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‘यश चोपड़ा और करण जौहर ने बहुत ठेस पहुँचाया, चीख-चीख कर कहूँगी’: वरिष्ठ अभिनेत्री फरीदा जलाल ने बताई बॉलीवुड की सच्चाई, कहा – बदल जाते हैं लोग

वरिष्ठ अभिनेत्री फरीदा जलाल ने YRF के संस्थापक यश चोपड़ा और ‘धर्म प्रोडक्शंस’ के करण जौहर के ‘धोखे’ को याद किया है। नब्बे के दशक में कई फिल्मों में हीरो-हीरोइन की माँ का किरदार निभा चुकीं फरीदा जलाल को हाल ही में ‘हीरामंडी’ नामक वेब सीरीज में देखा गया था। एक ज़माने में उन्हें वादा कर के भी ‘दिल तो पागल है’ (1997) के बाद काम नहीं दिया गया, जिसके बाद यश चोपड़ा से उनके रिश्ते बिगड़ गए। आदित्य चोपड़ा की पहली फिल्म DDJL (1995) में अहम किरदार निभाया था।

उन्होंने बताया कि ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ के बाद उन्हें YRF ने काम नहीं दिया, लेकिन ‘दिल तो पागल है’ के लिए उन्हें यश चोपड़ा ने खुद फोन कर के कहा था कि इसमें उनके लिए एक किरदार है लेकिन आदित्य को लगता है कि वो इसे नहीं करेंगी। तब यश चोपड़ा ने आदित्य चोपड़ा से कहा कि वो फरीदा जलाल से बात करेंगे। इसके बाद यश चोपड़ा ने अनुपम खेर का उदाहरण फरीदा जलाल को दिया, जो किसी भी फिल्म में रोल के लिए हाँ कर देते थे, अपने किरदार की लंबाई नहीं देखते थे।

बकौल फरीदा जलाल, तब यश चोपड़ा ने उनसे कहा कि वो उन्हें या आदित्य को ‘ना’ नहीं कहें, ये सिलसिला चलता रहता है। फरीदा जलाल ने कहा कि उसके बाद उन्हें यश चोपड़ा की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। उन्होंने बताया कि करण जौहर को ये पता था कि उनके साथ गलत हुआ है, इसीलिए उन्होंने ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ में दादी का रोल देने के लिए व्यक्तिगत रूप से उन्हें कॉल किया था। इसके बाद फिर वो खाली हाथ रहीं। फरीदा जलाल ने कहा कि उन्हें काफी ठेस पहुँची है, वो इसे स्पष्ट रूप में और तेज़ आवाज़ में कह सकती हैं।

वरिष्ठ अभिनेत्री ने बताया कि फिल्म इंडस्ट्री में वफादारी इधर से उधर शिफ्ट होती है और लोग भूल जाते हैं। उन्होंने कहा कि रिश्तों को लेकर जुमले दिए गए और उनकी जगह कई रोल में किसी और को कास्ट कर लिया गया। फरीदा जलाल ने कहा कि उन्हें गहरा जख्म लगा है और वो हमेशा इस कारण दुःखी रहेंगी। उन्होंने बताया कि कैसे न सिर्फ यश चोपड़ा, बल्कि करण जौहर की तरफ से भी उन्हें बीच में कोई किरदार नहीं मिला। दोनों ने उन्हें बहुत दुःख पहुँचाया।

मंथन के लिए बुलाई गई बैठक में चलने लगे लात-घूँसे, कॉन्ग्रेस कार्यालय बन गया मैदान-ए-ज़ंग: केरल में BJP के खाता खोलते ही विरोधी खेमे में हाहाकार

केरल के त्रिशूर लोकसभा सीट पर पहली बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वार दर्ज की गई जीत कॉन्ग्रेस पार्टी को रास नहीं आ रही है। इसको लेकर शुक्रवार (7 जून 2024) को जिला कार्यालय में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए। ऑफिस में एक-दूसरे पर लात-घूँसों की बौछार कर दी गई। भिड़ंत की वजह कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा हार का ठीकरा एक-दूसरे पर फोड़ने की कोशिश बताया जा रहा है।

इस मामले में पुलिस ने कुल 20 कॉन्ग्रेसी नेताओं-कार्यकर्ताओं पर FIR दर्ज करके जाँच शुरू कर दी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शुक्रवार (7 जून 2024) को जिला कॉन्ग्रेस कार्यालय में कॉन्ग्रेस नेताओं एवं कार्यकर्ताओं की मीटिंग बुलाई गई थी। इस मीटिंग में जिला अध्यक्ष जोशे वल्लूर और महासचिव संजीवन कुरिचिरा भी मौजूद थे।

कुछ ही देर की बातचीत के बाद कुरिचिरा ने जिला अध्यक्ष जोशे वल्लूर और पूर्व कॉन्ग्रेस सांसद टीएन प्रतापन को भाजपा प्रत्याशी से मिली हार के लिए जिम्मेदार बता डाला। खुद पर लगे आरोपों से जिला अध्यक्ष जोशे वल्लूर और उनके समर्थक भड़क गए। इन सभी ने एकजुट होकर जिला महासचिव संजीवन को पीटना शुरू कर दिया।

संजीवन पर लात-घूंसों की बौछार कर दी गई। उनको गंदी-गंदी गालियाँ और धमकियाँ दी गईं। कॉन्ग्रेस मुख्यालय में मौजूद कुछ अन्य लोगों ने जैसे-तैसे संजीवन को उनके ही जिला अध्यक्ष से बचा कर निकाला। इस दौरान किसी शख्स ने इस घटना का वीडियो बना लिया और सोशल मीडिया पर डाल दिया। अब यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

जिला कार्यालय से निकलने के बाद संजीवन ने पुलिस थाने में जाकर जोशे वल्लूर और उनके 19 साथियों पर FIR दर्ज करवा दिया है। उन्होंने हमलावरों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। पुलिस ने सभी आरोपितों पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न जमानतीय धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। इसके बाद पूरे मामले की जाँच की जा रही है।

बता दें कि त्रिशूर लोकसभा सीट को जीत कर भाजपा ने केरल में पहली बार खाता खोला है। यहाँ भाजपा के सुरेश गोपी ने अपने निकटतम प्रत्याशी सीपीएम के वीएस सुनील कुमार को 74,000 वोटों से हराया है। कॉन्ग्रेस प्रत्याशी मुरलीधरन यहाँ तीसरे नंबर पर रहे। उन्हें कुल 3,28,124 वोट मिले। इस हार के बाद कॉन्ग्रेस प्रत्याशी ने अपने राजनैतिक जीवन से संन्यास की घोषणा कर दी है।

