भारत और मलेशिया के रिश्तों को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार (7 फरवरी 2026) को दो दिवसीय दौरे पर कुआलालंपुर पहुँचेंगे। यह PM मोदी की करीब 8 साल बाद मलेशिया की यात्रा है और इस दौरान व्यापार और अर्थव्यवस्थ से लेकर तकनीक, ऊर्जा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में समझौते होने की उम्मीद है। चर्चा है कि इस यात्रा के दौरान मलेशिया में रह रहे भगौड़े इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक को लेकर भी दोनों देशों के बीच चर्चा हो सकती है।
PM मोदी के इस दौरे से पहले जाकिर नाइक का शागिर्द और हिंदू विरोधी इस्लामी कट्टरंपथी मोहम्मद जमरी विनोद बिलबिला रहा है। मोहम्मद जमरी ने आज (7 फरवरी) रात 8 बजे कुआलालंपुर के सोगो इलाके में ‘मंदिरों’ के खिलाफ रैली करने की चेतावनी दी है। इन मंदिरों को जमरी अवैध बताता है। जमरी ने फेसबुक पोस्ट के जरिए अपने समर्थकों को खुला आह्वान करते हुए कहा, “सरकार के प्रचार और चालों में मत आओ। हम घुसपैठियों के खिलाफ लड़ेंगे।” हर कट्टरपंथी की तरह इस कट्टरपंथी जमरी का भी दावा है कि यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण होगा।
PM मोदी का दौरा और प्रदर्शन
यह रैली में करीब 141 गैर-सरकारी संगठनों के शामिल होने का दावा किया जा रहा है। इसका मकसद सरकार पर दबाव डालना है ताकि वह कथित तौर पर अवैध बताए जा रहे इन धार्मिक स्थलों के खिलाफ कार्रवाई करे।
यह बयान ऐसे समय आया है, जब मलेशिया के गृह मंत्रालय ने घोषणा की थी कि पुलिस प्रदर्शन के आयोजकों से मुलाकात कर उन्हें रैली रद्द करने के लिए मनाने की कोशिश करेगी। मंत्रालय ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मलेशिया दौरे के कारण स्थिति संवेदनशील है।
गृह मंत्रालय ने जनता से अपील की है, “PM मोदी के दौरे की अवधि के दौरान किसी भी सार्वजनिक सभा या प्रदर्शन में हिस्सा न लें।” सरकार को आशंका है कि इस तरह की रैली देश की सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द को खतरे में डाल सकती है।
मलेशिया सरकार के प्रवक्ता फहमी फजिल ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम किसी भी कीमत पर राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे, खासकर ऐसे समय में जब एक महत्वपूर्ण विदेशी नेता (PM मोदी) मलेशिया के दौरे पर आ रहे हैं।
कौन है जाकिर नाइक का कट्टरपंथी शागिर्द जमरी?
जमरी खुद कन्वर्टेड मुस्लिम है और उसकी जड़े तमिल संस्कृति से जुड़ी रही है। 41 वर्षीय जमरी मलेशियाई तमिल मूल का है और उसका जन्म मूल रूप से एक हिंदू परिवार में हुआ था। पहले उसका नाम विनोथ कालिमुथु था। हालाँकि, इस्लाम अपनाने के बाद वो कट्टरपंथी बन गया और तब से ही हिंदू धर्म के खिलाफ जहरीले बयान दे रहा है।
जाकिर नाइक का शागिर्द और कट्टर समर्थक जमरी हिंदू समुदाय के साथ विवाद में उलझा हुआ है। वह उन कट्टरपंथी मुस्लिम समूहों के साथ खड़ा है, जो दावा करते हैं कि मलेशिया में कई हिंदू मंदिर और धार्मिक स्थल ‘अवैध भूमि’ पर बने हुए हैं।
कुछ दिनों पहले Thaipusam पर्व के अवसर पर 31 जनवरी रात 12 बजे से 2 फरवरी सुबह 3 बजे तक मुफ्त फेरी सेवा की घोषणा के बाद भी उसने हिंदू धर्म को लेकिन विवादित टिप्पणियाँ की थीं। इसके बाद डेमोक्रेटिक एक्शन पार्टी सोशलिस्ट यूथ (DAPSY) के सेपुतेह अध्यक्ष डिक्कैम लूर्डेस ने उसे आड़े हाथों लिया था। डिक्कैम लूर्डेस ने कहा था, “तुम्हारा इस्लाम में धर्मांतरण तुम्हारा निजी फैसला हो सकता है लेकिन उस धर्मांतरण को हिंदू त्योहारों का मजाक उड़ाने और हिंदू आस्था का अपमान करने का लाइसेंस समझना घिनौना है।”
अक्सर हिंदुओं के खिलाफ भड़काऊ बयान देने वाले जमरी के खिलाफ 890 से अधिक पुलिस शिकायतें दर्ज हैं। डेमोक्रेटिक एक्शन पार्टी (DAP) के सांसद आरएसएन रायर ने गृह मंत्री सैफुद्दीन नास्यूशन इस्माइल से इस मामले में कुछ दिनों पहले जवाब देने को भी कहा था। रायर ने दावा किया कि आदतन अपराधी के खिलाफ अब तक 890 से ज्यादा पुलिस शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं लेकिन इसके बावजूद उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने पूछा, “जब उसके बयान बार-बार समाज में तनाव पैदा कर रहे हैं, तो अब तक उस पर मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया?”
