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सोनू मराठा बनकर समीर खान ने तलाकशुदा से बनाए संबंध, भाई भी किया रेप, बेटी पर भी गंदी नजर: मुंबई में आफाक ने झाँसा दिया, धर्मांतरण का बनाया दबाव

देश में लव जिहाद की घटनाएँ रूकने का नाम नहीं ले रही हैं। एक उत्तर प्रदेश के कौशांबी में एक महिला को मुस्लिक युवक आफाक ने लव जिहाद का शिकार बना लिया। बेटी करने के बाद उसने हिंदू महिला को छोड़ दिया। वहीं, मध्य प्रदेश के इंदौर में सोनू मराठा बनकर समीर खान ने एक तलाकशुदा महिला को फँसा लिया और फिर उस धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने लगा।

दरअसल, कौशांबी जिले के पइंसा इलाके के मोहब्बतपुर का रहने वाला आफाक चार साल पहले नौकरी के लिए मुंबई गया था। वहाँ उसने सुनीता नाम की एक हिंदू लड़की को अपने प्रेम जाल में फँसा लिया। सुनीता भरत नगर बॉम्बे की रहने वाली है। दोनों चार साल तक साथ भी रहे। इस दौरान दोनों को एक बेटी भी हुई। उसके बाद तीन महीने पहले आफाक बिना निकाह किए वहाँ से कौशांबी भाग आया।

आफाक के लापता होने पर पीड़िता परेशान हो गई और गुरुवार (9 मई) को कौशांबी पहुँचकर पइंसा थाना पुलिस को तहरीर देकर कार्रवाई की माँग की। महिला का आरोप है कि शादी के लिए आफाक उससे धर्म परिवर्तन के लिए कह रहा था। इसके साथ ही वह अब किसी और लड़की से शादी करने वाला है। पुलिस ने तहरीर लेकर इस मामले में जाँच शुरू कर दी है।

इंदौर में तलाकशुदा महिला के साथ लव जिहाद

इंदौर के आजादनगर थाना क्षेत्र स्थित मदीनानगर का समीर खान ने सोनू मराठा बनकर एक तलाकशुदा महिला को अपने झाँसे में ले लिया। झाँसा देकर समीर ने महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाए और उसका वीडियो भी बना लिया। उसने दलित युवती से जबरदस्ती निकाह भी कर लिया। इस दौरान उसने कई रेप और अप्राकृतिक सेक्स भी किया।

महिला का कहना है कि आरोपित उसकी मासूम बेटी के साथ भी गंदी हरकत करने लगा। इसके बाद पीड़िता समाज के लोगों के साथ थाने जाकर शिकायत दर्ज करवाई। महिला का कहना है कि समीर खान उसके भाई का दोस्त है और उसके घर कभी कभार आता जाता था। इस दौरान उसने अपना नाम सोनू मराठा बताया था।

महिला का आरोप है कि दो साल तक साथ घुमने और शारीरिक संबंध बनाने के बाद जब उसने शादी के लिए कहा तो वह बोला कि मुस्लिम है और निकाह के लिए धर्म परिवर्तन करना पड़ेगा। इसके बाद समीर खान उसे लेकर धर्मपुरी में रहने वाले अपने भाई फिरोज उर्फ मौलाना हाफिज के पास ले गया और निकाह किया। निकाह के बाद दोनों खजराना में रहने लगे।

महिला का आरोप है कि इसी दौरान समीर खान का भाई अफजल आया और उसके साथ जबरदस्ती करने लगा। उसे धोखे से नशीला पदार्थ पिलाया और बेहोश करके दुष्कर्म किया। महिला का आरोप है कि बेहोशी की अवस्था में उसका आपत्तिजनक वीडियो भी बना लिया। महिला ने इसकी जानकारी जब आरोपित को दी तो उसने नजरअंदाज कर दिया।

इस दौरान उसकी बेटी के साथ भी गलत करने की कोशिश करते थे। महिला जब विरोध करती तो अश्लील वीडियो वायरल कर बदनाम करने की धमकी देते थे। आखिरकार महिला उनके अत्याचारों से तंग आ गई तो उसने दलित समाज के लोगों से संपर्क किया और पुलिस में जाकर शिकायत दर्ज कराई।

छत्तीसगढ़ में एनकाउंटर में 12 नक्सली ढेर, 1200 जवानों ने सँभाला मोर्चा: बोले CM विष्णुदेव साय – डबल इंजन की सरकार का मिल रहा लाभ

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन में सुरक्षा बलों को बड़ी सफलता मिली है। बीजापुर में मुठभेड़ में 12 नक्सली ढेर हुए हैं। ये एनकाउंटर गंगानूर पुलिस थाना अंतर्गत आने वाले गाँव पीडिया के पास की है। सुरक्षाकर्मियों की एक टीम नक्सलियों की तलाशी में अभियान चला रही थी। इसी दौरान पास के जंगल से नक्सली गोलीबारी करने लगे। पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की। घटनास्थल से सभी एक दर्जन नक्सलियों के शव बरामद कर लिए गए हैं।

अच्छी बात ये है कि एक भी सुरक्षाकर्मी हताहत नहीं हुआ है। हालाँकि, 2 घायल हुए हैं। इलाके में अभी भी तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। याद दिलाते चलें कि इससे पहले काँकेड़ में एक मुठभेड़ में 29 नक्सली मार गिराए गए थे। जहाँ तक बीजापुर की बात हैं, वहाँ कोरचोली और लेंड्रा के जंगलों में इससे पहले हुए मुठभेड़ में पुलिस ने 13 नक्सलियों का सफाया किया था। इनमें से कई इनामी नक्सली भी थे। राज्य में सरकार बदलने के साथ ही नक्सल विरोधी कार्रवाई तेज़ हो गई है।