दिनदहाड़े बीच सड़क पर युवती को तलवार से काट डाला: पंजाब में गुरुद्वारे के सामने हुई वारदात का CCTV वीडियो आया सामने, सहेलियों संग ऑफिस जा रही थी मृतका

पंजाब के मोहाली में तलवार से मार कर एक महिला की हत्या कर दी गई है। इस घटना का CCTV वीडियो फुटेज भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। घटना शहर के फेज-5 में स्थित गुरुद्वारा के सामने की है। उक्त युवती अपने 2 सहेलियों के साथ ड्यूटी करने दफ्तर जा रही थी, लेकिन रास्ते में ही उसकी हत्या कर दी गई। हत्यारा नकाब पहन कर आया था। युवती को आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसकी मौत हो गई। इस हत्याकांड के बाद क्षेत्र में तनाव का माहौल है।

मृतका फेज-5 में ही एक कॉल सेंटर में नौकरी करती थी, शनिवार (8 जून, 2024) की सुबह भी वो वहीं जा रही थी। उसकी पहचान बलजिंदर कौर के रूप में हुई है। हत्या के समय सुबह के साढ़े 9 बज रहे थे। पुलिस ने हत्यारे को गिरफ्तार कर लिया है। उसे मेडिकल के लिए अस्पताल ले जाया गया। हत्यारा सुखचैन सिंह समराला का रहने वाला है। वो वहीं पर एक पेट्रोल पंप पर काम करता था। वहीं बलजिंदर कौर फतेहगढ़ साहिब के फतेहपुर जट्टां गाँव की रहने वाली है।

वो 9 वर्षों से मोहाली में काम कर रही थी और यहीं रह रही थी। वो प्रतिदिन अप-डाउन करती थी। उसके पिता ने ही उसे बस में बिठाया था। मृतका के भाई ने बताया कि कंपनी के मैनेजर ने फोन कर के घटना की जानकारी दी है। वहीं पंजाब पुलिस का कहना है कि दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते थे और किसी बात को लेकर उनमें बहस हुई थी। लेकिन, मृतका के परिवार का कहना है कि सुखचैन के बारे में बलजिंदर ने उन्हें कभी नहीं बताया था।

बताया जा रहा था कि बलजिंदर कौर जैसे ही बस से उतर रही थी, उसी दौरान सुखचैन सिंह तलवार लेकर आ धमका। उसकी दोनों सहेलियाँ उसे बचाने की कोशिश करती रही, लेकिन उसने ताबड़तोड़ कई वार किए। सिविल अस्पताल मोहाली में उसे मृत घोषित किया गया। पंजाब की 'राज्य महिला आयोग' की अध्यक्ष भी अस्पताल पहुँची और घटना की जानकारी ली। पुलिस का कहना है कि इस मामले में अभी आगे की जाँच जारी है, हत्यारे से पूछताछ हो रही है।

‘घृणा फैलाने के लिए गलत इरादे से किया ऐसा’: हाईकोर्ट ने नेहा सिंह राठौड़ के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से किया इनकार, RSS को ‘पेशाब प्रकरण’ से जोड़ किया था बदनाम

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भोजपुरी गायिका नेहा सिंह राठौड़ के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया है। मध्य प्रदेश के सीधी जिले में एक शख्स द्वारा एक जनजातीय समाज के मजदूर के ऊपर पेशाब करने का वीडियो आया था, जिस पर नेहा सिंह राठौड़ ने आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने इसे RSS से जोड़ा था। जस्टिस गोपाल सिंह अहलूवालिया ने पूछा कि भोजपुरी गायिका ने एक खास विचारधारा की यूनिफॉर्म को इस घटना के साथ क्यों जोड़ा?

उन्होंने जिक्र किया कि इस घटना में शामिल शख्स ने ऐसी ड्रेस नहीं पहन रखी थी, फिर भी नेहा सिंह राठौड़ ने सोशल मीडिया पर कार्टून पोस्ट करते हुए उसके ‘खाकी शॉर्ट्स’ में होने का दावा किया था। जज ने कहा कि ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर नेहा सिंह राठौड़ द्वारा पलोड किया गया कार्टून इस घटना के तथ्यों के हिसाब से सही नहीं था, उसमें अपने मन से अतिरिक्त चीजें जोड़ दी गई थीं। जज ने कहा कि कोर्ट इस बात को नहीं मानता है कि ये अभिव्यक्ति और बोलने की आज़ादी के तहत आता है।

जस्टिस गुरपाल सिंह अहलूवालिया ने कहा कि एक कलाकार को व्यंग्य के माध्यम से आलोचना करने का अधिकार है, लेकिन एक खास संस्था के ड्रेस का कार्टून में इस्तेमाल कर लेना व्यंग्य नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि बिना किसी सबूत के एक विशेष विचारधारा समूह को इस प्रकरण से जोड़ने की कोशिश की गई। उन्होंने कहा कि ये संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत नहीं आता है और 19(2) के तहत ऐसा करना प्रतिबंधित भी है। नेहा सिंह राठौड़ अक्सर भोजपुरी गायक व उत्तर-पूर्वी दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी पर निशाना साधने के लिए जानी जाती हैं।

नेहा सिंह राठौड़ ने CM योगी आदित्यनाथ के खिलाफ ‘यूपी में का बा’ गाकर सुर्खियाँ बटोरी थीं। नेहा सिंह राठौड़ के खिलाफ IPC की धारा-153A (धर्म/जाति/नस्ल के आधार पर विभिन्न समुदायों में वैमनस्य फैलाना) के तहत FIR दर्ज की गई थी। मध्य प्रदेश सरकार ने बताया कि इस पर नेहा सिंह राठौड़ ने आपत्तिजनक कार्टून पोस्ट किया, जिससे तनाव फैला और उन पर NSA (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) भी लगाया गया है। कोर्ट ने माना कि गलत इरादे से घृणा फैलाने के लिए ऐसा किया गया।

जहाँ कर रहे मजदूरी-काम, वहीं से मतदान: 90-95% वोटिंग का हो लक्ष्य, NOTA को लेकर बने कड़ा कानून