पिछले साल मार्च 2025 में जमरी को फेसबुक पर मंदिर से जुड़ी एक पोस्ट के कारण गिरफ्तार किया गया था। यह पोस्ट कुआलालंपुर में एक मंदिर को हटाकर उसकी जगह मस्जिद बनाने से जुड़ी हुई थी। उसी महीने की शुरुआत में जमरी ने फेसबुक पर हिंदू श्रद्धालुओं के कवाड़ी अनुष्ठान को लेकर विवादित टिप्पणी की थी।
जमरी ने फेसबुक पोस्ट में कहा था कि कवाड़ी अनुष्ठान करने वाले हिंदू भक्त ‘वेल वेल’ कहते हुए ऐसे दिखाई देते हैं, जैसे वे किसी नशे में हों या उन पर किसी तरह का असर हो गया हो। इसे अलावा उसने टिकटॉक पर वीडियो बनाकर भगवान शिव का भी अपमान किया था।
इससे पहले 2019 में भी मोहम्मद जमरी को पुलिस ने हिंदुओं के खिलाफ विवादित टिप्पणी करने के मामले में गिरफ्तार किया था। उसने अपने भाषण के दौरान हिंदू धर्म को लेकर आपत्तिजनक शब्द कहे थे जिससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ने का खतरा बन गया था। पुलिस के मुताबिक, सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए 70 सेकंड के वीडियो में जमरी ने हिंदू धर्म के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक बयान दिए थे। इस मामले में उसके खिलाफ कई शिकायतें दर्ज की गईं।
जाकिर के लिए मलेशियाई नागरिकता छोड़ने को था तैयार
जाकिर का यह शार्गिद इस्लामी कट्टरपंथी के पीछे इस हद तक पागल था कि उसने मलेशियाई नागरिकता तक छोड़ने की बात कह दी थी। जमरी ने कहा था कि अगर जाकिर नाइक को भारत प्रत्यर्पित (सौंपा) किया जाता है, तो वह अपनी मलेशियाई नागरिकता छोड़ने के लिए तैयार है। उसने कहा था, “अगर सरकार ज़ाकिर नाइक को वापस भेजना चाहती है या उसका प्रत्यर्पण करती है, तो मैं बिना किसी हिचकिचाहट के अपना पहचान पत्र (आईसी) सौंप दूँगा।” अब जब एक बार फिर जाकिर नाइक को लेकर चर्चा होने की संभावना है तो यह कट्टरपंथी बिलबिला रहा है।
जाकिर नाइक के समर्थन में नागरिकता छोड़ने तक की घोषणा करने वाला जमरी दरअसल एक व्यक्ति नहीं बल्कि उस वैचारिक नेटवर्क का प्रतिनिधि है, जो धार्मिक उन्माद के जरिए राजनीतिक दबाव बनाना चाहता है। उसका आक्रोश इस बात का प्रमाण है कि भारत और मलेशिया के रिश्तों में मजबूती कट्टरपंथी ताकतों के लिए असहज होती जा रही है।
हालाँकि, कई सवाल भी हैं। जमरी के खिलाफ 890 से अधिक पुलिस शिकायतें दर्ज हैं, वह पहले भी हिंदू विरोधी बयान और सोशल मीडिया पोस्ट के कारण गिरफ्तार हो चुका है और उसने भगवान शिव से लेकर हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों तक का सार्वजनिक रूप से अपमान किया है। इसके बावजूद उसके खिलाफ निर्णायक कानूनी कार्रवाई का अभाव यह सवाल खड़ा करता है कि क्या कट्टरपंथियों के लिए मलेशिया में कानून अलग है?
