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कबाड़ की दुकान में विस्फोट से 4 की मौत, आइसक्रीम बेचता था इश्तियाक अंसारी: बेटा और 2 पड़ोस के बच्चे भी आ गए चपेट में, झारखंड की घटना

झारखंड के पलामू में हुए एक ब्लास्ट की वजह से 4 लोगों की मौत हो गई है। मरने वालों में 3 नाबालिग हैं। धमाका एक कबाड़ी की दुकान में हुआ है। मरने वालों के नाम इश्तियाक अंसारी, शहादत, शहीद और वारिस हैं। माजिद, महरुमा, अफसाना और रुखसाना घायल हैं जिनका इलाज अस्पताल में चल रहा है। इश्तियाक इस कबाड़ की दुकान का मालिक था। पुलिस ने केस दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी है। घटना रविवार (12 मई, 2024) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना पलामू के थाना क्षेत्र मनातू की है। यहाँ रहने वाला 50 साल का इश्तियाक अंसारी गाँव-गाँव फेरी लगा कर कबाड़ खरीदता था। कबाड़ के बदले वह आइसक्रीम बेचता था। रविवार को वह डीजल पम्प सेट का एक पुर्जा खरीद कर लाया। आशंका जताई जा रही है कि इसमें बम था। तमाम सामान छाँटने के बाद इश्तियाक ने जैसे ही कबाड़ तो तौलने के लिए तराजू पर चढ़ाया, उसमें विस्फोट हो गया। विस्फोट इतना तेज था कि उसकी आवाज दूर तक सुनाई पड़ी।

आसपास के लोग दौड़ कर इश्तियाक के घर पहुँचे। तब तक इश्तियाक के साथ उसके 8 वर्षीय बेटे शहादत की मौत हो चुकी थी। पड़ोस के 2 बच्चे 8 वर्षीय शाहिद और 10 साल के वारिश आइसक्रीम खरीदने इश्तियाक के घर गए थे। वो दोनों भी इस धमाके की चपेट में आ गए। धमाके की वजह से इश्तियाक की बीवी महरुमा, 7 साल का बेटा माज़िद और 17 साल की रुखसाना व 14 वर्षीया अफसाना खातून नाम की बेटियाँ बुरी तरह से घायल हो गईं।

मामले की जानकारी होते ही पुलिस मौके पर पहुँची। घायलों को अस्पताल भेजा गया है जिनकी हालात स्थिर बताई जा रही है। पुलिस ने घटनास्थल सील कर के जाँच की और वहाँ से सैम्पल जमा किए। पुलिस का कहना है कि जाँच होने के बाद ही ब्लास्ट की असली वजह बताई जा सकेगी। हालाँकि, प्रथम दृष्टया इसे घर में रखे कबाड़े में धमाका माना जा रहा है।

मालदीव में हेलीकॉप्टर-विमान उड़ाने के लिए पायलट ही नहीं, पड़े हुए हैं भारत से ‘भीख’ में मिले तीनों एयरक्राफ्ट: 76 जवानों के वापस लौटने के बाद मुश्किल में इस्लामी मुल्क

जनवरी 2024 की शुरुआत में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लक्षद्वीप पहुँचे थे और वहाँ की सुंदरता दिखाते हुए उन्होंने पर्यटन के पटल पर उस क्षेत्र को ला दिया, तब मालदीव भड़क गया था। वहाँ के 3 मंत्रियों ने पीएम मोदी के खिलाफ टिप्पणी की, जिसके बाद उन्हें पद से हाथ धोना पड़ा। इसके बाद मालदीव में भारतीय पर्यटकों की आमद में भारी कमी आई। अब सामने आया है कि मालदीव में सेना का विमान उड़ाने के लिए पायलटों की भी कमी है। उन्हें फ्लाइट उड़ाने के लिए कोई मिल ही नहीं रहा है।

बड़ी बात ये है कि ये एयरक्राफ्ट भारत ने ही मालदीव को दान में दिया है। भारत ने 3 एयरक्राफ्ट मालदीव को डोनेट किया था, जिन्हें उड़ाने के लिए अब पायलट ही नहीं हैं। ये बात किसी मीडिया रिपोर्ट ने नहीं, बल्कि खुद मालदीव के रक्षा मंत्री घासन मौमून ने बताई है। इसका कारण ये है कि मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जु ने वहाँ तैनात भारतीय सेना के 76 जवानों को मुल्क छोड़ने का आदेश दे दिया। भारत के प्रति अपने रूखे रवैये के प्रदर्शन के क्रम में उन्होंने ये आदेश दिया था।

इसके बाद भारत ने भी उन जवानों को वापस बुला लिया। अब मालदीव ने उनकी जगह नागरिक पुलिस को तैनात कर दिया है। मालदीव के रक्षा मंत्री घासन मौमून ने शनिवार (11 मई, 2024) को वहाँ के राष्ट्रपति दफ्तर में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए ये जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ‘मालदीवियन नेशनल डिफेंस फोर्स (MNDF)’ में ऐसा कोई जवान नहीं है, जो भारत द्वारा डोनेट किए गए 2 हेलीकॉप्टरों और 1 डोर्नियर विमान को उड़ाने में सक्षम हो।

इन एयरक्राफ्ट्स को उड़ाने के लिए कई चरणों का प्रशिक्षण होता है, जिसे मालदीव में किसी पायलट ने पूरा नहीं किया है। ऐसे में किसी के पास भी इन तीनों एयरक्राफ्ट्स को उड़ाने का लाइसेंस नहीं है। बता दें कि मोहम्मद मुइज्जु के शासनकाल में मालदीव का झुकाव चीन की तरफ ज्यादा है। जिन जवानों को मालदीव ने वापस भारत भेजा है, उनमें अधिकतर पायलट, तकनीकी विशेषज्ञ और क्रू के लोग थे। हालाँकि, मालदीव का कहना है कि सेनाहिया मिलिट्री हॉस्पिटल से भारतीय डॉक्टरों को हटाने का कोई इरादा नहीं है।