लोकसभा चुनाव 2024 के पहले दो चरणों में हुए कम मतदान ने ‘अनिवार्य मतदान’ संबंधी प्रस्ताव को एकबार फिर बहस का विषय बना दिया। हालाँकि, चुनाव आयोग द्वारा थोड़े विलंब से जारी किए गए इन दोनों चरणों के अंतिम आँकड़ों और बाद के चरणों के मतदान प्रतिशत ने इस चिंता को कम कर दिया। वर्तमान चुनाव और लोकसभा चुनाव 2019 और 2014 के मतदान सम्बन्धी आँकड़ों में अब कोई उल्लेखनीय अंतराल नहीं है।

दो चरणों के बाद मतदान प्रतिशत बढ़ाने में भारत के चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए जागरूकता अभियान, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बार-बार की गई अपील और राष्ट्रीय सेवा योजना, राष्ट्रीय कैडेट कोर आदि सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं, विविध छात्र संगठनों तथा समाज के प्रबुद्ध और जागरूक वर्ग द्वारा किए गए जनजागरण की उल्लेखनीय भूमिका है।

65 प्रतिशत के आसपास मतदान हालाँकि कोई उत्साहजनक उपलब्धि भी नहीं है। 90-95 प्रतिशत मतदान लोकतंत्र की स्वीकार्यता, सशक्तता और गतिशीलता की आधारभूत शर्त है। भारतीय लोकतंत्र को इस लक्ष्य को पाने के लिए अभी काफी मेहनत-मशक्कत करने की आवश्यकता है। अधिकतम लोगों की सक्रिय और सुनिश्चित भागीदारी ही लोकतंत्र के लक्षित उद्देश्यों की प्राप्ति का आधार है। यह भागीदारी ही लोकतंत्र की जड़ों को व्यापकता और गहराई देकर उसे मजबूती और स्थायित्व देती है।

हमारे पड़ोसी देशों- चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और नेपाल आदि में लोकतंत्र की दुर्दशा से हम अनभिज्ञ नहीं हैं। वहाँ जारी लोकतंत्र का क्षरण उसकी अपर्याप्तता, सीमितता और उसमें जनता की अनास्था का ही परिणाम है। भारत इस मामले में सौभाग्यशाली है कि यहाँ लोकतंत्र इन बुराइयों से बचा हुआ है। परंतु उसे और मजबूत बनाने के लिए मतदान प्रतिशत को 65 प्रतिशत से 90-95 प्रतिशत तक बढ़ाने की जरूरत है।

मतदान सबंधी इस लक्ष्य-प्राप्ति के लिए कुछ ‘थिंक टैंक’ पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हए मतदान को अनिवार्य बनाने का सुझाव देते हैं। परन्तु उनके द्वारा प्रस्तावित मतदान की अनिवार्यता लोकतंत्र की मूलभावना के विरुद्ध है। यह भारत के संविधान में प्रदत्त स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का अतिक्रमण होगी। इसे नागरिक कर्तव्यों में हालाँकि अवश्य शामिल किया जा सकता है।

मतदान प्रतिशत बढ़ाने संबंधी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मतदान को अनिवार्य बनाने की जगह कम मतदान के कारणों को चिह्नित करने और उनका व्यावहारिक समाधान करना समीचीन है।

रोटी-रोजगार की खोज में अपने गॉंव-शहर से दूर किसी अन्य गाँँव-शहर में अस्थायी रूप से रहने वालों की संख्या भारत में बहुत अधिक है। कोरोना काल में पहली बार इस संख्या की अधिकता का अंदाजा लग पाया था। इसी प्रकार पढ़ाई के लिए लाखों छात्र-छात्राएँ यूरोप-अमेरिका और लाखों कामकाजी लोग खाड़ी देशों और यूरोप-अमेरिका आदि में प्रवासी हैं। मतदान के लिए उनका अपने गाँव-घर आगमन संभव नहीं हो पाता। उनकी अनुपस्थिति मतदान प्रतिशत को प्रभावित करती है।

मतदान को प्रभावित करने वाले कई प्रमुख कारणों में से एक मतदाताओं का देश-विदेश में प्रवासन है। यह प्रवासन देश के विभिन्न भागों में बहुत बड़ी संख्या में होता है। प्रवासन सरकारी-गैरसरकारी नौकरी, शिक्षा और रोजगार आदि के कारण होता है। उदारीकरण के बाद यह प्रक्रिया बहुत अधिक बढ़ी है।

इन प्रवासी मतदाताओं के लिए सेना की तरह अपने कार्यस्थल से मतदान का विकल्प दिया जाना चाहिए। सैन्य बल और अर्धसैनिक बल के रूप में कार्यरत लाखों भारतीयों को अपने कार्यस्थल (पोस्टिंग की जगह) से ही मतदान करने की सुविधा है। यह सुविधा सभी प्रवासी मतदाताओं को दिए जाने के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए; क्योंकि वे कई दिन का समय और किराया-भाड़ा लगाकर मतदान के लिए अपने गाँव-घर वापस नहीं जा पाते।

काफी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है, जो मतदान के महत्व से अनभिज्ञ हैं। वे मानते हैं कि उनके मतदान करने या न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसी प्रकार ऐसे लोगों की संख्या भी काफी अधिक है, जो क्रमशः सिनिकल या यथास्थितिवादी हो गए हैं। उन्हें सभी राजनीतिक दल और नेता ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ या ‘एक ही थैली के चट्टे-बट्टे’ नज़र आते हैं। उन्हें सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन की कोई संभावना नज़र नहीं आती। उनके इस मनोभाव ने उनमें मतदान के प्रति अरुचि पैदा की है। यह दृष्टिकोण नकारात्मक है क्योंकि सभी दलों और नेताओं को एकसमान नहीं माना जा सकता है। लेकिन सभी नेताओं और राजनीतिक दलों को इस दृष्टिकोण के मद्देनजर आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए।

आज लोकतंत्र अपराधियों, भ्रष्टाचारियों और धन-पशुओं की गिरफ्त में हाँफ/काँप रहा है। प्रत्याशियों के चयन हेतु राजनीतिक दल सिर्फ और सिर्फ ‘जिताऊपन’ को पैमाना बनाते हैं। प्रत्याशी की योग्यता, आचार-व्यवहार, सामाजिक-राजनीतिक प्रतिबद्धता का कोई मूल्य-महत्व नहीं है। इसीलिए प्रत्येक राजनीतिक दल में दल-बदलुओं का वर्चस्व है। चुनाव दल-बदल की बाढ़ का मौसम है। ये दल-बदलू चुनाव जीतने के तंत्र और तकनीक को साधने में सिद्धहस्त हैं। इससे संवेदनशील और चिंतनशील मतदाताओं की काफी बड़ी संख्या मतदान को समय की बर्बादी या महत्वहीन मानने लगी है। इस मनःस्थिति से भी मतदान प्रतिशत कम होता है।