नेटफ्लिक्स की आगामी फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ नाम को लेकर विवाद तेज हो गया है। आपत्ति इस बात पर है कि फिल्म के टाइटल में ‘पंडत’ शब्द के साथ ‘घूसखोर’ जैसे क्राइम शब्द को जोड़ा गया, जो ब्राह्मण और पंडितों की छवि को बदनाम करने के लिहाज से रखा गया है। यहाँ अभी फिल्म रिलीज भी नहीं हुई, लेकिन टाइटल ने ही खेल कर दिया। बॉलीवुड में ‘जातिवाद’ का वही खेल, जो पहले भी फिल्म और गानों के ऐसे टाइटल देकर किया जा चुका है।
इससे पहले भी बॉलीवुड में जाति और पेशों से जुड़े शब्दों से सामाजिक भेदभाव पैदा करने की साजिश रची गई है। ऐसा ही मामला साल 2007 में माधुरी दीक्षित की फिल्म ‘आजा नचले‘ के साथ भी सामने आया था। फिल्म के टाइटल गीत में ‘बोले मोची भी खुद को सुनार’ पंक्ति जोड़कर मोची और दलित समुदायों के लोगों को नीचा दिखाया गया। विवाद हुआ, यूपी, पंजाब और हरियाणा में फिल्म पर बैन लगा।
विवाद बढ़ा, तो गाने के बोल बदलकर ‘मेरे दर पे दीवानों की बहार है’ कर दिए गए। दुनियाभर में प्रेम का चोला डालकर घूमने वाले ‘यश राज फिल्म’ ने सार्वजनिक तौर पर माफी तक माँगनी पढ़ी। यह सब बस मामला शांत कराने के लिए हुआ।
क्योंकि इसके बाद 2009 में ‘बिल्लू बार्बर‘ आई। यहाँ भी वही विवाद, सीधे फिल्म के नाम पर था। नाई समुदाय ने ‘बार्बर’ शब्द को अपमानजनक तौर पर देखा गया। यहाँ भी फिल्म रिलीज से पहले सबकुछ हुआ। विवाद बढ़ा, तो फिल्म निर्माता शाहरुख खान ने फिल्म के नाम से ‘बार्बर’ शब्द को हटा लिया। यहाँ भी मामला जल्दबाजी में सुलझा लिया गया।
लेकिन साल 2012 में एक और ऐसी फिल्म बनी- शूद्र। इस बार सीधा हमला हुआ। पूरी फिल्म सवर्ण समाज को बाँटने पर आधारित थी, खासकर ब्राह्मण और ठाकुर। फिल्म के ट्रेलर में ही विचलित करने वाले दृश्य थे, जैसे कि मंत्रोच्चारण करने पर एक बच्चे की जीभ काट देना या पैरों में घुंघरू बाँधकर चलना। फिल्म को लेकर कई राज्यों में विरोध हुआ, रिलीज तक रोक दी गई।
लेकिन फिल्म के मेकर्स ने सेंसर बोर्ड की मंजूरी का हवाला देते हुए कुछ नहीं किया। बल्कि जातिवाद फैलाने वाली इस फिल्म के निर्देशक संजीव जायसवाल ने इसमें समाज की गलती निकाली और कहा– जातिवाद समाज में ‘जहर’ है और उनकी फिल्म जातिवाद के खिलाफ आवाज है। मतलब खुद की गलती, पर खुद ही सीनाजोरी। फिल्म आई भी… विवाद भी हुआ, पर नतीजा कुछ नहीं निकला।
विवाद सिर्फ जातिवाद तक नहीं सिमटा। बात धर्म तक भी पहुँची। चाहे वो साल 2017 में ‘फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के गाने में ‘राधा‘ शब्द के साथ ‘सेक्सी’ लगाकर किया गया हो, या इसी तरह साल 2022 में फिल्म ‘पठान’ में दीपिका पादुकोण ‘भगवा रंग’ की बिकीनी में ‘बेशरम रंग’ ही क्यों न गुनगुना रही हो। इन पर भी हल्ला मचा… FIR दर्ज की गईं… ये भी रिलीज से पहले ही चर्चा में बने। लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।
अब यहाँ फिल्मों को लेकर ये पुराने विवाद याद किया जाना जरूरी भी है। क्योंकि ये सभी विवाद आज के दौर की ‘घूसखोर पंडत‘ की ही परछाई है, जो फिल्मों के वही जातिवाद के पैटर्न को झलकाता है। जो लोग इस नाम पर उठे विवाद को अब भी हल्के में ले रहे हैं, उन्हें खासतौर पर समझना होगा कि फिल्मों और गानों में शब्दों के जरिए पहचान को निशाना बनाने का खेल बरसों से चलता आ रहा है।
बात यहाँ सिर्फ ब्राह्मण या पंडित तक सीमित नहीं रही है। यहाँ भोगी दलित समुदाय भी है, जो ऐसे टाइटल और कंटेंट का विरोध कर चुका है, जहाँ जाति और पेशा लिखकर पहचान बनाई जाती है। यही नहीं, फिल्मों में हिंदू देवी-देवताओं, धार्मिक प्रतीकों और सनातन परंपराओं से जुड़े नाम और शब्द चुनकर भी यह खेल खेला गया है।