ताज़ा एनकाउंटर के बारे में बताते हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा, “नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में हमारे जवानों को भारी सफलता मिली है। मुठभेड़ समाप्त हो गया है, नक्सलियों की 12 लाशें मिली हैं। मैं अधिकारियों और जवानों को बधाई देता हूँ। जब से हमलोग सरकार में आए हैं, नक्सलवाद के खिलाफ मजबूती से लड़ रहे हैं। केंद्र सरकार भी चाहती है कि छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद समाप्त हो। डबल इंजन की सरकार का हमें लाभ मिल रहा है।”

वहीं छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री और कवर्धा से विधायक विजय शर्मा ने बताया कि DRG की बीजापुर व दंतेवाड़ा की टीम, कोबरा बटालियन और STF मिल कर 1000 की संख्या में सर्चिंग के लिए निकले थे। उन्होंने कहा कि IED की चपेट में आने से एक जवान को मामूली चोट आई है। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद की समस्या का हल बातचीत के माध्यम से निकलना चाहिए, बस्तर तक विकास पहुँचना चाहिए, बस्तर के लोग बंधक न बनाए जाएँ, बंदूक के दम पर स्कूल-अस्पताल नहीं बनते। उन्होंने नक्सलियों के आत्म-समर्पण करने और उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए नई रिहैबिटिलेशन योजना बनाने का भी वादा किया।

हिंदू नेताओं को धमकी वाला मोहम्मद अली उर्फ शहनाज बिहार से गिरफ्तार: नेपाल में नाम बदलकर रहता था, सोशल पर हिंदू विरोधी पोस्ट करता था

भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा और हिंदू सनातन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपदेश राणा सहित कई नेताओं को जान से मारने की धमकी देने वाले मोहम्मद अली को गुजरात पुलिस ने बिहार के मुजफ्फरपुर से गिरफ्तार किया है। उसके पाकिस्तान से लिंक मिले हैं। वह पाकिस्तान के एक व्यक्ति के साथ व्हाट्सऐप ग्रुप में जुड़ा था। उसी ग्रुप में गुजरात का मौलाना सोहेल खान भी था। 

हिंदू नेताओं को धमकी देने के मामले में सूरत की स्पेशल ब्रांच की टीम ने 24 साल के मोहम्मद अली उर्फ शहनाज को रात 2 बजे उसके ननिहाल से गिरफ्तार किया है। मोहम्मद अली मुजफ्फरपुर के सकरा थाना क्षेत्र में सकरा चक अब्दुल्ला गाँव में छिपा हुआ था। गुजरात पुलिस फिलहाल उसे कोर्ट में पेश कर ट्रांजिट रिमांड लेने की प्रक्रिया में जुटी हुई है।

कहा जा रहा है कि मोहम्मद अली पाकिस्तानी संगठनों के लगातार संपर्क में था। वह पाकिस्तान के एक युवक डोगर से वॉट्सऐप से जुड़ा था। इनका ग्रुप भी था। गुजरात का मौलाना सोहेल खान भी उसी ग्रुप में जुड़ा हुआ था। मौलाना सुहैल की गिरफ्तारी के बाद गुजरात की स्पेशल ब्रांच की टीम मुजफ्फरपुर के सकरा पहुँची थी।

मोहम्मद अली के पास से पुलिस ने एक मोबाइल जब्त किया है। वह नेपाल के नंबर से वॉट्सऐप चलाता था और उससे आपत्तिजनक पोस्ट करके धार्मिक उन्माद फैलाने की कोशिश करता था। इसके वॉट्सऐप ग्रुप में हिंदू देवी-देवताओं की कई एडिटेड तस्वीरें और वीडियो मिले हैं, जो आपत्तिजनक हैं। उसके खिलाफ सूरत में मामला दर्ज किया गया है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, अली ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए वीडियो कॉल करके लोगों को धमकियाँ देता था। वह जिस नेता को धमकी देनी होती थी, वह उसके नंबर को एक खास ग्रुप में जोड़कर ग्रुप वीडियो कॉल करता था। उसके बाद वीडियो कॉल करके धमकी देता था। धमकी में हत्या की धमकी भी शामिल है। उस पर कई हिंदू नेताओं को जान से मारने की धमकी और साजिश रचने का आरोप है।

बताया जाता है कि अली का जन्म नेपाल में ही हुआ है और वह पिछले 23 सालों से वहाँ रह रहा था। वहाँ अपना पहचान छिपाकर वह रह रहा था। वह बिहार आता जाता रहता है। हिंदूवादी नेता उपदेश राणा की हत्या की साजिश में मौलाना सोहेल अबुबक्र तिमोल की गिरफ्तारी के बाद यह मामला खुला। मोहम्मद अली को नेपाल में शहनाज के नाम से जाना जाता है।

 

‘चुनाव कर्मचारियों और मतदाताओं को हतोत्साहित करने वाला बयान’: वोटर टर्नआउट पर ECI ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को लताड़ा, कहा – ये गैर-जिम्मेदाराना

वोटर टर्नआउट पर कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के प्रोपेगंडा का चुनाव आयोग ने करारा जवाब दिया है। खड़गे ने I..N.D.I. गठबंधन के नेताओं को एक पत्र लिखा था। लोकसभा चुनाव 2024 के तीनों चरणों में वोटर टर्नआउट के आँकड़ों को जारी किए जाने में देरी के आरोपों को ECI ने नकार दिया है। चुनाव आयोग ने 11 पन्नों के अपने पत्र में मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम लिए बिना ही जवाब दिया है। बता दें कि विपक्षी दल हर संवैधानिक संस्था को बदनाम करते हैं।

