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कुम्भ 2019: अखाड़ों की परंपरा और जटाएँ

प्रयागराज में विश्व के सबसे बड़े धार्मिक मेले कुम्भ की सबसे बड़ी विशिष्टता इसमें शामिल होने वाले अखाड़े हैं। जूना अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, उदासीन अखाड़ा और अब किन्नर अखाड़ा समेत कुल चौदह अखाड़े है। अखाड़ो की परंपरा अपनी विशिष्टता, भव्यता और रोचकता के कारण हमेशा से जनमानस में कौतूहल, जिज्ञासा का विषय रहे हैं।

इन अखाड़ों का मूल रूप ‘अखंड’ है इसी कारण आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा और धार्मिक परंपरा को अक्षुण्ण बनाने के लिए साधुओं के संघ को मिलाने का प्रयास किया था और अंततः अखाड़ों की स्थापना हुई। इन अखाड़ों की सबसे खास बात यह है कि ये शस्त्र और शास्त्र दोनों में पारंगत होते हैं। अखाड़ों का निर्माण सनातन धर्म की रक्षा और धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए किया गया।

जटा मुकुट की परम्परा

इसी सिलसिले में विमल श्रीवास्तव ने भिन्न-भिन्न अखाड़ों के कुछ महंतो से बात की। श्री महंत केशव नाथ जी (महंत, जूना अखाड़ा) ने कुम्भ में आने वाले महंतों और साधुओं की जटाओं पर बात करते हुए कहा, “अखाड़ों की परंपरा में सबसे अहम है जटा मुकुट की परम्परा। बड़ी मुश्किल से तैयार होती हैं ये जटाएँ और इनकी देख-रेख भी बहुत सम्हाल कर की जाती है। अखाड़ों के साधु इसे अपना आभूषण मानते हैं और उनका कहना है जटायुक्त साधु ‘दर्शनी साधु’ होते है। दर्शनी जटाएँ रस्सी की तरह बँटी हुई होती हैं। यानी जटा का मुकुट होता है।”

जटाओं की महत्ता पर महंत सहदेवानंद जी (महंत, जूना अखाड़ा) ने बताया, “एक साधु की पहचान उसकी जटाओं से होती है और उसे बड़ा करने में इन्हें कई साल लग जाते हैं। तब जा कर इनकी जटाएँ इनके कद से भी कहीं बड़ी हो जाती हैं। इन जटाओं को बड़ा करने के लिए ये साधु इन्हें कंडा की विभूति देते है। अखाड़ों की जटा परंपरा अनादि काल से चली आ रही है।”

इसी विषय पर नागा साधु दिगम्बर कृष्णा पूरी जी ने भी अपनी बात कही, “वैसे तो कुम्भ मेले में अखाड़ों की कई प्राचीन परंपराएँ देखने को मिल रही हैं, जैसे नागा बनने की परंपरा, अखाड़ों की शस्त्र परंपरा आदि लेकिन इन सब में जटा परंपरा अपने आप में अनोखी परम्परा मानी जाती है।”

कुम्भ 2019 से जुड़ी कुछ तस्वीरें आप यहाँ देख सकते हैं।

गुरु गोबिंद सिंह के सम्मान में PM मोदी ने जारी किया 350 रुपए का स्मारक सिक्का

गुरु गोबिंद सिंह की जयन्ती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 350 रुपए का स्मारक सिक्का जारी किया। दिल्ली में चल रहे जयन्ती समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी शिरकत की।

गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें गुरु थे, जिनकी जयन्ती पर स्मारक सिक्का जारी हुआ। दिल्ली में सभा को संबोधित करने के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह एक महान योद्धा, दार्शनिक, कवि और गुरु थे। उन्होंने अत्याचार और अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी शिक्षा हमेशा धर्म और जाति की बेड़ियों को तोड़ने के लिए रही। उनके द्वारा दिया गया प्रेम, शांति और त्याग का संदेश आज भी सब में बेहद प्रासंगिक है। गुरु गोबिंद सिंह के प्रति अपना सत्कार अदा करने की दिशा में स्मारक सिक्के को नरेंद्र मोदी ने एक बहुत ही छोटा सा कदम बताया।

इस सिक्के को जारी करने के बाद पीएम मोदी ने कहा कि भारत के पास जो संस्कृति और ज्ञान की विरासत है, उसे विश्व के कोने-कोने तक फैलाए जाने का कार्य किया जा रहा है। पीएम मोदी ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह का काव्य भारतीय संस्कृति और हम लोगों के जीवन की सरल अभिव्यक्ति है। जिस प्रकार गुरु गोविंद सिंह जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था, वैसे ही उनका काव्य भी अनेकों विषयों को अपने में समाए हुए है।

इस बीच प्रधानमंत्री ने करतार पुर बॉर्डर पर भी बात की। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के लगातार प्रयासों के बाद करतारपुर कॉरिडोर बनने जा रहा है। अब गुरु नानक जी के रास्ते पर चलने वाला हर भारतीय दूरबीन की मदद से नहीं बल्कि खुद अपनी आँखों से गुरुद्वारा दरबार साहिब के दर्शन कर पाएगा।

नरेंद्र मोदी ने अगस्त 1947 में हुई चूक का इस कॉरिडोर को प्रायश्चित बताया है। 1947 में बँटवारे के समय ये महत्वपूर्ण स्थल रणनीतिक चूक की वजह से पाकिस्तान के हिस्से में चला गया।

केंद्र सरकार द्वारा कॉरिडोर मामले में किया गया यह काम सिखों और हर भारतीय के ज़रिए सराहा जा रहा है। साल 2017 में 5 जनवरी को पीएम ने 350वीं जयन्ती पर स्मारक के तौर पर डाक टिकट की भी शुरुआत की थी।

इन स्मारक सिक्कों के बारे में आपको बता दें कि ये किसी खास मौके पर ज़ारी किए जाते हैं। इनके ऊपर उस अवसर से जुड़े दिन का संदर्भ दिया गया होता है। ये प्राचीन स्मारक स्थलों, ऐतिहासिक व्यक्तियों, लुप्तप्राय प्रजातियों आदि पर प्रकाश डालते हुए थीम पर आधारित हो सकते हैं।