हर बार फिल्म की कहानी से पहले नाम और शब्द चर्चा में आया और रिलीज से पहले ही विरोध शुरू हुआ। कुछ मामलों में माफी माँग ली गई, तो कुछ मे विवाद को कुछ समय के लिए शांत कराने के लिए टरका दिए गए। लेकिन खेल नहीं रुका, अब इस खेल में ‘घूसखोर पंडत‘ नया नाम है। जहाँ फिल्म आने से पहले ही ‘नाम’ से जातिवाद पर विवाद को तूल मिल गया है।
केंद्र सरकार, नागालैंड सरकार और ईस्टर्न नागालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ENPO) के बीच गुरुवार (5 फरवरी 2026) को नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौता (MoA) हुआ। ENPO राज्य के पूर्वी छह जिलों की आठ प्रमुख नागा जनजातियों का प्रतिनिधित्व करता है।
यह समझौता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शांतिपूर्ण और समृद्ध पूर्वोत्तर के लक्ष्य की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इस करार पर नागालैंड के मुख्यमंत्री डॉ नेफ्यू रियो और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए गए।
समझौते के तहत फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (FNTA) की स्थापना का रास्ता साफ हुआ है, जो तुएनसांग, मोन, किफिरे, लॉन्गलेंग, नोकलाक और शामाटोर जिलों को कवर करेगी। इसके माध्यम से 46 विषयों से जुड़े प्रशासनिक अधिकारों का हस्तांतरण किया जाएगा, जिससे क्षेत्रीय विकास और स्वशासन को मजबूती मिलेगी।
फोटो साभार via idsa.in
नई दिल्ली में हुए इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्रालय और नागालैंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, नागालैंड के उपमुख्यमंत्री यंथुंगो पैटन, उनके कैबिनेट सहयोगी और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी मौजूद रहे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस करार को एक ऐतिहासिक समझौता बताते हुए कहा कि इससे पूर्वी नागालैंड के विकास को नई गति मिलेगी और वहाँ के लोगों को नए अवसर और समृद्धि प्राप्त होगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता उत्तर-पूर्व में शांति, प्रगति और पूर्ण विकास के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
This is a historic agreement indeed, which will enhance the development trajectory of Eastern Nagaland in particular. I am sure it will open new avenues of opportunity and prosperity for the people. It reflects our unwavering commitment to peace, progress and inclusive growth in… https://t.co/bKsHl8rWOn
नागालैंड के मुख्यमंत्री ने भी अपनी सरकार, केंद्र और ENPO के बीच हुए ज़रूरी समझौते की खबर शेयर की।
I am happy to announce that today, 5th Feb 2026, the Govt. of Nagaland signed the Memorandum of Agreement (MoA) with the Govt. of India and the Eastern Nagaland Peoples’ Organisation for the formation of the ‘Frontier Nagaland Territorial Authority’ within the State of Nagaland.” pic.twitter.com/xbfVbluj31
नई दिल्ली में हुए इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्रालय और नागालैंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, नागालैंड के उपमुख्यमंत्री यंथुंगो पैटन, उनके कैबिनेट सहयोगी और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी मौजूद रहे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस करार को एक ऐतिहासिक समझौता बताते हुए कहा कि इससे पूर्वी नागालैंड के विकास को नई गति मिलेगी और वहाँ के लोगों को नए अवसर और समृद्धि प्राप्त होगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता उत्तर-पूर्व में शांति, प्रगति और पूर्ण विकास के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