चुनाव आयोग ने कहा कि एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष द्वारा चुनावी चरणों और प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता पर हमला करने वाले बयान मतदाताओं की हिस्सेदारी पर नकारात्मक असर डाल सकती है। साथ ही इसे विशाल संख्या में चुनाव कर्मचारियों और मशीनरी को भी हतोत्साहित करने वाला बताया गया है। चुनाव आयोग ने कहा कि इससे मताधिकार के योग्य लोगों को अपने मत का इस्तेमाल करने से वंचित करने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।

चुनाव आयोग ने कहा कि आगे इस तरह के बयान दिए जाने से बचना चाहिए, सावधानी बरती जानी चाहिए। चुनाव आयोग ने समझाया कि तैनाती, EVM के इस्तेमाल आउट वोटर टर्नआउट के आँकड़े की व्यवस्था चरणबद्ध तरीके से की जाती है जिसमें नीचे से ऊपर पहुँचा जाता है। अर्थात, प्रत्येक मतदान केंद्र से आँकड़े जुटाए जाते हैं। चुनाव आयोग ने बताया है कि 1961 के नियमों के अनुसार, हर एक पोलिंग एजेंट को प्रत्येक EVM के मतदान के आँकड़े साझा किए जाते हैं।

चुनाव आयोग ने EVM में गड़बड़ी होने के मल्लिकार्जुन खड़गे के आरोपों को भी आश्चर्यजनक करार दिया। ECI ने इसे गैर-जिम्मेदाराना बयान बताते हुए कहा कि एक राष्ट्रीय दल द्वारा ऐसा करना चिंताजनक है। इलेक्शन कमीशन ने इस दौरान याद दिलाया कि ये सारे आँकड़े पार्टी के उम्मीदवारों और पोलिंग एजेंट्स के पास पहले से मौजूद हैं। चुनाव आयोग ने कहा कि सामान्यतः वो चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया से बचता है, लेकिन ताज़ा बयान भ्रम पैदा करने वाला है।

चुनाव आयोग ने इस दौरान 2019 लोकसभा चुनावों की भी याद दिलाई, जब वोटर टर्नआउट के आँकड़े बाद में अपडेट किए गए थे। दूसरे चरण में तब 18 अप्रैल को 66% पोलिंग का आँकड़ा दिया गया था, लेकिन 5 दिन बाद समीक्षा के बाद बताया गया कि ये 69.43% है। इसी तरह 2021 में केरल के आँकड़े प्रथम दृष्टया 69.95% थे, समीक्षा के बाद जिसे 76% किया गया। आयोग ने कहा कि वोटर टर्नआउट एप में भी सब कुछ सार्वजनिक है।

मी लॉर्ड! ये ‘दरियादिली’ कहीं गले की हड्डी न बन जाए, अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत ने बताया न्यायिक सुधार अविलंब क्यों जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने आज शुक्रवार (10 मई 2024) को दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को 1 जून तक अंतरिम जमानत दे दी। अरविंद केजरीवाल को यह जमानत लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी के प्रचार के लिए दिया गया है। प्रवर्तन निदेशालय ने केजरीवाल की अंतरिम जमानत का विरोध किया था कहा था कि इससे गलत परंपरा होगी।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की खंडपीठ ने अंतरिम बेल से संबंधित सुनवाई करते हुए कहा कि शराब नीति मामले में केस अगस्त 2022 में दर्ज किया गया था और अरविंद केजरीवाल को लगभग डेढ़ साल बाद मार्च 2024 में गिरफ्तार किया गया। शीर्ष अदालत ने पूछा कि आखिर डेढ़ साल तक ED कहाँ थी।

हालाँकि, ईडी के विरोध के बावजूद अरविंद केजरीवाल को न्यायालय से अंतरिम जमानत मिल गई है, लेकिन इसको लेकर सोशल मीडिया पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं। वैसे भारत में न्यायपालिका पर सवाल उठाने के रिवाज नहीं है, लेकिन जमानत का विरोध करते हुए ईडी ने जो तर्क दिया था वो उचित था। ईडी का संदेह भी सच साबित होता दिख रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में दर्ज अपने हलफनामे में प्रवर्तन निदेशालय ने तर्क दिया था कि अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। केंद्रीय एजेंसी ने कहा कि चुनाव प्रचार का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और ना ही कानूनी या संवैधानिक अधिकार है।

ED की आशंका आखिरकार सच साबित होती दिख रही है। अब राष्ट्रद्रोह में जेल में बंद खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह ने चुनाव में नामांकन दाखिल करने के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से सात दिनों के लिए अंतरिम जमानत की माँग की है। वह खडूर साहिब लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहता है। हालाँकि, हाई कोर्ट ने असम के डिब्रूगढ़ जेल में बंद अमृतपाल की याचिका खारिज कर दी है।

NSA के तहत जेल में ‘बंद वारिस पंजाब दे’ नाम के खालिस्तान समर्थक अमृतपाल की याचिका भले खारिज हो गई हो, लेकिन इससे एक नया रिवाज पैदा होने का खतरा पैदा हो गया है। इस देश में ऐसे दर्जनों नेता हैं, जिन पर विभिन्न मामलों में केस दर्ज है और कुछ नेता पुलिस एवं न्यायिक हिरासत में हैं। ऐसे में वे भी अपने लिए छूट की माँग कर सकते हैं। इनमें से प्रमुख नाम झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का नाम प्रमुख है।