‘बोलने की आजादी’ पर जज सूर्य कांत ने दिया ज्ञान, सुप्रीम कोर्ट के इन्हीं मीलॉर्ड ने नुपूर शर्मा के ‘बोल’ को बताया था देश के लिए खतरा

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सूर्य कांत ने कहा है कि बोलने की आजादी की किसी भी तरह रक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने कहा है कि इसके लिए सारे कदम उठाए जाने चाहिए। जस्टिस सूर्य कांत ने ही एक सुनवाई के दौरान पूर्व भाजपा प्रवक्ता नुपूर शर्मा को जिहादियों द्वारा की गई हत्या का जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। बोलने की आजादी की वकालत करने वाले जस्टिस सूर्य कांत ने नुपूर शर्मा को उनके बयान पर माफी माँगने और डिबेट में हिस्सा लेने के लिए फटकारा था।

एक किताब के विमोचन के दौरान जस्टिस सूर्य कांत ने कहा, “इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि बोलने की आजादी के अधिकार को किसी भी तरह बचाने की जरूरत है और हमें उस अधिकार की रक्षा के लिए सभी उपाय करने चाहिए। इसको रोकने के लिए अलग-अलग तरीकों से प्रयास हो सकते हैं, क्योंकि यह एक नई दुनिया है और लोग अलग प्रकार के तरीकों और तकनीकों खोजते रहते हैं जिससे बोलने की आजादी छीनी जा सके।”

इसके बाद जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि मीडिया के लोगों को विशेषतः बोलने की आजादी हो। उन्होंने कहा, “विशेष रूप से, पत्रकारों और मीडिया के लिए अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए, चाहे जो भी संवैधानिक प्रतिबंध हों। इनसे परे, अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए।”

जहाँ वर्तमान में जस्टिस सूर्य कांत बोलने के अधिकार को बचाने की बात कर रहे हैं, वहीं वह आज से लगभग 2 वर्ष पहले पूर्व भाजपा प्रवक्ता के बोलने को लेकर ही सुप्रीम कोर्ट में आग बबूला हो गए थे। नुपूर शर्मा पर सुनवाई के दौरान उन्होंने बोलने को लेकर कई टिप्पणियाँ की थीं।

जस्टिस सूर्य कांत ने उदयपुर में कन्हैया लाल का गला मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद द्वारा काटे जाने का जिम्मेदार नुपूर शर्मा को बताया था। जस्टिस सूर्य कांत ने नुपूर शर्मा पर देश में आग लगाने के आरोप लगाए थे। वर्तमान समय में बोलने की आजादी को बचाने की बात कहने वाले जस्टिस सूर्य कांत ने तब नुपूर शर्मा को उनके बोलने को लेकर माफ़ी माँगने को कहा था।

जस्टिस सूर्य कांत बोले थे कि नुपूर को खुद खतरा है या वो देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन गई हैं? जिस तरह उन्होंने देश में भावनाओं को भड़काया, उसके लिए और देश में जो कुछ हो रहा है उसके लिए उन्हें एकलौता जिम्मेदार माना जाना चाहिए। बोलने की आजादी पर बात करने वाले जस्टिस सूर्य कांत ने सुनवाई में यहाँ तक कह दिया था कि आखिर न्यूज चैनल ने किसी मुद्दे पर बहस रखी ही क्यों और उसमें नुपूर शर्मा ने उसमें बोला ही क्यों।

इसी सुनवाई में जस्टिस सूर्य कांत ने नुपूर शर्मा के बोलने की आजादी की तुलना गधे के खाने के अधिकार और घास के बढ़ने के अधिकार से कर दी थी। यहाँ जस्टिस सूर्य कांत ने यह भी कह दिया था कि मीडिया वालों के जैसे नुपूर शर्मा को बोलने की आजादी नहीं हो सकती।

इस बात पर जस्टिस सूर्य कांत खीझ गए थे कि नुपूर शर्मा को सलाखों के पीछे क्यों नहीं डाला गया। यह सभी टिप्पणियाँ उन्होंने नुपूर शर्मा की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की थीं। नुपूर शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के सामने याचिका लगाई थी कि उनके खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में दर्ज FIR को दिल्ली ट्रांसफर कर दिया जाए क्योंकि उनकी जान को खतरा है।

दरअसल, भाजपा प्रवक्ता की हैसियत से एक टीवी डिबेट शो में वाराणसी के ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में मिले शिवलिंग पर अपनी बात रख रहीं थी। इस दौरान लगातार शिवलिंग पर प्रश्न उठाए जाने के कारण एक मुस्लिम वक्ता से इस्लाम सम्बंधित एक बात कही थी। इसको लेकर बाद में कट्टरपंथियों ने खूब हंगामा किया था। नुपूर शर्मा को ‘सर तन से जुदा’ की धमकियाँ दी गई थीं। उनका सार्वजनिक रूप से बाहर निकलना अभी भी बंद है। नुपूर शर्मा ने इसको लेकर माफ़ी भी मांगी थी।

सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों ने नुपूर शर्मा को ही हर चीज के लिए जिम्मेदार मान लिया था। इसके कारण उन्हें और उनके परिवार को काफी समस्याएँ झेलनी पड़ी हैं। उन्हें लगातार सुरक्षा का खतरा बना हुआ है, वह सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पातीं। अब भी उनकी हत्या के लिए लगातार कट्टरपन्थी लगे हुए हैं और इसके लिए सुपारी दे रहे हैं।

