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‘किंग मेकर’ बनने की ख्वाहिश में ‘पलटू’ बन गए नीतीश कुमार, विपक्षी एका बनाते-बनाते चंद्रबाबू नायडू ने सब गँवाया: 2024 ने बदल दिए दोनों के ग्रह-नक्षत्र, गर्दिश भरे दिन बीते

2024 के लोकसभा चुनाव का परिणाम 2 नेताओं के लिए एकदम वैसा रहा, जिसकी खोज में वो वर्षों से थे। ये दोनों नेता हैं TDP के चंद्रबाबू नायडू और JDU के नीतीश कुमार। एक आंध्र प्रदेश में राज करता रहा है, दूसरा बिहार में। आंध्र प्रदेश से निकल कर तेलंगाना अलग राज्य बना, हैदराबाद भी वहाँ चला गया। बिहार के लिए शुरू से विशेष राज्य का दर्जा माँगा जाता रहा है। ऐसे में Kingmaker वाला जो किरदार हर खेमे में घूम-घूम कर नीतीश बाबू और चंद्रबाबू खोज रहे थे, वो आखिरकार उन्हें मिल गया है।

सबसे पहले आँकड़े समझ लेते हैं। NDA को 292 सीटें प्राप्त हुई हैं, वहीं I.N.D.I. गठबंधन को 234 सीटें। इस तरह से NDA जहाँ बहुमत से 20 सीटें अधिक लेकर आया है, वहीं I.N.D.I. गठबंधन बहुमत से 38 सीटें पीछे रह गया है। NDA में भाजपा के पास 240 सीटें हैं, ऐसे में उसे अपने सहयोगियों की 32 सीटों की आवश्यकता होगी। TDP की 16 सीटें हैं और JDU की 12, इन दोनों को मिला कर BJP+ 268 सीटों तक पहुँच रहा है। फिर भी उसे 4 सीटों की आवश्यकता पड़ेगी।

NDA में शामिल शिवसेना (शिंदे गुट) के पास 7 और चिराग पासवान की RLJP के पास 5 सीटें आई हैं। ऐसे में इन दोनों में से किसी एक को भी जोड़ दें तो भाजपा 3 दलों को साथ लेकर आराम से बहुमत प्राप्त कर रही है। लेकिन, फ़िलहाल ये दिख रहा है कि ये चारों पार्टियाँ मजबूती से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़ी हैं। ये 4 दल मिला कर ही भाजपा गठबंधन के पास 280 सीटें हो जा रही हैं। जबकि उसके पास अन्य दलों की 12 स्टिरिक्त सीटें भी हैं।

नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू: NDA के Kingmaker

तो ये थी आँकड़ों की बात। अगर भाजपा के लिए सबसे ख़राब परिदृश्य की बात करें तो TDP या JDU में से कोई एक निकल भी जाती है तो भी NDA बहुमत के पार रहेगा आराम से। लेकिन हाँ, अगर दोनों दल चले जाते हैं तो फिर बहुमत के लिए लाले पड़ सकते हैं। ऐसी अटकलें I.N.D.I. गठबंधन वाले लगाते हुए भले ही कितने ही अतरंगी सपने देख लें, ऐसा होता नज़र नहीं आ रहा है। आइए, अब बात करते हैं कैसे चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार के लिए ये सबसे मुफीद परिणाम हैं।

आंध्र प्रदेश में इस लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव भी हुए हैं। चंद्रबाबू नायडू की पार्टी 175 में से 135 सीटें जीतते हुए अकेले दम पर बहुमत के पार पहुँच गई है। उसके साथ अभिनेता पवन कल्याण की ‘जनसेना पार्टी’ है ही जिसने 21 सीटें जीती हैं और गठबंधन साथी भाजपा को भी 8 सीटें प्राप्त हुईं। उधर नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं, बीच के 9 महीने को छोड़ दें तो लगातार पिछले 19 वर्षों से। जून 2013 तक वो भाजपा के साथ रहे थे, फिर राजद के साथ चले गए।

नवंबर 2015 से लेकर जुलाई 2017 तक उन्होंने राजद के साथ गठबंधन में सरकार चलाई, फिर अगस्त 2022 तक भाजपा के साथ रहे। उसके बाद वो फिर से डेढ़ साल के लिए RJD के साथ गए, अब वो फिर से भाजपा के साथ हैं। इस तरह से नीतीश कुमार इस खेमे से उस खेमे तक लगातार अपनी मुख्य भूमिका की तलाश में घूमते रहे, जो उन्हें अब तक मिला नहीं था। आइए, एक-एक कर के देखते हैं कैसे चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार को मनचाही चीजें मिल गई हैं।

चंद्रबाबू नायडू: 2019 में विपक्षी एकता के सूत्रधार

सबसे पहले बात करते हैं चंद्रबाबू नायडू की। आपको याद होगा, 2019 लोकसभा चुनाव से कुछ महीनों पहले तक वो NDA में ही हुआ करते थे। 2014 का लोकसभा चुनाव उन्होंने भाजपा के साथ मिल कर लड़ा था। उन्हें 16 सीटें प्राप्त हुई थीं। उन्होंने राज्य में सरकार भी बनाई और मुख्यमंत्री बने। हालाँकि, इतना कुछ मिलने के बावजूद उनमें विपक्षी एकता बनाने की चूल घुस गई और उन्होंने राज्य-राज्य का दौरा करना शुरू कर दिया, मार्च 2018 में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आंध्र प्रदेश के साथ अन्याय का आरोप लगाते हुए गठबंधन को अलविदा कह दिया।

चंद्रबाबू नायडू हमेशा से किंगमेकर की भूमिका में आना चाह रहे थे, जो उन्हें मिल नहीं रही थी NDA में क्योंकि भाजपा बहुमत से 10 अधिक सीटें जीत कर सत्ता में थी और मोलभाव की टेबल पर सब कुछ उसके पक्ष में था। 2019 में चंद्रबाबू नायडू ने विपक्षी एकता के सहारे फिर से किंगमेकर बनने की सोची। यहाँ तक कि उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने पश्चिम बंगाल जाकर खड़गपुर में वहाँ की CM ममता बनर्जी तक के साथ रैली की थी, फिर राहुल गाँधी के साथ दिल्ली में मुलाकात कर मतगणना से 2 दिन पहले होने वाली विपक्षी बैठक को लेकर मंथन किया था।