फोटो साभार – Freepik
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि उन्होंने 2021–2022 में ENPO प्रतिनिधियों को भरोसा दिलाया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर-पूर्व में शांति के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं और उनकी चिंताओं का समाधान किया जाएगा। उन्होंने ENPO से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भरोसा बनाए रखने और यह विश्वास रखने का आग्रह किया कि उन्हें न्याय और सम्मान अवश्य मिलेगा।
अमित शाह ने विवाद के समाधान पर प्रसन्नता जताई और कहा कि गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने लंबे समय तक ENPO और नागालैंड सरकार के बीच सेतु की भूमिका निभाई, जिससे बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद मिली।
उन्होंने ENPO क्षेत्र के रणनीतिक महत्व पर भी जोर दिया और नागालैंड सरकार, मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो, उनके मंत्रिमंडल, राज्य के नागरिकों और नागालैंड के दोनों सांसदों को सफल वार्ता के लिए बधाई दी। शाह ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर पूर्वी नागालैंड के विकास को तेजी से आगे बढ़ाएँगी।
वहीं, मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने इस समझौते को नागा समाज की जीत करार देते हुए कहा, “आज का यह समझौता नागा समाज की जीत है। मुझे उम्मीद है कि सभी वर्गों के बीच आपसी विश्वास और मजबूत होगा। मैं भारत सरकार का धन्यवाद करता हूँ कि उसने इस मुद्दे को निर्णायक निष्कर्ष तक पहुँचाया, और आशा करता हूँ कि भविष्य में भी हमें केंद्र सरकार का सहयोग मिलता रहेगा।”
फोटो साभार -मोकोकचुंग टाइम्स
समझौते के अनुसार, फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (FNTA) के तहत एक मिनी-सचिवालय स्थापित किया जाएगा, जिसका नेतृत्व अतिरिक्त मुख्य सचिव या प्रधान सचिव करेंगे। इसके तहत विकास से जुड़ा खर्च क्षेत्रफल और जनसंख्या के अनुपात में साझा किया जाएगा। हालाँकि, यह पूरी व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371(A) के प्रावधानों के पूरी तरह अनुरूप रहेगी।
यह विशेष प्रशासनिक ढाँचा पूर्वी नागालैंड के विकास को बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया है, जिसका उद्देश्य बेहतर निर्णय-प्रक्रिया, वित्तीय स्वायत्तता, बुनियादी ढाँचे के तेज विकास, आर्थिक सशक्तिकरण और संसाधनों के प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करना है।
गृह सचिव गोविंद मोहन के अनुसार, यह समझौता (MoA) वर्षों से चली आ रही लंबी वार्ता को समाप्त करने में मदद करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि संस्थागत शासन और विकास तंत्र पूर्वी नागालैंड के लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतरें।
अलगाव से समावेश तक: मोदी प्रशासन ने लंबे समय से चले आ रहे विवाद को कैसे सुलझाया
स्वतंत्रता के बाद से ही पूर्वी नागा जनजातियों को अलग प्रशासनिक पहचान देने की माँग लगातार उठती रही है। तुएनसांग मोन पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन, जिसे बाद में 2005 में ईस्टर्न नागा पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ENPO) नाम दिया गया, की शुरुआत 1994 में पूर्वी नागा जनजातियों के पिछड़ेपन और उपेक्षा के खिलाफ एक औपचारिक आंदोलन के रूप में हुई थी।