गौरतलब है कि जस्टिस सूर्य कांत ने जहाँ नुपूर शर्मा की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणियाँ की थीं और जिहादियों द्वारा कन्हैया लाल के क़त्ल का जिम्मेदार उन्हें ही माना था, वहीं इन बातों का जिक्र आधिकारिक कोर्ट रिकॉर्ड में नहीं किया था। उनकी इन टिप्पणियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी डाली गई थी। इन टिप्पणियों को वापस लेने को कहा गया था। इन टिप्पणियों के कारण लोगों ने आलोचना करते हुए इस बेंच को ‘शरिया कोर्ट’ कहा था।

नुपूर शर्मा पर टिप्पणी करने वाली बेंच में शामिल जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस सूर्य कांत के विरुद्ध देश की बड़ी हस्तियों ने एक खुला पत्र भी लिखा था। 15 सेवानिवृत्त जजों, 77 रिटायर्ड नौकरशाहों और 25 पूर्व सैन्य अधिकारियों ने खुला पत्र जारी कर के नूपुर शर्मा पर सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों की टिप्पणी को ‘दुर्भाग्यपूर्ण और गलत उदाहरण पेश करने वाला’ करार दिया था। उन्होंने लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट के दो जजों द्वारा की गई ताज़ा टिप्पणी ‘लक्ष्मण रेखा’ का उल्लंघन है और हमें इस पर बयान जारी करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

यह बात भी ध्यान देने वाली है कि जस्टिस सूर्य कांत ने जजों को होने वाले खतरे की बात कही थी। 2021 में जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस एन वी रमन्ना की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा था कि इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) न्यायपालिका की बिलकुल भी सहायता नहीं करती। इस सुनवाई के दौरान बेंच ने अफसोस जताया था कि जांच अधिकारियों द्वारा जजों की चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता है।

ऐसे में इस बात पर अब प्रश्न उठ रहे हैं कि जजों की सुरक्षा की बात करने वाले और बोलने की आजादी को किसी तरह बचाने की वकालत करने वाले जस्टिस सूर्य कांत ने नुपूर शर्मा को खतरे में होने के बाद हिंसा का जिम्मेदार क्यों माना था और उनसे उनके बयान के लिए माफ़ी माँगने को क्यों कहा था।

बंगाल में एक दूसरे से भिड़े इंडी गठबंधन वाले, TMC कार्यकर्ता की हत्या का इल्जाम CPI (M) पर लगा: कड़ी सुरक्षा के बीच 8 सीटों पर मतदान जारी

पश्चिम बंगाल में चौथे चरण के मतदान के बीच हिंसा की घटनाएँ सामने आई हैं। बीरभूम में भाजपा ने आरोप लगाया कि टीएमसी कार्यकर्ताओं ने उनका स्टॉल तोड़ दिया, दुर्गापुर में कहा है कि उनके पोलिंग एजेंटों को बाहर कर दिया गया। अजीब बात ये है कि ये झड़पें केवल टीएमसी और बीजेपी के बीच नहीं हो रहीं बल्कि इंडी गठबंधन के दल भी आपस में एक दूसरे के खिलाफ भिड़े हुए हैं।

खबर है कि बंगाल में बीरभूम और कृष्णानगर में भी तृणमूल कॉन्ग्रेस और सीपीआई (एम) के कार्यकर्ताओं ने एक दूसरे पर हिंसा का आरोप लगाया है। बीरभूम में बताया जा रहा है कि टीएमसी ने दावा किया है उनके कार्यकर्ता को सीपीआई (एम) वाले ने पोलिंग स्टेशन पर मारा। वहीं कृष्णा नगर में इसके उलटा है। वहाँ सीपीआई (एम) ने हिंसा के लिए टीएमसी पर आरोप लगाया है।

इससे पहले बंगाल के पूर्वी बरदवान में रविवार (12 मई 2024) रात एक टीएमसी कार्यकर्ता की हत्या की घटना सामने आई थी। कार्यकर्ता की पहचान 50 साल के मिंटू शेख के तौर पर हुई थी। मिंटू की हत्या का इल्जाम भी टीएमसी ने सीपीआईएम पर ही लगाया था।

टीएमसी प्रवक्ता ने सीपीआई(एम) के लिए कहा था कि सीपीआई (एम) कार्यकर्ताओं को लगता है कि ये लोग इस बार चुनाव जीत जाएँगे, इसलिए हिंसा कर रहे हैं। वहीं सीपीआईएम ने तो सारे आरोपों को खारिज किया है।

याद दिला दें कि राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान करने वाले विपक्षी दलों का इंडी गठबंधन राज्य स्तर पर आकर छिन्न-भिन्न होता दिखता है। कभी ममता बनर्जी खुद जनता के सामने आकर अपील करती हैं कि राज्य में कॉन्ग्रेस और सीपीआई (एम) को वोट न दिया जाए तो कभी सारे दल खुद ही एक दूसरे पर इल्जाम लगाते हुए मिलते हैं।

चौथे चरण की वोटिंग में भी यही सब हो रहा है। सारी हिंसक घटनाओं के देखते हुए बंगाल में सुरक्षा टाइट है। मतदान वाले इलाकों में चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी जुटे हैं। आज सुबह 7 बजे से वहाँ बहरामपुर, कृष्णानगर, राणाघाट, कृष्णानगर, बर्धमान पूर्व, बर्धमान दुर्गापुर, आसनसोल, बोलपुर और बीरभूम में वोटिंग चल रही है।

