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ममता बनर्जी पर की टिप्पणी, अब 24 घंटे प्रचार नहीं कर पाएँगे BJP उम्मीदवार: चुनाव आयोग ने लगाई रोक, HC के जस्टिस रह चुके हैं अभिजीत गंगोपाध्याय

कलकत्ता हाईकोर्ट के पूर्व जज और तमलुक सीट से बीजेपी उम्मीदवार अभिजीत गंगोपाध्याय पर चुनाव आयोग ने 24 घंटों का बैन लगा दिया है। अब वो 24 घंटे प्रचार नहीं कर पाएँगे। उनके खिलाफ टीएमसी ने शिकायत की थी और सीएम ममता बनर्जी पर अमर्यादित टिप्पणी किए जाने का आरोप लगाया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चुनाव आयोग ने जो आदेश दिया है, उसमें बीजेपी उम्मीदवार अभिजीत गंगोपाध्याय 21 मई की शाम 5 बजे से चुनाव प्रचार नहीं कर सकेंगे। यही नहीं, चुनाव आयोग ने गंगोपाध्याय को अपने सार्वजनिक बयानों में सावधानी बरतने की भी सख्त चेतावनी दी है। चुनाव आयोग ने अभिजीत की टिप्पणियों की निंदा की और इसे निम्न स्तर का व्यक्तिगत हमला और महिलाओं का सीधा अपमान बताया है।

चुनाव आयोग ने कहा कि अभिजीत गंगोपाध्याय का ऐसा बयान जो किसी भी महिला के संबंध में उपयोग किए जाने पर पूरी तरह से निंदनीय है। किसी वरिष्ठ राजनीतिक नेता की बात छोड़िए, एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को निशाना बनाया गया है।

इस मामले में चुनाव आयोग ने अभिजीत को नोटिस भेजकर जवाब माँगा था। उनके जवाब को चुनाव आयोग ने संतोषजनक नहीं पाया। चुनाव आयोग ने कहा कि इस तरह के घृणित शब्द अभिजीत गंगोपाध्याय की एजुकेशनल और प्रोफेशनल बैकग्राउंड से जुड़े व्यक्ति ने कहे हैं, इसलिए वो किसी भी लाभ के हकदार नहीं हैं।

टीएमसी के दावे को लेकर ममता बनर्जी को बनाया था निशाना

आजतक के मुताबिक, अभिजीत गंगोपाध्याय ने 15 मई को हल्दिया में चुनावी सभा को संबोधित किया था और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी पर विवादित टिप्पणी की थी। कथित वीडियो में अभिजीत को हालिया संदेशखाली स्टिंग का जिक्र करते हुए ममता बनर्जी की ‘कीमत’ पर सवाल उठाते सुना जा रहा है। इस वीडियो में अभिजीत कहते हैं कि ‘तृणमूल कॉन्ग्रेस का कहना है कि रेखा पात्रा (बीजेपी की संदेशखाली उम्मीदवार) को 2,000 रुपये में खरीदा गया है। आपकी कीमत क्या है, ममता बनर्जी?”

उन्होंने आगे कहा था कि’ यदि आपको 8 लाख रुपये दिए जाते हैं तो आप एक नौकरी देती हैं। यदि आपको 10 लाख रुपये दिए जाते हैं तो आप एक नौकरी देती हैं। राशन दूसरे देश ले जाया जाता है… क्या आपकी कीमत 10 लाख रुपये है? क्या रेखा पात्रा को खरीदना आसान है, क्योंकि वो गरीब है? अभिजीत ने आगे सवाल किया कि एक महिला दूसरी महिला पर ऐसे आरोप कैसे लगा सकती है। क्या वह (ममता बनर्जी) भी एक महिला हैं?’

कहीं बहन से भाई कर रहा रेप, कहीं सेक्स के लिए पाटर्नर हो रहे वहशी: रिश्तों को खा रहा पोर्न की सुलभता, छोटी उम्र में ही छीन रहा बचपना

टेक्नॉलजी की सुलभता ने पोर्न देखने को जितना सामान्य बना दिया है उसके दुष्परिणामों से चाहकर भी अब निजात नहीं पाई जा सकती। मोबाइल, लैपटॉप पर इसका एक्सेस इतना सरल है कि परिवार वाले कितना ही बचा लें पर छोटे से छोटा बच्चा जब चाहे इसे देख सकता है। इसके परिणाम इतने घातक होते हैं कि इसका लती धीरे-धीरे मानसिक रूप से बीमार हो जाता है और रिश्तों का लिहाज उसके भीतर शून्य रह जाता है। 

उदाहरण एकदम ताजा है। मुंबई में दो नाबालिग भाई (13) – बहन (15) साथ में बैठकर पोर्न देखे। इसके बाद दोनों की सेक्स करने की इच्छा हुई। पहली बार में नाकाम हुए तो अगली बार भाई ने फिर करने को कहा। बहन मना करती रही, मगर भाई ने उसका रेप कर दिया। मामला तब खुला जब परिजन बच्ची का अबॉर्शन कराने अस्पताल गए।

है न ये ऐसा मामला जिसे सुनकर घिन्न आ जाए? दुर्भाग्य ये है कि ये कोई अकेली घटना नहीं है-

  • उत्तर प्रदेश में कासगंज में 19 साल का लड़का अपनी 17 साल की बहन के रेप के आरोप में पकड़ा गया, पूछने पर पता चला कि उसका ये सब करने का मन पोर्न देखने के बाद हुआ था। 
  • हाल में गाजियाबाद में दो लड़के गिरफ्तार हुए। 20 और 23 साल के। खबरों की मानें तो दोनों भाई अपनी ही 14 साल की छोटी बहन का एक साल से यौन उत्पीड़न कर रहे थे। बच्ची अगर प्रेगनेंट नहीं होती तो शायद ये मामला कभी नहीं खुलता।
  • फरवरी माह में मध्यप्रदेश के छतरपुर से खबर आई थी कि एक 9 साल की नाबालिग के साथ उसके पिता ने रेप कर दिया। पूछताछ हुई तो पता चला कि पिता को पोर्न देखने की आदत है इसी के चलते उसने अपनी हवस का शिकार मासूम बच्ची को बनाया।
  • झाँसी में 36 साल के चाचा ने इस गंदी लत की वजह से अपनी 17 साल की भतीजी की अस्मत लूटी और बाद में उसकी पत्थर से कुचलकर हत्या कर दी। 
  • गाजियाबाद में कैला भट्टा चौकी में एक मामा ने अपनी भांजी को अकेले पाकर उसका दुष्कर्म किया और बाद में उसकी जान ले ली। छानबीन में पता चला कि जब घटना को अंजाम दिया तो वो घर में अकेला बैठ पोर्न देख रहा था। उसी बीच बच्ची उसके पास पहुँच गई और इसलिए उसने इस वारदात को अंजाम दिया।