इस तरह वो खुद को अपोजिशन यूनिटी के फ्रंट में रख रहे थे। तब भी लगभग 21 पार्टियों ने भाजपा के खिलाफ एकता दिखाते हुए बैठक की थी। हालाँकि, KCR जैसे नेता तब तीसरे फ्रंट के गठन में भी लगे हुए थे। चंद्रबाबू नायडू ने तब अरविंद केजरीवाल से भी मुलाकात की थी। हालाँकि, चंद्रबाबू नायडू की पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में 16 से मात्र 3 सीटों पर सीमट गई। उसे 12 सीटों का नुकसान हुआ। राज्य की सरकार भी उनके हाथ से जाती रही।

कहाँ TDP की आंध्र प्रदेश विधानसभा में 102 सीटें थी, कहाँ TDP सीधा 23 पर आ गई। जगन मोहन रेड्डी की YSRCP ने उन्हें पटखनी दे दी, जिसका बदला उन्होंने 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में लिया है। चंद्रबाबू नायडू जानते हैं अमरावती को बतौर आंध्र प्रदेश की राजधानी विकसित करने की उनकी योजना में केंद्र सरकार के साथ सहयोग आवश्यक होगा, क्योंकि हैदराबाद नए राज्य के गठन के बाद तेलंगाना में चला गया। उनके साथ गठबंधन में अभिनेता पवन कल्याण भी हैं, जिनके PM नरेंद्र मोदी से अच्छे रिश्ते हैं।

नीतीश कुमार: I.N.D.I. गठबंधन उन्हीं की देन

अब ज़रा बात कर लें, नीतीश कुमार की जो ‘सबके हैं’। उन्हें भाजपा भी साथ लेती है और राजद भी, लेकिन दोनों के ही समर्थक उन्हें ‘पलटूराम’ भी कहते हैं। ऊपर हम चर्चा कर चुके हैं कि कैसे वो दोनों दलों के साथ सरकार बना चुके हैं। नीतीश कुमार तो Kingmaker बनने के लिए 2013 से ही प्रयास कर रहे हैं, जब उन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के खिलाफ पहली बार भाजपा का साथ छोड़ा था, 1998 से ही ये गठबंधन चला आ रहा था।

नीतीश कुमार ‘दबाव की राजनीति’ के विशेषज्ञ हैं और इसी के सहारे वो पिछले 19 वर्षों से सत्ता में टिके हुए हैं। बिहार एक गरीब राज्य है, जहाँ पलायन मुख्य समस्या है। अपराध पर तो अंकुश लगा, लेकिन हर जिले के जो उद्योग-धंधे चौपट हुए वो आज तक नहीं सुधर पाए। रोजगार नहीं है, भ्रष्टाचार हावी है, शिक्षकों पर KK पाठक का कहर चल रहा है, शिक्षा-स्वास्थ्य की व्यवस्था चरमराई हुई है, जातिवाद चरम पर है और राजद आग लगाने की राजनीति में माहिर है।

अभी जिस I.N.D.I. गठबंधन को आप देख रहे हैं, वो नीतीश कुमार का ही बनाया हुआ है। पटना, बेंगलुरु और मुंबई में जो इसकी पहली 3 बैठकें हुई थीं, नीतीश कुमार उसका मुख्य हिस्सा रहे थे और ये उनकी पहल पर ही हुआ था। चेन्नई में MK स्टालिन और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से लेकर लखनऊ में अखिलेश यादव और ओडिशा में नवीन पटनायक तक से उन्होंने मुलाकात की। जब गठबंधन बन जाने के बाद कॉन्ग्रेस ने इसे हाईजैक कर लिया, नीतीश कुमार इससे चलते बने।

नीतीश कुमार का 2025 के बाद भविष्य क्या होगा, ये भी अभी स्पष्ट नहीं है। 2025 के अंत में बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और जिस तरह से तेजस्वी यादव के नेतृत्व में RJD का ग्राफ बढ़ रहा है, नीतीश कुमार जानते हैं कि भाजपा, चिराग पासवान की RLJP, जीतन राम माँझी और उपेंद्र कुशवाहा का साथ उनके लिए काम का है। नीतीश कुमार को NDA गठबंधन में अब वो मिल रहा है, जिसकी उन्हें वर्षों से चाह थी। प्रधानमंत्री पद अब भी क्षेत्रीय दलों के लिए दूर की कौड़ी है क्योंकि स्थिति 1996 वाली नहीं है, ऐसे में किंगमेकर कहलाने का जो उनका अपना था, वो पूरा हो रहा है।

मस्जिद में दीनी तालीम लेने जाता था 13 साल का बच्चा; मौलाना हम्माद ने धमका कर 2 महीने तक किया कुकर्म, UP पुलिस ने भेजा जेल

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के एक मस्जिद में एक छात्र के साथ कुकर्म किए जाने का मामला सामने आया है। यह आरोप मदरसे के ही एक मौलाना पर लगा है। कुकर्म के बाद पीड़ित छात्र की तबीयत खराब हो गई है। इसके बाद उसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। मामले का खुलासा सोमवार (3 जून 2024) को हुआ है।

इस घटना के बाद पीड़ित के नाराज परिजनों ने मौलाना को पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया है। पुलिस ने केस दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना अमरोहा जिले के कोतवाली नगर क्षेत्र की है। यहाँ की एक मस्जिद में हम्माद बछरायूँनी नाम का मौलाना मुस्लिम बच्चों को मज़हबी और दीनी तालीम देता था।

हम्माद अमरोहा के ही मोहल्ला मुल्लाना का रहने वाला है। इसी मस्जिद में 13 वर्षीय पीड़ित छात्र भी पढ़ता है। पीड़ित पहले से हाफिज-ए-कुरआन है। आरोप है कि मौलाना पिछले 2 महीने से पीड़ित से कुकर्म कर रहा था। इस वजह से छात्र अक्सर गुमसुम रहता था। जब भी छात्र के घर वाले इसकी वजह पूछते थे तो वह झुंझलाता और खामोश हो जाता था।

कुछ समय से छात्र की तबीयत खराब रहने लगी थी। पीड़ित के पेट में दर्द होता था। परिजनों ने बच्चे का इलाज करवाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। डॉक्टरों की सलाह पर छात्र का अल्ट्रासाउन्ड भी कराया गया, लेकिन रिपोर्ट नॉर्मल आई। हालाँकि, पीड़ित नाबालिग छात्र के पेट में दर्द की शिकायत बरकरार रही।

सोमवार (3 जून) को परिजन पीड़ित को पढ़ाई के लिए मस्जिद ले जाने लगे तो वह आनाकानी करने लगा। परिजनों ने वजह पूछी तो छात्र ने मौलाना हम्माद की करतूत बता दी। छात्र ने यह भी बताया कि जब उसने मौलाना से ऐसा नहीं करने के लिए कहा तो उसने जान से मार डालने की धमकी भी दी गई थी। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है।

