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वही CM, वही घर… तब मुख्य सचिव की पिटाई पर हंगामा, अब खासमखास स्वाति मालीवाल से बदसलूकी: 6 साल बाद फिर कलंकित हुई दिल्ली

आम आदमी पार्टी (AAP) की ज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने सोमवार (13 मई, 2024) को आरोप लगाया कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के आधिकारिक आवास पर उनके साथ मारपीट हुई। बताया गया कि यह मारपीट केजरीवाल के निजी सचिव विभव कुमार ने की। यह जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स के जरिए दी गई है।

इस मामले में आधिकारिक शिकायत नहीं हुई है लेकिन बताया गया कि स्वाति मालीवाल थाने पहुँची थी। हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली मुख्यमंत्री आवास पर मारपीट की घटना हुई हो। इससे पहले यहाँ 2018 में दिल्ली के तत्कालीन मुख्य सचिव अंशु प्रकाश को पीटा जा चुका है।

फरवरी, 2018 में दिल्ली के मुख्य सचिव IAS अंशु प्रकाश ने आरोप लगाया था कि 19-20 फरवरी की दरम्यानी रात को उन्हें CM केजरीवाल के आधिकारिक आवास पर एक बैठक के नाम पर बुलाया गया। इस बैठक में CM अरविन्द केजरीवाल, डिप्टी CM मनीष सिसोदिया और AAP MLA अमातुल्लाह खान समेत अन्य कई विधायक मौजूद थे।

1986 बैच के IAS अंशु प्रकाश ने अपनी शिकायत में कहा था कि उन्हें AAP सरकार के लिए किए जाने विज्ञापन को लेकर एक मीटिंग में बुलाया गया था। अंशु प्रकाश ने आरोप लगाया कि इसी बैठक में उनके साथ AAP MLA अमानतुल्लाह खान समेत अन्य ने उन पर हमला बोला। अंशु प्रकाश ने आरोप लगाया कि उनके मुंह और सर पर कई घूंसे मारे गए।

उन्होंने दिल्ली पुलिस को की गई शिकायत में CM अरविन्द केजरीवाल और डिप्टी CM मनीष सिसोदिया के खिलाफ भी आरोप लगाया था। अंशु प्रकाश ने इन दोनों समेत 12 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करवाई थी। कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए बाद में अमानतुल्लाह खान और प्रकाश जारवाल को दोषी ठहराया था जबकि बाकी सभी लोगों को बरी कर दिया था।

अंशु प्रकाश को इस पूरे विवाद के बाद दिल्ली सरकार से स्थानांतरित करने केंद्र सरकार में भेज दिया गया था। अब CM केजरीवाल के आवास पर ही राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल के साथ मारपीट की खबरें आई हैं। इस मामले में अभी CM आवास या स्वाति मालीवाल की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

दिल्ली पुलिस ने मीडिया को बताया है कि उन्हें CM आवास से एक महिला के साथ मारपीट को लेकर फोन आया था। दिल्ली पुलिस ने बताया कि शिकायत करने वाली महिला बाद में थाने आ गई और बिना FIR दर्ज करवाए ही चली गई। महिला ने कहा कि वह बाद में FIR दर्ज करवाएगी।

जयपुर के जिस सीरियल ब्लास्ट में गई थी 71 की जान, उसकी बरसी पर 37 स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी: बच्चे भेजे गए घर, जाँच में जुटी पुलिस

दिल्ली के बाद अब जयपुर के स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी दी गई है। जयपुर सीरियल ब्लास्ट 2008 की बरसी पर ई-मेल के जरिए यह धमकी लगभग 37 स्कूलों को मिली है। इन स्कूलों में माहेश्वरी पब्लिक स्कूल तिलक नगर, विद्याआश्रम स्कूल ओटीएस चौराहा, निवारू रोड सेंट टेरेसा स्कूल, महर्षि पीजी कॉलेज सांगानेर, मालवीयनगर कान्वेंट स्कूल आदि शामिल हैं। सूचना मिलते ही पुलिस टीम बम निरोधक दस्ते के साथ स्कूलों में पहुँची और सघन तलाशी ली। फिलहाल कोई भी आपत्तिजनक सामान अथवा विस्फोटक बरामद नहीं हुआ है। घटना की जाँच के लिए SIT का गठन किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 37 स्कूलों को ई-मेल के जरिए मिली इस धमकी के बाद पुलिस की कई टीमें इन स्कूलों में पहुँच गई हैं। ई-मेल भेजने वाले ने लिखा, “स्कूल की बिल्डिंग में बम है, जो कि कभी भी फट सकता है।” राजस्थान के DGP यू आर साहू ने बताया कि सुबह 6 बजे से पुलिस टीमें सर्च अभियान चला रहीं हैं जो अब तक जारी है। अभी तक कोई संदिग्ध सामान नहीं मिला है। पुलिस की साइबर टीमों को मेल भेजने वाले की तलाश में लगाया गया है।

अभी तक मिली जानकारी के अनुसार, धमकी रूसी सर्वर से भेजी गई है। पुलिस ने लोगों से पैनिक न होने और अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की है।

राजस्थान के मुख्य सचिव सुधांश पंत ने आपातकालीन मीटिंग बुलाई है। मीटिंग में राज्य के गृह सचिव आनंद कुमार और इंटेलीजेंस विंग के DG IPS संजय अग्रवाल को भी बुलाया गया है। बम की धमकी के बाद कई स्कूलों में छुट्टी कर दी गई है। कुछ स्कूलों को समय से पहले बंद कर दिया गया है। बच्चों के अभिभावकों को भी काफी परेशान देखा गया। कई माता-पिता स्कूल पहुँच कर अपने बच्चे को साथ ले गए।