2010 में ENPO ने फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (FNTA) के गठन का प्रस्ताव रखा, जिसमें किफिरे, लॉन्गलेंग, मोन, नोकलाक, शामाटोर और तुएनसांग जैसे छह पूर्वी जिले शामिल हों। संगठन ने विकास और शासन में असमानता दूर करने के लिए एक अलग राजनीतिक व्यवस्था की माँग की, साथ ही वित्तीय, विधायी और कार्यकारी स्वायत्तता पर जोर दिया। उन्होंने सरकार में पूर्वी नागा जनजातियों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व को लेकर भी आपत्ति जताई।
इस मुद्दे को लेकर चुनाव बहिष्कार, हड़तालें, कई दौर की बैठकें, आश्वासन और टकराव होते रहे। कई बार समाधान की दिशा में प्रगति हुई, लेकिन बार-बार अड़चनें भी आईं। इसके बावजूद, मोदी सरकार ने लगातार संवाद जारी रखा और ENPO की माँगों को गंभीरता से सुना, जिससे आखिरकार इस ऐतिहासिक समझौते का रास्ता साफ हुआ।
फोटो साभार – दृष्टि आईएएस
गृह मंत्रालय और ENPO के बीच 2022 में औपचारिक बातचीत की शुरुआत एक उच्चस्तरीय समिति द्वारा की गई थी, ताकि सहमति पर पहुँचने का प्रयास किया जा सके। हालाँकि, ENPO की अलग राज्य बनाने की लगातार माँग के कारण प्रारंभिक वार्ता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाई। आखिरकार संगठन केंद्र के प्रस्ताव पर सहमत हुआ, जिसके तहत FNTA ढाँचे के तहत अधिक स्वायत्तता वाला क्षेत्रीय प्राधिकरण बनाया जाएगा।
दिसंबर 2024 में आयोजित उद्घाटन बैठक में ENPO ने अस्थायी रूप से मोदी सरकार के FNTA निर्माण योजना को अनुच्छेद 371(A) के तहत स्वीकार किया, जिससे पूर्वी नागाओं को कार्यकारी, विधायी और बजटीय अधिकार सौंपे गए। इसके बाद कई बैठकें हुईं और संगठन ने अपनी माँगों को घटा दिया।
अंततः स्वतंत्र राज्य बनाने की इच्छा को पिछले साल की अंतिम वार्ता में स्थगित किया गया और नागालैंड राज्य के भीतर विशेष स्वायत्त प्रशासनिक इकाई FNTA बनाने का प्रस्ताव मंजूर किया गया। यह दस साल बाद पुनः समीक्षा के लिए निर्धारित है और विवादित मुद्दों को लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सुलझाया जाएगा।
निष्कर्ष
उत्तर-पूर्व भारत भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के शासन में गंभीर उपेक्षा का शिकार रहा है। इसके विपरीत, मोदी सरकार ने पूरे क्षेत्र को मुख्यधारा से जोड़ने और इसके सबसे दूरदराज इलाकों में विकास को बढ़ावा देने के लिए व्यापक कदम उठाए हैं, जिससे क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव आए हैं।
इसके अलावा, विरोधी दलों द्वारा उठाए गए मुद्दों के समाधान के लिए कई बार सौहार्दपूर्ण प्रयास किए गए, जिससे लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा, राजनीतिक उथल-पुथल, हिंसा और अशांति कम हुई और क्षेत्र में स्थिरता और बेहतर भविष्य की राह बनी।
सरकार के अटल प्रयासों के कारण ENPO की अलग राज्य की माँग में भारी कमी आई, और उसने अनुच्छेद 371(A) के तहत सीमित स्वायत्तता वाली विशेष प्रशासनिक संरचना (FNTA) को स्वीकार किया। अब, इस क्षेत्र का एक बेहद विवादित इतिहास समाप्त हो गया है और नए सशक्त और आशापूर्ण युग की शुरुआत हुई है, जिसमें लंबे संघर्ष की जगह शांति और विकास ने ले ली है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
अमेरिका के प्रमुख अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने अपने कर्मचारियों की लगभग एक-तिहाई संख्या में कटौती करने का फैसला किया है। यह बड़े पैमाने पर छंटनी बुधवार (4 जनवरी 2026) को घोषित की गई, जो कंपनी के सभी विभागों को प्रभावित करेगी। इस फैसले से अखबार की अंतरराष्ट्रीय और खेल समाचारों की कवरेज में भारी कमी आने की आशंका है।
छंटनी के तहत स्पोर्ट्स सेक्शन को पूरी तरह बंद किया जा रहा है, जबकि कुछ खेल संवाददाताओं को फीचर्स सेक्शन में स्पोर्ट्स कल्चर कवर करने के लिए शिफ्ट किया जाएगा। इसके अलावा बुक्स, मेट्रो सेक्शन और प्रमुख न्यूज पॉडकास्ट ‘Post Reports’ को भी बंद करने की योजना है।