इस घटना को सुनकर परिजन हक्के-बक्के रह गए। गुस्साए परिजनों ने मस्जिद में जाकर मौलाना की जमकर धुनाई कर दी। इसके बाद उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। पीड़ित के अब्बा ने मौलाना हम्माद के खिलाफ पुलिस में तहरीर दी है। इसके आधार पर FIR दर्ज करके मौलाना को गिरफ्तार कर लिया गया है।

ऑपइंडिया के पास मौजूद FIR की कॉपी के अनुसार, मौलाना हम्माद पर छात्र को शारीरिक एवं मानसिक तौर पर प्रताड़ित करने का भी आरोप लगाया गया है। डिप्टी एसपी अरुण कुमार ने मीडिया को बताया कि मौलना को जेल भेज दिया गया है। हम्माद पर IPC की धारा 323, 377 और 506 के अलावा पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है।

बीजेपी की वोट 0.7% गिरी, पर सीटें घट गई 63… आखिरी चरणों ने किया बेड़ा गर्क, जानिए किन-किन चरणों ने तय की NDA सरकार

लोकसभा चुनाव 2024 के परिणाम सबके सामने हैं। देश ने NDA की गठबंधन सरकार को जनमत दिया है और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। भाजपा को इन चुनावों में 240 सीटें हासिल हुई हैं। वह अकेले दम पर बहुमत नहीं पा सकी है। उसका वोट प्रतिशत भी देश में 37.3% से 36.6% हो गया है। भाजपा के वोट शेयर में तो मात्र 0.6% की गिरावट है लेकिन उसकी सीटों का आँकड़ा इससे गड़बड़ा गया है। भाजपा 2019 में 303 सीटें आईं थी जबकि 2024 में उसकी सीटें घट कर 240 हो गईं, यानि उसे 63 सीटों का नुकसान हुआ।

चुनाव जैसे-जैसे बढ़ा, भाजपा को हुआ नुकसान

लोकसभा चुनाव में एक ट्रेंड देखने को मिला है, भाजपा को अधिकांश चुनाव के अंतिम चरणों में नुकसान हुआ है। इसके लिए बिहार और उत्तर प्रदेश का उदाहरण लिया जाना चाहिए। भाजपा को भी सबसे बड़ा नुकसान उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है। भाजपा को उत्तर प्रदेश में 33 सीट हासिल हुई हैं जबकि सपा यहाँ 38 और कॉन्ग्रेस 6 सीटें जीतने में सफल रही है। चुनाव के बढ़ने के साथ ही भाजपा और सपा की जीत का फासला भी उत्तर प्रदेश में बढ़ता गया है।

वोटिंग के चरणों के हिसाब से देखा जाए तो पहले चरण में हुए चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को 8 में से 3 जबकि दूसरे चरण में सभी 8 सीटों पर जीत मिली है। भाजपा पहले चरण में मुस्लिम बहुल सीटों पर ही पिछड़ी है। भाजपा को तीसरे चरण में भी काफी नुकसान हो गया। 10 में से 6 सीट तीसरे चरण में भाजपा हार गई, यह सीटें सपा ले गई। चौथे चरण में भाजपा को 13 में से 8 सीटों पर विजय श्री मिली। इसमें भी यादव परिवार की सीटों पर ही SP जीत हासिल कर सकी।

वहीं सबसे अधिक नुकसान भाजपा को पाँचवे और छठे चरण में हुआ। पाँचवे चरण में सपा-कॉन्ग्रेस गठबंधन ने 14 में से 10 सीट जीती। छठे चरण में सपा कॉन्ग्रेस गठबंधन ने 14 में से 11 सीट जीती। आखिरी सातवें चरण में 13 में से 6 सीट सपा जीत गई। ऐसे में उत्तर प्रदेश ने जहाँ चौथे चरण तक भाजपा का प्रदर्शन ठीक रहा, वहीं इसके बाद उसको बड़े झटके लगे। सपा-कॉन्ग्रेस गठबंधन की 60% से अधिक सीटें पाँचवे, छठे और सातवें चरण से आई हैं।

बिहार में भी यही कहानी

बिहार में NDA को भी सबसे बड़ा नुकसान अंतिम चरम में ही हुआ है। बिहार में NDA गठबंधन ने 40 में से 30 सीट जीती हैं। बाक़ी की 10 सीटों में 9 विपक्षी INDI गठबंधन को मिली हैं। बिहार में सातवें चरण में 8 सीटों पर चुनाव हुआ था जिसमें विपक्ष को 6 सीट मिलीं।

अंतिम चरण में राजद को पाटलिपुत्र, बक्सर और जहानाबाद की सीट मिली। कॉन्ग्रेस को अंतिम चरण में सासाराम और कम्युनिस्ट पार्टी को सीट मिली। INDI गठबंधन को मिलने वाली बाकी तीन सीटों में दो मुस्लिम प्रभाव वाले इलाकों में थी जबकि एक सीट उसे पहले चरण में ही मिल गई थी। तीसरे, चौथे और पाँचवे चरण में INDI गठबंधन का खाता तक बिहार में नहीं खुला। ऐसे में

देश में भी यही ट्रेंड

शुरूआती चरणों में अच्छा प्रदर्शन और अंतिम चरणों में खराब प्रदर्शन की यह कहानी मात्र उत्तर प्रदेश और बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश में भाजपा के साथ घटित होती दिखाई दे रही है। देश भर में भाजपा को पहले और दूसरे चरण में 189 में से 76 सीटें मिली हैं। तीसरे और चौथे चरण में भाजपा को सबसे अधिक फायदा देश में हुआ है। तीसरे और चौथे चरण में देश की 190 सीटों पर चुनाव हुआ था और इसमें भाजपा को 96 सीटों पर जीत मिली।

पाँचवे और छठे चरण से भाजपा को बड़ा नुकसान होना चालू हुआ। पाँचवे और छठे चरण में देश में 107 सीट पर चुनाव हुए, इसमें भाजपा 50 सीट जीत पाई। अंतिम चरण में भी भाजपा का प्रदर्शन कुछ खास अच्छा नहीं रहा। अंतिम चरण की 57 सीटों पर हुए मतदान में भी भाजपा को केवल 17 सीटें मिली। ऐसे में भाजपा को देशव्यापी नुकसान आखिरी तीन चरणों में हुआ।

क्या-क्या फैक्टर रहे?