आप अगर ऊपर दिए गए सारे उदाहरणों को ध्यान से देखेंगे तो पता चलेगा कि हर घटना में आरोपित और पीड़ित के बीच एक पारिवारिक रिश्ता है। ऐसा रिश्ता जो सामान्य तौर पर सबसे करीबी संबंध माना जाता हैं… चाहे पिता हो, भाई हो, मामा हो या चाचा हो… एक समय था जब इन रिश्तों के बारे में सोच कर लोगों के मन में सुरक्षा का भाव उमड़ जाता था… लेकिन वहीं अब ये समय है जब ऐसी खबरें पढ़ते हुए घरवाले हैरान होते हैं और हर रिश्ते को संदेह नजर से देखते मिलते हैं।

हम चाहें तो इस स्थिति के लिए समाज में बढ़ रहे पाश्चत्य प्रभाव को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं, लेकिन दूसरी तरफ हमें कहीं न कहीं खुद भी मानना होगा कि इन सबमें गलतियाँ हमारी है। पहली तो हमने अपने अपने परिवारों को छोटा करने की चाह में जिस तरह रिश्तों में कटौती करनी शुरू की, उसी का नतीजा है कि अब की पीढ़ी उन रिश्तों की अहमियत को ही नहीं समझती। दूसरी ओर, हम तकनीक की ओर ऐसा झुकते गए कि अब हमें खुद नहीं मालूम है कि इससे उबरना कैसे है। दिन पर दिन पर इस पर आश्रित होते हमारे रवैये ने हमें परिवारों से दूर कर दिया और सही-गलत में फर्क करने वाली समझ को खत्म कर दिया।

सोचिए कभी ऐसा हो सकता था कि भाई-बहन एक दूसरे के साथ बैठ पोर्न देखें या सेक्स करें…नहीं, मगर अब ऐसा होता है और ऐसी स्थिति ही इसलिए पैदा हुई है क्योंकि तकनीक के कारण और परिवार से दूरियों के चलते बच्चे पोर्न में ज्यादा रुचि दिखाने लगे हैं। वहीं वो माता-पिता जिनके पास अपने बच्चों को देखने का भी समय नहीं वो सेक्स एजुकेशन के नाम पर बच्चों के पोर्न देखता देख लें तो उन्हें समझाने की बजाय उनकी इस हरकत को ये कहकर जस्टिफाई करते हैं- ‘आज के समय में तो बच्चों को सब पता ही है उन्हें क्या रोकना और क्या समझाना।’ इसके अलाव कुछ ओवर प्रोग्रेसिव माता-पिता पोर्न को सेक्स एजुकेशन लेने का जरिया मानते हैं और सोचते है इससे बच्चे की सोच ह्यूमन बॉडी के लिए डेवलप होगी।

उनकी इस आधुनिक सोच का नतीजा होता है कि बच्चा धीरे-धीरे उनसे दूर होकर अलग दुनिया में खोने लगता है और फिर वो खुद समाज के लिए जो कोढ़ बनकर उभरता है, उसके कारण ऐसी स्थिति पैदा होती है।

बच्चे पर प्रभाव

इंटरनेट पर सर्च करने पर ऐसे लेख मिलते हैं जो बताते हैं कि पोर्न देखने की लत एक बच्चे को पहले उसके परिवार से दूर करती है और मानसिक रूप से कमजोर बनाती है। क्रमानुसार समझें तो जब बच्चा पोर्न देखना शुरू करता है तो उसे पता होता है ये गलत है इसलिए वो माता-पिता की नजरों से बचना शुरू करता है…और इस तरह एक ही छत के नीचे रहकर परिवार से उसकी दूरियाँ बढ़़ने लगती है। फिर यदि उस पर रोक-टोक हो तो वो घर में चिल्लाने या अपने बड़ों से लड़ने पर भी गुरेज नहीं करता…वो इतना टॉक्सिक हो जाता है कि कोई सामान्य बात भी हो तो उसे चिड़चिड़ापन रहता है।

ऐसी प्रवृत्ति सिर्फ खुद के घरेलू संबंध नहीं बिगाड़ती बल्कि शरीर पर भी बुरे प्रभाव दिखाती है, जिसके कारण कई स्वास्थ्य संबंधी बीमारियाँ हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त ये लत भीतर से इंसानियत खत्म कर देती है। नतीजा भाई-बहन का लिहाज नहीं करता, पिता-बेटी का, मामा अपनी भाँजी का। वहीं सिर्फ निजी जीवन की बात करें तो लोग ऐसी वीडियो देखने के बाद उसे अपने पार्टनर पर आजमाने की कोशिश करते हैं और तरह-तरह से पार्टनर को टॉर्चर किया जाता है।

इन तमाम बातों के बावजूद आपको अपने आसपास ऐसे लोग ये कहते हुए मिल जाएँगे कि पोर्न देखना गलत नहीं बशर्ते उसके नकारात्मक प्रभाव शरीर पर न पड़ें… सोचिए एक ऐसा समाज जहाँ लोग फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे जैसी फिल्में देखकर दोस्त का रेप करते हैं, पत्नी को प्रताड़ित करने लगते हैं… क्या उस समाज में ऐसा संभव है कि पोर्न का असर न पड़े। वर्तमान स्थिति में जब पोर्न का एक्सेस इतना आसान है और लोग अपने परिजनों से दूर हैं तो ये असंभव है कि इसका कोई पॉजिटिव इफेक्ट लोगों में देखने को मिले। असर अगर देखने को मिलता है तो वो सिर्फ इतना ही जितना हम खबरों में अब पढ़ते हैं। फर्क ये है कि कुछ घटनाएँ मीडिया में आने लगी हैं और कुछ अब भी प्रकाश में नहीं आतीं।

बाथरूम में महिलाओं का वीडियो बना रहा था कॉन्ग्रेस का युवा नेता आशिक बदरुद्दीन, पुलिस ने किया गिरफ्तार: केरल की घटना

केरल के कोल्लम में आशिक बदरुद्दीन नाम के एक स्थानीय कॉन्ग्रेस युवा नेता को बाथरूम में कैमरा रख महिलाओं के वीडियो बनाने करने आरोप में गिरफ्तार किया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, थेनमाला में टॉयलेट संचालक के रूप में काम करने कॉन्ग्रेस के स्थाने युवा नेता आशिक बदरुद्दीन के खिलाफ महिलाओं ने वीडियो बनाने के प्रयास करने की शिकायत की थी। इसके बाद उसे पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।