अपने हलफनामे में ED ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कहा था, “अभिसाक्षी की जानकारी में अभी तक किसी भी राजनीतिक नेता को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी गई है। ये (अरविंद केजरीवाल) तो चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार भी नहीं हैं। यहाँ तक कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को भी चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी जाती है, अगर वह हिरासत में है।”

जाहिर सी बात है कि जब उम्मीदवार नहीं होने के बावजूद सिर्फ चुनाव प्रचार के लिए अरविंद केजरीवाल अंतरिम जमानत की माँग कर सकते हैं तो कई ऐसे नेता हैं तो खुद उम्मीदवार हैं। ऐसे में वे अरविंद केजरीवाल की जमानत को प्रमुखता से उदाहरण के रूप में पेश करके अपने लिए भी ऐसी माँग कर सकते हैं। ऐसी में न्यायालय के सामने एक अलग तरह का धर्मसंकट खड़ा हो सकता है।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ भी जमीन घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जाँच चल रही है। ईडी ने उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में 31 जनवरी 2024 को ईडी ने गिरफ्तार किया था। उन्होंने 2 फरवरी को अपनी गिरफ्तारी को गलत बताते हुए याचिका दाखिल की थी। हालाँकि, यह याचिका हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी। लेकिन, अरविंद केजरीवाल का हवाला देखकर सोरेन भी सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।

हेमंत सोरेन और दिल्ली शराब घोटाले में बंद आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया भी न्याय में समानता के सिद्धांत का तर्क देकर अपने लिए अंतरिम जमानत की माँग कर सकते हैं। दरअसल, जमानत देना न्यायालय का विशेषाधिकार है और वह कई मामलों को ध्यान में रखते हुए किसी आरोपित को जमानत देता है। इनमें जिस धारा के आरोपित बंद है उसमें जमानत के लिए क्या प्रावधान हैं, जमानत पर निकलने के बाद वह लापता तो नहीं हो जाएगा, सबूतों के साथ छेड़छाड़ तो नहीं करेगा, गवाहों को धमकाएगा तो नहीं, गवाहों की हत्या तो नहीं करेगा, किसी अन्य आपराधिक मामले को अंजाम तो नहीं देगा… आदि कई ऐसे बिंदु होते हैं।

अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री हैं और शक्तिशाली भी हैं। ऐसे में इन बिंदुओं पर न्यायिक सिद्धांत के तहत नजर डालना महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि अगर चुनाव प्रचार के नाम पर जमानत मिलती है तो ऐसी याचिकाओं की लंबी लाइन लग जाएगी, क्योंकि भारत में लगभग हर साल कहीं ना कहीं चुनाव होते ही रहते हैं। इनमें पंचायत से लेकर लोकसभा के चुनाव तक शामिल हैं।

कोर्ट में ED ने भी तर्क दिया था, “पिछले 5 वर्षों में लगभग 123 चुनाव हुए हैं। यदि चुनावी प्रचार के उद्देश्य से अंतरिम वैधानिकता है तो किसी भी राजनेता को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है और ना ही किसी राजनेता को अनुमति नहीं दी जा सकती है, क्योंकि चुनाव पूरे साल होता है।” ED ने तर्क दिया था कि संघीय ढाँचे में हर चुनाव महत्वपूर्ण है। किसी को कम या अधिक महत्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

एजेंसी ने यह भी तर्क दिया था कि अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। ED ने कहा कि एक राजनेता एक सामान्य नागरिक से विशेष दर्जे का दावा नहीं कर सकता। समन से बचने के लिए केजरीवाल ने 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव का यही बहाना बनाया था।

इन सब तमाम बिंदुओं को मिलाते हुए सोशल मीडिया पर लोग न्याय में समानता की बात लोग कर रहे हैं। लोग ये सवाल उठा रहे हैं कि चुनाव प्रचार के लिए किसी आरोपित को, जो जेल में बंद है, उसे जमानत किस आधार पर दी जा सकती है। क्या अरविंद केजरीवाल की जगह कोई आम आदमी होता तो उसे यह सुविधा मिलती?

अधिकांश लोग किसी ना किसी पार्टी अथवा नेता के फॉलोअर होते हैं। अगर जेल में बंद। ऐसा ही कोई व्यक्ति तर्क दे कि उसे पार्टी अथवा नेता का प्रचार करना है तो क्या उसे यही सुविधा मिलेगी? इसका जवाब हाँ भी हो सकता है और ना भी। इसलिए देश में दशकों से न्यायिक सुधार की माँग भी की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में थोड़ा कदम बढ़ाए भी था, लेकिन वो फलीभूत नहीं हो पाया।

जिसका नाम रखा ‘पीयूष’, वही जीवन के लिए बन गया ‘विष’: पंखे पर झूल गए सूरत के बुजुर्ग माँ-बाप, छोड़ गए वो सुसाइड नोट जिसे पढ़ आप कहेंगे भगवान ऐसा बेटा दुश्मन को भी न दें

