोगों में जन-जागरुकता अभियान भी चलाया जा रहा है।

रजत गुप्ता व भाजपा नेता वीरेंद्र सचदेवा रमना सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में पत्रकारों के साथ

रजत गुप्ता को सुनने के बाद किसी कर्मचारी के कहने पर विश्वास करने के बजाय हमने रमना के अलावा भी कई दूसरे एसटीपी प्लांट पर जाकर उनके दावे की वास्तविकता का पता करना उचित समझा।

यदि आप वाराणसी गए हैं और वरुणा और असि की वर्तमान हालत को आपने देखा होगा तो आपको पता होगा कि यह दोनों ही नदी नाले में बदल चुकी हैं। ऐसे में यह ज़रूरी है कि गंगा में प्रवाहित होने से पहले इन दोनों ही नदी के गंदे पानी को साफ़ किया जाए।

जब मैंने मौके़ पर मौजूद अधिकारियों से पता किया तो उन्होंने बताया कि इन दोनों नदी के पानी को रमना व दिनापुर एसटीपी के ज़रिए साफ किए जाने की योजना है। दिनापुर प्लांट को ट्रायल के लिए शुरू किया जा चुका है जबकि रमना प्लांट को जल्द शुरू करने की योजना है।

सरकारी आँकड़ों के मुताबिक वर्तमान समय में वाराणसी शहर के नालों से 300 मिलियन लीटर प्रतिदिन गंदा पानी गंगा में प्रवाहित होता है। सरकार ने एक अनुमान लगाया है कि 2035 तक शहर से 400 मीलियन लीटर गंदा पानी बाहर निकलेगा। ऐसे में सरकार ने नमामि गंगे परियोजना के तहत गंगा को साफ़ रखने के लिए 2035 तक की योजना बनाई है।

शहर के नाले से दिनापुर STP में जमा होता गंदा पानी

आपका बता दूँ कि गंगा को साफ़ रखने के लिए पूरे वाराणसी शहर को 4 हिस्सों में बाँटा गया है। इन सभी क्षेत्रों में कुल 13 प्रोजेक्ट को शुरू किया गया, जिस पर सरकार द्वारा ₹913.07 करोड़ ख़र्च करने की घोषणा की गई है। वर्तमान समय में वाराणसी एसटीपी प्लांट द्वारा पानी साफ़ करने की क्षमता 102 मीलियन लीटर प्रतिदिन है, जबकि आने वाले समय में इसे 412 मीलियन लीटर तक पहुँचाने की योजना है।

शहर के गंदे पानी को सीवेज तक पहुँचाने के लिए तीन पंपिंग स्टेशन चौकाघाट, फुलवरिया और सरैया में बनाया गया है। इसके अलावा 26 घाटों को ख़ूबसूरत बनाने के लिए नमामि गंगे परियोजना के तहत ₹11.73 करोड़ खर्च करने की घोषणा की गई है।

यही नहीं देश भर में गंगा की सफ़ाई के लिए लोगों को जागरुक भी किया गया है। इसके तहत गंगा के किनारे रहने वाले देश भर के क़रीब 630 लोगों को गंगा प्रहरी के रूप में नियुक्त किया गया है।

इसमें कोई शक़ नहीं कि 2014 के बाद वाराणसी में गंगा के किनारे बैठकर चाय बेचने वालों की आय में वृद्धि हुई है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि नमामि गंगे परियोजना लागू होने की वजह से गंगा के घाटों से लेकर पानी तक साफ़ दिखने लगा है। देश-विदेश के लोग दशाश्वमेध घाट के अलावा भी दूसरे घाटों पर घूमने के लिए जाने लगे हैं। यही नहीं, पहले गंगा की आरती सिर्फ़ दशाश्वमेध घाट पर होती थी, लेकिन आज के समय में सभी घाटों पर गंगा आरती होने लगी है।

रिपोर्ट के अगले हिस्से में आप प्रयागराज में होने वाले कुंभ व नमामि गंगे परियोजना की सफलता के क़िस्से को पढ़ेंगे। आप जानेंगे कि किस तरह यह कुंभ पिछले कई कुंभ से अलग और ख़ास है। आप यह भी पढ़ेंगे कि कुंभ को स्वच्छ और पवित्र बनाए रखने के लिए सरकार ने किस नई तक़नीक का इस्तेमाल किया है।