पहले चरण से अंतिम चरण की तरफ जाते हुए भाजपा को यह चुनावी नुकसान क्यों हुआ, इसके कई कयास लगाए जा रहे हैं। एक कयास यह है कि शुरूआती चरणों में देश में गर्मी कम पड़ रही थी और तब वोटर बाहर निकल रहे थे जिससे भाजपा को फायदा हुआ। बाद के चरणों में देश में गर्मी बढ़ गई और वोटर निकलने से कतराने लगे जिससे भाजपा को नुकसान हुआ। इसके अलावा एक कयास यह है कि पहले चरण में भाजपा के पास फीडबैक पहुँचा और उसने अपना चुनावी अभियान दुरुस्त किया जिसका फायदा तीसरे और चौथे चरण में मिला।

यह सुधार की गति बाद के चरणों में नहीं बनी रही जिसके कारण इन चरणों में नुकसान हुआ। चुनाव प्रचार की दिशा और हर चरण में बदलते मुद्दे भी इसका एक कारण माने जा रहे हैं। हालाँकि, यह सभी केवल कयास हैं और इनको प्रमाणित करने वाले तथ्य अभी नहीं पुष्ट हो पाए हैं, ऐसे में अभी यह नहीं कहा जा सकता कि भाजपा को शुरूआती चरणों में फायदा और बाद के चरणों में फायदा क्यों हुआ।

अमृतपाल सिंह, अब्दुल रशीद, सरबजीत सिंह खालसा… इन 3 का लोकसभा पहुँचना भले ‘लोकतंत्र’ के लिए अच्छा हो, पर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संकेत शुभ नहीं

लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे आ चुके हैं। बीजेपी की अगुवाई में एनडीए गठबंधन को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ है। इस बीच, तीन लोकसभा सीटों पर जनता से चौंकाया है। पंजाब की 2 और जम्मू-कश्मीर की 1 लोकसभा सीट पर अलगाववादी नेताओं को जीत मिली है। इनमें खडूर साहिब (पंजाब) से अमृतपाल सिंह, फरीदकोट (पंजाब) से सरबजीत सिंह खालसा और बारामूला (जम्मू-कश्मीर) से अब्दुल रशीद शेख को चुनाव में जीत हासिल हुई। खास बात ये है कि इन 3 में से दो उम्मीदवार जेल में बंद हैं। दोनों पर ही यूएपीए जैसे बड़े मामले दर्ज हैं। वैसे, ऊपरी तौर पर इन तीनों की जीत देश में लोकतंत्र की मजबूत जड़ों को दिखाते हैं, लेकिन गंभीरता से देखें तो तीनों ही उम्मीदवारों की जीत देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा भी साबित हो सकता है।

बारामूला में अलगाववादी नेता की जीत

जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश की बारामूला लोकसभा सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार अब्दुल रशीद शेख को 45.7 प्रतिशत मत मिले, और उन्होंने 4 लाख 72 हजार 481 मत पाकर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला को आसानी से हरा दिया। उमर अब्दुल्ला को महज 25.95% यानी 2 लाख 68 हजार 339 मत ही मिले। अब्दुल रशीद शेख मौजूदा समय में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है।

फोटो साभार : निर्वाचन आयोग की वेबसाइट

अब्दुल रशीद शेख जम्मू कश्मीर आवामी इत्तेहाद पार्टी का संस्थापक है और इंजीनियर राशिद के नाम से भी जाना जाता है। इंजीनियर राशिद ने साल 2008 और 2014 का विधानसभा चुनाव भी निर्दलीय ही जाता था। साल 2019 के चुनाव में उसे हार झेलने पड़ी थी। वो साल 2019 से ही आतंकी फंडिंग केस में गिरफ्तार होने के बाद से जेल में बंद है। यूएपीए के तहत जेल में बंद होने वाले पहले बड़े नेता के तौर पर इंजीनियर राशिद का नाम लिया जाता है। इंजीनियर राशिद ऐसे गुट का नेतृत्व करता है, जो जम्मू-कश्मीर में भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है। राशिद की जीत इस बात का सबूत है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों का दिल जीतने में अभी भारत सरकार को लंबा सफर तय करता है, क्योंकि अलगाववादी भावनाओं को नियंत्रित करने में समय लगता दिख रहा है।

फरीदकोट में खालिस्तानी नेता की जीत, पिता बेअंत सिंह पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का हत्यारा

फरीदकोट में सरबजीत सिंह खालसा चौथी बार चुनाव लड़ा। तीन बार चुनाव हार चुका सरबजीत सिंह खालता बेअंत सिंह का बेटा है। बेअंत सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या की थी। सरबजीत को 2,98,062 वोट मिले, यानी 29.38% वोट शेयर। उनसे आम आदमी पार्टी के करमजीत सिंह अनमोल को हराया, जिन्हें 2,28,009 वोट मिले, यानी 22.48% वोट शेयर। सरबजीत का परिवार खालिस्तानी भावनाओं के लिए जाना जाता है और खालिस्तान की माँग करता है। सरबजीत सिंह खालसा की जीत ये बताती है कि पंजाब में अब भी खालिस्तानी आँदोलन खत्म नहीं हुआ है और देश की खतरा के लिए पंजाब के ऐसे तत्व बड़ा खतरा बना हुए हैं।

फोटो साभार : निर्वाचन आयोग की वेबसाइट

खडूर साहिब में अमृतपाल की जीत बड़ी चुनौती

खडूर साहिब में खालिस्तान समर्थक अलगाववादी नेता अमृतपाल सिंह ने महत्वपूर्ण अंतर से जीत हासिल की। ​​अमृतपाल सिंह को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत केंद्रीय एजेंसियों द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद फिलहाल डिब्रूगढ़ जेल में रखा गया है। अमृतपाल को 4,04,430 वोट मिले, जो 38.62% वोट शेयर के बराबर है। उसने भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के कुलबुर सिंह जीरा को हराया, जिन्हें 2,07,310 वोट मिले, जो 19.8% वोट शेयर के बराबर है। दीप सिद्धू के संगठन ‘वारिस पंजाब दे’ की कमान संभालने के बाद अमृतपाल सिंह ने पंजाब में लोकप्रियता हासिल की। ​​सिद्धू एक खालिस्तान समर्थक नेता भी थे। विशेष रूप से, अमृतपाल को पंजाब में खालिस्तान समर्थक तत्वों द्वारा भिंडरावाले 2.0 के रूप में देखा जाता है।

फोटो साभार : निर्वाचन आयोग की वेबसाइट

बता दें कि साल 2023 में अमृतपाल की तलाश में केंद्रीय एजेंसियों और पंजाब पुलिस ने बड़ा अभियान चलाया था। मार्च 2023 से अप्रैल 2023 तक ये अभियान चला और फिर उसे गिरफ्तार किया गया। पंजाब में अमृतपाल खुद को खालिस्तानी आथंकी जरनैल सिंह भिंडरावाले की तरह पेश करता था और वो दावा करता था कि वो ड्रग्स के खिलाफ अभियान चला रहा है। लेकिन अमृतपाल की गिरफ्तारी तक उसके पास लोगों को लड़ाई के लिए ट्रेंड करने वाला एक ट्रेनिंग सेंटर था और उसके हजारों-लाखों अनुयायी बन चुके थे। उसे 4 लाख से ज्यादा वोट मिलना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कतई अच्छा संकेत नहीं है।