राजनीतिक विमर्श और चुनाव प्रचार में प्रयुक्त भाषा-भंगिमा में भी क्रमशः गिरावट आ रही है। निजी आरोप-प्रत्यारोप और हवाई घोषणाएँ भी मतदाताओं को मतदान विमुख करके चुनाव-प्रक्रिया के प्रति उदासीन बना देती हैं। ये बातें मनोरंजन के लिए तो ठीक हो सकती हैं, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवहार/वातावरण के प्रतिकूल हैं। सभी राजनीतिक दलों को एक साथ बैठकर पारस्परिक संवाद करना चाहिए और चुनावी विमर्श के साथ-साथ अपनी भाषा-भंगिमा की भी ‘लक्ष्मण-रेखा’ तय करनी चाहिए। यह मर्यादा लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण होगी।

ऐसे लोगों की चिंता को ध्यान में रखते हुए ही ‘नोटा’ का प्रावधान किया गया है। अभी ‘नोटा’ अप्रभावी और अनुपयोगी है। उसे प्रभावी बनाए जाने की आवश्यकता है। यदि ‘नोटा’ को सबसे ज्यादा मत मिलते हैं तो संबंधित निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे सभी प्रत्याशियों को अगले पाँच साल तक कोई चुनाव न लड़ने की अनिवार्य ‘कूल-इन’ अवधि होनी चाहिए। साथ ही, संबंधित राजनीतिक दलों को पाँच साल तक उस निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्याशी खड़ा करने पर रोक लगनी चाहिए।

मौसम की मार से भी मतदान प्रभावित होता है। मई-जून की चिलचिलाती धूप ने इस बार मतदान प्रतिशत को कम किया है। विविधताओं वाले विशाल देश भारत में एकसाथ कई मौसम रहते हैं। इसलिए सबके लिए उपयुक्त एक मौसम चिह्नित करना बड़ा मुश्किल है। फिर भी दीपावली के एकदम आसपास का समय अधिकांश भारतीयों के लिए अनुकूल होगा। बड़ा त्योहार होने के कारण इस अवसर पर प्रवासी प्रायः अपने गाँव-घर आते ही हैं। कम चरणों में मतदान कराते हुए एक बड़ा चरण दीवावली के ठीक पहले और दूसरा बड़ा चरण दीपावली के ठीक बाद कराने से मतदान प्रतिशत में उछाल आने की पूरी संभावना है।

इसके अलावा सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों/संस्थानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों-औद्योगिक इकाइयों, कॉरपोरेट्स आदि को मतदान करने वाले जागरूक नागरिकों के लिए विविध लाभ, छूटें और सहूलियतें प्रदान करनी चाहिए। निश्चय ही, ये योजनाएँ नागरिकों को मतदान के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करेंगी। सरकारी कर्मचारियों को मतदान के लिए दिए जाने वाला अवकाश ऐसी ही एक प्रशंसनीय पहल है। इसे अन्य गैर-सरकारी प्रतिष्ठानों, संस्थाओं और संगठनों में भी अनिवार्यतः लागू किया जाना चाहिए। इसी प्रकार मॉलों, शॉपिंग सेंटरों, होटलों-रेस्त्राओं, सिनेमाघरों आदि में मतदान करने वाले नागरिकों को मतदान वाले दिन कुछ प्रतिशत छूट का प्रावधान करके भी लोगों को मतदान के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।

व्यापक सामाजिक प्रभाव वाले सेलेब्रिटीज़, सोशल मीडिया इंफ्लूएन्सरों, स्वयंसेवी संगठनों, शिक्षण संस्थानों को भी नागरिकों को मतदान के महत्व के प्रति जागरूक करते हुए उन्हें मतदान के लिए प्रेरित करना चाहिए। इन सबकी सक्रिय भूमिका और भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग को व्यापक योजना बनानी चाहिए।

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने चुनाव सुधार की दिशा में निर्णायक पहल की है। सरकार ने मतदाता पहचान-पत्र को आधार कार्ड से जोड़ने, पंचायत/निकाय चुनावों और विधानसभा/लोकसभा चुनावों की मतदाता सूचियों को एक करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए हैं।

मतदाता सूचियों को आधार कार्ड से जोड़ने से फ़र्जी मतदाताओं को चिह्नित करने और उनका नाम काटने का काम आसान हो गया है। भारत में अनेक व्यक्तियों का नाम जाने-अनजाने में एकाधिक जगहों पर मतदाता सूची में शामिल होता है। एक मतदाता का नाम कई जगह होने से न सिर्फ ‘एक व्यक्ति एक मत’ के संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन होता है; बल्कि वास्तविक जनादेश का भी हरण हो जाता है। एक व्यक्ति का नाम एकाधिक मतदाता सूचियों में होने से मतदान का प्रतिशत भी कम हो जाता है। मतदाता पहचान-पत्र को आधार कार्ड से जोड़कर फर्जी मतदाताओं का उन्मूलन किया जा सकता है।

मतदाताओं के नाम के दुहराव और मतदाता सूचियों के दुहराव को रोकने के लिए किए गए प्रावधानों की तरह चुनाव-प्रक्रिया के दुहराव को रोकने की दिशा में भी काम किया जाना चाहिए। “एक देश, एक चुनाव” इस दुहराव का सही समाधान है। लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव एकसाथ कराकर श्रम, समय और संसाधनों की बड़ी भारी बचत की जा सकती है। बार-बार होने वाले मतदान की जगह पाँच साल में एकबार होने वाले मतदान के लिए लोग अतिरिक्त श्रम, समय और संसाधन लगाकर भी मतदान के लिए आगे आएँगे और उससे मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी होगी।

मतदान प्रतिशत बढ़ाने की दिशा में प्राथमिकता के आधार पर पहल करने की आवश्यकता है। मतदान लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आधार है। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नागरिकों के दृढ़ विश्वास और गहरी आस्था का परिचायक है। इस भाव के अभाव में लोकतंत्र न तो सुरक्षित रह सकता है और न ही परिपक्व और विकसित हो सकता है। लोकतंत्र की मूल भावना अधिकतम लोगों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। चुनाव विजेता यही करता है। कम मतदान से लोकतंत्र की यह मूल भावना प्रश्नांकित होती है।

मोदी सरकार 3.0: पीएम मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में चीन को घेरने की रणनीति, पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्ष रहेंगे शामिल