PM मोदी ने रखी लद्दाख़ में पहले विश्वविद्यालय की आधारशिला

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में पहले विश्वविद्यालय ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ लद्दाख’ (University Of ladakh) की आधारशिला रविवार (फ़रवरी 03, 2019) को रखी। जम्मू क्षेत्र में एक आईआईटी (IIT) और एक आईआईएमसी (IIMC) के अलावा कुल 4 विश्वविद्यालय हैं, वहीं कश्मीर घाटी में तीन विश्वविद्यालय और एक राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि लद्दाख के पास अब पहला क्लस्टर विश्वविद्यालय है, जिससे लेह, करगिल, नुब्रा, जंस्कर, द्रास और खलतसी के डिग्री कॉलेज संबद्ध हैं। पीएम ने कहा कि लेह और करगिल में विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कार्यालय होंगे। जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने दिसंबर 15, 2018 को लद्दाख क्षेत्र में पहले विश्वविद्यालय की स्थापना को मंजूरी दी थी।

पी चिदंबरम के अब कैसे आएँगे अच्छे दिन? कानून मंत्रालय ने मुकदमा चलाने के लिए CBI को दी मंजूरी

क़ानून मंत्रालय ने आईएनएक्स मीडिया मामले में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए सीबीआई को मंजूरी दे दी है। जाँच एजेंसी ने पिछले महीने इस मामले के सिलसिले में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए केंद्र सरकार से मंज़ूरी माँगी थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सीबीआई ने मई 15, 2017 को INX मीडिया को फ़ॉरेन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड (FIPB) की मंज़ूरी में कथित अनियमितताओं के ख़िलाफ़ एक प्राथमिकी दर्ज की थी।

बता दें कि पी चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने वित्त मंत्री (साल 2007) रहते हुए गलत तरीके से विदेशी निवेश को मंजूरी दी थी। उन्हें 600 करोड़ रुपये तक के निवेश की मंजूरी देने का अधिकार था, लेकिन यह सौदा करीब 3500 करोड़ रुपये निवेश का था। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अपने अलग आरोप पत्र में कहा है कि कार्ति चिदंबरम के पास से मिले उपकरणों में से कई ई-मेल मिली हैं, जिनमें इस सौदे का जिक्र है। इसी मामले में पूर्व टेलिकॉम मंत्री दयानिधि मारन और उनके भाई कलानिधि मारन भी आरोपित हैं।

चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम को इस मामले में गिरफ़्तार किया गया था। कार्ति पर आरोप है कि उन्होंने आईएनएक्स मीडिया के लिए ग़लत तरीक़े से फॉरन इन्वेस्टमेंट प्रमोशन बोर्ड की मंज़ूरी ली। इसके बाद आईएनएक्स को ₹305 करोड़ का फंड मिला। इसके बदले में कार्ति को 10 लाख डॉलर की रिश्वत मिली। इसके बाद आईएनएक्स मीडिया और कार्ति से जुड़ी कंपनियों के बीच डील के तहत ₹3.5 करोड़ का लेनदेन हुआ। कार्ति पर यह भी आरोप है कि उन्होंने इंद्राणी की कंपनी के खिलाफ टैक्स का एक मामला खत्म कराने के लिए अपने पिता के रुतबे का इस्तेमाल किया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता का इस्तीफ़ा, कहा आंध्र प्रदेश में पार्टी कोमा में

लोकसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता उनका साथ छोड़ रहे हैं। गुजरात में ऊँझा विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेसी विधायक आशाबेन पटेल और विधायक कुँवर जी बावलिया के इस्तीफ़े के बाद अब आध्र प्रदेश में कॉन्ग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री किशोर चंद्र देव ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा राहुल गाँधी को सौंप दिया है।

ख़बरों के अनुसार किशोर चंद्र ने कहा कि आंध्र प्रदेश में कॉन्ग्रेस पार्टी कोमा में चली गयी है, और पार्टी नेतृत्व में कोई जवाबदेही नहीं बची है, यहाँ कॉन्ग्रेस विलुप्त हो चुकी है। आंध्र प्रदेश में कॉन्ग्रेस के अनुभवी सांसद के रूप में अपनी पहचान बना चुके किशोर चंद्र का इस्तीफ़ा कॉन्ग्रेस के लिए तगड़ा झटका माना जा रहा है।