चौथे चरण में 9 बजे तक वोटिंग

लोकसभा चुनावों के चौथे चरण में आज 10 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की 96 सीटों पर वोटिंग चल रही है। इनमें तेलंगाना की 17, आंध्र प्रदेश की 25, उत्तर प्रदेश की 13, बिहार की 5, झारखंड की 4, मध्य प्रदेश की 8, महाराष्ट्र की 11, ओडिशा की 4, पश्चिम बंगाल की 8 और जम्मू कश्मीर की श्रीनगर लोकसभा सीट पर मतदान जारी है।

7 बजे से शुरू हुई वोटिंग का आँकड़ा यदि 9 बजे तक में देखें तो पता चलता है कि आंध्र प्रदेश में 9.05% वोट डले, बिहार में 10.18%, जम्मू-कश्मीर में 5.07%, झारखंड में 11.78 फीसदी, मध्य प्रदेश में 14.97%, महाराष्ट्र में 6.45 %, ओडिशा में 9.23%, तेलंगाना में 9.51% उत्तर प्रदेश में 11.67% और बंगाल में 15.24%।

AAP सांसद स्वाति मालीवाल को केजरीवाल ने पिटवाया, CM के घर पर हुई मारपीट: मीडिया रिपोर्ट, दिल्ली पुलिस जाँच में जुटी

आम आदमी पार्टी की राज्यसभा सांसद और दिल्ली महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के घर पर पुलिस बुलाई है। स्वाति मालीवाल ने केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार पर मारपीट का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि उन्हें CM आवास के भीतर पीटा गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सोमवार (13 मई, 2024) को AAP की राज्यसभा सांसद CM आवास पहुँची थीं। यहाँ उनके साथ केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार ने मारपीट की। उन पर हमला किया। इसके बाद मालीवाल ने दिल्ली पुलिस को फोन किया।

CM आवास पर मारपीट की शिकायत के बाद दिल्ली पुलिस की एक टीम पहुँची। बताया गया कि स्वाति मालीवाल CM आवास से निकल कर पुलिस थाने भी पहुँच गईं। बताया गया कि यह मारपीट की घटना सोमवार सुबह 10 बजे CM आवास के भीतर हुई।

स्वाति मालीवाल ने पुलिस को एक फोन कॉल में यह भी कहा कि विभव कुमार ने उनके साथ मारपीट मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के कहने पर की। बताया गया कि इस मामले में दो बार फोन किया गया। यह भी बताया गया कि पुलिस के पहुँचने पर स्वाति मालीवाल मौके पर नहीं मिली। वह दिल्ली के सिविल लाइन्स थाने पहुँच चुकी थी।

CM केजरीवाल, उनके निजी सचिव विभव कुमार और स्वाति मालीवाल ने अभी आधिकारिक रूप से इस मामले में कुछ नहीं कहा है। दिल्ली पुलिस ने भी इस विषय में कोई जानकारी नहीं दी है। उत्तरी दिल्ली के DCP भी सिविल लाइन्स थाने में पहुँचे हुए हैं।

गौरतलब है कि जिन विभव कुमार पर स्वाति मालीवाल को पीटने का आरोप लगा है उन्हें विजिलेंस हटाने की कार्रवाई कर चुकी है, विजिंलेंस ने कहा था कि उनकी नियुक्ति नियमानुरूप नहीं थी। बिभव कुमार के खिलाफ उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक सरकारी अधिकारी को उसके कामकाज से रोकने और नुकसान पहुँचाने का मामला दर्ज है। 

मदरसे में यौन उत्पीड़न करता था इमाम, छात्रों ने गला घोंट कर मौत के घाट उतारा: 6 गिरफ्तार, पूरी साजिश का हुआ खुलासा

राजस्थान के अजमेर में एक इमाम की हत्या का मामला सामने आया है। इस संबंध में पुलिस ने मदरसे के 6 छात्रों को गिरफ्तार किया है। इमाम का नाम मौलाना माहिर था। 27 अप्रैल को उसके छात्रों ने उसके द्वारा किए जा रहे यौन उत्पीड़न से तंग आकर उसकी गला घोंट कर हत्या कर दी।

घटना राजस्थान के अजमेर जिले के थाना रामगंज क्षेत्र के दौराई गाँव के मोहल्ला कंचन नगर स्थित मोहम्मदी मस्जिद की है। पुलिस को छानबीन में मौलाना माहिर का मोबाइल मिला है, साथ ही वो रस्सी भी बरामद हुई है जिससे उसका गला घोंटा गया। बताया जा रहा है कि मदरसे के एक छात्र का माहिर ने यौन उत्पीड़न किया था। जब छात्र ने उसे धमकी दी कि वो सबको सबकुछ बता देगा तो माहिर ने उसे पैसों का लालच देकर चुप करा दिया।

इसके बाद भी उसकी हरकतें खत्म नहीं हुईं। वो लगातार यौन उत्पीड़न करता रहा। ऐसे में अन्य छात्रों ने प्लान बनाकर एक दिन उसे बेहोश किया, फिर उसे डंडे से पीटा और रस्सी से उसका गला घोंट दिया। माहिर घटना के दो दिन पहले ही अपने गाँव से आया था।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, माहिर की हत्या का खुलासा करने में पुलिस को समय लगा क्योंकि 15 दिन से ये छात्र एक ही बात को दोहरा रहे थे कि माहिर को अंजान लोगों ने मारा है। समय बीतने के साथ पुलिस के लिए इस केस की छानबीन मुश्किल होती जा रही थी। पुलिस सैंकड़ों सीसीटीवी फुटेज जाँच कर चुकी थी लेकिन कुछ नहीं पता चल रहा था।