भाजपा (NDA) की नेतृत्व वाली राषट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की लगातार तीसरी बार जीत के बाद नरेंद्र मोदी रविवार (9 जून 2024) को प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। इसके साथ ही देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बाद नरेंद्र मोदी ऐसे नेता बन जाएँगे, जिन्होंने लगातार तीन बार प्रधानमंत्री की शपथ ली और इस पद को सुशोभित किया।

शपथ ग्रहण समारोह के अवसर पर एडीए के नेता सहित भाजपा के मुख्यमंत्री से लेकर सफाईकर्मियों तक को न्योता भेजा गया है। भारत की नहीं, एशिया की पहली लोको पायलट सुरेखा यादव शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होंगी। वहीं, भारत के पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को भी इसमें शामिल होने के लिए निमंत्रण दिया गया है, जिसे संबंधित पक्ष ने स्वीकार कर लिया गया है।

इस समारोह में दुनिया भर के शीर्ष नेता, सफाईकर्मी, ट्रांसजेंडर, मजदूर शामिल होंगे। कहा जा रहा है कि शपथ ग्रहण समारोह में कुल 8,000 मेहमान शामिल हो सकते हैं। इस शपथ ग्रहण समारोह में भारत के पड़ोसी और हिंद महासागर क्षेत्र के नेताओं को विशिष्ट अतिथि के रूप में सादर आमंत्रित किया गया है। इसे पड़ोसी देशों के प्रति भारत की प्राथमिकता के तौर पर देखा जा रहा है।

श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे, मालदीव के राष्ट्रपति डॉक्टर मोहम्मद मुइज्जु, सेशेल्स के उपराष्ट्रपति अहमद अफीफ, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना, मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद कुमार जगन्नाथ, नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ और भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे ने प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह का निमंत्रण स्वीकार कर लिया है। 

मालदीव के मीडिया के अनुसार, राष्ट्रपति मुइज्जू शनिवार (8 जून 2024) को नई दिल्ली के लिए रवाना होंगे। इस दौरान उनके साथ उनकी सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी भी भारत आएँगे। इससे पहले मुइज्जू ने लोकसभा चुनाव में जीत के लिए पीएम मोदी को बधाई भी दी थी। मुइज्जू को चीन समर्थक माना जाता है और अगर वे भारत आते हैं तो राष्ट्रपति बनने के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी।

शपथ ग्रहण समारोह में सफाईकर्मी, ट्रांसजेंडर और सेंट्रल विस्टा परियोजना में काम करने वाले श्रमिक भी विशेष अतिथियों में शामिल होंगे। विशेष आमंत्रितों में केंद्र सरकार की योजनाओं के लाभार्थी और विकसित भारत के एंबेसडर भी होंगे। वंदे भारत और मेट्रो ट्रेनों पर काम करने वाले रेलवे कर्मचारियों को शपथ ग्रहण समारोह के लिए आमंत्रित किया गया है।

जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में भारत का एक बार फिर फोकस पड़ोसी देशों पर रहेगा और भारत उनसे बेहतर संबंध स्थापित करेगा। श्रीलंका, मालदीव, भूटान, नेपाल और बांग्लादेश ऐसे पड़ोसी हैं, जिन्हें भारत के खिलाफ लंबे समय से इस्तेमाल करने की रणनीति पर काम करता रहा है। माना जा रहा है कि भारत इन देशों से संबंधों को और प्रगाढ़ बनाकर चीन की चाल को नाकामयाब करेगा।

पैसा कमाने के लिए विशाल डडलानी को ‘सीरियल यौन शोषक’ के साथ बैठने से परहेज नहीं: गायिका ने लताड़ा, कंगना को थप्पड़ मारने वाली को दे रहे थे नौकरी

चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर गुरुवार (6 जून, 2024) को अभिनेत्री कंगना रनौत को कुलविंदर कौर नामक CISF जवान ने थप्पड़ मार दिया। इसके बाद सुरक्षा एजेंसी ने न सिर्फ उसे निलंबित किया, बल्कि पुलिस ने FIR भी दर्ज की। कंगना रनौत लोकसभा चुनाव 2024 में हिमाचल प्रदेश के मंडी से भाजपा के टिकट पर जीत कर सांसद बनी हैं। अब इस ताज़ा मुद्दे को लेकर गायिका सोना महापात्रा ने संगीत निर्देशक विशाल डडलानी की पोल खोली है और उन्हें आईना दिखाया है।

असल में विशाल डडलानी ने कुलविंदर कौर को नौकरी देने की पेशकश की थी। कुलविंदर कौर कंगना रनौत द्वारा किसान आंदोलन को लेकर दिए गए बयान से नाराज़गी जताते हुए उन्हें थप्पड़ मारा था। विशाल डडलानी ने इसके बाद कहा था कि वो हिंसा का बिलकुल भी समर्थन नहीं करते हैं, लेकिन वो CISF जवान के गुस्से को समझ सकते हैं। उन्होंने कहा था कि अगर उसके खिलाफ कार्रवाई की जाती है तो वो नौकरी देंगे। विशाल डडलानी AAP के लिए चुनाव प्रचार भी कर चुके हैं।

विशाल डडलानी ने कंगना रनौत का मजाक बनाते हुए उन्हें ‘डुन्गना’ कह कर भी संबोधित किया और उनका मजाक उड़ाया। कॉन्ग्रेस की रोहिणी आनंद ने विशाल डडलानी का समर्थन करते हुए उन्हें ‘रीढ़ वाला व्यक्ति’ बताया। अब गायिका सोना माहापात्रा ने इस पर जवाब दिया है। सोना महापात्रा ने कहा कि ‘रीढ़’ में ‘सीरियल यौन शोषक’ अनु मलिक जिन पर ऐसे कई आरोप हैं, उनके बगल में जज की कुर्सी पर बैठना भी शामिल है। बता दें कि 2018 में सोना महापात्रा ने संगीत निर्देशक अनु मलिक पर ‘Me Too’ के तहत यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।

सोना माहापात्रा ने बताया कि जब उन्होंने विशाल डडलानी से निवेदन किया कि वो खड़े हों, आवाज़ उठाएँ और रियलिटी शोज की ज़हरीली संस्कृति को पीछे धकेलने में मदद करें, तो विशाल डडलानी ने जवाब दिया कि उन्हें पैसे कमा कर देश से बाहर निकलना है। सोना महापात्र ने तंज कसते हुए कहा कि ये ऐसे ‘रत्न’ हैं। I.N.D.I. गठबंधन और उसका पूरा इकोसिस्टम कंगना रनौत के खिलाफ हिंसा का समर्थन कर रहा है, जबकि इंदिरा गाँधी की हत्या खालिस्तानी कट्टरपंथ के कारण ही हुई थी।