जानकारी के अनुसार, किशोर चंद्र अब चंद्रबाबू नायडू की तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी) में शामिल हो सकते हैं। बता दें कि वो पिछले चुनाव में कॉन्ग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे, जिसमें वो हार गए थे।

पंचायती राज मंत्री रह चुके हैं किशोर चंद्र

कॉन्ग्रेस के किशोर चंद्र यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में जुलाई 2011 से मई 2014 तक आदिवासी मामलों और पंचायती राज मंत्री रह चुके हैं। बता दें कि वह 1979-80 में लोकसभा के चुनाव के बाद इस्पात, खान और कोयला राज्य मंत्री भी रह चुके हैं। इन्होंने 2008 के कैश-फॉर-वोट घोटाले में संसदीय जाँच का नेतृत्व भी किया था।

राहुल गाँधी: जो तेजस्वी और लालू के साथ बिहार को बदलना चाहता है!


शेक्सपीयर ने कहा था कि कुछ लोग जन्मजात महान होते है, कुछ लोग महान बनते हैं, और कुछ पर महानता थोप दी जाती है। इस लाइन का इस आर्टिकल से कोई लेना-देना नहीं है, ये बस यह बताने के लिए लिख दिया कि आपको लगे कि मैं कुछ गम्भीर बात करूँगा क्योंकि शेक्सपीयर से शुरू किया। जैसा कि राहुल गाँधी करते हैं, “मैं जब फ़्रान्स के राष्ट्रपति से मिला, तो उन्होंने कहा; मैं जब चीन के राजनयिकों से मिला तो उन्होंने कहा; मैं जब पर्रीकर जी से मिला तो उन्होंने कहा…”

आज नया कांड किया है बिहार में। पटना में एक रैली के दौरान, तेजस्वी और लालू को अपना साथी कहते हुए, राहुल ने बताया कि आप जाइए बिहार के किसी भी गाँव में, युवकों से पूछिए कि वो क्या करता है, तो बताएगा कि वो नौकरी ढूँढ रहा है। आगे गाँधी परिवार के फड़फड़ाते चिराग़ ने कहा कि बिहारी जहाँ जाता है, भगा दिया जाता है। 

पहली बात तो यह है कि किसी भी सेंसिबल व्यक्ति को लालू या लालूनंदन को साथी मानकर बिहार में उसकी बदहाली पर लेक्चर तो देना ही नहीं चाहिए, और दे भी रहे हैं तो ये तो मत ही कहिए कि लालू जी और तेजस्वी जी के साथ मिलकर आप बिहार की तस्वीर बदल देंगे। ऐसा कहना आपकी राजनैतिक डेस्पेरेशन से कहीं ज़्यादा आपकी मानसिक क्षमता पर सवाल उठाता है। 

ख़ैर, 2005 से पहले बिहार क्या था, और तब तक की सरकारों ने वहाँ लिक्विड गोल्ड की नदियाँ बहा दी थी, ये राहुल गाँधी को पता नहीं होगा क्योंकि तब तक वो विश्व के किसी कोने में चिलम, सॉरी, चिल कर रहे थे। उन्हें ये मालूम नहीं होगा कि जो हालत सुधरी है, जितनी ही सुधरी है, वो लालू और कॉन्ग्रेस के न होने से ही सुधरी है। उन्हें ये नहीं मालूम होगा कि वो नदियाँ लिक्विड गोल्ड की नहीं, पीत विष्ठा की थी जो कॉन्ग्रेस और लालू-राबड़ी काल की कुल कमाई है जिसको छाँटने कर साफ़ करने में बाद की सरकारों को बहुत समय लग चुका है।

किस गाँव में राहुल ने जाकर पूछ लिया? किस युवा से मिल लिए जाकर? कौन-सी रिसर्च एजेंसी ने यह डेटा दिया कि वो ‘किसी भी गाँव के युवा’ की बात कर पा रहे हैं? 2015-16 के डेटा के अनुसार भारत में प्रति 1000 लोगों में 50 लोग बेरोज़गार हैं, बिहार सारे राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों को मिलाकर 60 के साथ, 15वें स्थान पर है।