वीडियो बनाने के मामले में गिरफ्तार हुआ आशिक बदरुद्दीन पुनालुर ब्लॉक में यूथ कॉन्ग्रेस का महासचिव है। महिलाओं की शिकायत के बाद पुलिस ने बदरुद्दीन को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया है। साथ ही पुलिस ने उसका मोबाइल फोन जब्त कर लिया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, आशिक (30) थेनमाला डैम में टॉयलेट ऑपरेटर के तौर पर काम करता है। उसने कथित तौर पर महिलाओं के शौचालय के अंदर एक कैमरा लगा दिया था। 21 मई को तिरुवनंतपुरम से घूमने आई कुछ लड़कियों की नजर कैमरे पर पड़ी और उन्होंने आशिक बदरुद्दीन के खिलाफ पुलिस में शिकायत की। पुलिस ने इस शिकायत के आधार पर उसे गिरफ्तार कर लिया। बाद में आशिक को अदालत में पेश किया गया और पुलिस हिरासत में भेज दिया गया।

जहाँ से लड़ रही लालू की बेटी, वहाँ यूँ ही नहीं हुई हिंसा: रामचरितमानस को गाली और ‘ठाकुर का कुआँ’ से ही शुरू हो गई थी पटकथा, अपनी शादी ही याद कर लें रोहिणी आचार्य

बिहार में 1990-2005 के बीच 15 वर्षों का एक ऐसा दौर था, जब हिंसा ही राज्य की पहचान बन चुकी थी। इसके बाद नीतीश कुमार की सरकार बनी और शुरुआती 8 वर्षों में उन्होंने जिस तरह से काम किया, उसके बाद अपराध थमा और विकास की गति बढ़ी। हाँ, 2013 के अंतिम महीनों में उनके भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने उबाल मारना शुरू कर दिया और बिहार की राजनीतिक स्थिति डाँवाडोल होती चली गई। हालाँकि, फिर भी जंगलराज के दौर को याद कर लोग आज भी काँप उठते हैं, जब अपहरण-हत्या अपराध नहीं बल्कि उद्योग हुआ करता था।

रोहिणी आचार्य; जिनकी शादी बिहार के आपराधिक इतिहास का हिस्सा

इसी बीच सारण में हिंसा हो गई। वहाँ से लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य RJD की उम्मीदवार हैं। ये वही रोहिणी आचार्य हैं, जिनकी शादी में पटना में नए खुले शोरूम से नई-नई कारें उठा ली गई थीं। अगले दिन हवाई अड्डे पर ‘रोहिणी संग समरेश’ लिखे कारों की लाइन लगी हुई थी। अनुमान है कि करीब 45 कारें उठाई गई थीं। दर्जन भर दुकानों से 100 सोफे सेट और अन्य फर्नीचर लाए गए थे। एक शोरूम से 7 लाख रुपए के डिजाइनर कपड़े उठा लिए गए और 50 किलो ड्राइफ्रूट्स के अलावा खाने-पीने की अन्य सामग्रियाँ भी लूटी गई थीं।

पटना के एक्सहिबिशन रोड पर 2 शोरूम बंद हो गए थे – मिथिला मोटर्स और लॉली सेन। इसका कारण था – रोहिणी आचार्य की शादी। कुछ दिनों बाद टाटा तक ने अपने शोरूम में ताला लगा दिया था। तब लालू यादव के सालों सुभाष और साधु यादव का राज चलता था। सुभाष यादव ने बताया था कि जीजा ने उन्हें ‘राव साहब’ (समरेश के पिता) के स्वागत के लिए कारों की व्यवस्था करने को कहा, जब उन्होंने विधायकों की गाड़ियाँ लाने का सुझाव दिया तो लालू यादव ने मना करते हुए कहा कि नई कारें लेकर आओ।

सारण में हिंसा, जानिए क्या हुआ

अब रोहिणी आचार्य एक बार फिर से विवादों में हैं, हिंसा के केंद्र में उनका नाम है। असल में बिहार के सारण में लोकसभा चुनाव 2024 के 5वें चरण के तहत सोमवार (20 मई, 2024) को मतदान था। इसी दौरान शाम को रोहिणी आचार्य शाम को भिखारी ठाकुर चौक के पास स्थित बूथ संख्या 118 पर पहुँचीं। वहाँ उनका खूब विरोध हुआ। दोनों तरफ से लाठी-डंडे निकल गए, गोलियाँ भी चलीं। आरोप है कि रोहिणी आचार्य अपने समर्थकों के साथ बूथ पर पहुँच कर मतदाताओं से दुर्व्यवहार कर रही थीं।

आक्रोशित भीड़ को देखते हुए रोहिणी आचार्य खुद तो वहाँ से निकल गईं, लेकिन हिंसा को भड़का गईं। अगले दिन मंगलवार को सुबह से ही बवाल शुरू हो गया। 3 लोगों को गोली लगी, जिनमें एक की मौत हो गई है। पुलिस ने इसे RJD और BJP कार्यकर्ताओं के बीच झड़प बताया है। फ़िलहाल जिले में इंटरनेट बंद है। 2 लोग अब भी अस्पताल में हैं। बताया जा रहा है मुख्य विवाद जातीय स्तर पर पहुँच गया था, जहाँ राजपूत और यादव समाज के लोग आपस में भिड़ गए।

सारण लोकसभा सीट: 8 बार लालू-रूडी का कब्ज़ा

सारण (पहले छपरा) लोकसभा सीट बिहार की हॉट सीटों में से एक है, क्योंकि ये राजद सुप्रीमो लालू यादव का गृह क्षेत्र है। वो पहली बार यहीं से 1977 में जीत कर सांसद बने थे। फिर 1989, 2004 और 2009 में वो यहाँ से सांसद बने। इसी तरह भाजपा के राजीव प्रताप रूडी यहाँ हैट्रिक लगाने के लिए उतरे हैं। वो इस सीट से 1996, 1999, 2014 और 2019 में यहाँ से सांसद बने। इसी तरह दोनों बड़े नेता यहाँ से 4-4 बार MP रहे हैं। राजीव प्रताप रूडी राजपूत जाति से आते हैं।

सारण के 6 में से 4 विधानसभा सीटों पर राजद का कब्ज़ा है, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में सभी विधानसभा सीटों पर भाजपा को बढ़त मिली थी। राजीव प्रताप रूडी ने 2014 में यहाँ से बिहार की पूर्व CM और लालू यादव की पत्नी राबड़ी देवी को हराया था। वो अमनौर विधानसभा क्षेत्र के रहने वाले हैं। वहीं इसी क्षेत्र में परसा भी पड़ता है, जो चन्द्रिका राय का क्षेत्र है। वो राजीव प्रताप रूडी के साथ हैं। लालू यादव के बेटे तेज प्रताप यादव से चन्द्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या की शादी हुई थी।