एग्जीक्यूटिव एडिटर मैट मरे ने इस कदम को कंपनी के लिए स्थिरता लाने वाला बताया, लेकिन कर्मचारियों और पत्रकारों ने इसे अखबार के इतिहास के सबसे अंधेरे दिनों में से एक और खून-खराबे जैसा फैसला करार दिया है। गौरतलब है कि वाशिंगटन पोस्ट के मालिक अमेजन के संस्थापक और अरबपति जेफ बेजोस हैं।
मैट मरे ने कहा कि मीडिया इंडस्ट्री में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और पाठकों तक पहुँचने में आ रही मुश्किलों के कारण यह फैसला लेना जरूरी हो गया है। उन्होंने कहा कि कंपनी की ओवरसीज कवरेज भी कम की जाएगी, हालाँकि करीब 12 विदेशी ब्यूरो बनाए रखे जाएँगे, जिनका फोकस राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर होगा।
कर्मचारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने माना कि यह फैसला परेशान करने और चौंकाने वाला है। इससे पहले स्थानीय और विदेशी पत्रकारों ने जेफ बेज़ोस से अपनी नौकरियाँ बचाने की अपील भी की थी, लेकिन उनकी अपील सफल नहीं हो सकी।
वाशिंगटन पोस्ट की इस बड़ी छंटनी का असर भारत में काम करने वाले कर्मचारियों पर भी पड़ा है। 300 से अधिक कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया, जिनमें कई जाने-माने नाम शामिल हैं। इनमें शशि थरूर के बेटे ईशान थरूर भी शामिल हैं।
इसके अलावा, नई दिल्ली ब्यूरो चीफ प्रांशु वर्मा और यरुशलम ब्यूरो चीफ गैरी शिह (Gerry Shih) को भी हटाया गया है। दोनों पहले से ही अखबार की भारत-विरोधी रिपोर्टिंग और पश्चिमी मीडिया के पक्षपाती रवैये से जुड़े चर्चित चेहरे माने जाते रहे हैं।
छंटनी के बाद कई प्रभावित पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया साझा की। प्रांशु वर्मा ने लिखा कि उन्हें यह बताते हुए दिल टूट गया है कि उन्हें वाशिंगटन पोस्ट से निकाल दिया गया। उन्होंने अपने चार साल के अनुभव को सम्मान की बात बताया और कहा कि वे अपने कई प्रतिभाशाली साथियों के लिए भी दुखी हैं, जिन्हें भी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।
वाशिंगटन पोस्ट से निकाले जाने के बाद यरुशलम ब्यूरो चीफ गैरी शिह ने अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए कहा कि अखबार के साथ उनका समय उनके लिए एक सम्मान और सौभाग्य जैसा रहा। उन्होंने बताया कि उन्होंने सात साल से अधिक समय तक दुनिया भर की यात्रा की, एक ऐसे अखबार के लिए, जिस पर उन्हें पूरा भरोसा था।
गैरी शिह ने कहा कि उन्हें मिडिल ईस्ट टीम के बाकी सदस्यों के साथ हटा दिया गया है और दिल्ली से लेकर बीजिंग, कीव और लैटिन अमेरिका तक के अधिकांश सहयोगियों की भी नौकरी चली गई है। उन्होंने इस दिन को दुखद बताया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि यह सफर मजेदार, यादगार और चुनौतीपूर्ण रहा और उनकी टीम ने अपने काम के दौरान खूब असरदार काम किया।
प्रांशु वर्मा से जिन्होंने अपनी नौकरी बचाने के लिए मोदी सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की
वाशिंगटन पोस्ट की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, प्रांशु वर्मा भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और भूटान से जुड़ी खबरों की कवरेज के जिम्मेदार थे। वे 2022 में द पोस्ट से जुड़े थे और इस दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) समेत कई अहम विषयों पर रिपोर्टिंग की। इससे पहले वे बोस्टन ग्लोब में टेक्नोलॉजी पर लिख चुके थे और न्यूयॉर्क टाइम्स में कूटनीति और परिवहन से जुड़ी रिपोर्टिंग कर चुके हैं।