अब तक मिली जानकारी के मुताबिक, माहेश्वरी पब्लिक स्कूल तिलक नगर, विद्याआश्रम स्कूल ओटीएस चौराहा, निवारू रोड सेंट टेरेसा स्कूल, महर्षि पीजी कॉलेज सांगानेर, मालवीयनगर कान्वेंट स्कूल को बम की धमकी दी गई है।

2008 में हुआ था सीरियल ब्लास्ट

बताते चलें कि 13 मई, 2008 को जयपुर में सीरियल ब्लास्ट हुए थे। इस दिन जयपुर के अलग-अलग हिस्सों में 15 मिनट के अंदर 8 धमाके हुए थे। इन विस्फोटों में 71 लोगों की मौत हो गई थी और 185 लोग घायल हुए थे। धमाके के लिए साइकिलों का प्रयोग किया गया था। कुछ लोगों के शव तो हवा में उड़ते दिखाई दिए थे। 18 दिसंबर, 2019 को इस केस में मोहम्मद सैफ, मोहम्मद सरवर आजम, सैफुर्रहमान और मोहम्मद सलमान को अदालत ने दोषी करार दिया था।

हिंदुओं की आबादी 66 से घटकर 54%, मुस्लिम बढ़ गए 6 से 26%: मिलिए जनसंख्या वृद्धि दर के ‘केरल मॉडल’ से – यह लेख नहीं, आँकड़े हैं

हमारे देश में 28 राज्य हैं, जिसमें से 8 राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। देश की जनसंख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, जो बहुत ही चिंता का विषय है। ऐसे समय में यह जानना अतिमहत्वपूर्ण है कि इस जनसंख्या वृद्धि में हिन्दुओं की संख्या का कितना अनुपात है।

अगर हम एक साधारण हिन्दू परिवार की बात करें, तो हम पाएँगे कि हमारी दादी, नानी और हमारे माता-पिता कम से कम 5 से 6 भाई-बहन हुआ करते थे। लगभग 40 वर्ष के युवा के माता-पिता का जन्म आजाद भारत में हुआ, बढ़ती हुई जनसंख्या निश्चित रूप से देश की प्रगति में बहुत बड़ी समस्या है और इसका सीधा असर आर्थिक और सामाजिक रूप से दिखता है।

अगर सही मायनों में हम जनसंख्या के प्रति जागरूक हैं तो हमें जनसंख्या वृद्धि के डेटा को समझना होगा। इंदिरा गाँधी की सरकार ने 1970 के दशक में हम दो हमारे दो का नारा दिया। कहीं न कहीं यह नीति साफ तौर पर हिन्दुओं के लिए थी। कैसे? इसका उत्तर आसानी से समझने के लिए पहले हम अभी के आँकड़ों को समझ लेते हैं।

अगर हम हिन्दू और मुस्लिम की जनसंख्या वृद्धि के अनुपात को देखें तो हम पाएँगे कि हिन्दुओं की जनसंख्या वृद्धि की दर 2011 के डेटा के हिसाब से 16.08% थी जबकि मुस्लिम जनसंख्या की वृद्धि दर 24.6% थी। हिन्दुओं की जनसंख्या वृद्धि दर पिछले चार दशकों से घट रही है। यह वृद्धि दर 1981 में 24.1%, 1991 में 22.7%, 2001 में 19.9% तथा 2011 में 16.8% है। देश में हिन्दू की जनसंख्या, देश की कुल आबादी का 80% भी नहीं रह गई है और हर दशक के बाद यह अनुपात कम ही होता जा रहा है।

2011 की जनगणना के अनुसार केरल की बात करें तो हम पाएँगे कि हिन्दू की आबादी वहाँ सिर्फ 54.72% है, जबकि 1911 (तब त्रावणकोर राज्य) के डाटा के हिसाब से यह 66.57% थी। 1911 के उसी केरल में मुस्लिम आबादी थी मात्र 6.61%, और 2011 में कितनी थी? 26.56% मुस्लिम थे केरल में जनगणना 2011 के अनुसार।

मतलब केरल में हिंदू घट रहे हैं, मुस्लिम बढ़ते चले जा रहे हैं। 2011 और 1911 के आँकड़ों से अगर क्लियर नहीं डेमोग्राफी चेंज का मसला तो एक आँकड़ा 2011 और 2001 का भी है। इन 10 सालों में केरल में हिंदुओं और ईसाइयों की जनसंख्या के मुकाबले मुस्लिम आबादी 10% ज्यादा बढ़ी थी। सिर्फ केरल ही नहीं, पश्चिम बंगाल में भी हिन्दुओं की जनसंख्या घटती जा रही है, जो चिंता का विषय है।

वर्ष 1975 में इंदिरा गाँधी ने देश में आपातकाल लगा दिया, राजनीतिक गलियारों से लेकर एक आम आदमी के निजी जीवन तक इसका प्रभाव पड़ा। यह वही समय था, जब इंदिरा गाँधी ने जनसंख्या को नियंत्रण करने के लिए नसबंदी जैसे सख्त फैसले किए। यह फैसला इंदिरा सरकार ने लिया था, पर इसे लागू करने की जिम्मेदारी उनके छोटे बेटे संजय गाँधी को दी गई थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक 60 लाख से ज्यादा लोगो की नसबंदी कर दी गई। अगर हम इस मुद्दे पर प्रकाश डालें तो पाएँगे कि मीडिया में ऐसा कोई भी डेटा प्रकाशित नहीं हुआ, जो यह बता सके कि 60 लाख लोगों में से किस धर्म के कितने लोग थे, जिनकी नसबंदी हुई।