बाद में ऐश्वर्या के साथ दुर्व्यवहार हुआ और उन्हें घर छोड़ना पड़ा। ऐसे में कहा जा रहा है कि यहाँ के यादव लोग ऐश्वर्या राय के मान-सम्मान को लेकर भी लालू परिवार से नाराज़ हैं। परसा से चन्द्रिका राय 6 बार विधायक बने हैं, उन्होंने कॉन्ग्रेस, निर्दलीय, जनता दल, राजद और जदयू के टिकट पर चुनाव जीते हैं। ऐसे में इस बार काँटे की टक्कर है। ऊपर से लालू यादव की पार्टी की तरफ से जिस तरह के भड़काऊ बयान आए हैं, उससे पता चलता है कि इन सबकी पटकथा काफी पहले से लिखी जा रही थी।

रामचरितमानस को गाली, ‘ठाकुर का कुआँ’: पहले से लिखी जा रही थी पटकथा

सितंबर 2023 में लालू यादव की पार्टी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान ‘ठाकुर की कुआँ’ कविता संसद में पढ़ी, जिस कारण राजद से राजपूत समाज नाराज़ हुआ। उधर आनंद मोहन की तरफ से भी कुछ बयान आए, उनके बेटे चेतन आनंद को लेकर लालू यादव ने नकारात्मक बयान दिया। कुल मिला कर इस मामले को जातिवादी बना दिया गया। हालाँकि, बाद में चेतन आनंद ने पाला बदल कर राजद विधायक होते हुए भी विश्वासमत में नीतीश कुमार के पक्ष में वोट किया और उनकी माँ लवली आनंद को शिवहर से जदयू का लोकसभा टिकट मिला।

ये सारा विवाद तभी शुरू हो गया था जब बिहार के शिक्षा मंत्री रहे राजद नेता चंद्रशेखर यादव ने रामचरितमानस पर नकारात्मक टिप्पणी की थी। जनवरी 2023 में उन्होंने पटना में एक दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए छात्रों के मन में तुलसीदास कृत रामकथा के प्रति ज़हर भरा। इसी तरह सितंबर 2023 में उन्होंने रामचरितमानस को पोटैशियम सायनाइड बता दिया। लालू यादव ने खुल कर मनोज झा का समर्थन किया, चंद्रशेखर यादव के साथ भी पार्टी खड़ी रही।

बिहार में NDA में भाजपा, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास), पशुपति कुमार पारस की RLJP, उपेंद्र कुशवाहा की RLM और जीतन राम माँझी की HAM(S) शामिल है। NDA ने आरोप लगाया है कि जहाँ लालू यादव रहते हैं वहाँ हिंसा होती है, जहाँ ये परिवार हाथ डालता है वहाँ आग लग जाती है। जंगलराज के दौर के बाद इस ताज़ा घटना को देखें तो ये आरोप झूठा नहीं लगता। सारण में रोहिणी आचार्य के पहुँचने के बाद ही हिंसा शुरू हुई।

रोहिणी आचार्य का क्षेत्र से कोई लेना-देना नहीं, विदेश में रहती हैं

रोहिणी आचार्य छपरा में रहती भी नहीं है। छपरा क्या, वो बिहार या भारत में भी नहीं रहतीं। वो रहती हैं सिंगापुर में। चूँकि छपरा उनके पिता का गृह क्षेत्र है और कहा जाता है कि सिंगापुर में रोहिणी आचार्य ने ही अपने पिता को किडनी दी है, ऐसे में लालू यादव को लेकर उनके समर्थकों में जो संवेदना और भावनात्मकता है उसका वो फायदा उठा कर वोट लेना चाहती हैं। हारने के बाद वो फिर सिंगापुर चली जाएँगी। नेता का अर्थ ये थोड़े होता है कि वो हार कर बैठ जाए, वो जमीन पर जनता से संपर्क में रहता है और उनके सुख-दुःख में साथ रहता है।

रोहिणी आचार्य पर ये परिभाषा फिट नहीं बैठती। न तो उनका कोई जमीनी संपर्क रहा है, न वो श्रद्धा-विवाह जैसे कार्यक्रमों में पहुँची हैं, न ही उन्होंने पिछले 5 साल से जमीन पर मेहनत की है, न ही उन्होंने अपने इलाके के समर्थकों से फोन कॉल कर उनका हालचाल पूछा, न ही उन्होंने जमीनी मुद्दों व समस्याओं को समझा, न ही उन्हें ठीक से पूरे क्षेत्र की जानकारी है और न ही इसकी कोई गारंटी है कि जीतने के बाद वो अपने लोकसभा क्षेत्र में जनता को समय देंगी।

रोहिणी आचार्य तो केवल अपने ट्वीट्स के लिए जानी जाती रही हैं, जो वो सिंगापुर में बैठ कर करती रही हैं। जब महागठबंधन टूटा था तो उन्होंने जम कर नीतीश कुमार को खरी-खोटी सुनाई थी, उन्हें ट्वीट्स डिलीट तक करने पड़े थे। उन्होंने नीतीश कुमार को ‘कचरा’ तक बता दिया था। उनकी एक ही उपलब्धि है और वो ये है कि वो लालू यादव की बेटी हैं। इसी दम पर उन्हें सांसद बनना है। अब लालू परिवार हिंसा और लाशों के सहारे फिर से जीत की राह देख रहा है।

शासन में RJD का प्रभाव, आत्मरक्षा में चली गोली: रूडी

जो भी हो, रामचरितमानस विवाद और ‘ठाकुर का कुआँ’ विवाद से उपजी जातीय घृणा ने लालू यादव की बेटी के क्षेत्र में जंगलराज की यादों को ताज़ा कर दिया है। सारण के भाजपा नेता भी यही आरोप लगा रहे हैं कि लालू परिवार जहाँ भी रहेगा वहाँ इस तरह की वारदातें होंगी ही। सांसद राजीव प्रताप रूडी मानते हैं कि आत्मरक्षा में गोली चली है, उन्होंने पूछा कि 500 लोग घर पर चढ़ आएँगे तो कोई क्या करेगा? उन्होंने रोहिणी आचार्य पर बूथ-बूथ जाकर हिंसा फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि FIR इसीलिए दर्ज नहीं की गई क्योंकि शासन में अब भी RJD से जुड़े लोगों का कब्ज़ा है।

बिहार में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं है, जंगलराज के दौर में ये आम थी। लालू यादव ‘मतपेटी से जिन्न’ निकलने की बातें करते थे, मुख्य चुनाव आयुक्त TN शेषन तक बिहार में निष्पक्ष चुनाव करवाने में नाकामयाब रहे। बूथ लूटा जाना आम बात था। आँकड़े कहते हैं कि 14 वर्षों (1990-2004) के दौरान बिहार में चुनावी हिंसा में 641 मौतें हुईं। 23 वर्षों बाद बिहार में 2002 में पंचायत चुनाव हुए थे, 196 हत्याएँ तो उसी में हो गईं। वहीं 2005-15 के बीच 8 लोगों की मौत हुई बिहार में चुनावी हिंसा में। अंतर आप खुद देख लीजिए।