अभी तक महान भारतीय एक्टर और राजनेता स्वर्गीय एमजी रामचंद्रन की याद में 100 रुपए और 5 रुपए का सिक्का पीएम मोदी द्वारा जारी किया गया है। इसके अलावा कर्नाटक शैली की गायिका एमएस सुब्बालक्ष्मी के सम्मान में 100 रुपए और 10 रुपए का सिक्का भी जारी किया गया था।

भारतीय इतिहास में स्मारत सिक्के चलाने की प्रथा रही है। 1964 में सबसे पहला स्मारक सिक्का प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सम्मान में जारी किया गया था।

#MeToo: फ़िल्म डायरेक्टर राजकुमार हिरानी पर यौन शोषण का आरोप

संजू, 3 इडियट्स, मुन्नाभाई और पीके जैसी फिल्में बनाने वाले बॉलीवुड के प्रसिद्ध डायरेक्टर राजकुमार हिरानी भी ‘Me Too’ की जद में आ गए हैं। ये आरोप उनके साथ काम करने वाली एक महिला ने लगाया है। पीड़िता के अनुसार राजकुमार हिरानी ने उन्हें करीब छह महीने तक प्रताड़ित किया। यह महिला पिछले साल आई फ़िल्म संजू के पोस्ट प्रोडक्शन क्रू में शामिल थीं। उन्होंने हिरानी पर आरोप लगाया कि वो उनके साथ बदसलूकी करते थे।

बता दें कि भारत में ‘मी टू (Me Too)’ अभियान की शुरुआत पिछले वर्ष अक्टूबर में तनुश्री दत्ता द्वारा नाना पाटेकर पर लगाए गए आरोपों के साथ हुई थी। इसके बाद अभिनेता आलोक नाथ, फ़िल्मकार साज़िद खान, पत्रकार विनोद दुआ सहित कई जानी-मानी हस्ती इसकी जद में आ गए थे। राजकुमार हिरानी पर लगे आरोपों को बॉलीवुड का सबसे बड़ा ‘मी टू (Me Too)’ स्कैंडल माना जा रहा है। राजकुमार हिरानी पिछले 15 सालों से फ़िल्म निर्देशन में सक्रिय हैं और इस दौरान उन्होंने आमिर ख़ान, संजय दत्त और रणबीर कपूर सहित कई बड़े अभिनेताओं के साथ काम किया है।

हफ़्फिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पीड़िता संजू के पोस्ट प्रोडक्शन के दौरान इस सच को सबके सामने लाने का साहस नहीं कर पाईं क्योंकि राजू हिरानी इंडस्ट्री में एक बड़े नाम हैं और वो उसे बदनाम कर सकते थे। साथ ही हिरानी ने पीड़िता को नौकरी से निकालने तक की धमकी भी दे डाली थी। ये सारे खुलासे नवंबर 3, 2018 को फ़िल्म निर्माता विधु विनोद चोपड़ा को भेजे गए एक ईमेल से हुए हैं।

इस ईमेल में पीड़िता ने कहा था वो अपने से 30 साल बड़े हिरानी को पिता-तुल्य मानती थी लेकिन उन्होंने उनके दिल, दिमाग और शरीर के साथ खिलवाड़ किया। उस महिला ने हिरानी पर अपने ऑफिस में बुला कर बदसलूकी करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वो हिरानी की प्रताड़ना को सिर्फ इसलिए सहती रही क्योंकि उनके पिता गंभीर रोग से पीड़ित थे और वो अपनी नौकरी नहीं छोड़ सकती थी।

वहीं हिरानी ने हफ़्फिंगटन पोस्ट से बात करते हुए इन सभी आरोपों को निराधार बताया और दावा किया कि उनका उस महिला के साथ सिर्फ़ प्रोफेशनल रिश्ते थे, और कुछ नहीं। उनके वकील ने भी हिरानी पर लगे आरोपों का खंडन किया है।

निर्माता के तौर पर ‘इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ हिरानी की अगली फ़िल्म है, जो फरवरी में रिलीज़ होने वाली है। इस फ़िल्म में अनिल कपूर, सोनम कपूर और राजकुमार राव मुख्य भूमिका में हैं।

दुबई में ‘हिन्दू’ शब्द बोलने में भी क्यों कतराए जनेऊधारी राहुल गाँधी?

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी इन दिनों दुबई के दौरे पर हैं। राहुल यहाँ न सिर्फ पीएम मोदी पर हमला बोल रहे हैं बल्कि गाँधी के विचारों, देश की सांस्कृतिक विरासत और धरोहर को भी चोट पहुँचा रहे हैं। दुबई में भारतवंशियों को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने न सिर्फ ये साबित किया कि उन्हें दर्शन शास्त्र का थोड़ा भी ज्ञान नहीं है, बल्कि ये भी साबित किया कि उन्हें महात्मा गाँधी के अहिंसा के बारे में भी कुछ पता नहीं। दरअसल राहुल गाँधी यहाँ लोगों को अहिंसा का पाठ पढ़ा रहे थे और कह रहे थे कि महात्मा गाँधी ने प्राचीन भारतीय दर्शन, इस्लाम, जूडाइजम से अहिंसा की विचारधारा को लिया है। यहाँ उल्लेखनीय बात यह है कि राहुल ने एक बार भी यह नहीं कहा कि अहिंसा का मूल मंत्र हिंदू धर्म से ही होकर गुजरता है।

ऑडियंस देखकर बोलते हैं राहुल गाँधी

राहुल गाँधी कब क्या बोल जाते हैं, ये उन्हें ही नहीं पता होता है। तभी तो हिंदू शास्त्रों और जैन दर्शन से उठाए गए अहिंसा के पाठ को इस्लाम, जूडाइजम, क्रिश्चैनिटी से जोड़ दिया। राहुल की मानें तो महत्मा गाँधी ने पाश्चात्य संस्कृति से अहिंसा का पाठ पढ़ा। कमाल की बात है कि जिन अंग्रेज या इस्लामी आक्रांताओं से भारत को लंबे समय तक जूझना पड़ा है, आज राहुल गाँधी ने राजनीति करते हुए उन्हें ही अहिंसा का क्रेडिट दे दिया।