संवेदनशील संसदीय दस्तावेजों तक पहुँच

सांसद होने के नाते इन तीनों को केंद्र सरकार से जुड़े संवेदनशील दस्तावेजों तक पहुँच मिल जाएगी, जिन तक आम जनता की पहुँच नहीं है। ऐसी जानकारी का इस्तेमाल लंबे समय में जनता की भावनाओं को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है। इस बात के सबूत हैं कि कुछ सांसदों ने अपने पासवर्ड अनधिकृत व्यक्तियों के साथ साझा किए हैं, महुआ मोइत्रा का उदाहरण लें, जिन्हें पिछले साल दिसंबर में लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया था। कई स्तरों की सुरक्षा के बावजूद, दस्तावेजों तक इस तरह की पहुँच खतरनाक हो सकती है।

लोकतंत्र के नजरिए से सही, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा पर खतरा बढ़ा

लोकतांत्रिक व्यवस्था में पार्टी और विचारधारा से परे स्वतंत्र उम्मीदवारों की सफलता निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया का प्रमाण है। हालाँकि, अलगाववादी नेताओं की ऐसी जीत खतरे की घंटी बजाती है और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संभावित खतरा बन सकती है। इन नेताओं की अलगाववादी और खालिस्तान समर्थक विचारधाराएँ इसी तरह के आंदोलनों को बढ़ावा दे सकती हैं, जिससे क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संतुलन अस्थिर हो सकता है।

इन जीतों को राष्ट्र के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बनाए रखते हुए उन मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है, जिनकी वजह से अलगाववादी और चरमपंथी विचारधाराओं को पनपने का मौका मिलता है। अब्दुल रशीद शेख, सरबजीत सिंह खालसा और अमृतपाल सिंह की जीत एक स्पष्ट इशारा भी है कि लोकतंत्र, स्वतंत्रता का एक स्तंभ होने के साथ-साथ सतर्क सुरक्षा उपायों के बिना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक दोधारी तलवार भी हो सकता है।

मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है। मूल लेख को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

संन्यासी सीएम योगी आदित्यनाथ: जिसने यूपी की बदली तस्वीर, बनाई 7वीं से दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, जन्मदिन पर जानिए कैसे तोड़ा अपशकुन की भ्रांतियाँ​

उत्तराखंड के एक गाँव में 5 जून 1972 को पैदा हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत 26 वर्ष की उम्र में की थी। आज वे अपने 26 वर्ष के राजनीतिक जीवन को पूरा करते हुए एक प्रेरणादायक यात्रा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में प्रदेश ने विकास के नये आयाम स्थापित किए हैं।

योगी आदित्यनाथ के संघर्षों और समर्पण की कहानी आज हर किसी के लिए एक मिसाल है। गोरक्षपीठाधीश्वर और गोरखपुर से पाँच बार सांसद रह चुके योगी आदित्यनाथ पिछले 7 वर्षों में मुख्यमंत्री के रूप में कई महत्वपूर्ण कार्य किए। आज उनके जन्मदिन पर मुख्यमंत्री के रूप में उत्तर प्रदेश में किए गए उनके कार्यों का हम संक्षिप्त विश्लेषण करेंगे।

सात वर्षों की अद्वितीय नेतृत्व गाथा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने सात वर्षों के कार्यकाल में विकास की एक नई परिभाषा गढ़ी है। यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है कि एक संन्यासी, जो पहले कभी किसी मंत्री पद पर नहीं रहा, देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनता है और विकास के नए आयाम स्थापित करता है। उनके जन्मदिन पर उनकी महान उपलब्धियों का स्मरण कर उनके नेतृत्व की प्रशंसा करते हैं।

एक संन्यासी का नेतृत्व

योगी आदित्यनाथ एक संन्यासी राजनेता हैं, जिन्होंने अपने संन्यास और राजनीति के बीच संतुलन स्थापित किया। पाँच बार सांसद रह चुके योगी आदित्यनाथ ने कभी मंत्री पद नहीं लिया, लेकिन जब मुख्यमंत्री बने तो देश और प्रदेश के लिए एक मिसाल कायम की। उन्होंने संसद में अपने जीवन पर खतरे की बात की थी, लेकिन नियति ने उन्हें एक दशक बाद उसी प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया। आज उनकी कानून और व्यवस्था की मिसाल पूरे देश में दी जाती है।

कानून व्यवस्था में सुधार

योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। संगठित अपराधियों पर नकेल कसी गई और बड़े-बड़े माफिया या तो जेल में हैं या फिर यमलोक में। यह सीएम योगी की सख्त नीति का ही प्रभाव है कि 2017 के बाद से प्रदेश में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ और संगठित अपराधी गिरोह पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए भी उन्होंने विशेष ध्यान दिया और पुलिस बल में महिलाओं की संख्या तीन गुनी बढ़ाई है।

अर्थव्यवस्था में उछाल

उत्तर प्रदेश को देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का श्रेय योगी आदित्यनाथ को जाता है। उन्होंने एक सशक्त कानून व्यवस्था और बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव रखी, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा और प्रदेश में निवेश की बाढ़ आ गई। उनके कार्यकाल में उत्तर प्रदेश का बजट 3.4 लाख करोड़ रुपए से बढ़कर 7 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक हो गया। ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ में राज्य 14वें स्थान से दूसरे स्थान पर आ गया है।

इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास

योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में 20 एयरपोर्ट्स बनाए गए, जिनमें 5 अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट हैं। नोएडा से सटा जेवर एयरपोर्ट एशिया का सबसे बड़ा एयरपोर्ट बनने जा रहा है। 13 एक्सप्रेस-वे का निर्माण किया गया, जो 55 जनपदों को जोड़ते हैं। इससे व्यापारियों और आम नागरिकों को बड़ी सुविधा हुई। आज उत्तर प्रदेश को ‘एक्सप्रेस कैपिटल’ के नाम से भी जाना जाता है।

सांस्कृतिक और धार्मिक विकास

योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहरों को संजीवनी दी है। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए 32 हजार करोड़ रुपए का आवंटन किया गया और अयोध्या को विश्व की सुंदरतम नगरी बनाने की दिशा में अनेकों कदम उठाए गए। यहाँ कई धार्मिक आयोजन शुरू किए गए, जिसने विश्व पटल पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।