आजमगढ़ में अखिलेश यादव की सभा में चले ईंट-पत्थर, भगदड़ में कई घायल: फूलपुर से भी अखिलेश-राहुल बिना भाषण दिए लौट गए थे

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव मंगलवाल (21 मई 2024) को आजमगढ़ की लालगंज लोकसभा सीट पर प्रचार करने पहुँचे थे, जहाँ जमकर हंगामा हुआ। इस दौरान जमकर ईंट-पत्थर चले और मारपीट भी हुई। इस घटना में कई लोग घायल भी हो गए। अखिलेश यादव आजमगढ़ जिले की लालगंज लोकसभा सीट से दरोगा प्रसाद सरोज के समर्थन में चुनाव प्रचार करने पहुँचे थे।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अखिलेश यादव आजमगढ़ के लालगंज लोकसभा सीट के सरायमीर थाना क्षेत्र में आने वाले खरेमा बाजार में जनसभा करने पहुँछे थे। उनकी जनसभा में भगदड़ मच गई। इस दौरान जनसभा में जमकर ईंट-पत्थर भी चले और कुर्सियाँ चलीं। लोगों के घायल होने की सूचना मिल रही है, लेकिन अभी तक किसी अधिकारी ने इसकी पुष्टि नहीं की है। एनबीटी ने इस भगदड़ का वीडियो एक्स पर पोस्ट किया है।

बताया जा रहा है कि अखिलेश यादव जैसे ही मंच पर पहुँचे, वैसे ही सपा कार्यकर्ता बेकाबू हो गए। यही नहीं, वो बैरीकेडिंग तोड़कर अखिलेश यादव के मंच की ओर बढ़ने लगे। कार्यकर्ताओं को काबू करने के लिए पुलिस को लाठियाँ भी भाँजनी पड़ी। इस दौरान भगदड़ के साथ ही जमकर ईंट-पत्थर और कुर्सियाँ चलाईं।

इससे पहले, रविवार (19 मई 2024) को आयोजित राहुल गाँधी और अखिलेश यादव की संयुक्त रैली में हंगामा हुआ था। दोनों नेताओं के मंच पर पहुँचते ही समर्थकों ने बेकाबू होकर सुरक्षा घेरा तोड़ दिया और धक्का-मुक्की की। फूलपुल में भीड़ को कंट्रोल करने के लिए पुलिस ने लाठी चलाई तो भगदड़ मच गई थी। इस दौरान अखिलेश ने समर्थकों से शांत रहने की भी अपील की, लेकिन उनकी बात का किसी ने ध्यान नहीं दिया। अखिलेश के साथ राहुल ने भी हाथ उठाकर लोगों से शांत रहने की अपील की। बेकाबू भीड़ को रोकने के दौरान पुलिस से भी धक्का-मुक्की की गई।

इतना ही नहीं, जब दोनों नेताओं की बात किसी ने नहीं सुनी तो अखिलेश यादव नाराज हो गए। वे उठे और मंच से जाने लगे। इस दौरान मंच पर मौजूद नेताओं ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन वे रूके नहीं और मंच के पीछे बने हेलिपेड की तरफ चल पड़े। अखिलेश यादव के साथ राहुल गाँधी भी मंच से उतर आए। दोनों नेता रैली को संबोधित किए बिना ही वहाँ से रवाना हो गए।

8 महीने की उस बच्ची के सिर पर अब नहीं रही ममता की छाँव, जिसकी माँ को सब कोस रहे थे: रम्या ने आत्महत्या नहीं की है, उसे ट्रोल आर्मी ने मार डाला

तमिलनाडु के कोयम्बटूर में एक टेक कम्पनी में काम करने वाली महिला की लाश मिली। बताया गया कि महिला ने आत्महत्या कर ली है। महिला के हाथ से एक माह पहले उसकी बच्ची छूट कर गिर गई थी, जिसका सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुआ था। इसको लेकर महिला को ट्रोल भी किया गया था।

जानकारी के अनुसार, रम्या वी नाम की एक महिला का शव कोयम्बटूर में उसके माता-पिता के घर पर मिला। वह अपनी बच्ची के साथ ही कोयम्बटूर आई थी। रविवार (19 मई, 2024) को जब अन्य कोई घर पर नहीं था तब उसने आत्महत्या कर ली। उसका शव बाद में घर में मिला। उसके परिजनों ने उसे अस्पताल पहुँचा कर बचाने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो सके। महिला के आत्महत्या के पीछे सोशल मीडिया की ट्रोलिंग को ही कारण बताया जा रहा है।

महिला चेन्नई में रह कर नौकरी करती थी, उसका पति भी एक टेक फर्म में काम करता है। चेन्नई में वह चौथे मंजिल पर रहती थी। 28 अप्रैल, 2024 को उसके हाथ से उसकी आठ महीने की बच्ची छूट गई थी। बच्ची इसके बाद नीचे बने एक सनशेड पर जा गिरी थी। इसके बाद बच्ची को आसपास रहने वालों ने मिलकर उसे सुरक्षित रूप से बचा लिया था। इस पूरी घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था, जिसमें कई लोग बच्ची को बचाते दिखे थे।

बच्ची के नीचे गिरने का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया में उसकी माँ रम्या को काफी ट्रोल किया गया था। रम्या को सोशल मीडिया पर लापरवाह माँ कहा था। लोगों ने रम्या वी को काफी ट्रोल किया था। रम्या को सोशल मीडिया पर माँ के तौर पर विफल होने वाली महिला बताया गया था। इसको लेकर रम्या काफी दुखी चल रहीं थी। वह बच्ची के हाथ से छूटने के सदमे से निकल नहीं पा रही थीं। इस कारण से वह अपने पति के साथ पैतृक निवास वापस आ गईं थी। जहाँ उन्होंने आत्महत्या कर ली।

तमिलनाडु पुलिस ने इस घटना को लेकर मामला दर्ज कर लिया है और आगे की जाँच कर रही है।

बेटी की सहेलियों को ‘वेश्या’ बनाती थी नादिया, डांस-ब्यूटीशियन कोर्स का लालच देकर फँसाती थी: हैदराबाद से दिल्ली तक करती थी स्कूल गर्ल्स की सप्लाई, 6 गिरफ्तार

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में पुलिस ने शनिवार (18 मई 2024) को वेश्यावृत्ति के एक बड़े रैकेट का खुलासा किया है। रैकेट को 37 वर्षीया महिला के. नादिया संचालित कर रही थी। पुलिस ने नादिया और उसके 6 सहयोगियों को गिरफ्तार किया है। यह गिरोह गरीब एवं मध्यम वर्ग की स्कूली छात्राओं को देह व्यापार में धकेल रहा था। ये सभी नादिया की बेटी की सहपाठी और सहेलियाँ हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना चेन्नई के वलसरवक्कम इलाके की है। शनिवार को पुलिस को इस क्षेत्र में स्कूली लड़कियों से वेश्यावृत्ति कराए जाने की सूचना मिली थी। इस सूचना पर कार्रवाई के लिए पुलिस टीम का गठन किया गया और एक लॉज में दबिश दी गई। दबिश के दौरान लॉज से 2 लड़कियाँ बरामद हुईं। पीड़िताओं की उम्र 17 से 18 वर्ष के बीच है। उनसे पूछताछ में नादिया का नाम सामने आया।