भारतीय दर्शन के ‘धर्म दर्शन’ में ‘धर्म’ और ‘रिलीजन’ की अलग ही थ्योरी है। उसमें कहा गया है कि ‘सनातन धर्म’ ही एक मात्र धर्म है, बाकी सभी ‘रिलीजन’ हैं। जिस पाश्चात्य दर्शन ने हमसे अहिंसा का पाठ पढ़ा और सीखा, राहुल गाँधी उनसे महात्मा गाँधी के अहिंसा के पाठ की तुलना कर रहे हैं! ये न सिर्फ भारतीय दर्शन का अपमान है बल्कि महात्मा गाँधी का अपमान भी है। अब सवाल उठता है कि देश में हिंदू धर्म की दुहाई देने वाले और जनेऊ पहनकर खुद को हिंदू कहने वाले राहुल गाँधी विदेश में जाकर वहाँ के ऑडियंस के हिसाब से क्यों बोलने लगते हैं? 

जनेऊधारी राहुल को हिन्दू शब्द से इतना परहेज़ क्यों

देश में रहकर खुद को हिंदू धर्म का रक्षक और रहनुम़ा कहने वाले राहुल भी समय के साथ एक दम बदल जाते हैं। उन्हें पता है कि अवसर का फायदा कैसे लेना है। देश में रहने पर न मालूम उनके अंदर कहाँ से देशभक्ति जाग जाती है। शायद बहुसंख्यकों का वोट उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करता है। तभी तो सोमनाथ मंदिर में जाकर राहुल गाँधी मंदिर के रज़िस्टर में ग़ैर हिंदू के तौर पर एंट्री करते हैं और तिलक लगाते हुए जनेऊ धारण करके खुद को विशुद्ध हिंदू बताते हैं। लेकिन जैसे ही वो विदेश के दौरे पर होते हैं, वहां के बहुसंख्यकों से ताली बजवाने के लिए ऊल-जलूल कुछ भी बोलते हैं। भले ही वो अहिंसा का गलत पाठ पढ़ाना या हिंदू धर्म का अपमान करना क्यों न हो।

BJP कार्यकर्ता उम्मीदें हारकर चाहते हैं सपा-बसपा से जुड़ना: अखिलेश यादव

सपा-बसपा के गठबंधन के बाद, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने रविवार को ट्वीट के ज़रिए इस बात को कहा कि इस गठबंधन ने बीजेपी के कई लोगों को हतोत्साहित किया होगा। इसलिए पार्टी के निराश और अशांत कार्यकर्ता अब सपा-बसपा से जुड़ना चाहते हैं।

शनिवार (जनवरी 12, 2019) को औपचारिक रूप से गठबंधन की घोषणा करने के बाद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने रविवार (जनवरी 13, 2019) को ट्वीट किया है कि बीजेपी के कई कार्यकर्ता बेहद हताश और निराश हैं और अब सपा-बसपा का हिस्सा बनना चाहते हैं।

बता दें कि शनिवार को समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की मायावती ने उत्तर प्रदेश में अपने गठबंधन की घोषणा की। ये दोनों पार्टियाँ 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। इस गठबंधन पर पिछले साल मार्च से ही दोनों पार्टियों के मुखिया मायावती और अखिलेश यादव काम कर रहे थे।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और भाजपा नेताओं की इस गठबंधन को लेकर कई प्रतिक्रियाएँ आईं। जिसके बाद अखिलेख यादव ने ट्वीट करके कहा है, “बसपा-सपा में गठबंधन से न केवल भाजपा का शीर्ष नेतृत्व व पूरा संगठन बल्कि कार्यकर्ता भी हिम्मत हार बैठे हैं। अब भाजपा बूथ कार्यकर्ता कह रहे हैं कि ‘मेरा बूथ, हुआ चकनाचूर’। ऐसे निराश-हताश भाजपा नेता-कार्यकर्ता अस्तित्व को बचाने के लिए अब बसपा-सपा में शामिल होने के लिए बेचैन हैं।”

हम उनके इस ट्वीट को गठबंधन पर भाजपा द्वारा दी गई प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया भी कह सकते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने खुल कर गठबंधन पर बात की।

अखिलेश का कहना है कि इस गठबंधन का बीज तो उसी दिन रख दिया गया था, जब भाजपा के नेताओं ने मायवती जी को अपमानित करना शुरू किया था,और बीजेपी ने उन्हें सज़ा देने की बजाए उन्हें मंत्री पद पर बिठा दिया (बता दें अखिलेश की ये बात उस संदर्भ में है, जब मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफ़ा दिया था)।

कश्मीर में सुरक्षा बलों को बड़ी कामयाबी; मोस्ट वॉन्टेड आतंकी ढेर

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों को बड़ी कामयाबी मिली है। शनिवार (जनवरी 12, 2019) की रात कुलगाम में हुई मुठभेड़ में खूंखार आतंकवादी ज़ीनत उल-इस्लाम सहित दो आतंकवादी मारे गए। ख़बरों के अनुसार पुलिस को कुलगाम जिले के कटपोरा इलाक़े में आतंकवादियों के छिपे होने की सूचना मिली थी। इसके आधार पर सुरक्षा बलों ने वहाँ तलाशी अभियान चलाया। सुरक्षा बलों द्वारा घेराबंदी करने के बाद बौखलाए आतंकियों ने उन पर गोलियाँ बरसानी शुरू कर दी, जिसका सुरक्षा बलों ने मुँहतोड़ जवाब दिया।

इसके अलावे मुठभेड़ स्थल से पुलिस ने भारी मात्रा में गोला-बारूद भी बरामद किया है। पुलिस ने आम नागरिकों को वहाँ न जाने की सलाह दी है क्योंकि उन्हें इस बात का अंदेशा है कि वहाँ बम पड़े हो सकते हैं। पुलिस के अनुसार उन्होंने मुठभेड़ के वक्त आतंकियों को आत्मसमर्पण करने को भी कहा लेकिन वो नहीं माने और गोलियाँ चलाते रहे।