अगर हम हिन्दुओं की जनसंख्या वृद्धि को ध्यान में रख कर 1971 और 1981 के डेटा का अनुपात देखें तो पाएँगे कि 1981 के बाद हिन्दुओं की जनसंख्या घटती जा रही है, जबकि बाकी वर्ग की जनसंख्या हिन्दुओं के अनुपात में तेजी से बढ़ रही है। अगर सभी धर्म-मजहब के लोगों की नसबंदी जनसंख्या के आधार पर समानुपातिक किया गया होता तो क्या कारण है कि सिर्फ हिंदुओं की जनसंख्या घटी, जबकि बाकियों की बढ़ी? इंदिरा गाँधी की सरकार को जनसंख्या नियंत्रण करने के लिए वर्ल्ड बैंक, स्वीडिश अंतरराष्ट्रीय विकास प्राधिकरण और संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष से 10 मिलियन डॉलर की आर्थिक मदद मिली थी।

इस पूरे प्रकरण से अगर हम दो साल पीछे 1973 में देखें तो हम पाएँगे कि इंदिरा गाँधी ने वर्ष 1973 में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जो एक गैर सरकारी मुस्लिम संगठन है, का गठन किया। इसके लिए देश के हिन्दुओं के साथ-साथ सीधे तौर पर संविधान को भी दर किनार किया गया। यहाँ, यह जानना अति आवश्यक है कि यह वही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड है, जो राम मंदिर जन्मभूमि विवाद में न्यायालय में राम मंदिर के विरुद्ध पार्टी था। क्या यह सब महज एक संयोग है या फिर हिन्दुओं के विरुद्ध किसी सोची समझी साजिश का हिस्सा?

अगर हम नेहरू गाँधी परिवार के इतिहास की पड़ताल करें तो पाएँगे कि कहीं न कहीं इसके तार मुगलों से जुड़ते दिखते हैं। क्या हिन्दू की आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं है? ये कौन लोग हैं, जो हिन्दुओं या यूँ कहें की जो सनातन धर्म के अनुयायियों को मिटाने पर तूले हैं? राम मंदिर आंदोलन के समय लाखों कारसेवकों पर अंधाधुँध गोली चलाने वाले कौन थे? सनातन धर्म के विरोधी ये कौन लोग हैं, जो हिन्दू को हिन्दू के विरुद्ध भड़काना चाहते हैं?

अगर हम कानपूर के बिकरू कांड की बात करें तो पाएँगे कि अपराधी विकास दुबे एक ब्राह्मण था, जिसकी मुठभेड़ में हुई मृत्यु पर ब्राह्मणों को भड़काने की राजनीति शुरू हो गई परन्तु बिकरू कांड में बलिदान हुए पुलिस ऑफिसर देवेंदर मिश्रा भी ब्राह्मण थे, पर इस पर कोई चर्चा नहीं हुई।

यह सब उस षड्यंत्र का हिस्सा है, जो सदियों से उन लोगों के खिलाफ चल रहा है, जो सनातन धर्म का परचम लहरा रहे हैं। हिन्दुओं में आपस में फुट डालकर राजनीति करने की आदत देश विरोधी ताकतों की बहुत पुरानी है। परन्तु अब समय आ गया है कि हिन्दुओं को संगठित होकर, ब्राह्मण और दलित की राजनीति से ऊपर उठकर अपने असली दुश्मनों के विरुद्ध रण के लिए तैयार होना होगा।

ईरान के चाबहार बंदरगाह का ‘ठेकेदार’ बना भारत, 10 साल तक देखेगा संचालन: वाजपेयी के जमाने में शुरू हुई कवायद, मोदी राज में पूरा हुआ मिशन

अब भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह को चलाएगा। इसके लिए भारत और ईरान के बीच 10 साल का समझौता हो रहा है। भारत के बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मामलों के मंत्री सर्बानंद सोनोवाल भारत और ईरान के इस समझौते पर हस्ताक्षर के लिए सोमवार (13 मई, 2024) को ईरान गए हैं।

भारत ने इस चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए बड़ी धनराशि का निवेश किया है। इसका प्रबंधन अभी तक भारत सीमित रूप से करता है। नया समझौता बंदरगाह को चलाने के लिए होगा जो कि 10 वर्षों का होगा। इसे आगे बढ़ाया भी जा सकेगा। चाबहार बंदरगाह आर्थिक के साथ ही सामरिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्या है नया समझौता?

नए समझौते के अनुसार, भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह का पूरी तरह से प्रबन्धन करेगा। इसके ऑपरेशन को भारत ही चलाएगा। इसके अंतर्गत इस बंदरगाह पर होने वाली सभी गतिविधियों को भारत नियंत्रित करेगा। यहाँ आने जाने वाले जहाजों और माल के आवागमन को भारतीय कम्पनियाँ नियंत्रित करेंगी। भारत और ईरान के बीच यह समझौता 10 वर्षों के लिए होगा। भारत और ईरान के बीच पहले भी चाबहार पोर्ट के संचालन का समझौता हुआ था।

हालाँकि, इस समझौते के अंतर्गत भारत को चाबहार पोर्ट पर सीमित अधिकार थे। यह समझौता 2016 में हुआ था। इसके अंतर्गत चाबहार पोर्ट के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन की जिम्मेदारी भारत के पास थी। यह समझौता लम्बे समय के लिए नहीं किया गया था। यह समझौता प्रत्येक वर्ष दोहराया जाता था। यह समझौता भारत और ईरान के अलावा अफगानिस्तान के साथ भी किया गया था। भारत की चाबहार में बड़ी हिस्सेदारी के लिए ईरान पहले से जोर लगाता रहा है।

चाबहार में भारत ने किया है निवेश, अटल बिहारी सरकार से शुरू हुई कवायद

चाबहार बंदरगाह को विकसित करने में भारत का बड़ा रोल है। चाबहार बंदरगाह को विकसित करने की बातचीत 2002 में चालू हुई थी। 2003 में तत्कालीन ईरानी राष्ट्रपति मुहम्मद खतामी नई दिल्ली की यात्रा पर आए थे, इस यात्रा के दौरान तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ उन्होंने कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें आवागमन को लेकर सहयोग भी एक बिंदु था। इसके बाद देश में सत्ता बदल गई और UPA सरकार ने इस मोर्चे पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया।