बताया जा रहा है कि के नादिया अपनी बेटी की सहेलियों को डांस सिखाने और ब्यूटीशियन का कोर्स करवाने का लालच देती थी। ऐसा करके वो अपनी बेटी की उम्र की लड़कियों से घुल-मिल जाया करती थी। नादिया लड़कियों को पार्ट टाइम काम करके 25 से 30 हजार रुपए तक कमाने का सपना दिखाती थी। इस धंधे में नादिया के साथ शामिल अन्य आरोपित लड़कियों को घर में बहाने बनाना सिखाते थे।

यह गैंग चाहता था कि छात्राएँ आराम से बिना किसी रोकटोक के रात भर बाहर रह सकें। अब तक मिली जानकारी के मुताबिक, आरोपितों ने लड़कियों को हैदराबाद और दिल्ली तक भेजा था। अगर कोई लड़की बाद में कहीं जाने से इनकार करती थी तो उसे उसके आपत्तिजनक फोटो और वीडियो दिखाकर ब्लैकमेल किया जाता था। नादिया ग्राहकों को सोशल मीडिया के जरिए खोजती थी।

इनमें अधिकांश बुजुर्ग ग्राहक होते थे, जो स्कूल गर्ल की चाह रखते थे। पुलिस ने हैदराबाद और कोयंबटूर के ऐसे ग्राहकों को भी चिन्हित किया है, जो स्कूली छात्राओं के लिए ज्यादा पैसे देने को तैयार रहते थे। नादिया के अलावा पुलिस ने इस गिरोह के 42 वर्षीय रामचंद्र, 43 वर्षीया सुमति, 29 साल की माया ओली, 43 साल की जयश्री, 31 वर्षीय अशोक और 70 वर्षीय रामचंद्रन को गिरफ्तार किया है।

अशोक कोयंबटूर का निवासी है, जबकि बाकी अन्य चेन्नई के अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं। इन सभी आरोपितों के मोबाइल फोन जब्त करके जाँच की जा रही है। इन्हीं आरोपितों में से एक आरोपित की कार भी पुलिस ने सीज कर ली है। जिला चाइल्ड यूनिट पीड़िताओं की काउंसिलिंग करवा रहा है। सभी आरोपितों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

निजी प्रतिशोध के लिए हो रहा SC/ST एक्ट का इस्तेमाल: जानिए इलाहाबाद हाई कोर्ट को क्यों करनी पड़ी ये टिप्पणी, रद्द किया केस

देश में एससी-एसटी ऐक्ट के दुरुपयोग को लेकर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं। ये सवाल यूँ ही नहीं उठाए जाते हैं, इसके ऐसे कई उदाहरण हैं कि फर्जी SC-ST के कारण कई लोगों की जिंदगी हमेशा के लिए तबाह हो गई। कई लोगों के जीवन के अनमोल वर्ष जेल में बीते और बाद में पता चला कि केस झूठा था। ऐसे ही एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संज्ञान लिया है और कठोर टिप्पणी की है।

एक मामले की सुनवाई करने के दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक सरकारी कर्मचारी के इशारे पर एक पति-पत्नी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

जस्टिस प्रशांत कुमार ने कहा, “अगर उत्तर प्रदेश में इस प्रकार की गतिविधियों की अनुमति किसी और के द्वारा नहीं, बल्कि सरकारी कर्मचारी के द्वारा दी जाती है तो यह न्यायालय अपने कर्तव्य में असफल होगा। यहाँ भू-माफियाओं, राजस्व अधिकारियों और तत्कालीन एसएचओ की मिलीभगत है, जिसमें एक जोड़े को गलत तरीके से आपराधिक कार्यवाही में फंसाया गया है और उन्हें दर-दर भटकने के लिए मजबूर किया गया।”

याचिकाकर्ता अलका सेठी और उनके पति ध्रुव सेठी द्वारा दायर याचिका पर FIR रद्द करने का आदेश कोर्ट ने दे दिया। याचिकाकर्ताओं पर आरोप था कि सतपुड़ा में सड़क के खसरा नंबरों का लेखपाल निरीक्षण कर रहा था। इस दौरान अलका और उनके पति से लेखपाल का सामना हुआ। याचिका के अनुसार दोनों दंपत्ति ने लेखपाल को जातिसूचक गालियाँ दीं।

कथित तौर पर ध्रुव सेठी ने कहा कि अगर उसकी बात नहीं मानी गई तो वह उसकी पत्नी के साथ बदतमीजी और भ्रष्टाचार के मुकदमे में फँसा देगा। आरोप है कि याचिकर्ता ने लेखपाल को बंधक बना लिया था और बिहारीगढ़ एसएचओ के हस्तक्षेप के बाद लेखपाल को रिहा कराया जा सका। इसके बाद लेखपाल ने SC/ST ऐक्ट सहित विभिन्न धाराओं में पति-पत्नी के खिलाफ FIR दर्ज करा दी।

इसके बाद पूरे आपराधिक कार्यवाही के साथ-साथ विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी अधिनियम), सहारनपुर द्वारा पारित समन एवं आरोप पत्र को चुनौती देते हुए पति-पत्नी ने अदालत का रुख किया। इस पर तर्क दिया गया कि ध्रुव सेठी ने जमीन का एक टुकड़ा खरीदा था और म्युटेशन के बाद सीमांकन के लिए आवेदन किया था। सीमांकन के आदेश के बावजूद राजस्व अधिकारियों ने इसे पूरा नहीं किया।

अधिकारी सीमांकन नहीं कर रहे थे और इसके लिए आवेदकों को इधर-उधर दौड़ा रहे थे। जब उन पर दबाव डाला गया तो उन्होंने आश्वासन दिया कि सीमांकन पक्षों के सामने कराया जाएगा, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उन्होंने आवेदकों की अनुपस्थिति में सीमांकन करना शुरू कर दिया। जब इसका विरोध किया गया तो हाथापाई शुरू हो गयी।

दंपति ने कोर्ट को बताया कि स्थानीय भू-माफिया, जिनका उस क्षेत्र में और राजस्व पर भी प्रभाव था, और स्थानीय पुलिस अधिकारी ने एक साजिश रची। वे उनकी जमीन हड़पना चाहते थे। इसी वजह से उनके खिलाफ FIR दर्ज कराई गई थी। इसके साथ ही दंपति ने कहा कि उन्हें नहीं पता था कि लेखपाल की जाति क्या है और ना ही जाति से संबंधित उन्होंने कोई बात कही।