मारा गया आतंकी ज़ीनत उल-इस्लाम मोस्ट वॉन्टेड की केटेगरी में था और अल-बद्र नमक आतंकी संगठन का सरगना था। इस से पहले वह कश्मीर के खूंखार आतंकी समूह हिज़बुल मुज़ाहिदिन से भी जुड़ा हुआ था। पुलिस ने बताया कि वह 2015 से ही घाटी में आतंक फैलाने के काम में लगा हुआ था। ज़ीनत ने अल-बद्र को मजबूत बनाने के लिए हिज़बुल से समझौता भी कर रखा था। उसे IED बम एक्सपर्ट के रूप में भी जाना जाता था। मारे गए दूसरे आतंकी की पहचान शक़ील डार के रूप में की गई है।

आतंकियों को मारे जाने के बाद सुरक्षाबलों पर पथराव शुरू कर दिया गया और इलाक़े में हिंसा भड़क गई। ताजा ख़बरों एक अनुसार ऐसी स्थिति को देखते हुए पूरे क्षेत्र में इंटरनेट सेवा ठप्प कर दी गई है। वहाँ और जवान तैनात कर दिए गए हैं ताकि हिंसा को काबू में किया जा सके। बता दें कि कुलगाम दक्षिण कश्मीर में स्थित है।

कश्मीर में हाल के दिनों में आतंकियों द्वारा IED बमों के इस्तेमाल करने की घटनाएँ बढ़ी हैं। शुक्रवार (जनवरी 11, 2019) को ही कश्मीर के राजौरी जिले में लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल के पास सेना के मेजर सही दो जवान शहीद हो गए थे। इन घटनाओं में ज़ीनत या उसके गैंग के हाथ होने की संभावना हो सकती है। फ़िलहाल पुलिस ने मामला दर्ज कर आगे की करवाई शुरू कर दी है।

सागरिका जी, मोदी के साथ सेल्फ़ी लेने पर बॉलीवुड कलाकार ‘भक्त’ हो गए, फिर आप क्या हैं?

जब से पत्रकारिता की तरफ रुख़ किया है, तबसे महिला पत्रकारों में सागरिका घोष और बरखा दत्त दो ऐसे नाम रहे हैं, जिन्हें हर दूसरे शख़्स के मुँह से मैंने सुना और जाना है। क्लास में टीचर के लेक्चर से लेकर सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर आप लोगों के बारे में जब भी पढ़ने का मौक़ा मिला तो अपने समय में से समय निकालकर आप लोगों को समय दिया। वर्चुअल स्पेस में आप लोगों की बातचीत और सक्रियता ने ही हमको मौक़ा दिया कि हम आपसे न जुड़ते हुए भी आपसे, और आपकी शैली से, बहुत कुछ सीख सकें। क्योंकि, पता होना चाहिए देश में पितृसत्ता की इतनी कसी जकड़ में भी आप लोग उस मुकाम तक किस जज़्बे को लेकर पहुँची हैं, जहाँ तक जाने के हम सिर्फ़ सपने देख पाते हैं।

मैंने अभी इस मीडिया इंडस्ट्री में कदम रखा है और अभी से कुछ पत्रकारों को पढ़ते-समझते हुए कई बार असहमति की दीवार मानो जैसे मुझे घेर लेती है और फिर मैं कुछ भी प्रतिक्रिया नहीं दे पाती। आख़िर, जिन्हें हमेशा से पढ़ा और जाना है, उनकी बातों पर सवाल हम जैसे नए लोग कैसे उठा सकते हैं। फिर भी क्या आप लोगों को कभी नहीं लगता कि हम बतौर पत्रकार सही दिशा में जाने की जगह कहाँ पर जा रहे हैं और इसका प्रभाव हम जैसों नए लोगों पर क्या पडे़गा जो अभी अपनी शुरूआत ही कर रहे हैं?

मैं छोटे स्तर पर रहकर सोशल मीडिया पर चल रही धार्मिक, राजनैतिक लड़ाईयों से तंग आ जाती हूँ, बहुत समय तक मैं सोशल मीडिया से ही दूर रही सिर्फ़ इसलिए क्योंकि मुझे अपने आस-पास के लोगों को जीना था, न कि सोशल मीडिया पर पसरे ज़हर को अपने भीतर उतारकर उनसे बहसों में उलझना था।

मैं अभी नई हूँ, इसलिए ज़्यादा सवाल करना नहीं सीख पाई और न ही मैं अभी पूर्णत: अपने भीतर नारीवाद की आग को जला पाई हूँ, शायद इसलिए असहमति की दीवार मुझे हमेशा काली दिखती है।

बरखा दत्त द्वारा उठाया गया सबरीमाला विवाद हाल ही के मामलों में शामिल है। इस मामले को पीरियड्स से जोड़कर देखने वालों को सिर्फ़ अपना अधिकार दिख रहा है। उसके लिए चाहे वो पीरियड्स की उलाहनाएँ देते हुए ही पूरे प्रबंधन को कोसें। लेकिन, न जानें क्यों किसी को उस मंदिर में विराजमान अयप्पा भगवान द्वारा लिया ब्रहमचर्य का वो प्रण नहीं दिख रहा है, जिसकी वजह से सालों से उनकी आराधना एक तय तरीक़े से होती रही है। धर्म को आधार और श्रद्धा को भाव मानने वाले लोग इतने मतलबी कैसे हो सकते है कि अपनी अधिकारों की लड़ाई में वो किसी और के प्रण को तोड़ने पर ही आमादा हो जाएँ। अगर हमारे हिंदू धर्म में वाकई पीरियड्स को अछूत होने की दिशा में देखा जाता, तो देश के सबसे बड़े मंदिरों में से एक कामाख्या मंदिर में रजस्वला होती देवी की पूजा क्यों की जाती?