एक बच्चे के जन्म का दिन माता-पिता के लिए सबसे खुशी वाला दिन होता है। दोनों जन उसी क्षण से अपने मन में उस नवजात को हर खुशी देने के सपने देखने लगते हैं। बाद में उसके किशोर होने पर उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए खुद को झोंक देते हैं। फिर युवा होने पर उसके उज्जवल भविष्य की प्रार्थना करने लगते हैं… यही करते-करते एक दिन वो दोनों प्राणी बूढ़े हो जाते हैं और आस भरी नजरों से सिर्फ यही सोचते हैं कि अब उनके बच्चे उनका ख्याल रखेंगे। लेकिन क्या असल में ऐसा हो पाता है? क्या हर माता-पिता को उनके त्याग और समर्पण के बदले बुढ़ापे में बच्चों का सहारा मिलता है? नहीं… बच्चा अगर सूरत के चुन्नी भाई और मुक्ताबेन की बड़ी औलाद पीयूष जैसा हो तो बिलकुल भी नहीं।

सूरत के चुन्नी भाई और उनकी पत्नी मुक्ताबेन ने हाल में अपनी औलाद के कारण एक आखिरी खत लिखकर मौत को गले लगा लिया। अपने आखिरी खत में वो साफ-साफ कह गए कि उनके अंतिम संस्कार में उनके बच्चों को न शामिल किया जाए और उतना ही खर्च हो जितने की जरूरत हो, इसके अलावा कुछ भी नहीं।

फोटो साभार: देश गुजरात

आप सोचेंगे कितने निष्ठुर माता-पिता रहे होंगे जो अपने बच्चे से अंतिम संस्कार का अधिकार छीन लिया और दुनिया के सामने उसे बुरी संतान साबित कर गए…कुछ लोग शायद ऐसा भी सोचें कि बच्चे ने अगर कुछ गलत किया भी था तो इसमें आत्महत्या करने की क्या जरूरत थी, जैसे खत में बच्चे को दूर रहने को कहा है वैसे असल जिंदगी में भी कह देते… लेकिन हमारे लिए ये सारी चीजें सोचना आसान है क्योंकि हम उस मनोवस्था को समझ ही नहीं पा रहे जो आखिर समय में चुन्नी भाई और उनकी पत्नी की रही होगी। पीयूष उनकी बड़ी औलाद था। बचपन से उसे पढ़ाने लिखाने में चुन्नी भाई ने खुले हाथ से खर्च किया। जब बड़ा हुआ तो उसका काम सेट करवाने के लिए अपनी सारी संपत्ति लगा दी। पीयूष उसमें भी सफल नहीं हुआ तो अपने नाम पर चुन्नी भाई ने कर्जा लेकर उसे 35 लाख रुपए दिलवा दिए। उन्हें लगा बेटा कमाएगा तो सारा कर्जा चुकता हो जाएगा। मगर बेटे ने क्या किया…उन पैसों को भी व्यापार में डुबा दिया।

इतने पर भी चुन्नी भाई और मुक्ताबेन ने अपने बेटे का हाथ नहीं छोड़ा। वो उसे सेटल करवाने के प्रयास करते रहे। उन्होंने पीयूष की शादी करवाई उसका घर बसवाया। एक बच्चा हुआ। बाद में उन्होंने पीयूष को कनाडा भेजा। इन सबके बीच पीयूष को एक भी बार ख्याल नहीं आया कि जो 40 लाख रुपए उसके पिता ने उसके काम के लिए उधार लिए थे वो कैसे वापस दिए जाएँगे। देखते-देखते पीयूष कनाडा में रम गया। वहीं उसकी बीवी भी अपने बच्चे को लेकर अलग घर में रहने लगी। सब जानते हुए भी पीयूष को न माता-पिता की चिंता रही, न कर्जा लौटाने की बात। अपना कमाना अपना खाना वाली नीति पर पीयूष जिंदगी गुजारता था। इधर सूरत में माता-पिता इस शर्मींदगी में जीवन जीते रहे कि इतना कर्जा लौटाया कैसे जाएगा…।

कर्ज देने वाले चुन्नी भाई की खुद्दारी जानते थे इसलिए वो उनसे ज्यादा कुछ नहीं कहते थे, पर चुन्नी भाई को ये कर्ज अंदर ही अंदर खा रहा था। इसी बीच एक दिन उन्हें पता चला कि उनका बेटा पीयूष सालों बाद कनाडा से सूरत आया था लेकिन उनसे मिले बिना, हाल-चाल जाने बिना ही वापस लौट गया…। दोनों पति-पत्नी को ये बात सदमे की तरह लगी। उन्होंने किसी से कुछ कहा तो नहीं लेकिन मन में घुटते रहे। एक दिन दोनों ने निर्णय लिया कि जिस बच्चे के लिए उन्होंने अपना सब कुछ लुटा दिया, 40 लाख रुपए के कर्जे में आ गए, जब वही उन्हें नहीं पूछ रहा तो उन्हें अब आगे नहीं जीना।

बंद कमरे में दोनों 5 पन्नों का खत लिखा और फिर एक साथ मौत को गले लगा लिया। घटना के वक्त छोटा बेटा संजय बगल वाले कमरे में अपनी पत्नी के साथ सो रहा था, उसे इसके बारे में पता भी नहीं चला। बाद में जब नींद खुली तब तक माता-पिता जा चुके थे। उनके पास वो खत अब सुसाइड नोट बन चुका था जिसमें उन्होंने अपने दिन की सारी बात लिखी थी। उन्होंने अपनी बहू से भी सवाल किया था कि वो तो बहुत बड़े घर से शादी होकर उनके यहाँ आई थी, फिर उसकी परवरिश में ऐसी क्या कमी रह गई जो उसने भी उनके साथ ऐसा किया…।

उनका ये सुसाइड पत्र एक आईना है हर उस बच्चे के लिए जो अपने माता-पिता के प्रेम को भुलाकर अपनी दुनिया में खो गए हैं। वो भूल चुके हैं कि उनके माता-पिता ने उनके लिए अपनी जिंदगी खपा दी, तब जाकर वो इस काबिल बने कि समाज में अपनी पहचाने जा सकें, स्कूल-कॉलेज में उच्च शिक्षा ले सकें, विदेश जाकर पढ़ सकें और इस काबिल बन सकें कि अपना नया परिवार बनाकर उसका गुजर-बसर कर सकें… क्या इतने के बावजूद माता-पिता को भुलाया जाना उचित है, उनकी परवाह किए बिना अपनी दुनिया में रमना उचित है?