इस पर न्यायालय ने कहा कि चौंकाने वाली बात है कि ST/SC ऐक्ट के प्रावधानों का कुछ लोगों द्वारा व्यक्तिगत प्रतिशोध, व्यक्तिगत हितों या खुद को बचाने के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। न्यायालय ने कहा कि यह कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है, क्योंकि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ एक भी सबूत नहीं था कि उन्हें लेखपात की जाति के बारे में पता था।

कोर्ट ने कहा कि यह विश्वास करना कठिन है कि आवेदकों ने लेखपाल के खिलाफ जाति-संबंधी शब्दों का इस्तेमाल किया था। राजस्व अधिकारी को बाँधने की घटना को भी कोर्ट ने अविश्वसनीय बताया और कहा कि एक महिला एवं एक पुरुष इतने लोगों कैसे हावी हो सकते हैं और एक व्यक्ति को बाँध सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि FIR पढ़ने से कोई मामला नहीं बनता। इसलिए इसे रद्द किया जाता है।

SC/ST Act के दुरुपयोग को लेकर कई कोर्ट सख्त

यह कोई पहली बार नहीं है कि किसी कोर्ट ने ST/SC ऐक्ट के गलत इस्तेमाल पर इस तरह की कठोर टिप्पणी की है। इससे पहले इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं। फरवरी 2021 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसे ही व्यक्ति को निर्दोष करार दिया था, जो पिछले 20 वर्षों से जेल में कैद था। व्यक्ति को बलात्कार के आरोप और SC/ST एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था।

हाईकोर्ट ने आरोपित की रिहाई की बात कहते हुए मामले पर तल्ख़ टिप्पणी भी की है। हाईकोर्ट के मुताबिक़ दुराचार का आरोप साबित नहीं हो पाया। मेडिकल रिपोर्ट में ज़बरदस्ती के कोई सबूत नहीं मिले हैं। मामले की रिपोर्ट भी घटना के तीन दिन बाद लिखाई गई थी। इस मामले में बलात्कार का झूठा आरोप ही नहीं, बल्कि SC/ST ऐक्ट का भी झूठा इस्तेमाल करते हुए दुरुपयोग किया गया था।

SC व्यक्ति ने सीनियर पर प्रताड़ना का आरोप लगाकर दे दी थी जान

इसी तरह के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति के व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में एक व्यक्ति के खिलाफ लगाए गए 22 साल पुराने आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। यह आरोप कन्नौज जिले में जिला बचत अधिकारी के रूप में कार्यरत प्रभात मिश्रा नाम के एक व्यक्ति पर लगा था। मृतक प्रभात मिश्रा का जूनियर था। इसके साथ ही आरोपित पर से कोर्ट ने ST-SC कानून की धाराएँ भी हटा दीं।

सुसाइड नोट पर गौर करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मृतक काम के दबाव के कारण निराश था और आरोपित द्वारा सौंपे गए अपने आधिकारिक कर्तव्यों को लेकर आशंकित था। सुसाइड नोट में व्यक्त की गई आशंकाएँ किसी भी कल्पना से आरोपित को आत्महत्या के लिए उकसाने के तत्वों के रूप में कार्य करने के लिए जिम्मेदार ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा सकती हैं।

सिर्फ गाली देने से नहीं लग सकता SC/ST ऐक्ट

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST Act को लेकर बड़ी टिप्पणी की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि सिर्फ अभद्र भाषा का प्रयोग किसी व्यक्ति के खिलाफ ST/ST Act लगाने के लिए काफी नहीं है। अदालत ने व्यक्ति के खिलाफ लगाए आरोप को खारिज कर दिया था। इसमें एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1) (एक्स) के तहत एक व्यक्ति के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया था।

बेंच ने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति किसी को सार्वजनिक रूप से ‘बेवकूफ’ या ‘मूर्ख’ या ‘चोर’ कहता है तो यह आरोपित द्वारा अपशब्द कहे जाने का कृत्य माना जाएगा। यदि यह SC/ST व्यक्ति को कहा गया है, तब तक धारा 3(1)(एक्स) के तहत व्यक्ति को आरोपित नहीं किया जा सकता, जब तक कि इस तरह के शब्द जातिसूचक टिप्पणी के साथ नहीं कहे गये हों।

अदालत ने कहा था कि इस संबंध में ना ही प्राथमिकी में और ना ही आरोप पत्र में जिक्र है कि मौखिक विवाद के दौरान शिकायतकर्ता की जाति का कोई संदर्भ नहीं दिया गया था। अदालत ने कहा कि जिस समय घटना हुई, उस समय शिकायतकर्ता के अलावा उसकी पत्नी और बेटे ही उपस्थित थे। कोर्ट ने कहा कि पत्नी-बेटे की उपस्थिति में कही गई बात को सार्वजनिक नहीं कहा जा सकता।

SC/ST Act का गलत इस्तेमाल कानून का दुरुपयोग

इसी तरह के एक मामला में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तीन प्रोफेसरों के खिलाफ लगाए गए SC/ST Act को लेकर कड़ी टिप्पणी की थी। उच्च न्यायालय ने पाया कि यह मामला फर्जी है। इसके साथ ही आरोप लगाने वाली प्रोफेसर पर कोर्ट ने 15 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया था।

दरअसल, प्रोफेसरों ने महिला प्रोफेसर को समय पर आने और ढंग से पढ़ाने के लिए कहा था। इसके बाद उस महिला प्रोफेसर ने तीन अन्य प्रोफेसरों पर आरोप लगाते हुए FIR दर्ज करा दी थी और अपनी शिकायत में कहा था कि उसे अपमानित, परेशान और निशाना बनाया जा रहा है।

गलत सबूतों से ST/SC में फाँसी हुई तो शिकायतकर्ता भी नहीं बचेगा

SC/ST Act के लगातार बढ़ रहे दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी चिंता जता चुका है। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST Act के एक प्रावधान की वैधता की जाँच करने पर सहमति जताई। इस प्रावधान के तहत उस व्यक्ति के लिए मौत की सजा है, जिसके झूठे साक्ष्य की वजह से SC या ST समुदाय के किसी निर्दोष सदस्य को दोषी ठहराया गया और फाँसी दी गई।

याचिकाकर्ता ने न्यायमूर्ति कांत और न्यायमूर्ति विश्वनाथन की पीठ को बताया कि एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(2) (I) में प्रावधान है कि यदि एससी या एसटी समुदाय के किसी निर्दोष सदस्य को ऐसे झूठे या मनगढ़ंत साक्ष्य के परिणामस्वरूप दोषी ठहराया जाता है और उसे फाँसी दी जाती है, तो ऐसे झूठे साक्ष्य देने या गढ़ने वाले व्यक्ति को मौत की सजा दी जाएगी।