ये बेहद शर्मनाक स्थिति है हमारे उस समाज की, कि हम आज नारीवाद के मामले में सिर्फ़ योनि से संबंधित बातों को ही करके अपनी छवि को बूस्ट कर पाते हैं, क्या हम थोड़ा सीधा होकर अपनी बात या रिपोर्ट नहीं कर सकते थे? लेकिन हाँ मैं समझती हूँ कि अगर सीधी तरीके से बातें होने लगीं तो मिर्च-मसाला टूथपेस्ट की ट्यूब में ही रह जाएगा।

बातों को किस तरह घुमाया जाता है वो तो ज़्यादा नहीं मालूम मुझे, लेकिन मैं लगातार कुछ आप जैसे कुछ लोगों को फ़ॉलो कर रही हूँ, बहुत दूर नहीं भी जा पाई तो आप जैसों तक थोड़ा तो पहुँच ही जाऊँगी।

इसके बाद एक बेहद मामूली-सा उदहारण है कि सागरिका घोष ने हाल ही में एक ट्वीट किया, जिसमें उन्होंने बॉलीवुड की स्थिति को और मिडिया की स्थिति को एक जैसा ही बताया है। साथ ही, उनका ये भी कहना भी रहा कि सरकार का फ़िल्म इंडस्ट्री पर जो नियंत्रण है वो बेहद अनौपचारिक और अत्यधिक है। हालाँकि, इस ‘नियंत्रण’ पर कुछ साक्ष्य या तर्क के साथ उन्होंने कहीं कुछ लिखा हो, मुझे नहीं पता। उनका मानना है जैसे कुछ पत्रकार ‘भक्त’ हैं वैसे ही कुछ कलाकार भी ‘भक्त’ हैं। अब समझ नहीं आता मैं पहले ‘भक्त’ होने की परिभाषा नेट पर सर्च करूँ या फिर उनके इस को ट्वीट को समझने में अपनी पूरी मानसिक शक्ति लगाऊँ!

मैं नई धरातल पर आकर इतना समझ पा रही हूँ कि किसी के साथ सेल्फ़ी लेना हमें उसका भक्त नहीं बना सकता है, लेकिन आप इतनी बड़ी गलती कैसे कर रही हैं? अगर सिर्फ़ सेल्फ़ी लेने से और अपना झुकाव दिखाने से कोई भक्त हो जाता है, तो लालू प्रसाद के साथ ली आपकी सेल्फ़ी, जो बेहद ख़ूबसूरत है, उससे हम नए लोग क्या समझें?

मेरे जैसे नसमझ तो इसको यही समझेंगे कि अगर मोदी के साथ एक तस्वीर लेना भक्त हो जाने की परिभाषा है तो लालू प्रसाद संग ली गई तस्वीरों का मतलब यह है कि लालू द्वारा किए गए ‘शुभ कार्यों’ में सागरिका की भी भागीदारी रही होगी या उनसे प्रभावित होकर वो भी अपने क्षेत्र में लालू के तौर तरीकों को अपनाने लगी होंगीं।

मैं उम्मीद करती हूँ जिस तरह महज़ एक सेल्फ़ी पर सागरिका ने बॉलीवुड के सितारों को भक्त कह दिया, उन्हें किसी ने ‘लालू की लाली’ न कहा हो। नवाज़ शरीफ के साथ खिंचाई तस्वीर को देखकर क्या यह समझ लिया जाए कि आप पाकिस्तान की तरफ से हिंदुस्तान पर हँस रही हैं।?

लालू प्रसाद के साथ सागरिका
नवाज़ शरीफ के साथ राजदीप और सागरिका

ये बातें महज़ समझने वाली बातें हैं कि प्रधानमंत्री मोदी देश की सबसे ऊँचे पद पर है अगर कोई उनके साथ सेल्फ़ी लेकर पोस्ट करता है, तो ये आत्मीयता का भाव भी हो सकता है, या भविष्य में याद करने के लिए एक स्मृति कि हम देश के प्रधानमंत्री से मिले थे। आज के दौर में सेल्फ़ी लेना बहुत आम बात है। भक्त शब्द की परिभाषा बहुत गहरी है। आप किसी भी संदर्भ में इसका प्रयोग करके न सिर्फ़ अपनी साख हम जैसों की नज़रों में धूमिल कर रही है बल्कि भारत के सांस्कृतिक शब्दों से भी छेड़-छाड़ कर रही हैं।

सोशल मीडिया पर इस फोटो पर किया गया प्रयोग जो बहुत कुछ बयान करता है

आप जैसे पत्रकारों को लेकर जो हमारे भीतर सीखने की ललक है उसे बने रहने दीजिए। आपके इन सर्कास्टिक प्रयोगों से ऐसा लगता है कि अगर किसी के पास सोशल मीडिया पर उसके पाठक पहले से तैयार हों, तो वो भारी तादाद में नागरिकों को देश के प्रति भड़का और बरगला सकते हैं। अपनी विचारधारा में सनी हुई सोच से हर बात को जेनरलाइज़ करते हुए कुछ भी मत परोसिए, प्रतिक्रिया से समस्या नहीं है, जेनेरलाइज़शन से है। हम जैसे नए लोगों का भी ख्याल रखें, जो क्लासरूम से पत्रकारिता में नैतिकता वाला पाठ पढ़कर निकलते हैं, व्यवहारिकता में वही सच्चाई दिखाने का सपना देखते हैं, न कि किसी के साथ मानसिकता के साथ खेलने का!

ऐसा मत करिए! मेरा और मेरे जैसों के विश्वास को बने रहने दीजिए…

लद्दाख और कारगिल को जल्दी ही मिलेगा विश्व का सबसे बड़ा सोलर पॉवर प्लांट

भारत सरकार द्वारा पोषित राष्ट्रीय सोलर मिशन के अंतर्गत विश्व का सबसे बड़ा सोलर पॉवर प्लांट लदाख और कारगिल में बनने वाला है । इसकी कुल अनुमानित क्षमता 25,000 मेगावाट से भी अधिक आंकी गई है। नवीन और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के अंतर्गत सोलर एनर्जी कॉर्पोरेशन द्वारा प्रोत्साहित इस परियोजना के प्रथम चरण में लदाख में 5000 मेगावाट और कारगिल में 2,500 मेगावाट क्षमता वाला सोलर पॉवर प्लांट बनेगा।

लदाख वाली यूनिट का निर्माण लेह से 275 किमी दूर हानले में होगा जहाँ विश्व की तीसरी सबसे बड़ी वेधशाला इंडियन एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरी भी स्थित है। कारगिल में सोलर पॉवर प्लांट ज़िला मुख्यालय से लगभग 250 किमी दूर ज़ंस्कर में सुरु में निर्मित होगा।   