अजमेर के एसपी देवेंद्र कुमार बिश्नोई कहते हैं कि उन्होंने इस मामले में बहुत खोजबीन की लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा तब उन्होंने छात्रों को कॉन्फिडेंस में लेना शुरू किया। इसके बाद उन लोगों ने खुद ही सब कुछ उगल दिया। छात्रों ने ही जानकारी दी की इमाम ने छात्र का यौन उत्पीड़न किया था। जब छात्र ने उसे धमकी दी कि वो सबको सबकुछ बता देगा तो माहिर ने उसे पैसों का लालच देकर चुप करवा दिया।

बिश्नोई ने बताया कि हत्या की घटना से दो दिन पहले ही माहिर अपने गाँव से लौटा था। ऐसे में 26 अप्रैल को जब वो खाना खाने चला तो छात्रों ने उसे खाने में सोने की दवाई मिलाकर दे दी। जब मौलाना सोने गया तो छात्र स्टोर रूम से डंडे और रस्सी ले आए। जैसे ही माहिर सोया इन्होंने उसके सिर पर डंडे से मारा। उसने उठने की कोशिश की तो उसका गला रस्सी से घोंट दिया। जैसे ही वो बेहोश हुआ, उसकी धड़कनें रुकीं। सारे वहाँ से भाग गए। बाद में मस्जिद के तौसीफ अशरफ ने इस मामले में शिकायत दायर की और छानबीन के बाद पुलिस ने 6 नाबालिगों को गिरफ्तार किया।

कोलेजियम ने गलत लोगों को बना दिया जज, हिमाचल प्रदेश HC में हो गई नियुक्ति, CJI चंद्रचूड़ के पास पहुँचा मामला

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में दो जजों की कोलेजियम द्वारा नियुक्ति पर विवाद खड़ा हो गया है। कोलेजियम द्वारा नियुक्त किए गए इन जजों के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है। हाई कोर्ट के इस फैसले के लिए खिलाफ प्रदेश के ही दो जिला जजों ने मोर्चा खोल दिया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के सोलन और बिलासपुर के जिला जज चिराग भानु सिंह और अरविन्द मल्होत्रा ने सुप्रीम कोर्ट से खुद को हाई कोर्ट का जज ना बनाए जाने की शिकायत की है। उन्होंने कहा है कि वह राज्य के सबसे वरिष्ठ जिला जज थे लेकिन उनकी जगह हाई कोर्ट के कोलेजियम ने दूसरे जूनियर लोगों को भर्ती कर लिया।

इन दोनों जजों ने आरोप लगाया है कि इस नियुक्ति के दौरान नियमों का पालन नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों तक को नजरअंदाज कर दिया गया। इन दोनों जजों ने कहा कि उनका नाम चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ वाले सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम की तरफ से हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट को दिया गया था।

दोनों जजों ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि नाम की संस्तुति CJI चंद्रचूड़ के कोलेजियम के बाद देश के कानून मंत्रालय ने भी की थी। कानून मंत्रालय ने एक पत्र लिख कर हिमाचल प्रदेश के हाई कोर्ट कोलेजियम को मल्होत्रा और सिंह के नामों पर विचार करने के लिए कहा था।

दोनों जजों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए कहा है कि उनका नाम एक बार जुलाई 2023 और फिर जनवरी 2024 सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाया गया था। लेकिन इस सबके बावजूद हिमाचल हाई कोर्ट ने उनको प्रमोशन नहीं दिया। दोनों जजों ने आरोप लगाया कि उनके नाम को नजरअंदाज कर दिया गया।

मल्होत्रा और सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दी गई याचिका में कहा है कि हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने उनकी जगह पर उनसे दो जूनियर लोगों को नियुक्त कर दिया जो कि अयोग्य हैं और उनके नामों को हटा दिया जबकि उनका ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहा है। दोनों जजों ने मेरिट की अनदेखी का आरोप हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट पर लगाया है।

दोनों जजों ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा की गई नियुक्तियों पर रोक लगाने की माँग की है और कहा है कि सुप्रीम कोर्ट उनकी इस समस्या का समाधान निकाले। अब इस मामले पर CJI डी वाई चंद्रचूड़ के दखल के कयास लगाए जा रहे हैं।

चौथे चरण के लिए EVM में लॉक होगी 1717 उम्मीदवारों की किस्मत: लोकसभा की 96 सीटें, आंध्र-ओडिशा में विधानसभा चुनाव भी

लोकसभा चुनाव 2024 में सोमवार को चौथे चरण का मतदान होगा। लोकसभा चुनाव के चौथे चरण में 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश की 96 लोकसभा सीटों पर मतदान कराया जाएगा। इइसके साथ ही आंध्र प्रदेश और ओडिशा विधानसभा के लिए भी मतदान कराया जाएगा। आंध्र प्रदेश में 175 विधानसभा सीटे हैं, तो ओडिशा की 28 विधानसभा सीटों पर मतदान कराया जाएगा। ओडिशा में चार चरणों में विधानसभा चुनाव कराए जा रहे हैं, जिसकी शुरुआत सोमवार से हो रही है।

लोकसभा चुनाव के चौथे चरण में आंध्र प्रदेश में सर्वाधिक 25 लोकसभा सीट, तेलंगाना में सभी 17 लोकसभा सीट, यूपी में 13 लोकसभा सीट, महाराष्ट्र में 11 लोकसभा सीट, पश्चिम बंगाल और एमपी की 8-8 लोकसभा सीट, बिहार की 5 लोकसभा सीट, ओडिशा और झारखंड की 4-4 सीटों पर मतदान कराया जाएगा। इसके अलावा केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की एक लोकसभा सीट पर भी वोटिंग कराई जाएगी। चौथे चरण की 96 संसदीय सीटों में सामान्य श्रेणी की 64 सीटें, अनुसूचित जनजाति की 12 सीटें और अनुसूचित जाति श्रेणी की 20 सीटें आरक्षित हैं।