लेकिन डेटा और रिसर्च तो राहुल गाँधी के वश की बात है भी नहीं, इसलिए नब्बे के दशक में रोज़गार के क्या हाल थे, इस पर मैं नहीं जा रहा। वैसे, अपहरण, रंगदारी, ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम आदि को भी ‘रोज़गार’ में मिला लिया जाए, तो भी वो दौर भूलने लायक ही था। जो अस्सी और नब्बे में जन्मे हैं, उन्हें पता है कि किस ख़ौफ़ में हमने जीवन जिया है।

उस दौर का बच्चा जानता है कि उसे अपने माँ-बाप से दूर, किसी प्राइवेट स्कूल के हॉस्टल में रहना होता था ताकि उसे बेहतर शिक्षा मिले, उसका अपहरण न हो, या जबरन कोई पकड़ कर शादी न कर दे। चाणक्य, चंद्रगुप्त, बुद्ध और दिनकर की धरती पर लालू भी पैदा होगा, ये अगर इन्हें पता होता तो अपने नाम और काम के लिए, ये लोग भी कई लाख बिहारियों की तरह शर्म से कहते, “मैं तो दिल्ली का हूँ।” 

‘बिहारी’ होना शर्मिंदगी की निशानी थी, और आज भी करोड़ों बिहारियों के लिए है जो बाहर रह रहा है। बिहारियों की इतनी दुर्गति हुई कॉन्ग्रेस और लालू के काल में कि, वो और ख़राब स्थिति में जा ही नहीं सकता था। वहाँ से ऊपर आने की ही संभावना थी। ‘बिहारी बहुत मेहनती होते हैं, पढ़ने में बहुत आगे’, ये भी आपने बहुत सुना होगा। लेकिन इसके पीछे की कहानी आप समझ नहीं सकते अगर आप बिहारी नहीं हैं।

मेहनत और पढ़ाई ही वो चीज़ें थीं जो हमारे वश में थीं। मेहनत के लिए पैसा नहीं लगता, और किरासन तेल के डिबिया, या लालटेन की रोशनी में सेकेंड हैंड किताबें पढ़कर हम बेहतर स्कूलों में जाते रहे, और अपनी राह बनाते रहे। वो इसलिए क्योंकि पढ़ाई के सिवाय कोई चारा नहीं था। और, चारा तो वैसे भी लालू जी ही खा गए। 

आज राहुल गाँधी गाँवों के युवा से पूछने की बात कहते हैं! बिहार में एक तय तरीके से सारे कारख़ानों को किसने बंद होने दिया? किस केन्द्र और राज्य सरकार की नीतियों ने यहाँ के स्कूलों की दुर्गति की? किस सरकार की नीति ने अपराध को इतना बढ़ावा दिया कि लोग भारत ही नहीं, अफ़्रीका तक जाकर बसने लगे? क्या कारण थे कि बिहार में कभी भी तरह का निवेश करने से लोग कतराते थे, और आज भी कतराते हैं?

रोजग़ार लाने के लिए जो माहौल चाहिए था, वो तो बर्बाद कर दिया तुमने और तुम्हारे साथियों ने! बची हुई कसर, बिहार को लेकर जो मानसिकता बनी कि ‘ट्रेन से जाओगे तो घड़ी चुराने के लिए लोग हाथ काट लेते हैं’, इस डर ने पूरी कर दी। कमाल की बात नहीं है कि अंडरवर्ल्ड के ख़ौफ़ से दहले मुंबई के लोग, बलात्कारों की राजधानी दिल्ली के लोग, राजनैतिक हत्याओं और अपराधों वाले उत्तर प्रदेश के लोग भी बिहार का नाम सुनकर वहाँ जाने से मना कर देते हैं? जबकि अपराधों के नज़रिए से देखें तो कोई भी जगह बिहार से कम तो नहीं ही है। फिर ये माहौल बनाने में किसका हाथ था कि लोग वहाँ फ़ैक्टरी लगाने की नहीं सोचते?

ये सब याद है कि नहीं जब रेल बजट में हर राज्य की राजधानी को पटना से डायरेक्ट ट्रेन से जोड़ दिया गया था? क्या उससे पटना में पर्यटन को बढ़ावा देना चाहता था लालू? या हर राज्य में ईंट ढोने से लेकर, रिक्शा खींचने, भट्टी में औज़ार बनाने, खेतों में फ़सल काटने और तमाम तरह के काम करने के लिए ‘चीप’ लेबर सप्लाय करने के रास्ते बना रहा था? याद आया कुछ?