लदाख वाले सोलर पॉवर प्लांट से निकलने वाली ऊर्जा हरयाणा के कैथल में जाएगी जिसके लिए बिजली की 900 किमी ट्रांसमिशन लाइन बिछाई गई है जबकि कारगिल में बनने वाले प्लांट की ऊर्जा श्रीनगर की ग्रिड में भेजी जाएगी। इस पूरी परियोजना पर लगभग ₹45,000 करोड़ का निवेश होगा और 2023 तक इसके पूर्ण होने का अनुमान है।

अच्छी बात यह है कि लेह तथा कारगिल प्रशासन ने क्रमशः 25,000 और 12,500 एकड़ ग़ैर-चरागाह भूमि चिन्हित की है जहाँ सोलर पॉवर प्लांट का निर्माण होगा। इस भूमि से स्वायत्तशासी पहाड़ी परिषदों ₹1200 प्रतिवर्ष प्रति हेक्टेयर के हिसाब से किराया प्राप्त होगा जिसमें 3% प्रतिवर्ष वृद्धि के भी प्रावधान हैं।

अच्छी बात यह है कि लेह तथा कारगिल प्रशासन ने क्रमशः 25,000 और 12,500 एकड़ ग़ैर-चरागाह भूमि चिन्हित की है जहाँ सोलर पॉवर प्लांट का निर्माण होगा। इस भूमि से स्वायत्तशासी पहाड़ी परिषदों ₹1200 प्रतिवर्ष प्रति हेक्टेयर के हिसाब से किराया प्राप्त होगा जिसमें 3% प्रतिवर्ष वृद्धि के भी प्रावधान हैं।

इस परियोजना से लेह लदाख और कारगिल क्षेत्र में विकास में तेज़ी आएगी और कार्बन उत्सर्जन में प्रतिवर्ष 12,750 टन की कमी आएगी जिससे ग्रीनहॉउस गैसों की मात्रा कम होगी और ग्लेशियरों के पिघलने की गति धीमी होगी।    

एक वर्ष पूर्व जनवरी 2018 में जम्मू कश्मीर सरकार और भारत सरकार के मध्य इस परियोजना को लेकर एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे जिसके बाद दिसंबर 2018 में टेंडर निकाले गए थे।     

कौन किसके साथ? ख़ुद में ही कन्फ़्यूज़्ड हैं महागठबंधन के नेता

आजकल मीडिया में एक शब्द जो बार-बार प्रयोग किया जा रहा है, वो है- महागठबंधन। ये शब्द लोगों को इतनी ज़्यादा बार सुनने और पढ़ने के लिए मिल रहा है कि उन्हें ये तक पता नहीं चल पा रहा कि आख़िर महागठबंधन में कौन शामिल हैं और कौन नहीं। महागठबंधन का स्क्रिप्ट 1981 में आई यश चोपड़ा की क्लासिक फ़िल्म सिलसिला से भी ज्यादा जटिल है।

दरअसल, सिलसिला में रिश्तों का ऐसा ताना-बाना बुना गया है, जो असल ज़िन्दगी में शायद ही कहीं देखने को मिले। इस फ़िल्म में जया भादुरी प्रेमिका तो होती हैं शशि कपूर की पर उनकी शादी हो जाती है अमिताभ बच्चन से लेकिन अमिताभ जया से प्रेम नहीं करते और उनकी प्रेमिका रेखा होती हैं। रेखा भी अमिताभ से ही प्रेम करती हैं लेकिन उनकी शादी संजीव कुमार से हो जाती है। फ़िल्मी परदे पर तो ये कहानी काफ़ी अच्छी लगती है, लोग कहानी में खो जाते हैं और उनका मनोरंजन हो जाता है। लेकिन, असल ज़िंदगी में अगर ऐसी खिचड़ी पकती रहे तो लोग पसंद न करें। महागठबंधन के रूप में हमें ऐसी ही खिचड़ी पकती दिख रही है।

सबसे पहले बात मायावती की। कभी भाजपा के सहयोग से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती आज राजस्थान और मध्य प्रदेश में तो कॉन्ग्रेस के साथ हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में उन्होंने कॉन्ग्रेस से किनारा कर लिया है। राजस्थान में बहुजन समाज पार्टी के छह विधायक हैं जबकि मध्य प्रदेश में उनके दो विधायक हैं। दोनों ही राज्यों में बसपा कॉन्ग्रेस के साथ है और सत्ता के मजे ले रही है। वहीं उत्तर प्रदेश में पासा पलट जाता है। यहाँ ‘बहन’ जी ने अपने ‘भतीजे’ अखिलेश के साथ मिल कर कॉन्ग्रेस को नज़रअंदाज़ कर दिया। अर्थात यूपी में उनकी लड़ाई कॉन्ग्रेस और भाजपा- दोनों से ही होगी।

मायावती के ताजा बयानों से ये साफ़ है कि वो कॉन्ग्रेस और भाजपा- दोनों राष्ट्रीय दलों से समान दूरी बना कर चल रही हैं। हाल ही में उन्होंने दोनों को ही दलित-विरोधी पार्टी बताया था। मायावती जब भी कोई बयान देती हैं तो वह भाजपा और कॉन्ग्रेस- दोनों को ही लपेटे में लेती हैं। ऐसे में महागठबंधन रूपी खिचड़ी में यह जानना मुश्किल हो गया है कि आखिर बहन जी हैं किसके साथ? अगर वो कॉन्ग्रेस के विरोध में हैं तो फिर दो राज्यों में कॉन्ग्रेस के साथ मिलकर सत्ता का स्वाद क्यों चख रहीं हैं? अगर वो कॉन्ग्रेस की विरोधी नहीं हैं तो फिर उत्तर प्रदेश में उन्होंने कॉन्ग्रेस पार्टी के भाजपा के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा बनाने के इरादों पर पानी क्यों फेर दिया?