मोदी सरकार आने के बाद इस मामले में तेजी से कदम बढ़ना चालू हुए। 2015 में भारत ने विदेश में पोर्ट चलाने के लिए एक नई सरकारी कम्पनी का गठन किया। भारत और ईरान के बेच इस दौरान चाबहार बंदरगाह को विकसित करने की बातचीत ने जोर पकड़ा और 2016 में दोनों देशों के बीच समझौता हुआ। पीएम मोदी ने 2016 में अपनी यात्रा के दौरान ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी के साथ इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

भारत ने चाबहार के एक टर्मिनल में 85 मिलियन डॉलर (लगभग ₹7.09 करोड़) निवेश करने की घोषणा की थी। भारत ने इस बंदरगाह के विकास के लिए 150 मिलियन डॉलर (लगभग ₹1250 करोड़) का कर्ज देने की भी घोषणा की थी।

चाबहार को विकसित करने वाली भारतीय कम्पनी IPGL के अनुसार, बंदरगाह के पूरी तरह विकसित होने पर इसकी क्षमता 82 मिलियन टन हो जाएगी। इससे ईरान के बंदर अब्बास बंदरगाह से भीड़ कम करने में राहत मिलेगी। इसी के साथ इसके नए तकनीक से बने होने के कारण यहाँ माल की आवाजाही आसानी से हो सकेगी।

अफगानिस्तान का रास्ता आसान करता है चाबहार

भारत चाबहार में अफगानिस्तान के कारण सबसे अधिक रूचि रखता है। पहले भारत से अफगानिस्तान कोई भी माल भेजने के लिए उसे पाकिस्तान से गुजरना होता था। चाबहार बंदरगाह के विकास के बाद से अफगानिस्तान माल भेजने का यह सबसे अच्छा विकल्प है। भारत अफगानिस्तान को गेंहू भी इस रास्ते से भेज रहा है। अफगानिस्तान के अलावा यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशियाई देशों के भी रास्ते खोलेगा। इन देशों से गैस और तेल भी इस पोर्ट के जरिए लाया जा सकता है। इन देशों के साथ व्यापार इस चाबहार बंदरगाह के जरिए आसान हो जाएगा।

सामरिक महत्व भी रखता है चाबहार

चाबहार इस क्षेत्र में भारत के आर्थिक हितों के साथ ही सामरिक हितों को भी साधेगा। यह अफगानिस्तान से जुड़ने के लिए भारत की पाकिस्तान पर निर्भरता को खत्म कर देगा। इससे भारत अफगानिस्तान को सीधे मदद पहुँचा पाएगा। इस बंदरगाह की भौगोलीय स्थिति इसे और भी महत्वपूर्ण बनाती है। चाबहार बंदरगाह ईरान के सिस्तान और बलूचिस्तान में स्थित है। चाबहार, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के बराबर ही ओमान की खाड़ी में स्थित है।

ग्वादर बंदरगाह चीन ने बनाया है। ऐसे में भारत इस इलाके में चीन को भी चाबहार के जरिए चुनौती दे रहा है। चीन ग्वादर को बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत बना रहा है। इससे वह पूरी दुनिया को रोड, रेल और समुद्री मार्ग से जोड़ना चाहता है।

चाबहार से अफगानिस्तान की सीमा भी नजदीक है। ईरान से तेल समेत अन्य सामनों की आपूर्ति भी भारत में चाबहार के जरिए जल्दी हो सकती है। इससे इस इलाके में भारत का दबदबा भी बढ़ेगा। इसके अलावा चाबहार से जुड़ी हुई एक रेल लाइन भी बनाए जाने का प्रस्ताव है। ईरान को भी इस बंदरगाह से फायदा होगा। वह अपने ऊपर पर लगे प्रतिबंधों को इस बंदरगाह के जरिए बच सकता है। ऐसे में दोनों देशों को फायदा होगा।

फर्जी OBC सर्टिफिकेट पर लुबना शौकत ने की MBBS की पढ़ाई, हाईकोर्ट ने कहा- डॉक्टरी करने दीजिए नहीं तो होगा ‘देश का नुकसान’

बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक महिला डॉक्टर का MBBS एडमिशन रद्द करने से इनकार कर दिया। उस पर आरोप था कि उसने झूठी सूचनाएँ लेकर OBC नॉन-क्रीमी लेयर सर्टिफिकेट प्राप्त किया था। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता का एडमिशन रद्द करने का अर्थ होगा देश को एक डॉक्टर का नुकसान होना, क्योंकि उक्त महिला अब एक डॉक्टर बन चुकी है। बता दें कि उसने MBBS का कोर्स पूरा कर लिया था। उच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसी स्थिति में उसकी डिग्री छीन लेना उचित नहीं होगा।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि हमारे देश में पहले से ही जनसंख्या के हिसाब से डॉक्टरों का अनुपात काफी कम है। इसीलिए, बॉम्बे हाईकोर्ट का मानना है कि एक डॉक्टर की डिग्री छीनना राष्ट्रीय हानि होगी, क्योंकि देश के नागरिक एक एक डॉक्टर को खो देंगे। हालाँकि, जस्टिस AS चांदुरकर और जस्टिस जितेंद्र जैन की एक खंडपीठ ने OBC नॉन-क्रीमी लेयर वाला सर्टिफिकेट रद्द करते हुए याचिकाकर्ता का एडमिशन ओपन कैटेगरी से हुए में बदल दिया। इसके अलावा अब उसे अपनी फी भी इसी हिसाब से चुकानी पड़ेगी।