मैदान में कई हाई प्रोफाइल चेहरे

लोकसभा चुनाव के चौथे चरण में मोदी सरकार के 5 बड़े मंत्रियों, एक पूर्व मुख्यमंत्री, 2 क्रिकेटर और एक अभिनेता समेत कई दिग्गज राजनेताओं की किस्मत तय होगी। वहीं, यूपी से सपा के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की भी किस्मत का फैसला ईवीएम में कैद होगा।

हाई प्रोफाइल नेताओं में तेलंगाना के हैदराबाद से भाजपा की माधवी लता, कन्नौज से समाजवादी पार्टी से अखिलेश यादव, बिहार के बेगुसराय से गिरिराज सिंह, उजियारपुर से गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय, हैदराबाद से असदुद्दीन औवेसी, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी से गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी, मुंगेर से जदयू के पूर्व अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, झारखंड के खूंटी से अर्जुन मुंडा, पश्चिम बंगाल के आसनसोल से शत्रुघ्न सिन्हा, बहरामपुर से अधीर रंजर चौधरी और क्रिकेटर यूसुफ पठान की किस्मत का फैसला ईवीएम में कैद हो जाएगा।

17.7 करोड़ मतदाता करेंगे नेताओं की किस्मत का फैसला

चुनाव आयोग की विज्ञप्ति के अनुसार, 10 राज्य/केंद्र-शासित प्रदेशों की कुल 96 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में 17.7 करोड़ मतदाता हैं। ये 1.92 लाख मतदान केंद्रों पर वोट डालकर 1717 उम्मीदवारों के के भाग्य का निर्णय कर सकेंगे। इनमें 8.97 करोड़ पुरुष और 8.73 करोड़ महिला मतदाता हैं। इस चरण में आंध्र प्रदेश की 175 विधानसभा सीटों और ओडिशा की 28 विधानसभा सीटों पर भी मतदान कराया जा रहा है।

आयोग ने इस चरण के चुनाव को सुचारु और शांतिपूर्वक सम्पन्न कराने के लिए 364 पर्यवेक्षकों (126 सामान्य पर्यवेक्षक, 70 पुलिस पर्यवेक्षक, 168 अन्य पर्यवेक्षक) की तैनाती कर रखी है। इसके अतिरिक्त कुछ राज्यों में विशेष पर्यवेक्षकों को तैनात किया गया है।

इस साल 100+ माओवादी ढेर, 400+ ने किया सरेंडर: छत्तीसगढ़ में सरकार बदलते वामपंथी हिंसा की टूटने लगी कमर, समझिए कैसे काम कर रही नई रणनीति

कभी केंद्र सरकार ने संसद में ये बात स्वीकार की थी कि भारत में सबसे ज्यादा खून लाल आतंक की वजह से बहता है। साल 2004 की 4 नवंबर को नए-नए प्रधानमंत्री बने डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा था कि नक्सलवाल भारत की आतंरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती है। साल 2010 में दंतेवाड़ा में नक्सलियों के हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे और लगभग पूरी बटालियन का ही सफाया हो गया था। नक्सलवाल उस दौर में देश के 220 जिलों में था, जिसमें 83 जिलों में उनका काफी प्रभाव था। अबूझमाड़ के जंगल कुछ सालों तक अबूझ ही थे। लेकिन पिछले कुछ महीनों में नक्सलियों की जिस तरह से कमर टूट रही है और सुरक्षा बल उनका एक के बाद एक सफाया कर रहे हैं, वो बदली हुई सरकार का, उसकी इच्छाशक्ति का और बदलती रणनीति का नतीजा है।

नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा नीत राजग सरकार ने भारत देश के सबसे बड़े दुश्मन यानी वामपंथी हिंसा से निपटने की जो रणनीति अपनाई है, वो बेहद कारगर होती दिख रही है। मोदी सरकार ने साल 2027 तक पूरे देश को लाल आतंक से मुक्ति दिलाने का लक्ष्य रखा है। ये लक्ष्य तभी पूरा हो सकता था, जब नक्सलियों को उनकी ही माँद में घुसकर न सिर्फ चुनौती दी जाए, बल्कि उनकी जड़ों पर भी करारा प्रहार किया जाए। अब पिछले कुछ माह से नतीजे भी सामने आ रहे हैं। अकेले छत्तीसगढ़ में पिछले 4 माह में नक्सलियों के खिलाफ कई बड़े ऑपरेशन हुए हैं। इन ऑपरेशंस में सौ से ज्यादा नक्सली मारे जा चुके हैं, जिनमें शीर्ष कमांडर तक शामिल हैं, तो 400 से ज्यादा सरेंडर कर मुख्यधारा में लौट चुके हैं।

इस सफलता के पीछे क्या है वजह?