शर्म कर लो राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव! तुम्हारी शक्लें और तुम्हारे मुँह से बिहार की भलाई की बात सुनता हूँ तो नीतिश के साथ चुनकर आते ही पहले दो महीने में 578 हत्याएँ याद आ जाती हैं। और फिर याद आती है दिल्ली के दोस्तों की बात कि ‘बिहार ने लालू को दोबारा कैसे चुन लिया, तुम लोग *** हो, और रहोगे’। शायद वो सही था।

जेल में बंद एक अपराधी को अपना सहयोगी मानकर बिहार की स्थिति सुधारने की बात सुनना देह में सिहरन ला देता है। लेकिन क्यों न हो, पब्लिक के पैसे से परिवार को पालने में जैसे राहुल के घरवाले, वैसे ही तेजस्वी, ऑटोमेटिक ट्यूनिंग है। इनकी फ़्रीक्वेंसी मैच करती है, दोनों ही परिवारों ने देश और राज्य को लूटा और बर्बाद किया है। इसलिए एक दूसरे के नेचुरल अलाय (प्राकृतिक सहयोगी) तो बनेंगे ही।

राहुल गाँधी, बिहार में बेरोज़गारी है, लेकिन तेजस्वी के बापू और आपका ख़ानदान उसके लिए ज़िम्मेदार है। नीतिश भी ज़िम्मेदार है, लेकिन नब्बे प्रतिशत जवाबदेही आपकी है। चोरों को दोबारा सत्ता देकर एक बार बिहार ने देख लिया है, शायद अगली बार वो ऐसी गलती नहीं करेंगे। 

क़ायदे से आपको ‘ये जो कैलाश है, वो एक पर्वत है’ पर ही रह जाना चाहिए था। आपको डिटॉक्सिफ़िकेशन की ज़रूरत है क्योंकि जिस माहौल में आपकी परवरिश हुई है, उस माहौल में नैसर्गिक रूप से आपको चोरों की संगति पसंद आएगी। नाना के जीप से लेकर बाप के टैंक और माँ के पता नहीं किस-किस घोटाले तक, करप्शन तो डीएनए लेवल तक उतर चुका है। आपको पूरे परिवार, अपने घर और हो सके तो देश से दूर रहना चाहिए क्योंकि जब देश तबाह हो रहा था, तब आप बच्चे थे। लूट के दूसरे दौर में सत्ता आपके माताजी के पास थी। ये बात और है कि आप देश को लूटने पर अपना भी पारिवारिक हक़ जताना चाहते हों!

आप क्यूट आदमी हैं, आपको दोनों गालों में डिम्पल पड़ते हैं, आप कहाँ ये राजनीति और बिहार के बेरोज़गार युवाओं को राह दिखाने आ गए! पहले अपने लिए कोई ढंग का काम देख लीजिए। क्योंकि आपके भी घर में घुसकर अगर मैं पूछ लूँ कि ये चिरयुवा क्या करता है, तो आपकी माताजी ‘मेला छोना बाबू, अभी तो लैली में एछपीछ देता है’ से ज़्यादा नहीं कह पाएँगी। और हाँ, जैसे आपने कहा न कि मोदी के गुजरात में बिहारियों को भगा दिया जाता है, वैसे ही शायद आपकी माताजी ये न बोल दें, “मोदी ने भारत से मेरे युवा बेटे का रोज़गार छीन लिया है, और उसे भगाना चाहता है।”

माँ की मौत की ख़बर के बाद रोया, खूब रोया… लेकिन इस क्रिकेटर ने नहीं छोड़ा टीम का साथ

‘कर्म ही पूजा है’ इस बात को आपने ज़रूर सुना होगा, लेकिन वेस्टइंडीज़ क्रिकेट टीम के तेज़ गेंदबाज अल्ज़ारी ज़ोसेफ़ ने इसको कुछ इस तरह से परिभाषित किया है, जिससे किसी की आँख नम हो जाएँ। जी हाँ वेस्टइंडीज़ के इस गेंदबाज की माँ का निधन इंग्लैंड के ख़िलाफ़ दूसके टेस्ट मैच के दौरान हो गया, बावजूद इसके वह मैच में खेलने के लिए मैदान में उतरे और साथी खिलाड़ियों का बख़ूबी साथ दिया।