साथ ही उस पर 50,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। हाईकोर्ट ने कहा कि उसे भान है कि मेडिकल कोर्स में प्रवेश के लिए कितनी प्रतियोगिता है, साथ ही उसे ये भी पता है कि ओपन कैटेगरी में इसके लिए भारी फी चुकानी पड़ती है। जजों ने कहा कि इसका ये अर्थ नहीं है कि छात्र और अभिभावक अनुचित माध्यमों का इस्तेमाल कर के मेडिकल कोर्स में दाखिला ले लें। अवैध NCL सर्टिफिकेट मामले में एडमिशन रद्द होने से रोकने के लिए उक्त डॉक्टर हाईकोर्ट पहुँची थी।

याचिकाकर्ता लुबना शौकत मुजावर ने मुंबई के सिओन स्थित लोकमान्य तिलक म्युनिसिपल मेडिकल कॉलेज एन्ड जनरल हॉस्पिटल से डिग्री प्राप्त कर रखी है। उसने 2012-13 में एडमिशन लिया था। याचिकाकर्ता के पिता ने इन्क्वारी कमिटी के सामने झूठ कहा था कि उनकी पत्नी बेरोजगार है। तलाक के बावजूद उनका कहना था कि बच्चों के लिए दोनों साथ रह रहे हैं, साथ ही पत्नी कॉर्पोरेशन में कार्यरत थी। अक्टूबर 2013 में उसका एडमिशन रद्द कर दिया था था, लेकिन फरवरी 2014 में हाईकोर्ट ने उसे राहत देते हुए कोर्स जारी रखने का आदेश दिया।

उक्त महिला ने ऑब्सटेट्रिक्स और गायनेकोलॉजी में MBBS कोर्स, डिप्लोमा और इंटर्नशिप पूरी की थी। उसका कहना था कि तलाक के बाद पत्नी की आय से कुछ लेना-देना नहीं है, ये उसके पिता की सोच थी इसीलिए उन्होंने पत्नी की इनकम नहीं गिनाई। उसका कहना था कि उसके पिता की आय सर्टिफिकेट के लिए ज़रूरी लिमिट से कम है, ऐसे में उन्होंने सही जानकारी दी। हाईकोर्ट ने ये टिप्पणी भी की कि मेडिकल कोर्स का आधार अगर झूठी सूचनाएँ हैं तो ये इस प्रोफेशन के लिए एक कलंक होगा, किसी छात्र को ऐसा नहीं करना चाहिए।

30 साल पहले मर गई लड़की, उसके लिए ‘वर’ की तलाश में परिजनों ने अखबार में छपवाया विज्ञापन: जानिए क्या है ‘प्रेथा मडुवे’ जिसमें आत्माओं का होता है विवाह

मैट्रिमोनियल साइटों पर माता-पिता अपने बच्चों के लिए अक्सर अजीबोगरीब डिमांड करते हुए विज्ञापन छपवाते हैं, लेकिन कभी आपने सुना है कि कोई माता-पिता अपने मृत बच्चे जिसने 30 साल पहले शरीर छोड़ा हो एक लिए रूह वाले दूल्हे की खोज कर रहे हों… अगर नहीं सुना तो आपको बता दें कि हाल में एक अखबार में ऐसा विज्ञापन छपा है जिसे कर्नाटक के पुत्तूर में एक परिवार ने छपवाया है।

एक सप्ताह पहले प्रकाशित विज्ञापन में लिखा था: “कुलाल जाति और बंगेरा (‘गोत्र’) की लड़की के लिए लड़के की तलाश। बच्चे की करीब 30 साल पहले मौत हो गई हो। यदि ऐसी स्थिति आती है कि जहाँ एक ही जाति का कोई लड़का मिले, जो अलग बारी का हो और जिसकी मौत 30 साल पहले हो गई हो गई हो तो परिवार ‘प्रेथा मडुवे’ करने को तैयार है।”

परिवार का कहना है कि उन्हें शुरू में लगा था कि उन्हें इस विज्ञापन के लिए ट्रोल किया जाएगा लेकिन जब इस एड को देख उनके पास 50 परिवार पहुँचे तो उन्होंने कहा कि वह अनुष्ठान को संपन्न करने के लिए दिन तय करेंगे।

दरअसल, इस परिवार ने ‘कुले मदिमे’ या ‘प्रेथा मडुवे’ अनुष्ठान के लिए ऐसा विज्ञापन निकलवाया था। ये अनुष्ठान ‘कुले मदीम’ उडुपी और दक्षिण कन्नड़ के तटीय क्षेत्रों में संपन्न करवाया जाता है। यह सामान्य विवाह की तरह ही होता है लेकिन इसे संपन्न दिवंगत आत्माओं के बीच कराया जाता है।

डेक्कन हेराल्ड में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, ये अनुष्ठान पितृ पूजा या फिर पितृ आराधना का हिस्सा है। तुलुनाडु में माना जाता है कि इस अनुष्ठान से उन दिवंगत आत्माओं को मोक्ष मिलता है जिनकी बिना विवाह किए ही मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि इस अनुष्ठान से उन अन्य दुल्हनों की शादी में बाधाएँ नहीं आतीं।

परिवार ने कहा, “विज्ञापन देते वक्त हमें चिंता थी कि हमें ट्रोल किया जाएगा लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस विज्ञापन से अनुष्ठान के बारे में जागरुकता आई है। विभिन्न जातियों के लोगों को भी इस प्रथा के बारे में पता चला है और बाकी लोग भी इसके बारे में जानने हमारे पास पहुँचे हैं।” परिवार ने बताया कि वह लोग पिछले पाँच सालों से उपयुक्त रिश्ते की तलाश कर रहे थे।

कबाड़ की दुकान में विस्फोट से 4 की मौत, आइसक्रीम बेचता था इश्तियाक अंसारी: बेटा और 2 पड़ोस के बच्चे भी आ गए चपेट में, झारखंड की घटना