मोदी सरकार ने जब नक्सलवाद के सफाए का लक्ष्य निर्धारित किया, तब सबसे ज्यादा जिस बात पर चर्चा हुई, वो थी नक्सलियों के खिलाफ रणनीति बनाने की। ऐसे में गृह मंत्रालय ने ये तय किया कि सीमा की रखवाली के साथ ही कश्मीर में आतंकवाद का सामना कर चुके बीएसएफ और अन्य फ्रंटल अर्धसैनिक बलों को भी नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में सामने लाया जाए। अभी तक ये जिम्मेदारी सिर्फ सीआरपीएफ तक सीमित थी, बाकी कुछ हिस्सों में औद्योगिक इकाइयों की रक्षा के लिए सीआईएसएफ की टुकड़ियों की सहायता ली जाती थी। ऐसे में फ्रंट पर सीआरपीएफ के साथ ही बीएसएफ को भी नक्सलियों से निपटने का जब जिम्मा सौंपा गया, तब सवाल भी उठ रहे थे, लेकिन अब सभी सवालों के जवाब सामने हैं।

दरअसल, सीआरपीएफ की टीम एक निश्चित प्लानिंग के साथ ही आगे बढ़ती थी। सीआरपीएफ के साथ स्थानीय पुलिस और जंगलों में लड़ने के लिए ट्रेंड राज्यों की स्पेशल फोर्स पूरी प्लानिंग करती थी। फिर ऊपर से आदेश और लंबी सरकारी प्रक्रिया। ऐसे में कई बार नक्सलियों को बच कर निकल जाने का मौका मिलता था। यही नहीं, नक्सलियों के जोन में न तो मोबाइल टॉवर होते थे और न ही सुरक्षा चौकियाँ। ऐसे में हमारे सुरक्षा बल नक्सलियों के जाल में अक्सर फंस जाते थे, लेकिन बीएसएफ को नक्सल विरोधी अभियान में शामिल करने से परिस्थितियाँ बदल गई।

फास्ट ट्रैक्ड एंटी नक्सल ऑपरेशन से सफलता

बीएसएफ को लालफीताशाही से मुक्त रखकर गृह मंत्रालय ने फास्ट ट्रैक्ड एंटी नक्सल ऑपरेशन चलाने की अनुमति दी है। ऐसे में पहले जहाँ किसी ऑपरेशन को अंजाम देने में सीआरपीएफ की टीम को काफी समय लग जाता था और नक्सलियों को संभलने का मौका मिल जाता था, वो मौका अब नहीं मिलता है। अब बीएसएफ टारगेटेड ऑपरेशन को अंजाम देती है। बीएसएफ व अन्य सुरक्षा बलों को नए हथियारों और तकनीकी से लैस किया गया है। यही नहीं, नक्सलियों के गढ़ के आसपास भी अब सुरक्षा बलों की उपस्थिति है, खासकर अबूझमाड़ में नक्सलियों के सबसे बड़े केंद्र से महज 4 किमी की दूरी पर।

अब पहले के मुकाबले, संचार ही नहीं, यातायात की व्यवस्था और चप्पे-चप्पे पर तैनात पुलिस की चौकियाँ नक्सलियों के खात्मे में खासा योगदान दे रहे हैं। पिछले 4-5 माह में जो नतीजे सामने आए हैं, वो इन्हीं चार-5 माह की व्यवस्था नहीं है। दरअसल, गृह मंत्रालय और नक्सल प्रभावित राज्यों में साल 2022 से नई प्लानिंग के तहत जो पुलिस की चौकियाँ बनाई गई हैं, वो काफी काम आ रही हैं। अब कॉर्डिनेटेड अटैक में नक्सलियों को संभालने का मौका नहीं दिया जा रहा है। कुछ दिनों पहले ही बीएसएफ ने एकदम तड़के नक्सलियों के एक शिविर पर धावा बोल दिया था, जिसमें 29 से ज्यादा नक्सली मार गिराए गए थे। उन नक्सलियों में ईनामी नक्सली भी शामिल थे। उन्हें संभलने का मौका तक नहीं मिला था, हालाँकि तीन तरफ से घिरे होने के बावजूद बड़ी संख्या में नक्सली भागने में सफल हो गए थे, लेकिन उस ऑपरेशन के बाद सुरक्षा बलों ने दो और बड़े ऑपरेशन चलाए, जिसमें 2 दर्जन से ज्यादा नक्सली ढेर किए जा चुके हैं।

नक्सलियों के खिलाफ चलाए गए ये बड़े अभियान

नक्सलवाद के खात्मे के लिए कभी सरकार ने स्थानीय लोगों को हथियारों से लैस करने का अभियान शुरु किया था, जिसमें सलवा जुडूम अभियान प्रमुख था। हालाँकि सरकार ने इसे कभी अपना अभियान नहीं माना, लेकिन कोर्ट से रोक लगने के बाद इस अभियान पर रोक लग गई। इसके अलावा साल 2009 में ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाया गया। इस ऑपरेशन से नक्सलियों की घेरेबंदी में थोड़ी सफलता तो मिली, लेकिन नुकसान ज्यादा हुआ। हालाँकि अब नक्सलियों के बारे में ज्यादा सूचनाएँ उपलब्ध थी। ऑपरेशन ग्रीन हंट से मिले सबक के बाद ऑपरेशन प्रहार शुरू किया गया। तीन हिस्सों में ऑपरेशन प्रहार को काफी सफलताएँ मिली, लेकिन नक्सली अपने गढ़ों में मजबूत बने रहे थे। मौजूदा समय में सुरक्षा बल नक्सली इलाकों में हॉट परस्यूट और ड्राइव फॉर हंट चला रहे हैं, जो नक्सल आतंकवाद के खिलाफ बड़ी सफलताएँ दिला रही है।

नक्सल आतंकवाद का खात्मा कब तक?