विशाल डडलानी अपने दोस्त शेखर राजवानी के साथ मिल कर ‘विशाल-शेखर’ की जोड़ी बना कर फिल्मों में संगीत देते हैं। उन्होंने ‘ओम शांति ओम’ (2007), ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ (2012), ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ (2013) और ‘सुल्तान’ (2016) जैसी फिल्मों में संगीत दिया है। वहीं सोना माहापात्रा ने 2013 में आई फिल्म ‘फुकरे’ के गाने ‘अम्बरसरिया’ से सुर्खियाँ बटोरी थी। विशाल-शेखर के साथ उन्होंने ‘आई हेट लव स्टोरीज’ (2011) के ‘बहारा’ गाने में भी काम किया है।

जो मंदिर कभी बॉलीवुड फिल्मों और गानों में था मशहूर, आखिर क्यों किसी मुस्लिम को बना दिया गया वहाँ का पुजारी?

जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग की पहाड़ी पर स्थित महारानी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध शिव मंदिर में 5 जून 2024 की तड़के आग लग गई। आग को तो बुझा लिया, लेकिन मंदिर पूरी तरह जल गया है। आग लगने का कारणों का फिलहाल पता नहीं चल पाया है। लगभग 109 साल पुराने इस मंदिर को कश्मीर के महाराजा हरि सिंह की धर्मपत्नी महारानी मोहिनी बाई सिसोदिया ने सन 1915 में बनवाया था। 

महारानी मंदिर में मोहिनीश्वर शिव स्थित हैं। यह घास के मैदानों से घिरी एक पहाड़ी पर स्थित था। लकड़ी और पत्थरों से बने 109 साल पुराने इस शिव मंदिर का विशिष्ट पिरामिडनुमा गुंबद है। इसमें ऐसी खिड़कियाँ थीं, जो गुलमर्ग के सभी कोनों से दिखाई देती थीं। मंदिर के पुजारी पुरुषोत्तम शर्मा ने मंदिर में आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट बताया। हालाँकि, अभी असली वजह का पता नहीं चल पाया है।

कश्मीर में 1990 के हिंदू विरोधी नरसंहार से पहले इस महारानी मंदिर की भव्यता और प्रसिद्धि अपने चरम पर थी। यही कारण है कि यहाँ ना सिर्फ हिंदू श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता था, बल्कि फिल्मों में इसे दिखाने की होड़ लगी रहती थी। उस समय तक मंदिर में पुजारी से लेकर इसका प्रबंधन तक हिंदुओं के हाथों में हुआ करता था। महाराजा हरि सिंह के समय से ही मंदिर में ब्राह्मण पुजारी नियुक्त थे।

यह मंदिर पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय था। इतना ही नहीं, इस मंदिर को बॉलीवुड की कई फिल्मों में भी दिखाया जा चुका है। राजेश खन्ना और मुमताज अभिनीत सुपरहिट फिल्म ‘आप की कसम’ का लोकप्रिय गाना ‘जय जय शिव शंकर’ इसी मंदिर में फिल्माया गया था। इसके अलावा इसके अलावा फिल्म ‘रोटी’, ‘अंदाज’ और ‘कश्मीर की कली’ जैसी फिल्मों की शूटिंग भी इस मंदिर में हो चुकी है।

हालाँकि, 1990 के दशक में घाटी में इस्लामी आतंकियों द्वारा हिंदुओं के खिलाफ छेड़े गए अभियान और हिंदुओं के पलायन के बाद यहाँ के हिंदू-सिखों के ही नहीं, बल्कि मंदिरों के भी दुर्दिन शुरू हो गए। हिंदुओं के पलायन के बाद पलायन के बाद यह मंदिर लंबे समय तक बंद रहा। बाद में बारामुल्ला जिले के दंडमुह निवासी गुलाम मोहम्मद शेख ने 23 सालों तक इस मंदिर की देखभाल और पूजा-अर्चना की।

गुलाम मोहम्मद शेख को धर्मार्थ ट्रस्ट की ओर से मासिक वेतन पर शुरू में चौकीदार के रूप में नियुक्त किया गया था। हालाँकि, बाद में उन्होंने हिंदुओं के पवित्र कर्मकांड एवं अनुष्ठान की विधि को सीखा। मंदिर में जब नियमित पुजारी की अनुपस्थिति हो गई तो गुलाम मोहम्मद शेख पूजा के साथ-साथ शाम और सुबह की आरती करने लगे। हालाँकि, साल 2021 में वह इस काम से सेवानिवृत्त हो गए।

गुलमर्ग पुलिस थाने के प्रभारी सब इंस्पेक्टर फारूक अहमद के अनुसार, मंदिर की देखरेख पुजारी समेत तीन लोग करते हैं। इनमें दो लोग स्थानीय मुस्लिम समुदाय से हैं। इनमें से एक गुलाम मोहम्मद शेख का भांजा है। मंदिर छोटा होने के चलते रात को दोनों मंदिर के निकट स्थित हट में चले जाते थे। घटना की रात मंदिर का पुजारी भी निकटवर्ती गुरुद्वारे में सो रहा था।

अब यह मंदिर जम्मू-कश्मीर धर्मार्थ ट्रस्ट के अधीन है। नवंबर 2023 में धर्मार्थ ट्रस्ट ने पुरुषोत्तम शर्मा को मंदिर का पुजारी नियुक्त किया है। ट्रस्ट मंदिर के पुनर्निर्माण की तैयारी कर रहा है। वहीं, फारूक अहमद ने बताया कि शुरुआती जाँच में पता चला कि मंदिर में बिजली के तारों में शॉर्ट सर्किट हुआ, जिसके कारण आग लगी। वहीं, पुजारी पुरुषोत्तम शर्मा ने मंदिर में आगजनी की घटना से इनकार किया है।

सोशल मीडिया पर सवाल

ऐसे में लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब मंदिर में ना पुजारी सो रहा था और ना ही उसका सहयोगी तो कैसे पता चला कि किसी ने आगजनी नहीं की। बिजली के तारों में भी छेड़छाड़ करके शॉर्ट सर्किट किया जा सकता है, क्योंकि घटना के वक्त मंदिर में कोई मौजूद नहीं था। लोगों का तर्क है कि ऐसा करके अब शांति को कदम बढ़ा रहे जम्मू-कश्मीर में माहौल बिगाड़ने वाले अराजक तत्वों की अभी भी कमी नहीं है।