स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं में भी बड़े सुधार किए गए हैं। आज 75 जनपदों वाले उत्तर प्रदेश में 77 मेडिकल कॉलेज कार्यरत हैं। कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों सुधार हुआ है, जिससे प्रदेश के हर बच्चे को बेहतर शिक्षा मिल रही है। महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने प्रदेश में नई क्रांति लाई है।

भ्रांतियों को तोड़ा

योगी आदित्यनाथ ने कई भ्राँतियों को तोड़ा है। पहले के मुख्यमंत्री नोएडा में रुकने को अपशकुन मानते थे, लेकिन योगी बाबा ने कई बार नोएडा का दौरा किया और फिर भी सत्ता में वापस आए। उन्होंने आस्था और विकास को एक साथ लेकर चलने की मिसाल कायम की है। प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए उन्होंने प्रदेश की अर्थव्यवस्था में नई जान फूँकी है।

कानून व्यवस्था की मिसाल

देश ही नहीं, दुनिया में जब-जब योगी आदित्यनाथ का जिक्र होता है, तब-तब उत्तर प्रदेश की शानदार कानून व्यवस्था का जिक्र जरूर होता है। उनके बुलडोजर की नीति ने प्रदेश में शांति स्थापित की है। बड़े-बड़े माफिया और अपराधी या तो जेल में हैं या फिर यमलोक में। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई बार उनके काम एवं कानून-व्यवस्था की कई बार खुले मंच से तारीफ की है।

आर्थिक सुधार

योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में जबरदस्त उछाल आया है। उन्होंने प्रदेश को देश की छठी या सातवीं अर्थव्यवस्था से उठाकर दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना दिया है। साल 2027 तक एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य उन्होंने तय किया है, जिससे प्रदेश की आर्थिक स्थिति और भी मजबूत होगी। उनका ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ODOP) योजना ने देश और दुनिया में सराहना पाई है, जिससे स्थानीय उत्पादों को नया बाजार मिला और रोजगार के अवसर बढ़े।

समर्पित नेतृत्व

25 करोड़ आबादी वाले उत्तर प्रदेश की विकास गाथा बिना योगी आदित्यनाथ के संभव नहीं होती। उनका समर्पित नेतृत्व और विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने प्रदेश को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया है। उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने हर क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।

योगी आदित्यनाथ का कार्यकाल एक प्रेरणा है, जिसमें विकास, कानून व्यवस्था, सांस्कृतिक धरोहर, आर्थिक सुधारों के क्षेत्र में अद्वितीय कार्य हुए। उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने जो मुकाम हासिल किया है, वह वास्तव में प्रशंसनीय है। इस विशेष अवसर पर हम उनके जन्मदिन पर उन्हें हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं और उनके नेतृत्व की सराहना करते हैं।

TMC को कॉन्ग्रेस नहीं दे रही भाव, INDI को उद्धव नहीं दे रहे भाव: महाराष्ट्र के पूर्व CM ने बैठक से किया किनारा, ममता बनर्जी बोलीं- बधाई सन्देश राहुल गाँधी ने नहीं दिया जवाब

लोकसभा चुनाव 2024 के परिणाम आ चुके हैं और 240 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। NDA 292 सीटों के साथ लगातार तीसरी बार सरकार बनाने जा रहा है। वहीं I.N.D.I. गठबंधन के खाते में 234 सीटें आईं। विपक्षी गठबंधन में पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की TMC को 29 और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) को 7 सीटें मिली हैं। अब खबर आ रही है कि ये दोनों ही नेताओं ने I.N.D.I. गठबंधन की बैठक को धता बताया है।

बुधवार (5 जून, 2024) को राजधानी नई दिल्ली में I.N.D.I. गठबंधन के नेताओं की बैठक हुई। इसमें उद्धव ठाकरे नहीं पहुँचे। उनका इस बैठक में आना पहले से प्रस्तावित था, लेकिन अंतिम क्षणों में उन्होंने इससे किनारा करने का निर्णय लिया। हालाँकि, उनकी तरफ से पार्टी के प्रवक्ता व राज्यसभा सांसद संजय राउत के नेतृत्व में 3 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल इस बैठक में हिस्सा लेने पहुँचा। पूर्व CM के बैठक में न पहुँचने के पीछे का कारण स्पष्ट नहीं किया गया है।

हालाँकि, पार्टी सूत्रों का कहना है कि आगे होने वाली ऐसी बैठकों में वो शिरकत कर सकते हैं। कहा जा रहा है कि अगर बहुत ज़रूरी होगा, तभी वो दिल्ली के लिए उड़ान भरेंगे। वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री व DMK अध्यक्ष MK स्टालिन, राजद के तेजस्वी यादव और NCP (शरदचंद्र पवार गुट) के शरद पवार इस बैठक में पहुँचे। उधर TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी भी इस बैठक में नहीं पहुँचीं। हालाँकि, उनके भतीजे और डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र से लगातार तीसरी बार संसद बने अभिषेक बनर्जी इस बैठक में पहुँचे।

उधर ममता बनर्जी ने कहा कि उन्होंने विपक्ष के कई नेताओं से बात की है, लेकिन उनका कोई जवाब नहीं आया। ममता बनर्जी ने राहुल गाँधी को बधाई सन्देश भेजा, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया। ममता बनर्जी ने कहा कि शायद राहुल गाँधी चुनाव परिणाम आने के बाद व्यस्त होंगे। उन्होंने ये भी कहा कि चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस को गठबंधन के तहत 2 सीटों की पेशकश की गई थी, लेकिन उन्होंने बात नहीं मानी और कॉन्ग्रेस को मात्र एक सीट से संतोष करना पड़ा।

जिसने नुपूर शर्मा के लिए माँगी थी फाँसी AIMIM का वह जलील हारा, दक्षिण भारत को अलग राष्ट्र बनाने की डिमांड करने वाले कॉन्ग्रेसी को भी जनता ने धूल चटाई

लोकसभा चुनाव के नतीजे देख कुछ प्रत्याशी हैरान-परेशान होंगे क्योंकि चुनाव प्रचार शुरू होने से पहले वो अपनी कुछ विवादित माँगों के कारण चर्चा में थे। इनमें एक नाम ‘ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन’ के इम्तियाज जलील सैयद का है और दूसरा नाम ‘कॉन्ग्रेस’ के डीके सुरेश का है। इम्तियाज जलील ने महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एकनाथ शिंदे की पार्टी नेता भुमारे संदीपनराव आसाराम से हार गए हैं। वहीं कॉन्ग्रेस के डीके शिवकुमार को हार मिली है भाजपा के डॉ सीएन मंजूनाथ से।