हॉट परस्यूट और ड्राइव फ़ॉर हंट के तहत अब सुरक्षा बल अलग तरीके से नक्सलियों का सफाया कर रहे हैं। पहले नक्सलियों के पास इतना समय होता था कि वो अपना पीछा कर रहे सीआरपीएफ के जवानों को घेरकर उनपर ही हमला कर देते थे, लेकिन अब सुरक्षा बल न सिर्फ उनका पीछा करते हैं, बल्कि बेहतरी मशीनरी के दम पर उनकी आईईडी से लेकर माइन्स तक का तोड़ निकाल रहे हैं। ऐसे में माओवादियों का शिकार बनने की जगह अब सुरक्षा बल माओवादियों का थकाकर, उनका ही शिकार करते हैं। इसकी वजह से इस ऑपरेशन का सक्सेस रेट ज्यादा है। इसके अलावा जो बात इन ऑपरेशंस की सफलता में सबसे आगे आ रही है, वो है इन सुरक्षा बलों के हाथों में अत्याधुनिक हथियार, जिनको उन तक पहुँचाने का जिम्मा खुद गृह मंत्रालय उठा रहा है।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जल्द से जल्द राज्य से नक्सलियों के सफाए की बात कह रहे हैं, जिसमें दम भी नजर आता है। लेकिन नक्सलियों के लड़ने के तरीके और उनकी शैली को देखते हुए इसमें थोड़ा समय और लगने की उम्मीद है। वैसे, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इसी साल एक हाई-लेवल मीटिंग की थी, खासकर इस साल नक्सल आतंकवाद को कुचलने की शुरुआत से पहले की आखिरी बड़ी मीटिंग, जिसमें उन्होंने सुरक्षाबलों को पूरी छूट देते हुए नक्सलवाद के समूल नाश के लिए साल 2027 का समय फिक्स्ड कर दिया है। ये मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल होगा, जब कमोवेश उसी समय भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन रहा होगा, तो दूसरी तरफ वो अपने अंदर मौजूद सबसे बड़े खतरे को भी खत्म कर चुका होगा।

गुजरात में बांध की जमीन पर अवैध कब्जा कर बना दी दरगाह: पानी में इत्र मिलाने से चर्मरोग का शिकार हो रहे लोग, प्रशासन से शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं

गुजरात के जामनगर में रणजीत सागर बांध में अवैध इस्लामी निर्माण किया गया है। हैरानी की बात तो यह है कि प्रशासन द्वारा वर्ष 2022 में अवैध कब्जा हटाने का लिखित आदेश जारी होने के बाद भी निर्माण अभी भी जस का तस है। मामले को लेकर स्थानीय हिंदू कार्यकर्ताओं में आक्रोश है। उनका आरोप है कि प्रशासन की निगरानी में इस निर्माण को नहीं हटाया जा रहा है। वहीं पुलिस-प्रशासन ने अपने संज्ञान में इस मामले के आने के बाद कार्रवाई का भरोसा दिया है।

जामनगर जिले के हर्षदपुर और नवा मोखाना गाँव के बीच रणजीत सागर बांध के अंदर एक दरगाह बनी हुई है। इस दरगाह का नाम ‘हजरत पंजूपीर दरगाह शरीफ’ है। नियमों के मुताबिक, सार्वजनिक जलस्रोतों पर निजी निर्माण करना कानूनी अपराध है। हालांकि, बांध की सरकारी जमीन पर 10,000 से 15,000 वर्ग फुट क्षेत्र पर एक दरगाह बनाई गई है। इस मामले में जामनगर के हिंदू कार्यकर्ताओं ने 2022 में प्रशासन को एक ज्ञापन सौंपा था और दबाव हटाने की माँग की थी।

प्रशासनिक सर्वे से साबित हुआ कि जिस दरगाह का निर्माण किया गया है वह सरकारी जगह है और निर्माण अवैध है। इसके बाद सितंबर 2022 में मामलतदार ने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वाले कासम हसन उड़िया के खिलाफ लिखित में अतिक्रमण हटाने का आदेश जारी किया। इस आदेश में कहा गया था कि यदि प्रवर्तक कसम परिसर को नहीं खोलता है, तो राजस्व संहिता की धारा 202 के तहत नोटिस जारी की जाएगी और फिर परिसर को खोलने और अवैध कब्ज़ा हटाने का खर्च भी उसी से वसूला जाएगा।

संघर्ष समिति के कार्यकर्ता युवराज सोलंकी ने ऑपइंडिया को बताया, “बांध के पीछे एक विशाल दरगाह बनाई गई है। इसमें 31-31 फीट की तीन दरगाहें हैं और एक नवनिर्मित साइड दरगाह भी इतनी ही लंबाई की है। वर्ष 2022 में हमने कब्जा हटाओ संघर्ष समिति द्वारा कलेक्टर को एक आवेदन प्रस्तुत किया।

युवराज ने कहा, ”जामनगर रणजीत सागर बांध में यह दरगाह पिछले 30-35 वर्षों में बनाई गई है। मानसून के दौरान जब बांध के इस क्षेत्र में पानी आता है तो ये संरचनाएँ डूब जाती हैं। साथ ही अब जामनगर में पानी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए बांध को सौनी योजना द्वारा भरा जा रहा है, इसलिए यह जगह लगभग 6 महीने तक पानी में डूबी रहती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि आसपास के सभी गाँवों में हिंदू आबादी है।”

इससे होने वाली समस्या के बारे में उन्होंने ऑपइंडिया को बताया, “इस दरगाह में इत्र का प्रयोग बहुतायत में किया जाता है। जब पानी नहीं होता तो बड़ी मात्रा में इत्र चढ़ाया जाता है। पानी आने के बाद उसकी खुशबू पानी में मिल जाती है और जो लोग उस पानी का इस्तेमाल करते हैं उन्हें चर्म रोग हो जाते हैं। परफ्यूम इतना तेज़ होता है कि मुँह या हाथों पर चिपक जाए तो जलन होता है, इस पानी को पीना तो दूर की बात है।”