झारखंड के पलामू में हुए एक ब्लास्ट की वजह से 4 लोगों की मौत हो गई है। मरने वालों में 3 नाबालिग हैं। धमाका एक कबाड़ी की दुकान में हुआ है। मरने वालों के नाम इश्तियाक अंसारी, शहादत, शहीद और वारिस हैं। माजिद, महरुमा, अफसाना और रुखसाना घायल हैं जिनका इलाज अस्पताल में चल रहा है। इश्तियाक इस कबाड़ की दुकान का मालिक था। पुलिस ने केस दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी है। घटना रविवार (12 मई, 2024) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना पलामू के थाना क्षेत्र मनातू की है। यहाँ रहने वाला 50 साल का इश्तियाक अंसारी गाँव-गाँव फेरी लगा कर कबाड़ खरीदता था। कबाड़ के बदले वह आइसक्रीम बेचता था। रविवार को वह डीजल पम्प सेट का एक पुर्जा खरीद कर लाया। आशंका जताई जा रही है कि इसमें बम था। तमाम सामान छाँटने के बाद इश्तियाक ने जैसे ही कबाड़ तो तौलने के लिए तराजू पर चढ़ाया, उसमें विस्फोट हो गया। विस्फोट इतना तेज था कि उसकी आवाज दूर तक सुनाई पड़ी।

आसपास के लोग दौड़ कर इश्तियाक के घर पहुँचे। तब तक इश्तियाक के साथ उसके 8 वर्षीय बेटे शहादत की मौत हो चुकी थी। पड़ोस के 2 बच्चे 8 वर्षीय शाहिद और 10 साल के वारिश आइसक्रीम खरीदने इश्तियाक के घर गए थे। वो दोनों भी इस धमाके की चपेट में आ गए। धमाके की वजह से इश्तियाक की बीवी महरुमा, 7 साल का बेटा माज़िद और 17 साल की रुखसाना व 14 वर्षीया अफसाना खातून नाम की बेटियाँ बुरी तरह से घायल हो गईं।

मामले की जानकारी होते ही पुलिस मौके पर पहुँची। घायलों को अस्पताल भेजा गया है जिनकी हालात स्थिर बताई जा रही है। पुलिस ने घटनास्थल सील कर के जाँच की और वहाँ से सैम्पल जमा किए। पुलिस का कहना है कि जाँच होने के बाद ही ब्लास्ट की असली वजह बताई जा सकेगी। हालाँकि, प्रथम दृष्टया इसे घर में रखे कबाड़े में धमाका माना जा रहा है।

मालदीव में हेलीकॉप्टर-विमान उड़ाने के लिए पायलट ही नहीं, पड़े हुए हैं भारत से ‘भीख’ में मिले तीनों एयरक्राफ्ट: 76 जवानों के वापस लौटने के बाद मुश्किल में इस्लामी मुल्क

जनवरी 2024 की शुरुआत में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लक्षद्वीप पहुँचे थे और वहाँ की सुंदरता दिखाते हुए उन्होंने पर्यटन के पटल पर उस क्षेत्र को ला दिया, तब मालदीव भड़क गया था। वहाँ के 3 मंत्रियों ने पीएम मोदी के खिलाफ टिप्पणी की, जिसके बाद उन्हें पद से हाथ धोना पड़ा। इसके बाद मालदीव में भारतीय पर्यटकों की आमद में भारी कमी आई। अब सामने आया है कि मालदीव में सेना का विमान उड़ाने के लिए पायलटों की भी कमी है। उन्हें फ्लाइट उड़ाने के लिए कोई मिल ही नहीं रहा है।

बड़ी बात ये है कि ये एयरक्राफ्ट भारत ने ही मालदीव को दान में दिया है। भारत ने 3 एयरक्राफ्ट मालदीव को डोनेट किया था, जिन्हें उड़ाने के लिए अब पायलट ही नहीं हैं। ये बात किसी मीडिया रिपोर्ट ने नहीं, बल्कि खुद मालदीव के रक्षा मंत्री घासन मौमून ने बताई है। इसका कारण ये है कि मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जु ने वहाँ तैनात भारतीय सेना के 76 जवानों को मुल्क छोड़ने का आदेश दे दिया। भारत के प्रति अपने रूखे रवैये के प्रदर्शन के क्रम में उन्होंने ये आदेश दिया था।

इसके बाद भारत ने भी उन जवानों को वापस बुला लिया। अब मालदीव ने उनकी जगह नागरिक पुलिस को तैनात कर दिया है। मालदीव के रक्षा मंत्री घासन मौमून ने शनिवार (11 मई, 2024) को वहाँ के राष्ट्रपति दफ्तर में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए ये जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ‘मालदीवियन नेशनल डिफेंस फोर्स (MNDF)’ में ऐसा कोई जवान नहीं है, जो भारत द्वारा डोनेट किए गए 2 हेलीकॉप्टरों और 1 डोर्नियर विमान को उड़ाने में सक्षम हो।

इन एयरक्राफ्ट्स को उड़ाने के लिए कई चरणों का प्रशिक्षण होता है, जिसे मालदीव में किसी पायलट ने पूरा नहीं किया है। ऐसे में किसी के पास भी इन तीनों एयरक्राफ्ट्स को उड़ाने का लाइसेंस नहीं है। बता दें कि मोहम्मद मुइज्जु के शासनकाल में मालदीव का झुकाव चीन की तरफ ज्यादा है। जिन जवानों को मालदीव ने वापस भारत भेजा है, उनमें अधिकतर पायलट, तकनीकी विशेषज्ञ और क्रू के लोग थे। हालाँकि, मालदीव का कहना है कि सेनाहिया मिलिट्री हॉस्पिटल से भारतीय डॉक्टरों को हटाने का कोई इरादा नहीं है।

‘बोलने की आजादी’ पर जज सूर्य कांत ने दिया ज्ञान, सुप्रीम कोर्ट के इन्हीं मीलॉर्ड ने नुपूर शर्मा के ‘बोल’ को बताया था देश के लिए खतरा