वहीं, मंदिर में मुस्लिम व्यक्ति को देखभाल एवं पुजारी नियुक्त करने पर सवाल उठाया है। लोगों का तर्क है कि मंदिर एक पवित्र जगह है, जहाँ प्रवेश करने पर कई तरह नियम और कायदे का पालन करना जरूरी है। इनमें सात्विक भोजन, शुद्ध आचार-व्यवहार एवं अन्य तरह पाबंदियाँ भी शामिल हैं। उनका कहना है कि गुलाम मोहम्मद को मंदिर का देखरेख करने के लिए उस दौर में रखा गया था, जब वहाँ कोई हिंदू नहीं था।

लोगों ने गुलाम मोहम्मद द्वारा मंदिर में पूजा-पाठ एवं आरती का विरोध किया। इसके साथ ही वर्तमान में नियुक्त किए गए दो मुस्लिम देखरेख करने वालों पर सवाल उठाया गया है। अन्य कुछ लोगों का तर्क है कि मंदिर की देखभाल करना अलग बात है और उसमें पूजा-पाठ करना अलग बात है। इसके पीछे लोगों ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की एक घटना का भी जिक्र किया।

बीएचयू में संस्कृत विभाग में डॉक्टर फिरोज की नियुक्ति होने पर छात्रों ने जमकर बवाल किया था। उन्होंने कहा था कि डॉक्टर फिरोज को कर्मकांड का क्या जानकारी होगी। इसके खिलाफ छात्रों ने धरना प्रदर्शन भी किया था। हालांकि, बीएचयू के वीसी और कुछ प्रोफेसरों ने डॉक्टर फिरोज की प्रोफेसर पद पर नियुक्ति का समर्थन किया था।

लोगों का यह भी तर्क है कि जिस मुस्लिम समुदाय में मूर्ति पूजा शिर्क है, हराम है…. क्या वे उतनी पवित्रता या भाव से पूजा-पाठ या कर्मकांड को अंजाम देते होंगे या फिर सिर्फ इसे भी किसी दैनिक काम की तरह ही निपटाते होंगे। उनका तर्क है कि जिस तरह से एक गैर-मुस्लिम को कुरान आदि पढ़ने के बाद भी मौलवी आदि नहीं बनाया जा सकता, उसकी तरह हिंदू धर्म में भी गैर-हिंदू को पुजारी नहीं बनाया जाना चाहिए।

‘घर तबाह, खतरे में परिवार, कमाई खत्म’: पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के बाद BJP कार्यकर्ता घर छोड़ भागने को मजबूर, सुनाई आपबीती

पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के बाद BJP के सैकड़ों कार्यकर्ताओं को अपने गाँव और घरों से भागने पर मजबूर होना पड़ा। 2021 में हुए विधानसभा चुनाव और 2023 के पंचायत चुनाव के बाद क्या हुआ था? तब भी BJP के कार्यकर्ताओं को बेघर होना पड़ा था, आज भी पश्चिम बंगाल में लोग उसी गंभीर स्थिति से गुजर रहे हैं।

इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट 8 जून 2024 को प्रकाशित की है। इसी रिपोर्ट में पूरी बात बताई गई है। पश्चिम बंगाल में हो रहे घटनाक्रम पर बात करते हुए भाजपा कार्यकर्ता प्रशांत हलदर ने बताया, “चुनाव का मौसम माने आमदेर घोर छरार मौसम (हमारे लिए चुनाव का मौसम मतलब घर छोड़ने का मौसम)।”

बरुईपुर के विद्याधर पल्ली इलाके के निवासी हैं हलदर। वो खुद और उनका परिवार लोकसभा चुनाव के सातवें चरण में वोट डालने के बाद घर से भाग गए थे। उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चों को एक रिश्तेदार के घर भेज दिया था।

अपने ही देश में शरणार्थी बने BJP कार्यकर्ता

अपने घर से भाग कर 50 अन्य लोगों के साथ प्रशांत हलदर ने बरुईपुर स्थित भाजपा कार्यालय में शरण ली है। हलदर ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “मुझे 2021 में विधानसभा चुनाव और फिर पिछले साल पंचायत चुनाव के बाद भी घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था।”

BJP कार्यकर्ता ने दुख जताते हुए कहा, “मैं इस साल अप्रैल में घर वापस आ गया था। दुखद यह है कि अब एक बार फिर से बेघर हो गया हूँ। मुझे और मेरे गाँव के अन्य कार्यकर्ताओं को लोकसभा चुनाव से पहले धमकियाँ मिली थीं, फिर भी मैंने पार्टी के लिए काम किया। हालाँकि, मतदान के अंतिम चरण के बाद 2 जून को मैं घर छोड़ कर भागने पर मजबूर हो गया। बाद में मैंने सुना कि मेरे घर में तोड़फोड़ की गई है।”

मामोनी दास नामक एक अन्य पार्टी कार्यकर्ता ने भी इंडियन एक्सप्रेस को लगभग ऐसी ही भयावह आपबीती सुनाई है। उन्होंने बताया कि टीएमसी के गुंडों ने उन्हें दक्षिण 24 परगना के माथेरदिघी गाँव में स्थित उनके घर से जबरन बाहर निकाल दिया था। उन्होंने कहा, “इसके बाद मैं सहपारा और बाद में काठपोल में किराए के मकान में रही, इसके बावजूद भी हमें धमकियाँ मिलती रहती हैं।”

पश्चिम बंगाल में BJP कार्यकर्ता = जीवन और आजीविका दोनों पर खतरा

भाजपा बरुईपुर की उपाध्यक्ष मामोनी ने बताया कि जिस दिन लोकसभा चुनाव के नतीजे (4 जून 2024) आए, उस दिन टीएमसी के 50 गुंडों ने उनके घर को घेर लिया था। उन्होंने दुख जताते हुए कहा:

“मैंने खुद को छिपा लिया, लेकिन गुंडों ने मेरे पति और मेरी माँ को मारा। इसके कारण दोनों घायल हो गए। अगले दिन सुबह-सुबह हम घर से भागने को मजबूर हो गए। फिर मैं दोनों को अस्पताल ले गई। तब से लेकर आज तक पार्टी कार्यालय ही हमारा घर है।”

इसी तरह, टीएमसी के गुंडों ने बिकास रॉय नाम के एक अन्य भाजपा कार्यकर्ता की आजीविका खत्म कर दी। उनका ई-रिक्शा छीन लिया। गुंडों ने उनके घर पर भी घात लगाकर हमला किया और धमकियाँ दीं।