कभी प्रधानमंत्री की दौर में शामिल रहीं मायावती को आज राज्य में सत्ता पाने के लिए भी समझौते करने पर रहे हों तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्हें अपने सामने मोदी के रूप में एक ऐसा ख़तरा नज़र आ रहा है, जो उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए संकट बन गया है। हाल ही में अखिलेश यादव के साथ हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी से गठबंधन करने में उनका फायदा नहीं है। उनके शब्दों पर गौर करें तो हम पाएँगे कि मायावती सिर्फ़ और सिर्फ़ फ़ायदे के लिए ही अखिलेश के साथ गठबंधन में शामिल हुई हैं। अब ये फ़ायदा कुछ भी हो सकता है- किसी भी तरह सत्ता की मलाई चखना, अपना अस्तित्व बचाना और आगामी लोकसभा चुनाव के बाद किंगमेकर बनना।

अब बात सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की। राहुल गाँधी ने कभी सपा-कॉन्ग्रेस गठबंधन की तुलना प्रयागराज के गंगा-यमुना संगम से की थी। आगामी आम चनाव के लिए बने ताजा हालात में वो गंगा-यमुना का संगम बिख़र गया है। अखिलेश यादव और मायावती के महागठबंधन ने ये साबित कर दिया कि इन इन क्षणिक गठबंधनों और इन्हें जनता के बीच पहुँचाने के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले ‘गंगा-यमुना संगम’ जैसे मुहावरों का कोई मोल नहीं है। अवसरवाद की पराकाष्ठा को पार कर रहे ये गठबंधन सिर्फ और सिर्फ चुनावी होते हैं और एक हार के बाद ही बिखर जाते हैं।

सपा का समीकरण भी कुछ खिचड़ी की तरह ही है। अखिलेश यादव भाजपा के ख़िलाफ़ तो काफ़ी मुख़र हैं लेकिन कॉन्ग्रेस या फिर राहुल गाँधी के विरोध में बोलने से बचते रहे हैं। मायावती की तरह उनकी पार्टी में राजस्थान और मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस के साथ सत्ता भोग रही है लेकिन यूपी में हालात अलग हो गए हैं। प्रयागराज में तो आज भी गंगा और यमुना का संगम धाराप्रवाह है और शायद अनंतकाल तक रहे लेकिन राजनीति में ख़ुद को गंगा-यमुना बताने वाली ज़मात आज़ दो अलग दिशा में खड़ी है, कम से कम चुनाव परिणाम आने तक।

दोनों दलों ने कॉन्ग्रेस के लिए अमेठी और रायबरेली की सीटें छोड़ने का फ़ैसला लिया है क्योंकि इन दोनों क्षेत्रों से क्रमशः यूपीए अध्यक्षा सोनिया गाँधी और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी चुनाव लड़ते रहे हैं। कुल मिलाकर देखें तो इस खिचड़ी में जनता को यह समझना मुश्किल हो रहा है कि कौन किसके कितना साथ है और कौन किसके कितने विरोध में। राहुल गाँधी की बात करें तो वो सपा-बसपा का सम्मान करने की बात तो करते हैं लेकिन फिर उनके ख़िलाफ़ पूरी ताक़त से चुनाव में उतरने की बात भी करते हैं।

बिहार में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। यहाँ चेहरे की लड़ाई थमने का नाम नहीं ले रही। राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने ये कह कर कॉन्ग्रेस को सकते में डाल दिया है कि बिहार में महागठबंधन का चेहरा राहुल नहीं बल्कि लालू यादव होंगे। जीतन राम माँझी की ‘हम’ पार्टी ने भी इस मामले में राजद का समर्थन किया है।

इन सभी वाक़यों को देखने के बाद ये साफ़ प्रतीत होता है कि महागठबंधन की दशा व दिशा, समय, जगह और परिस्थिति पर निर्भर है यानी कि इन तीनों के हिसाब से वो बदलती रहती है और भविष्य में भी बदलती रहेगी। कहीं ये पार्टियाँ एक-दूसरे का विरोध करेंगी तो कहीं समर्थन। आज ये किसी और के साथ रहेंगे और कल किसी और के साथ। साथ ही, किसी राष्ट्रीय दल या गठबंधन को बहुमत न मिलने की स्थिति में किंगमेकर बनने का दिवास्वप्न देख रहे ये दल चुनाव बाद किस पाले में होंगे- इसका अनुमान कोई भविष्यद्रष्टा भी न लगा सके।

जस्टिस काटजू ने अलोक वर्मा कांड पर ‘फ़र्ज़ी मीडिया’ की निकृष्टता पर जमकर ली क्लास

CBI के पूर्व डायरेक्टर आलोक वर्मा पिछले कुछ दिनों से चर्चा में थे। मीडिया-सोशल मीडिया हर जगह। सुप्रीम कोर्ट तक में भी। अब इस्तीफ़ा देकर खुद ही उन्होंने पूर्ण विराम लगा दिया है। लेकिन मीडिया को जो मसाला चाहिए होता है, वो दे गए। इसी मसाले पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने फेसबुक पर अपनी राय रखी और मीडिया की धज्जियाँ उड़ा दीं। पत्रकारिता और रिपोर्टिंग कैसे करनी चाहिए, इसकी सीख भी दे गए:

11 जनवरी, सुबह 9:30 – जस्टिस सीकरी का समर्थन

जस्टिस काटजू लिखते हैं – मुझसे कई लोगों ने एक दिन पुराने पोस्ट पर पूछा कि आलोक वर्मा को समिति (जिसमें जस्टिस सीकरी भी थे) द्वारा सुनवाई का अवसर क्यों नहीं दिया गया। इस पर उनकी राय जानने के लिए मैंने उन्हें फोन किया। फोन पर जस्टिस सीकरी ने कहा:

  • आलोक वर्मा के खिलाफ कुछ गंभीर आरोप थे, जिनकी प्रारंभिक जांच में सीवीसी को कुछ सबूत और निष्कर्ष मिले थे।
  • सीवीसी ने प्रथम दृष्टया सामने आ रहे निष्कर्ष को अपनी रिपोर्ट में दर्ज करने से पहले आलोक वर्मा को सुनवाई का मौका दिया था।
  • इन गंभीर आरोपों व सबूतों के आधार पर ही जस्टिस सीकरी इस फैसले पर पहुँचे कि जाँच पूरी होने तक आलोक वर्मा को सीबीआई डायरेक्टर पद पर नहीं रहना चाहिए। जाँच के दौरान उन्हें उनकी रैंक के बराबर के किसी अन्य पद पर स्थानांतरित कर दिया जाए।
  • कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि वर्मा को बर्ख़ास्त किया गया है, जबकि ऐसा नहीं है। उन्हें तो निलंबित भी नहीं किया गया है। वर्मा को उनके स्तर के बराबर ही वेतन व रुतबे वाली दूसरी पोस्ट पर महज़ स्थानांतरित किया गया है।
  • जहाँ तक वर्मा का पक्ष नहीं सुनने की बात है तो बिना किसी सुनवाई के किसी को निलंबित करने की प्रक्रिया बहुत आम है। सिर्फ बर्ख़ास्तगी के मामले में सुनवाई जरूरी है।
  • वर्मा को न तो बर्ख़ास्त किया गया और न ही हटाया गया। उन्हें सिर्फ सीबीआई डायरेक्टर के बराबर स्तर वाले दूसरे पद पर ट्रांसफर किया गया।

11 जनवरी, शाम 4:46 – भारतीय मीडिया फ़र्ज़ी खबरों का पुलिंदा

आगे वो बताते हैं कि कैसे ट्विटर पर सीबीआई डायरेक्टर के पद से आलोक वर्मा को हटाए जाने पर कई पत्रकारों (जिनमें कुछ तो बहुत जानेमाने हैं) ने बकवास भरी बातें लिखीं, “उनमें से किसी ने भी जस्टिस सीकरी से संपर्क करके इस मुद्दे पर उनकी राय जानने की जरूरत भी नहीं समझी। इस मामले में जो 3 सदस्य समिति थी, वो न्यायिक कार्यवाही से संबंधित समिति नहीं थी।”

“ऐसे में मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि जस्टिस सीकरी से अगर कोई उनके फ़ैसले पर राय ज़ाहिर करने को कहता तो वो मना कर देते। हद तो तब हो गई, जब बिना उनकी राय जाने लोगों ने उन्हें पीएम मोदी की कठपुतली तक कह दिया। क्या मीडियाकर्मियों ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की? क्या यही जिम्मेदार पत्रकारिता है?”

उन्होंने मीडिया की नैतिकता और जवाबदेही पर सवाल उठाते हुए कहा, “ऐसा लगता है कि हमारे अधिकांश पत्रकार केवल सनसनी पैदा करना चाहते हैं। तथ्यों की परवाह किए बिना मसाला घोंटने में विश्वास रखते हैं। इसीलिए मैं ज्यादातर भारतीय मीडिया को फ़र्ज़ी खबर कहता हूँ।”

12 जनवरी – मीडिया की कार्यशैली और विश्वसनीयता पर सवाल

मार्कंडेय काटजू फेसबुक पर ही नहीं रुके। कई बड़े TV चैनलों पर भी उन्होंने अपनी राय दी। लेकिन TV के शोर को छोड़, इस मुद्दे पर हम आपको ‘द वीक’ पर लिखे उनके आर्टिकल का सारांश समझाते हैं। यह मीडिया की कार्यशैली और विश्वसनीयता पर एक तमाचा है। ऊपर कही गई बातों के अलावा ‘द वीक’ का अहम हिस्सा (शब्दशः नहीं, सिर्फ भावार्थ):

मुझे पता चला कि आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी द्वारा जांच की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त जस्टिस पटनायक ने एक बयान दिया था। इसमें कहा गया था कि वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई सबूत नहीं है। इसलिए, मैंने जस्टिस पटनायक को फोन किया और उनसे इस मुद्दे पर लंबी चर्चा की। उन्होंने इस चर्चा को मुझे दूसरों के साथ शेयर करने की अनुमति नहीं दी। हालाँकि उन्होंने मुझे यह उल्लेख करने की अनुमति दे दी कि एक को छोड़कर किसी भी पत्रकार ने उनके साथ इस मामले पर चर्चा करने के लिए संपर्क नहीं किया। और जिस एक ने उनसे संपर्क साधा, वो ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक महिला पत्रकार थीं। आश्चर्य कि उस महिला पत्रकार ने भी एक मिनट से भी कम देर तक बात की।

गौर कीजिए – एक मिनट से कम की बातचीत सिर्फ एक पत्रकार के साथ – लगभग सभी भारतीय मीडिया हाउस ने इस मुद्दे पर लंबे-लंबे आर्टिकल लिख छापे। सोशल मीडिया पर तो ख़ैर बाढ़ ही आ गई। और जिन्होंने ऐसा किया, उनमें से किसी ने भी (उस महिला पत्रकार को छोड़कर) जस्टिस पटनायक से संपर्क नहीं किया।

मिसाल के तौर पर, हिंदुस्तान टाइम्स की एक महिला पत्रकार ने लिखा कि हाई पावर्ड कमिटी का फैसला बहुत ज़ल्दबाज़ी में लिया गया। शायद, उसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पढ़ने की भी ज़हमत नहीं उठाई, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि कमिटी को एक सप्ताह के भीतर फैसला करना होगा। साथ ही उसने यह भी लिखा कि कमिटी को वर्मा का पक्ष सुनना चाहिए था। अगर वह जस्टिस सीकरी (ईमेल आईडी [email protected] और फोन नंबर 23016022/23016044) से संपर्क करतीं तो शायद उन्हें उत्तर मिल जाता।

जिन पत्रकारों ने इस मुद्दे पर लिखा है, उनमें से किसी ने भी (उस महिला पत्रकार को छोड़कर, जिसने एक मिनट से भी कम बात की) जस्टिस सिकरी या जस्टिस पटनायक से संपर्क नहीं किया, न ही करने की कोशिश की।

पत्रकारों द्वारा बिना जाँच-पड़ताल के ख़बरें बनाना ही फ़ेक न्यूज़ हैं। ऐसे में डोनल्ड ट्रम्प जब कहते हैं -मीडिया ही लोगों का दुश्मन है- तो यह बात अमेरिकी मीडिया के लिए शायद सही है, शायद नहीं, लेकिन अधिकांश भारतीय मीडिया के लिए यह निश्चित तौर पर सच है। यहाँ की मीडिया संवेदनाओं को भड़काने और जनता को मसाला देने में विश्वास करती है। यही कारण है कि अब लोग अधिकांश मीडिया और पत्रकारों को बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं देते हैं।