अल्ज़ारी ज़ोसेफ़ की माँ शेरॉन का शनिवार की (2 फरवरी 2019) सुबह निधन हो गया था। जिसके बाद वह काफ़ी देर तक माँ की याद में रोए थे। जिसके बाद उनकी टीम के खिलाड़ियों ने उन्हें समझाया और उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की। बता दें कि, अल्ज़ारी ज़ोसेफ़ की माँ काफ़ी समय से बीमार चल रहीं थी। साथी खिलाड़ी की माँ के देहांत पर दुख व्यक्त करते हुए दोनों टीम के खिलाड़ियों ने मैच के तीसरे दिन अपने बाजू़ पर काली पट्टी बांधे रखी।

वेस्टइंडीज़ टीम के मैनेजर रॉल लुइस ने कहा, ‘युवा तेज गेंदबाज अल्ज़ारी ज़ोसेफ़ की माँ शेरॉन जोसेफ़ की सूचना पाकर हम बहुत दुखी हुए। वह अब इस दुनिया में नहीं रहीं। हम यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि ये समय अल्ज़ारी और उनके परिवार के लिए मुश्किल भरा है। उम्मीद करते हैं कि वो जल्द से जल्द इससे उबर जाएँगे।’

बता दें कि तीसरे दिन का खेल शुरू होने से पहले अल्ज़ारी विंडीज टीम के हर्डल में मौजूद थे। टीम प्रबंधन ने उनके बल्लेबाजी और गेंदबाजी करने की पुष्टि भी की है। मैच के तीसरे दिन मेजबान वेस्टइंडीज़ की टीम पहली पारी 306 रनों पर समाप्त हुई थी। जिसमें वेस्टइंडीज़ के लिए डेरेन ब्रावो ने 50 रनों की पारी खेली।

बिहारियों की बात कर राहुल-तेजस्वी ने अपने पैर पर ‘8 बार’ मारी कुल्हाड़ी – 5वीं बहुत जोर की लगी

बिहार के जनाकांक्षा रैली में राहुल जी बोल रहे थे, मंच पर लालू यादव के सुपुत्र एवं गठबंधन के नए साथी तेजस्वी यादव भी मौजूद थे।

राहुल जी की रैली थी तो जैसा कि हमेशा होता है राफेल का जिक्र हुआ और हर बार की तरह उन्हें आज भी सही आँकड़ा याद नहीं था। 7 दिन पहले का अनिल अंबानी का ₹45,000 करोड़ का कर्ज आज ₹1 हजार लाख करोड़ हो गया (अंक में लिखना पड़ा क्योंकि मुझे ₹1 हजार लाख करोड़ लिखना नहीं आता)।

खैर, बात निकलते-निकलते बेरोजगारी तक पहुँच गई और श्रीमान ये बोल बैठे कि बिहार में बेरोजगारी बड़ी समस्या है। लोगों को रोजगार के लिए गुजरात जाना पड़ता है और हम इसे खत्म करके रहेंगे, जिसे सुनकर साथ बैठे तेजस्वी यादव जी जोर-जोर से तालियाँ बजाते दिखे।

पर जोश में आकर ये बात बोलते समय न राहुल जी को ये याद रहा न ही तेजस्वी यादव जी को कि असल में वो खुद पर हमला कर रहे हैं। कैसे, वो एक बिहारी होने के नाते मैं बताता हूँ –

आजादी के बाद से 1990 तक 40 साल तक 1-2 साल छोड़ दें, तो करीबन कॉन्ग्रेस ने ही लगातार बिहार में शासन किया।

उसके बाद 1990 से 2005 तक भी करीबन 15 साल राहुल के अभी के हमजोली लालू यादव एंड फैमिली ने शासन किया।

तो क्या बिहार में रोजगार की समस्या 2005 के बाद शुरू हुई? क्या पहले गुजरात से लोग बिहार नौकरी ढूँढने जाते थे?