चुनाव आयोग की साइट के अनुसार, महाराष्ट्र में भुमरे संदीपनराव आसाराम ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के इम्तियाज जलील सैयद को 134650 मतों के अंतर से हराकर शानदार जीत हासिल की। इम्तियाज जिस क्षेत्र में हारे हैं 13 मई को मतदान हुआ था उस सीट पर 63.03 मतदान हुआ था। इस सीट पर संदीपनराव को 4 लाख 76 जार वोट मिले। वहीं इम्तियाज अली को 3 लाख 41 हजार 480 वोट।

इम्तियाज अली वही विवादित नेता हैं जिन्होंने ईशनिंदा के मामले में पूर्व भाजपा नेत्री नुपूर शर्मा के लिए मौत की सजा की माँग की थी। साल 2022 में ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के सांसद इम्तियाज जलील ने  कहा था  कि इस्लाम शांति का मजहब है, उनकी माँग थी कि नूपुर शर्मा को फाँसी दी जाए। जलील ने यह बयान 10 जून 2022 को महाराष्ट्र के औरंगाबाद के संभागीय आयुक्त के कार्यालय के सामने उग्र इस्लामवादियों के विरोध प्रदर्शन के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए दिया।

डीके सुरेश ने की अलग दक्षिण भारतीय राज्यों की माँग

वहीं, कॉन्ग्रेस के डीके सुरेश की बात करें तो उन्हें डॉ सीएन मंजूनाथ ने 269647 वोट से हराया है। डीके सुरेश प्रदेश के उप मुख्यमंत्री के भाई हैं। डॉ मंजूनाथ को जहाँ चुनावों में 10 लाख 79 वोट मिले, वहीं डीके सुरेश ने सिर्फ 8 लाख 9 हजार 335 वोट पाए। साल 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा जब रिकॉर्ड तोड़ सीटों पर जीत हासिल की थी उस समय डीके सुरेश एक अकेले कॉन्ग्रेस नेता थे जिन्हें सीट मिली थी।

इसके बाद वो विवादों में तब आए जब इस साल फरवरी में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2024 के लिए अंतरिम बजट पेश किया। उस दौरान कॉन्ग्रेस और कुछ इंडी गठबंधन नेताओं ने इस पर नकारात्मक प्रचार किया था। बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए कॉन्ग्रेस नेता डीके सुरेश ने केंद्र पर दक्षिण भारतीय राज्यों को फंड जारी न करने का आरोप लगाया था। उन्होंने यह भी कहा था कि भविष्य में दक्षिण भारतीय राज्य अपने लिए अलग देश की मांग कर सकते हैं और अलग राष्ट्र बन सकते हैं।

कश्मीर के 106 साल पुराने शिव मंदिर में लगी आग, दूर तक दिखी लपटें: सेना ने 3 साल पहले कराया था जीर्णोद्धार, देखिए Video

जम्मू-कश्मीर के गुलमर्ग में प्राचीन शिव मंदिर में 5 जून 2024 (बुधवार) की रात को आग लगने की घटना सामने आई है। ये मंदिर रानी का मंदिर या मोहिनेश्वर शिवालय के नाम से जाना जाता है। सामने आई तस्वीरों में मंदिर में लगी आग की लपटों को देखा जा सकता है।

पत्रकार आदित्य पाज कौल ने इसकी तस्वीरें भी साझा की हैं। उन्होंने फोटो शेयर करते हुए लिखा- “कश्मीर के गुलमर्ग से दिल दहलाने वाली खबर आ रही है। वहाँ ऐतिहासिक महारानी मंदिर में रात में भीषण आग गई। आपको याद होगा राजेश खन्ना और मुमताज का जय-जय शिव शंकर गाना, वो इसी मंदिर के पास फिलमाया गया था। ये बहुत दुखद है।”

जानकारी के मुताबिक महारानी मंदिर का निर्माण महाराजा हरि सिंह की पत्नी मोहिनी बाई सिसोदिया ने 1915 में करवाया था। यह मंदिर जम्मू-कश्मीर के डोगरा राजाओं का है। यह धर्मार्थ ट्रस्ट द्वारा नियंत्रित मंदिरों में से एक है और इसका प्रबंधन तत्कालीन शाही परिवार द्वारा किया जाता है।

साल 2021 में, भारतीय सेना ने स्थानीय लोगों की मदद से कश्मीर के गुलमर्ग में 106 साल पुराने शिव मंदिर का जीर्णोद्धार किया था। इस मंदिर में एक मुस्लिम पुजारी सारे अनुष्ठानों को कराता है। लोग इस मंदिर को बहुलवादी संस्कृति का प्रमाण बताता रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि इस घटना के बाद लोग इस तरह मंदिर में आग लगने की घटना पर सवाल उठा रहे हैं और दोबारा से इसकी मरम्मत की माँग कर रहे हैं। इसके अलाव कुछ लोग इस घटना को चुनाव में भाजपा की हार से भी जोड़ कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि भाजपा को कम सीटें देकर हिंदुत्व को खतरे में डालने का काम हुआ है।

‘भीम’ के साथ ‘मीम’ को सवारी कराने से हाथी ने की तौबा: UP में BSP का खाता भी नहीं खुला, दिए थे 19 मुस्लिम उम्मीदवार, बोलीं मायावती- आगे सोच-समझकर ही दूँगी मौका

बसपा सुप्रीमो मायावती का भीम-मीम की सियासत से विश्वास उठ गया है। दलितों और वंचितों का दावा करने वाली बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने आगे से मुस्लिम उम्मीदवारों को सोच समझ कर मौक़ा देने की बात कही है। उत्तर प्रदेश के भीतर बसपा के मुस्लिम उम्मीदवारों की हार को देख कर साफ़ हो गया है कि यह भीम-मीम का फॉर्मूला तभी सफल है जब इसमें मुस्लिम वोटरों को अपना फायदा दिखता हो। इस बार उन्हें बसपा से फायदा नहीं दिखा, इसलिए बसपा के अपने समाज के उम्मीदवारों को भी किनारे कर दिया गया।

इस बात को बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी माना है। बसपा सुप्रीमो ने हताशाजनक परिणाम के बाद एक पत्र जारी किया गया है। इसमें का कहा गया है कि बसपा ने इस चुनाव में मुस्लिमों को काफी मौका दिया लेकिन मुस्लिम समाज उन्हें समझ नहीं पाया, ऐसे में वह पार्टी आगे सोच-समझ कर उनकी राजनीतिक भागीदारी पर निर्णय लेगी। यह एक तरह से बसपा का मुस्लिम राजनीति से दुराव का संकेत है, जिसको पत्र में स्पष्ट रूप से प्रकट किया गया है।