यौन प्रताड़ना मामले में बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आरोप तय: कोर्ट ने दिया आदेश, 5 महिला पहलवानों से छेड़खानी का चलेगा केस

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने कैसरगंज से भाजपा सांसद और WFI (भारतीय कुश्ती संघ) के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर यौन प्रताड़ना के मामले में आरोप तय कर दिया है। उन पर महिला पहलवानों की यौन प्रताड़ना का आरोप है। शुक्रवार (10 मई, 2024) को उनके खिलाफ एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट प्रियंका राजपूत की अदालत में आरोप तय किए गए। 6 महिला पहलवानों ने उनके खिलाफ आरोप लगाए थे, जिसके आधार पर दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज की थी।

कोर्ट ने कहा कि IPC (भारतीय दंड संहिता) की धारा-354 (किसी महिला की प्रतिष्ठा से छेड़छाड़ करना) और 354A (यौन प्रताड़ना) के तहत बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। बृजभूषण शरण सिंह कैसरगंज, गोंडा और बलरामपुर से सांसद रह चुके हैं। फ़िलहाल वो भाजपा में हैं। बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ धारा-506(1), अर्थात आपराधिक धमकी को लेकर भी आरोप तय किया गया है।

वहीं 6 में से एक पीड़िता के मामले में उन्हें राहत दी गई है। सभी आरोपितों के मामले में किसी आपराधिक साजिश में शामिल होने के मामले में भी उन्हें राहत दी गई। साथ ही WFI के एसिस्टेंट सेक्रेटरी रहे विनोद तोमर के खिलाफ भी आरोप तय किए गए हैं। 15 जून, 2023 को दिल्ली पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट दायर की थी। उन पर पीछा करने और आपराधिक धमकी का मामला भी चलाया जा रहा था। FIR दर्ज कराने के लिए शिकायतकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख भी किया था।

बतौर पब्लिक प्रॉसिक्यूटर अतुल श्रीवास्तव इस मामले में कोर्ट में पेश हुए। हालाँकि, बृजभूषण शरण सिंह पर POCSO के तहत मामला नहीं चलेगा, क्योंकि नाबालिग लड़की से यौन शोषण वाला मामला हट गया है। इस बार भाजपा ने उनके टिकट काट कर उनके बेटे करण भूषण सिंह को लड़ाया है। बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ महिला पहलवानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबा प्रदर्शन किया था, जिसमें कई विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए थे।

CM ऑफिस नहीं जा सकेंगे अरविंद केजरीवाल, फाइल पर हस्ताक्षर की इजाजत भी नहीं: जानिए किन शर्तों पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव के लिए दी है अंतरिम जमानत

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविन्द केजरीवाल को शुक्रवार (10 मई, 2024) को सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत दे दी। उन्हें यह जमानत दिल्ली शराब घोटाला मामले में मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को यह जमानत लोकसभा चुनाव 2024 में प्रचार के लिए दी है। यह जमानत उन्हें 1 जून तक के लिए दी गई है। केजरीवाल को जमानत देने के के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तें भी लगाई हैं, जिनका पालन उन्हें करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और संजीव खन्ना की सदस्यता वाली बेंच ने केजरीवाल को दी गई जमानत में स्पष्ट रूप से कहा है कि वह इस अवधि के दौरान दिल्ली के मुख्यमंत्री कार्यालय नहीं जा सकेंगे। वह इस दौरान किसी भी फाइल पर हस्ताक्षर भी करेंगे। उन्हें केवल उन मामलों में फाइलों पर हस्ताक्षर करने की अनुमति दी गई है, जिनमें दिल्ली के उपराज्यपाल से किसी बात की अनुमति ली जानी हो। इसके अलावा उन्हें दिल्ली सरकार के सचिवालय जाने से भी मना किया गया है।

इस जमानत अवधि के दौरान मुख्यमंत्री केजरीवाल दिल्ली शराब घोटाला मामले पर भी कोई टिप्पणी नहीं कर सकेंगे। वह शराब घोटाला मामले के किसी गवाह से भी नहीं मिल सकेंगे। उन्हें 2 जून को कोर्ट के सामने सरेंडर करना होगा। उन्हें यह जमानत ₹50,000 के मुचलके पर मिली है। इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। बता दें कि अरविंद केजरीवाल को प्रवर्तन निदेशालय ने 21 मार्च को गिरफ्तार किया था और तब से वह हिरासत में हैं।

अरविन्द केजरीवाल ने इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाल कर चुनाव प्रचार के आधार पर जमानत माँगी थी। इसका विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में केंद्रीय एजेंसी ने 9 मई को कहा था कि चुनाव प्रचार का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और ना ही कानूनी या संवैधानिक अधिकार है। अगर चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो यह एक मिसाल कायम करेगा, जो सभी बेईमान राजनेताओं को अपराध करने और फिर चुनाव की आड़ में जाँच से बचने की अनुमति देगा। 