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सूर्य कांत ने कहा है कि बोलने की आजादी की किसी भी तरह रक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने कहा है कि इसके लिए सारे कदम उठाए जाने चाहिए। जस्टिस सूर्य कांत ने ही एक सुनवाई के दौरान पूर्व भाजपा प्रवक्ता नुपूर शर्मा को जिहादियों द्वारा की गई हत्या का जिम्मेदार ठहरा चुके हैं। बोलने की आजादी की वकालत करने वाले जस्टिस सूर्य कांत ने नुपूर शर्मा को उनके बयान पर माफी माँगने और डिबेट में हिस्सा लेने के लिए फटकारा था।

एक किताब के विमोचन के दौरान जस्टिस सूर्य कांत ने कहा, “इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि बोलने की आजादी के अधिकार को किसी भी तरह बचाने की जरूरत है और हमें उस अधिकार की रक्षा के लिए सभी उपाय करने चाहिए। इसको रोकने के लिए अलग-अलग तरीकों से प्रयास हो सकते हैं, क्योंकि यह एक नई दुनिया है और लोग अलग प्रकार के तरीकों और तकनीकों खोजते रहते हैं जिससे बोलने की आजादी छीनी जा सके।”

इसके बाद जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि मीडिया के लोगों को विशेषतः बोलने की आजादी हो। उन्होंने कहा, “विशेष रूप से, पत्रकारों और मीडिया के लिए अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए, चाहे जो भी संवैधानिक प्रतिबंध हों। इनसे परे, अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए।”

जहाँ वर्तमान में जस्टिस सूर्य कांत बोलने के अधिकार को बचाने की बात कर रहे हैं, वहीं वह आज से लगभग 2 वर्ष पहले पूर्व भाजपा प्रवक्ता के बोलने को लेकर ही सुप्रीम कोर्ट में आग बबूला हो गए थे। नुपूर शर्मा पर सुनवाई के दौरान उन्होंने बोलने को लेकर कई टिप्पणियाँ की थीं।

जस्टिस सूर्य कांत ने उदयपुर में कन्हैया लाल का गला मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद द्वारा काटे जाने का जिम्मेदार नुपूर शर्मा को बताया था। जस्टिस सूर्य कांत ने नुपूर शर्मा पर देश में आग लगाने के आरोप लगाए थे। वर्तमान समय में बोलने की आजादी को बचाने की बात कहने वाले जस्टिस सूर्य कांत ने तब नुपूर शर्मा को उनके बोलने को लेकर माफ़ी माँगने को कहा था।

जस्टिस सूर्य कांत बोले थे कि नुपूर को खुद खतरा है या वो देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन गई हैं? जिस तरह उन्होंने देश में भावनाओं को भड़काया, उसके लिए और देश में जो कुछ हो रहा है उसके लिए उन्हें एकलौता जिम्मेदार माना जाना चाहिए। बोलने की आजादी पर बात करने वाले जस्टिस सूर्य कांत ने सुनवाई में यहाँ तक कह दिया था कि आखिर न्यूज चैनल ने किसी मुद्दे पर बहस रखी ही क्यों और उसमें नुपूर शर्मा ने उसमें बोला ही क्यों।

इसी सुनवाई में जस्टिस सूर्य कांत ने नुपूर शर्मा के बोलने की आजादी की तुलना गधे के खाने के अधिकार और घास के बढ़ने के अधिकार से कर दी थी। यहाँ जस्टिस सूर्य कांत ने यह भी कह दिया था कि मीडिया वालों के जैसे नुपूर शर्मा को बोलने की आजादी नहीं हो सकती।

इस बात पर जस्टिस सूर्य कांत खीझ गए थे कि नुपूर शर्मा को सलाखों के पीछे क्यों नहीं डाला गया। यह सभी टिप्पणियाँ उन्होंने नुपूर शर्मा की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की थीं। नुपूर शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के सामने याचिका लगाई थी कि उनके खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में दर्ज FIR को दिल्ली ट्रांसफर कर दिया जाए क्योंकि उनकी जान को खतरा है।

दरअसल, भाजपा प्रवक्ता की हैसियत से एक टीवी डिबेट शो में वाराणसी के ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में मिले शिवलिंग पर अपनी बात रख रहीं थी। इस दौरान लगातार शिवलिंग पर प्रश्न उठाए जाने के कारण एक मुस्लिम वक्ता से इस्लाम सम्बंधित एक बात कही थी। इसको लेकर बाद में कट्टरपंथियों ने खूब हंगामा किया था। नुपूर शर्मा को ‘सर तन से जुदा’ की धमकियाँ दी गई थीं। उनका सार्वजनिक रूप से बाहर निकलना अभी भी बंद है। नुपूर शर्मा ने इसको लेकर माफ़ी भी मांगी थी।

सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों ने नुपूर शर्मा को ही हर चीज के लिए जिम्मेदार मान लिया था। इसके कारण उन्हें और उनके परिवार को काफी समस्याएँ झेलनी पड़ी हैं। उन्हें लगातार सुरक्षा का खतरा बना हुआ है, वह सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पातीं। अब भी उनकी हत्या के लिए लगातार कट्टरपन्थी लगे हुए हैं और इसके लिए सुपारी दे रहे हैं।

गौरतलब है कि जस्टिस सूर्य कांत ने जहाँ नुपूर शर्मा की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणियाँ की थीं और जिहादियों द्वारा कन्हैया लाल के क़त्ल का जिम्मेदार उन्हें ही माना था, वहीं इन बातों का जिक्र आधिकारिक कोर्ट रिकॉर्ड में नहीं किया था। उनकी इन टिप्पणियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी डाली गई थी। इन टिप्पणियों को वापस लेने को कहा गया था। इन टिप्पणियों के कारण लोगों ने आलोचना करते हुए इस बेंच को ‘शरिया कोर्ट’ कहा था।