बिकास ने दुख जताते हुए कहा, “उन्होंने ताला तोड़ दिया और मेरा टोटो (ई-रिक्शा) छीन लिया। अब मैं क्या कमाऊँ, कैसे घर चलाऊँगा? उस रात मैं घर छोड़कर यहाँ आ गया। मेरी पत्नी और बच्चे एक रिश्तेदार के घर पर हैं।”

परिवार के सदस्यों पर हमला

कोलकाता में BJP कार्यकर्ताओं की कहानी कोई अलग नहीं है, भयावह ही है। यहाँ के लगभग 100 कार्यकर्ता अब भाजपा के पश्चिम बंगाल मुख्यालय के पास की एक इमारत में रह रहे हैं।

31 साल के शानू प्रमाणिक ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “4 जून को नतीजे आने के बाद टीएमसी के गुंडों ने हमारे घरों में तोड़फोड़ की। वो मेरे घर में घुस रहे थे, मौका देखते ही मैं वहाँ से भाग गया। फिर मैं अपने एक रिश्तेदार के घर छिप गया। उसके बाद सुबह करीब 3 बजे मैं वहाँ से निकला और दोपहर 1 बजे यहाँ पहुँचा।”

उन्होंने कहा, “मेरे परिवार के सदस्य अभी भी वहीं हैं। उन्होंने मुझे वापस जाने से मना किया है क्योंकि अभी भी धमकियाँ मिल रही हैं कि अगर वापस लौटे तो मुझे मार दिया जाएगा।”

बिष्णु ढाली नाम के एक अन्य BJP कार्यकर्ता हैं। टीएमसी के गुंडों के हमले से बचने के लिए वो समय रहते अपने घर से भागने में सफल रहे। उन्होंने बताया, “उन्होंने मेरी चाची को बुरी तरह पीटा। हमारे घर में तोड़फोड़ भी की है।”

अलग मजहब और प्रेमिका पर चीजें थोपने की जिद्द: बिग बॉस वाले आसिम रियाज और हिमांशी खुराना के ब्रेकअप की असली वजह आई सामने

‘बिग बॉस 13’ के में कपल रहे हिमांशी खुराना और आसिम रियाज असल जिंदगी में भी कपल बन गए थे। बिग बॉस से बाहर निकलने के बाद दोनों के प्यार के चर्चे हो जगह हो रहे। हालाँकि, पर्दे का यह प्यार ज्यादा दिन नहीं चला, पिछले साल उन्होंने ब्रेकअप कर लिया। इस ब्रेकअप के पीछे जो सच्चाई अब सामने आई है, उसमें दोनों का अलग-अलग धर्म का होना नहीं, रियाज का हिमांशी पर चीजें थोपना भी एक बड़ी वजह थी।

बिग बॉस 13 में आसिम रियाज के पूर्व सह-प्रतिभागी अबू मलिक ने पंजाबी गायिका एवं अभिनेत्री हिमांशी खुराना के साथ रियाज के संबंधों के बारे में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। अब, अबू मलिक ने कहा है कि आसिम बहुत ‘असुरक्षित आदमी’ है और यह उसका ‘मूल स्वभाव’ है। बता दें कि आसिम हाल ही में होस्ट रोहित शेट्टी के साथ लड़ाई के बाद खतरों के खिलाड़ी सीजन 14 से भी बाहर हो गए है।

अबू ने खुलासा किया, “ऐसा लगता है कि वह उस पर थोप रहा था कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। मैंने इस बारे में आरती की शादी में सुना था। हिमांशी को अपना करियर बनाना है। अभिनेताओं को एक-दूसरे को स्पेस देना होता है। आसिम और हिमांशी के बीच जाहिर तौर पर स्पेस नहीं था। वह रिश्ते से बाहर चली गई होगी।”

अबू ने कहा कि आसिम रियाज हिमांशी खुराना पर बहुत कुछ थोपता था कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। हिमांशी को अपना करियर बनाना था, इसलिए वह रिश्ते से बाहर निकल गई। अबू ने आगे कहा, “हमारी इंडस्ट्री के लोगों को तब तक डेट नहीं करना चाहिए, जब तक वे एक-दूसरे को स्वीकार करने के लिए तैयार न हों। धर्म एक और मुद्दा हो सकता है, लेकिन ये एकमात्र कारण नहीं होगा।”

जूम/टाइम्स नाऊ को अबू ने बताया, “एक तेंदुआ अपनी त्वचा नहीं बदल सकता चाहे कुछ भी हो। वह (आसिम रियाज) एक ऐसा लड़का है, जो भड़क जाता है। बिग बॉस 13 में सिद्धार्थ शुक्ला के साथ उनकी बहुत बड़ी लड़ाई हुई थी। अगर कोई उसके खिलाफ जाता है तो वह उससे द्वेष रखने लगता है। उसमें बहुत अधिक असुरक्षा की भावना है।”

अबू मलिक ने आगे कहा, “वह हर चीज को बदसूरत बनाने की कोशिश करता है, जो मुझे लगता है कि जन्मजात है। जब मैं उसके साथ था तो वह अर्थशास्त्र के बारे में बहुत बात करता था। उसने एक बार मुझे बताया था कि वह कैसे ड्राई फ्रूट्स बेचता था। भगवान ने उसे कुछ दिया है, लेकिन उसके अहंकार का स्तर बहुत अधिक है। यह अब दिखाई दे रहा है।”

खतरों के खिलाड़ी 14 से कथित निष्कासन के बारे में बात करते हुए अबू ने कहा, “वह खुद की देखभाल करने जैसी कई चीजों को लेकर वह बहुत संदिग्ध है। उसने सोचा होगा कि ‘मुझे कुछ हो गया तो?’ वह विनम्रता से अनुरोध कर सकता था कि मैं यह स्टंट करने में सक्षम नहीं हूँ। वह यह बात ऑफ कैमरा भी बता सकता था। उसने जो लाइन कही ‘मैं हर हफ़्ते एक गाड़ी खरीद सकता हूँ’ वह सिर्फ़ अपनी दौलत दिखाने का उसका तरीका है।”

बता दें कि 7 दिसंबर 2023 को आसिम ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर एक नोट शेयर किया था। इस नोट में उन्होंने लिखा, “हमने अलग होने का फैसला किया है, क्योंकि हमारी धार्मिक मान्यताएँ अलग-अलग हैं।” इसके पहले 6 दिसंबर 2023 को हिमांशी खुराना ने पुष्टि की थी कि वह अब आसिम रियाज के साथ रिश्ते में नहीं हैं।