अपने हलफनामे में ED ने कहा, “अभिसाक्षी की जानकारी में अभी तक किसी भी राजनीतिक नेता को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी गई है। ये तो चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार भी नहीं हैं। यहाँ तक कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को भी चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत नहीं दी जाती है, अगर वह हिरासत में है।”

केंद्रीय एजेंसी ने कहा, “पिछले 5 वर्षों में लगभग 123 चुनाव हुए हैं। यदि चुनाव प्रचार के उद्देश्य से अंतरिम जमानत़ दी जानी है तो किसी भी राजनेता को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है और ना ही न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि चुनाव पूरे वर्ष होते रहते हैं।” कयास लगाए जा रहे हैं कि जेल से बाहर आने के बाद केजरीवाल दिल्ली और पंजाब में चुनाव प्रचार करेंगे। दिल्ली में 25 मई, 2024 को 7 लोकसभा सीटों के लिए मतदान होना है।

मजहब के आधार पर आरक्षण से मिलेगा नाजायज धर्मांतरण को बढ़ावा, कॉन्ग्रेस ने तेलंगाना को बनाया ATM: पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तेलंगाना की राज्य सरकार पर हमला बोला है। तेलंगाना के महबूबनगर लोकसभा क्षेत्र में एक रैली के दौरान पीएम मोदी ने कहा है कि कॉन्ग्रेस ने राज्य के साथ धोखा किया है। उन्होंने कहा है कि कॉन्ग्रेस ने तेलंगाना को ATM बना लिया है। उन्होंने राज्य की पूर्ववर्ती BRS सरकार पर भी हमला बोला।

पीएम मोदी ने राज्य की रेवंत रेड्डी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा, “हमने तेलंगाना के लिए लाखों करोड़ रूपए भेजे, लेकिन ये पैसा कहाँ गए, ये पैसा भ्रष्टाचार का ATM लगाकर पहले BRS ने अपनी जेब भरी और अब कॉन्ग्रेस लूट। कॉन्ग्रेस यहाँ ढेर सारे वादे करके आई थी लेकिन सत्ता में आने के बाद वह BRS की फोटोकॉपी बन गई।”

पीएम मोदी ने अमित शाह का फर्जी वीडियो फैलाने में तेलंगाना से गिरफ्तार कॉन्ग्रेस नेता के बारे में जिक्र करते हुए कहा, “कॉन्ग्रेस यहाँ उद्योग लगाने का वादा करके सत्ता में आई थी लेकिन बाद में फर्जी वीडियो बनाने लगे।” पीएम मोदी ने कहा कि कॉन्ग्रेस BRS के घोटालों पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही।

रैली में पीएम मोदी ने RR टैक्स का भी जिक्र किया। पीएम मोदी ने कहा कि RR टैक्स पर वह तेलंगाना मुख्यमंत्री का नाम नहीं ले रहे लेकिन वह खुद जाकर मीडिया को सफाई दे रहे हैं। पीएम मोदी ने कहा कि तेलंगाना की तस्वीर बदलने के लिए भाजपा को अधिक प्रतिनिधित्व मिला जरूरी है।

महबूबनगर में रोजगार की समस्या को उठाते हुए पीएम मोदी ने कहा, “इस क्षेत्र को तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों का आशीर्वाद है लेकिन फिर भी यहाँ के लोगो को मजदूरी के लिए पलायन करना पड़ रहा है। यहाँ की सिंचाई परियोजनाएँ आगे नहीं बढ़ रही है। कॉन्ग्रेस किसानों से कर्जमाफी का वादा पूरा नहीं कर रही। कॉन्ग्रेस ने राज्य धोखा किया है।”

यहाँ पीएम मोदी ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और सैम पित्रोदा पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा, “शहजादे के एक एडवाइजर अमेरिका में रहते हैं, उन्होंने कहा है कि दक्षिण भारत के लोग अफ्रीकन हैं। उन्हें तेलंगाना के लोग अफ्रीकन लगते हैं क्योंकि उन्हें आपकी चमड़ी का रंग पसंद नहीं है।”

पीएम मोदी ने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस हिन्दुओं और हिन्दुओं के त्योहारों से नफरत करती है। पीएम मोदी ने कहा कि वह गर्व से मंदिर जाते हैं, इस पर भी कॉन्ग्रेस को समस्या है, वह इसे देश विरोधी मानती है। इसीलिए ही यह लोग वोट जिहाद की बात करते हैं। आप पीएम मोदी का यह भाषण यहाँ सुन सकते हैं।

उन्होंने कॉन्ग्रेस पर देश को धर्म और जाति के आधार पर बाँटने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण से नाजायज धर्मांतरण करवाने वालों को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन फिर भी कॉन्ग्रेस इससे पीछे नहीं हट रही। उन्होंने कहा यही कॉन्ग्रेस का असली एजेंडा है।

खुद के हाथ-पैर नहीं, फिर भी बने दिव्यांगों की आवाज… मोदी सरकार ने पद्म पुरस्कारों को ‘कोठरी’ से किया मुक्त, हौसलों की कहानी से देश का हो रहा साक्षात्कार

नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्र में आने के बाद हर साल लोगों को पद्म पुरस्कार विजेताओं के नामों का इंतजार रहता है। इस बार ये पुरस्कार 132 हस्तियों को दिए जाने का ऐलान हुआ था। इनमें 2 पद्म विभूषण, 9 पद्म भूषण और 56 पद्म श्री पुरस्कार दूसरे चरण में राष्ट्रपति भवन में महानुभावों को गुरुवार (9 मई 2024) को दिए गए। इसके बाद सभी हस्तियों और उनके उल्लेखनीय कार्यों की चर्चा सोशल मीडिया पर होने लगी। इस बीच सबसे ज्यादा जिन्हें देख लोग इंस्पायर हुए वो डॉ केएस राजन्ना हैं।