नुपूर शर्मा पर टिप्पणी करने वाली बेंच में शामिल जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस सूर्य कांत के विरुद्ध देश की बड़ी हस्तियों ने एक खुला पत्र भी लिखा था। 15 सेवानिवृत्त जजों, 77 रिटायर्ड नौकरशाहों और 25 पूर्व सैन्य अधिकारियों ने खुला पत्र जारी कर के नूपुर शर्मा पर सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों की टिप्पणी को ‘दुर्भाग्यपूर्ण और गलत उदाहरण पेश करने वाला’ करार दिया था। उन्होंने लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट के दो जजों द्वारा की गई ताज़ा टिप्पणी ‘लक्ष्मण रेखा’ का उल्लंघन है और हमें इस पर बयान जारी करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

यह बात भी ध्यान देने वाली है कि जस्टिस सूर्य कांत ने जजों को होने वाले खतरे की बात कही थी। 2021 में जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस एन वी रमन्ना की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा था कि इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) न्यायपालिका की बिलकुल भी सहायता नहीं करती। इस सुनवाई के दौरान बेंच ने अफसोस जताया था कि जांच अधिकारियों द्वारा जजों की चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता है।

ऐसे में इस बात पर अब प्रश्न उठ रहे हैं कि जजों की सुरक्षा की बात करने वाले और बोलने की आजादी को किसी तरह बचाने की वकालत करने वाले जस्टिस सूर्य कांत ने नुपूर शर्मा को खतरे में होने के बाद हिंसा का जिम्मेदार क्यों माना था और उनसे उनके बयान के लिए माफ़ी माँगने को क्यों कहा था।

बंगाल में एक दूसरे से भिड़े इंडी गठबंधन वाले, TMC कार्यकर्ता की हत्या का इल्जाम CPI (M) पर लगा: कड़ी सुरक्षा के बीच 8 सीटों पर मतदान जारी

पश्चिम बंगाल में चौथे चरण के मतदान के बीच हिंसा की घटनाएँ सामने आई हैं। बीरभूम में भाजपा ने आरोप लगाया कि टीएमसी कार्यकर्ताओं ने उनका स्टॉल तोड़ दिया, दुर्गापुर में कहा है कि उनके पोलिंग एजेंटों को बाहर कर दिया गया। अजीब बात ये है कि ये झड़पें केवल टीएमसी और बीजेपी के बीच नहीं हो रहीं बल्कि इंडी गठबंधन के दल भी आपस में एक दूसरे के खिलाफ भिड़े हुए हैं।

खबर है कि बंगाल में बीरभूम और कृष्णानगर में भी तृणमूल कॉन्ग्रेस और सीपीआई (एम) के कार्यकर्ताओं ने एक दूसरे पर हिंसा का आरोप लगाया है। बीरभूम में बताया जा रहा है कि टीएमसी ने दावा किया है उनके कार्यकर्ता को सीपीआई (एम) वाले ने पोलिंग स्टेशन पर मारा। वहीं कृष्णा नगर में इसके उलटा है। वहाँ सीपीआई (एम) ने हिंसा के लिए टीएमसी पर आरोप लगाया है।

इससे पहले बंगाल के पूर्वी बरदवान में रविवार (12 मई 2024) रात एक टीएमसी कार्यकर्ता की हत्या की घटना सामने आई थी। कार्यकर्ता की पहचान 50 साल के मिंटू शेख के तौर पर हुई थी। मिंटू की हत्या का इल्जाम भी टीएमसी ने सीपीआईएम पर ही लगाया था।

टीएमसी प्रवक्ता ने सीपीआई(एम) के लिए कहा था कि सीपीआई (एम) कार्यकर्ताओं को लगता है कि ये लोग इस बार चुनाव जीत जाएँगे, इसलिए हिंसा कर रहे हैं। वहीं सीपीआईएम ने तो सारे आरोपों को खारिज किया है।

याद दिला दें कि राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान करने वाले विपक्षी दलों का इंडी गठबंधन राज्य स्तर पर आकर छिन्न-भिन्न होता दिखता है। कभी ममता बनर्जी खुद जनता के सामने आकर अपील करती हैं कि राज्य में कॉन्ग्रेस और सीपीआई (एम) को वोट न दिया जाए तो कभी सारे दल खुद ही एक दूसरे पर इल्जाम लगाते हुए मिलते हैं।

चौथे चरण की वोटिंग में भी यही सब हो रहा है। सारी हिंसक घटनाओं के देखते हुए बंगाल में सुरक्षा टाइट है। मतदान वाले इलाकों में चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी जुटे हैं। आज सुबह 7 बजे से वहाँ बहरामपुर, कृष्णानगर, राणाघाट, कृष्णानगर, बर्धमान पूर्व, बर्धमान दुर्गापुर, आसनसोल, बोलपुर और बीरभूम में वोटिंग चल रही है।

चौथे चरण में 9 बजे तक वोटिंग

लोकसभा चुनावों के चौथे चरण में आज 10 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की 96 सीटों पर वोटिंग चल रही है। इनमें तेलंगाना की 17, आंध्र प्रदेश की 25, उत्तर प्रदेश की 13, बिहार की 5, झारखंड की 4, मध्य प्रदेश की 8, महाराष्ट्र की 11, ओडिशा की 4, पश्चिम बंगाल की 8 और जम्मू कश्मीर की श्रीनगर लोकसभा सीट पर मतदान जारी है।

7 बजे से शुरू हुई वोटिंग का आँकड़ा यदि 9 बजे तक में देखें तो पता चलता है कि आंध्र प्रदेश में 9.05% वोट डले, बिहार में 10.18%, जम्मू-कश्मीर में 5.07%, झारखंड में 11.78 फीसदी, मध्य प्रदेश में 14.97%, महाराष्ट्र में 6.45 %, ओडिशा में 9.23%, तेलंगाना में 9.51% उत्तर प्रदेश में 11.67% और बंगाल में 15.24%।