बसपा ने सबसे अधिक मुस्लिम उतारे, सभी हारे

बसपा ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश के भीतर सबसे अधिक मुस्लिम उम्मीदवार दिए थे। बसपा ने उत्तर प्रदेश में कई मुस्लिम बहुत और कई सामान्य सीटों पर भी मुस्लिम उम्मीदवार दिए थे। बसपा ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश के भीतर 19 मुस्लिमों को टिकट दिया था। उसने देश भर में 35 मुस्लिमों को टिकट दिया था। उसके सभी मुस्लिम उम्मीदवार हार गए हैं। उत्तर प्रदेश में उसके कोई भी मुस्लिम उम्मीदवार चुनावी लड़ाई में दूसरे नम्बर पर तक नहीं आ सके हैं।

कई सीटों पर उसके उम्मीदवारों को 1 लाख से भी कम वोट हासिल हुए हैं। इसके बाद ही बसपा सुप्रीमो का यह पत्र सामने आया है जिसमें उन्होंने मुस्लिम समाज के प्रति अपने गिले शिकवे कहे हैं। उनके इस पत्र से साफ़ है कि बसपा अब राजनीति का ट्रैक बदलेगी और उसमें मुस्लिमों का हिस्सा पहले से कम होगा।

मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों पर भी हारे बसपा के उम्मीदवार

बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार उन सीटों पर भी हार गए हैं जिन्हें बसपा के प्रभाव वाली माना जाता है। उत्तर प्रदेश के भीतर संभल, रामपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर, अमरोहा, आजमगढ़, और पीलीभीत जैसी मुस्लिम प्रभाव वाली सीटों पर भी मुस्लिम उम्मीदवार दिए थे। यहाँ भी इसके कोई उम्मीदवार नहीं जीत सके। इन सभी सीटों पर बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार तीसरे नम्बर पर रहे। वह कहीं टक्कर में भी नहीं आ सके।

पीलीभीत, सहारनपुर और अमरोहा छोड़ का कोई बाकी सारी मुस्लिम प्रभाव वाली सीटें सपा के खाते में गईं, जो दिखाता है कि मुस्लिमों ने इस चुनाव में काफी रणनीतिक तरीके से सपा को अपना वोट दिया। इसके अलावा बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार वहाँ भी चुनाव नहीं जीत पाए जहाँ उनके सामने सपा ने हिन्दू उम्मीदवार दिए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मुरादाबाद की सीट है। यहाँ से सपा ने रूचि वीरा को टिकट दिया जबकि बसपा ने मोहम्मद इरफ़ान को, इस चुनावी लड़ाई में रूचि वीरा जीत गईं जबकि इरफ़ान बुरी तरह से हारे।

यह दिखाता है कि बसपा के भीम-मीम फॉर्मूला को नकारते हुए मुस्लिमों ने अपने पुराने मुस्लिम-यादव फॉर्मूला को बढ़त दिलाई। बसपा भी इस बात को समझ गई है कि दलितों को मुस्लिमों के साथ जोड़ने की सोशल इंजीनियरिंग उसके काम नहीं आने वाली और स्पष्ट रूप से उसने आगे से ऐसा करने से मना भी कर दिया है।

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लोकसभा चुनावों के नतीजे आने के साथ गौर करने वाली बात यह भी है कि इस चुनाव में जहाँ भारतीय जनता पार्टी की सीटें पहले के मुकाबले घट गई हैं तो वहीं दूसरी ओर लोकसभा में मुस्लिम सांसदों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई है। 2014 में संसद में मुस्लिम सांसदों की संख्या 22 थी। अब ये संख्या 28 पहुँच गई है। कल तक सामने आ रहा था कि 26 मुस्लिमों ने लोकसभा सीटें जीती हैं, लेकिन अब ये संख्या 28 हो गई है।

नए मुस्लिम सांसदों की बात करें तो इनमें एक टीएमसी द्वारा बहरहामपुर से उतारे गए युसूफ पठान हैं जिन्होंने पाँच बार से लगातार सांसद बन रहे अधीर रंजन चौधरी को हराकर अपनी जगह संसद में बनाई है। इस सीट पर 848, 152 मुस्लिम वोट थे जो कि वहाँ की जनता के 52 फीसद हैं। इसके अलावा इकरा चौधरी ने कैराना में सपा की ओर से भाजपा प्रत्याशी को हराया।

लद्दाख में मोहम्मद हनीफ ने, जम्मू में अब्दुल राशिद ने निर्दलीय चुनाव लड़कर जीता। इसके अलावा सपा प्रत्याशी मोहिबुल्लाह ने रामपुर से। सबसे बड़ी जीत अगर किसी मुस्लिम प्रत्याशी ने दर्ज कराई है तो वो असम के ढुबरी से रकीबुल हुसैन हैं। उन्होंने मोहम्मद बदरुरद्दीन अजमल को 10 लाख 12 हजार वोट से हराकर जीत हासिल की है।

इनके अलावा केरल के मल्लपुरम लोकसभा सीट पर 65 से 70 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं जहाँ से मुस्लिम लीग के मोहम्मद बशीर ने जीत हासिल की है। इसी तरह हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी ने भी 6 लाख से ज्यादा वोट पाकर अपनी सांसदी बनाए रखी। मुख्तार अंसारी के बेटे अफजाल अंसारी ने भी गाजीपुर सीट जीती है।

बता दें कि कॉन्ग्रेस, टीएमसी, एसपी और राष्ट्रीय जनता दल, राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मिलकर इस पर 78 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। जबकि 2019 में 115 कैंडिडेट मैदान में थे और इनमें से 26 निर्वाचित होकर लोकसभा पहुँचे थे। इसके अलावा यदि उस साल की बात करें जब सबसे ज्यादा मुस्लिम प्रतिनिधियों ने लोकसभा में जगह बनाई थी तो वो साल 1980 का था। 1980 में मुस्लिम प्रतिनिधियों की संख्या 49 थी।

उल्लेखनीय है कि 2024 में हुए लोकसभा चुनाव के मतदान में एनडीए के हिस्से 293 सीट आई है जबकि इंडी गठबंधन को 235 सीट मिली है। इनमें भाजपा ने अकेले 240 सीट हासिल की है। उनके साथ गठबंधन में प्रमुख दल टीडीपी और जदयू हैं। पिछले चुनाव में भाजपा को अकेले 303 सीट मिली थी और एनडीए गठबंधन को 350 से ज्यादा। मगर इस बार पूरे विपक्ष ने एक साथ होकर नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ चुनाव लड़ा। उनका मकसद देश के विकास से ज्यादा भाजपा को सत्ता से बाहर करने का था। बावजूद इसके बीजेपी सबसे ज्यादा वोट पाने वाली पार्टी बनी।