कल से डॉ केस एस राजन्ना की वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही है और आज की पीढ़ी को उनसे जज्बा लेने की सलाह दी जा रही। इस वीडियो में दिखाई दे रहा है कि के एस राजन्ना हाथ-पाँव न होने के बावजूद इतने उत्साह से पद्म पुरस्कार लेने आते हैं कि उनके चेहरे की मुस्कान देख सब खुश हो जाते हैं। पहले वो पीएम मोदी के पास जाते हैं, जहाँ पीएम उन्हें हाथ जोड़ उनका अभिवादन करते हैं। फिर वो राष्ट्रपति मुर्मू के पास जाते हैं और पद्म पुरस्कार स्वीकारते हैं।

इस दौरान राष्ट्रपति भवन में मौजूद जवान उनकी मदद करने की कोशिश करते हैं, लेकिन वो बिन किसी की सहायता के खुद अपने आत्मनिर्भर होने का प्रमाण देते हैं। उनकी वीडियो देखने के बाद लोग आश्चर्यचकित हैं और जो उनके संबंध में नहीं जानते वो उनके बारे में सर्च कर रहे हैं।

पोलियों के कारण डॉ केएस राजन्ना ने गँवाए थे हाथ-पाँव

मात्र 11 माह की उम्र में पोलियों के कारण अपने हाथ-पाँव गँवाने वाले डॉ के केस राजन्ना ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने खुद को दिव्यांग समझने की बजाय अपने अपनी क्षमताओं का विस्तार करना शुरू किया और धीरे-धीरे वो अन्य दिव्यांगों के लिए प्रेरणा बनते गए। आज लोग उन्हें एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर जानते हैं लेकिन सच तो यह है कि वो सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हैं बल्कि एक स्पोर्ट्स पर्सन भी रहे हैं जिन्होंने राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम ऊँचा किया।

1980 में मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री ले लेने वाले डॉ राजन्ना ने 2002 में हुए पैरालंपिक के डिस्कस थ्रो प्रतियोगिता में देश के लिए गोल्ड जीता था और तैराकी में चांदी जीतकर देश की शान बढ़ाई थी।

इसके बाद उन्होंने खिलाड़ी के तौर पर पहचान स्थापित करने के बाद खुद का बिजनेस शुरू किया। वहाँ भी उन्हें ऐसी सफलता मिली कि उन्होंने 500 दिव्यांगों को उसके जरिए रोजगार प्रदान किया। 2013 में राजन्ना को ‘कमिश्नर फॉर डिसेबल्ड’ का पद दिया गया। इस दौरान भी उन्होंने कई दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने का काम किया।

64 साल की उम्र में जाकर उन्हें उनके संघर्षों के लिए, उनकी मेहनत के लिए पहचान मिली। जब इस वर्ष इनका नाम पद्म पुरस्कार के लिए आया तो इन्होंने ये खबर सुन कहा, “यह पुरस्कार मेरे लिए चीनी खाने जितना मीठा है. लेकिन यह सिर्फ एक पुरस्कार बनकर नहीं रहना चाहिए बल्कि इससे मुझे अपने सामाजिक कार्यों में और मदद मिलेगी।”

मोदी सरकार में मिला आम जन को सम्मान

अब डॉ केएस राजन्ना को जब यह अवार्ड मिल गया है तो उनके चेहरे की मुस्कान से कई लोग उनकी तारीफ कर रहे हैं और साथ में पीएम मोदी का अभिवादन कर रहे हैं। चर्चा हो रही है कि मोदी सरकार ने जो प्रयास आम जन के कार्यों को पहचान दिलाने के लिए किया है, वो दशकों से इस देश में नहीं हुआ था। मोदी सरकार आई तो उन्होंने न केवल उन महानुभूतियों को पहचान दिलाई जो समाज में चुपचाप बिन किसी लालच के किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दे रहे थे बल्कि उनकी पहुँच तक पद्म पुरस्कारों को भी पहुँचवाया।

जानकारी के लिए बता दें कि देश की जनता तक के बीच पद्म पुरस्कार पहुँचानेलेके लिए मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद सबसे पहले पुरस्कार पाने की प्रक्रिया में बदलाव किया था। पहले जहाँ ये अवार्ड केवल उन लोगों को मिलते थे जो इसके लिए अप्लाई करते थे। उस प्रक्रिया में केवल उन लोगों का नाम आ पाता था था जिन्हें अवार्ड के बारे में पता होता था और जानकारी होती थी कि इसका कब नामांकन करना है, कहाँ उसे जमा कराना है, क्या सोर्स लगानी है आदि-आदि… ये सब बिंदु मिलकर निर्धारित करते थे कि किसका नाम यूपीए शासन में पद्म पुरस्कार के लिए घोषित होगा। इस प्रक्रिया में नतीजा ये दिखता था कि सर्वोच्च सम्मान के अधिकारी समाज का एक निश्चित वर्ग रह जाता था। तब, उन लोगों को अवार्ड ज्यादा मिलता था जो सरकार के करीबी होते थे, वहीं असली संघर्ष करने वाले गुमनाम ही रह जाते थे। मगर, अब स्थिति बदल गई है। आज के समय में ये पुरस्कार देने से पहले किसी का बैकग्राउंड या राजनैतिक पार्टी नहीं देखी जाती, उनके कार्यों को देखा जाता है।