इस प्रावधान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ इस सुनवाई कर रही थी। अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह सरकार से परामर्श करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई जुलाई के लिए टाल दी।

5 आतंकियों की उम्रकैद दिल्ली हाई कोर्ट ने 10 साल की सजा में बदली, कहा- इनका अपराध गंभीर लेकिन इन्होंने कोई आतंकवादी घटना अंजाम नहीं दी

दिल्ली हाई कोर्ट ने जैश-ए-मोहम्मद के 5 ओवर ग्राउंड वर्कर्स (OGW) की सजा उम्रकैद से घटा कर 10 वर्ष कर दी है। हाई कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में लिप्त होने के बावजूद उन्होंने खुद किसी वारदात को अंजाम नहीं दिया। इस दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने सुप्रसिद्ध रुसी लेखक फ्योडोर दोस्तोवस्ती के मशहूर नॉवेल ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ का भी हवाला दिया। दिल्ली हाई कोर्ट की ओर से बिलाल अहमद मीर, सज्जाद अहमद खान, मुजफ्फर अहमद भट, मेहराज-उद-द्दीन चोपन और इशफाक अहमद भट को ये राहत मिली है।

लॉ रिपोर्टिंग वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार (20 मई 2024) को आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के पाँच सदस्यों को भारतीय दंड संहिता की धारा 121ए के तहत अपराध के लिए दी गई सजा को बदलकर उम्रकैद से 10 साल के कठोर कारावास में बदल दिया। जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस मनोज जैन की बेंच ने बिलाल अहमद मीर, सज्जाद अहमद खान, मुजफ्फर अहमद भट, मेहराज-उद-दीन चोपन और इशफाक अहमद भट द्वारा ट्रायल कोर्ट से मिली उम्रकैद की सजा के खिलाफ दायर अपील पर ये फैसला दिया। हाई कोर्ट की बेंच ने यूएपीए की धारा 23 के तहत अपराध के लिए इशफाक अहमद भट को दी गई सजा को उम्रकैद से 10 साल की कठोर सजा में बदल दिया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, “जिस व्यक्ति के पास विवेक है, वह अपने पाप को स्वीकार करते हुए कष्ट सहता है। हम ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ के लेखक फ्योदोर दोस्तोवस्की के उद्धरण का उल्लेख करते हैं, जिसके 19वें चैप्टर में दोस्तोवस्की ने लिखा, “यदि उसके पास विवेक है तो वह अपनी गलती के लिए पीड़ित होगा; वही सजा होगी – साथ ही जेल भी।”

जानकारी के मुताबिक, बिलाल अहमद मीर, सज्जाद अहमद खान, मुजफ्फर अहमद भट, मेहराज-उद-द्दीन चोपन और इशफाक अहमद भट को साल 2022 में ट्रायल कोर्ट ने आईपीसी की धाराओं और यूएपीए की धाराओं के तहत दोषी पाया था और उन्हें 28 नवंबर 2022 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। ये सभी लोग जम्मू-कश्मीर में आत्यधिक सक्रिय रहे जैश-ए-मोहम्मद जैसे दुर्दांत आतंकी संगठन के ओवर ग्राउंड वर्कर थे।

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि उनकी सजा कम करने से इनके अपराध कम नहीं हो जाते, ये भले ही कई मामलों से जुड़े रहे थे, लेकिन सीधे इन्होंने किसी काम को अंजाम नहीं दिया। ऐसे में इन्हें सुधरने के लिए एक खिड़की खुली छोड़ देनी चाहिए। हालाँकि एनआईए ने जोर दिया है कि ये लोग कई आतंकी घटनाओं से जुड़े रहे हैं।

CM केजरीवाल के PA विभव कुमार को लेकर मुंबई गई दिल्ली पुलिस, स्वाति मालीवाल के साथ मारपीट के बाद यहीं फॉर्मेट किया था फोन: जाँच के लिए SIT का गठन

स्वाति मालीवाल से CM अरविन्द केजरीवाल के आधिकारिक आवास पर मारपीट मामले में आरोपित पूर्व PS बिभव कुमार को दिल्ली पुलिस मुंबई लेकर पहुँची है। दिल्ली पुलिस इस मामले में जाँच के लिए बिभव कुमार को हवाई रास्ते से दिल्ली लेकर पहुँची है। बताया गया है कि दिल्ली पुलिस ऐसा सबूत जुटाने के लिए कर रही है।

जानकारी के अनुसार, दिल्ली पुलिस की टीम बिभव कुमार को मुंबई में उस जगह पर लेकर जाएगी जहाँ उन्होंने अपना फोन फॉर्मेट किया था। यह बात दिल्ली पुलिस ने तीस हजारी कोर्ट को भी बताई है। बताया गया था कि बिभव कुमार ने स्वाति मालीवाल के साथ बदसलूकी के बाद अपना फोन फॉर्मेट कर दिया था।

दिल्ली पुलिस इस प्रयास में है कि वह बिभव कुमार फॉर्मेटेड किए गए फोन से डाटा वापस निकाल सके। इसके लिए ही वह बिभव कुमार को मुंबई में उस जगह ले जा रही है जहाँ उन्होंने फोन से सारा डाटा उड़ा चुके हैं। बिभव कुमार अभी पुलिस की हिरासत में हैं।

पुलिस इस पूरी घटना के अधिक से अधिक सबूत जुटाने में लगी हुई है। बिभव कुमार को इस मामले में शुक्रवार (16 मई, 2024) को गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में सबूत जुटाने के लिए घटना का रीक्रिएशन भी CM आवास में करवाया था। इसमें बिभव कुमार को भी ले जाया गया था।

दिल्ली पुलिस ने लगभग 20 लोगों के बयान भी इस मामले में दर्ज किए गए हैं। दिल्ली पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि बिभव कुमार CM आवास पर घटना वाले दिन क्यों पहुँची थी। मामले में कई डिवाइस की फॉरेंसिक जाँच भी करवाई जाएगी।

मामले में जाँच के लिए एक SIT का भी गठन हुआ है, इसमें सिविल लाइन्स थाने के अधिकारी भी शामिल हैं। उनके पास ही स्वाति मालीवाल शिकायत लेकर सबसे पहले पहुँची थी और इसी थाने में FIR दर्ज की गई थी। यह भी बताया गया है कि आवश्यकता पड़ने पर CM केजरीवाल के परिवार के लोगों के बयान भी लिए जा सकते हैं।

गौरतलब है कि AAP राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने 13 मई, 2024 को आरोप लगाया था कि उनके साथ CM आवास में केजरीवाल के पूर्व PS बिभव कुमार ने मारपीट की। इस मामले में बाद में मालीवाल ने दिल्ली पुलिस के पास FIR भी दर्ज करवाई थी। इसके बाद से इस मामले में AAP और स्वाति मालीवाल के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल रहा है।