जाते होंगे पर मेरे पिता 1992 में गुजरात आए थे, पढ़ने नहीं काम की तलाश में।

97 में चाचा जी आए और फिर करीब-करीब पूरा खानदान यहीं आ गया। यहाँ आकर पता चला एक चौथाई गुजरात बिहार के लोगों से भरा पड़ा है, क्यों? क्या करने आये थे वो सब? बिहार में लालू-कॉन्ग्रेस की सरकार जबर्दस्ती नौकरी दे रही थी। उससे भाग कर आए थे? जी नहीं, हर व्यक्ति यहाँ काम की तलाश में आया था।

दूसरी बात ये कि राहुल जी खुद अपने मुँह से कबूल किए कि बिहार के लोग गुजरात जाते हैं काम ढूँढने। तो क्या ये मोदी जी के उस बात पर मुहर नहीं लगाता है कि गुजरात रोजगार देने के मामले में सबसे बेहतर है? यहाँ के लोग खुशहाल होते हैं?

क्या ये इस बात पर मुहर नहीं लगाता है कि व्यापार करने की सुगमता गुजरात में दूसरे राज्यों की अपेक्षा बेहतर है?

इसलिए अगर ठीक से विश्लेषण करें तो राहुल जी का आज का भाषण भाजपा के खिलाफ कम और कॉन्ग्रेस-जनता दल के खिलाफ ज्यादा माना जा सकता है।

यह विचार Mr Sinha का है। जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

₹6000 से बढ़ सकती है किसानों को दी जाने वाली सहायता राशि: जेटली

किसानों को सालाना ₹6,000 की न्यूनतम सहायता राशि को भविष्य में बढ़ाया जा सकता है। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसके संकेत दिए हैं। मोदी सरकार द्वारा पेश किए गए अंतरिम बजट में कार्यवाहक वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने 2019-20 के बजट में किसानों को सालाना ₹6,000 की सहायता देने की घोषणा की थी। बता दें कि यह राशि तीन किश्तों में किसानों को दी जाएगी, जो ₹500 मासिक बैठती है।

जानकारी के अनुसार जेटली ने कहा कि सरकार के संसाधन बढ़ेंगे, इससे भविष्य में किसानों को दी जाने वाली सालाना राशि को बढ़ाया जा सकेगा। साथ ही राज्य इस राशि के ऊपर अपनी ओर से आय समर्थन योजनाओं की घोषणा भी कर सकते हैं।

इस दौरान जेटली ने राहुल गाँधी के उस बयान पर जिसमें उन्होंने कहा था सरकार किसानों को प्रतिदिन ₹17 देकर उनका अपमान कर रही है। तंज कसते हुए कहा कि विपक्ष के नेता को ‘परिपक्व होना चाहिए’ और उन्हें यह समझना चाहिए कि वह किसी कॉलेज यूनियन का चुनाव नहीं राष्ट्रीय चुनाव लड़ने जा रहे हैं।

जेटली ने कहा, ’12 करोड़ छोटे और सीमांत किसानों को हर साल ₹6,000 दिए जाएँगे। इसके अलावा सरकार की योजना उन्हें घर देने, सब्सिडी पर खाद्यान्न देने, मुफ़्त चिकित्सा सुविधा, मुफ़्त साफ़-सफ़ाई की सुविधा, बिजली, सड़क, गैस कनेक्शन देने की योजना किसानों की दिक्कतों को दूर करने से जुड़ी हैं।’

उन्होंने कहा कि किसानों को न्यूनतम आय समर्थन देने का यह सरकार का पहला क़दम है। सरकार के संसाधन बढ़ने के साथ इस राशि को भी बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए हमने ₹75,000 करोड़ सालाना से शुरुआत की है।

‘राज्यों की मदद से बनेगी बात’

जेटली ने कहा कि कुछ राज्यों की मदद से इस राशि को और अधिक बढ़ाया जा सकेगा। जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों ने इस बारे में योजना शुरू की है। मुझे लगता है कि और राज्य भी उनके रास्ते पर चलेंगे। उन्होंने कहा कि किसानों की समस्याओं और कृषि क्षेत्र की दिक्कतें दूर करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की भी बनती है।

जेटली ने कहा, ‘मैं नकारात्मक सोच रखने वाले नवाबों से कहूँगा कि वे अपनी राज्य सरकारों से कहें कि इस समर्थन के ऊपर वे सरकारें भी कुछ मदद दें।’ उन्होंने कहा कि सभी राजनीतिक दल इस मामले में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम करेंगे तो किसानों को ज्यादा लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि ज़्यादातर केंद्रीय योजना 60:40 अनुपात में होती हैं। इसमें भी अगर राज्य अपनी ज़िम्मेदारी समझें तो किसानों का ज़्यादा हित हो सकेगा।