उनका पत्रकारिता करियर फिलाडेल्फिया इन्क्वायरर से शुरू हुआ था, जहाँ उन्होंने न्यू जर्सी की राजनीति और जेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया। वे डेलावेयर विश्वविद्यालय और कोलंबिया विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से डिग्री हासिल कर चुके हैं। इसके बावजूद अब छंटनी की मार उनकी नौकरी पर भी पड़ी।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्मा ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से अपनी नौकरी बचाने की अपील भी की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया कि उनका मीडिया संस्थान भारत में उन गिने-चुने प्लेटफॉर्म्स में से है, जो सरकार के डर के बिना अकाउंटेबिलिटी रिपोर्टिंग कर सकता है। हालाँकि, उनकी यह कोशिश काम नहीं आई।
बताया गया है कि वर्मा ने अपनी रिपोर्टिंग में मोदी सरकार के खिलाफ बार-बार आलोचनात्मक रुख अपनाया और कई लेखों में सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी और भारत की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले आरोप लगाए। उन्होंने गर्व के साथ उन रिपोर्ट्स का जिक्र किया, जिनमें भारतीय अरबपतियों को विशेष लाभ मिलने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में क्रोनी कैपिटलिज़्म, भारत की कंपनियों पर रूस-यूक्रेन युद्ध में भूमिका निभाने के आरोप और अवैध घुसपैठ रोकने की भारत की मुहिम को मुसलमानों के खिलाफ कठोर निर्वासन अभियान के रूप में दिखाया गया था।
इन उदाहरणों को वर्मा ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के तौर पर पेश किया, जो वाशिंगटन पोस्ट की भारत को लेकर आलोचनात्मक और पक्षपाती अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग की छवि से मेल खाती रही है। फिर भी, इन सबके बावजूद छंटनी से उनकी नौकरी नहीं बच पाई।
वाशिंगटन पोस्ट में जर्नलिस्ट बनने के लिए ग्रेजुएट स्कूल ऑफ जर्नलिज्म की अहम भूमिका
जानकारी के मुताबिक, प्रांशु वर्मा ने यह साफ कर दिया था कि वाशिंगटन पोस्ट में भारतीय संवाददाता बनने के लिए क्या अपेक्षित है। उनके मुताबिक, भारत जो वर्तमान में राइट-विंग सरकार के तहत है और जिसे उदार (लिबरल) नजरियों में आलोचना का सामना करना पड़ता है, उसे संदिग्ध और आलोचनात्मक रूप में पेश करना चाहिए। देश की कार्रवाइयों को संवैधानिक लोकतंत्र की चुनौती के बजाय तानाशाही, बहुसंख्यकवाद और नैतिक गिरावट के नजरिए से दिखाना जरूरी था।
उदाहरण के तौर पर, वर्मा ने अवैध रोहिंग्या प्रवास से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों को, जिसमें जाली दस्तावेज, सीमा में घुसपैठ और आपराधिक आरोप शामिल हैं, साम्प्रदायिक उत्पीड़न की कहानी के रूप में पेश किया। इसी तरह, अरबपतियों को सरकारी भ्रष्टाचार के साधन के रूप में दिखाया गया, जबकि वे फ्री मार्केट के व्यावसायिक खिलाड़ी हैं।
उनके अनुसार, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के तनाव का स्रोत भौगोलिक या रणनीतिक कारण नहीं, बल्कि भारत की कथित नैतिक असफलताओं में हैं। नई दिल्ली की संसदीय संप्रभुता और नागरिक कल्याण की रक्षा की कोशिशों को बार-बार नकारात्मक रूप में दिखाया गया।
वर्मा ने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए फैलाई गई नैरेटिव पर गर्व किया और इस पक्षपाती और गलतियों से भरी रिपोर्टिंग के भारत पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को अपने नौकरी बचाने के औजार के रूप में इस्तेमाल किया। विडंबना यह है कि उन्होंने भारतीय अरबपतियों पर लगातार हमला किया और भारत में सेंसरशिप की चिंता जताई, लेकिन खुद एक अमेरिकी अरबपति के कंधों पर काम के लिए निर्भर रहे।
उनकी बातों में शक्ति से स्वतंत्रता की चर्चा थी, लेकिन यह अमीर मालिक की कृपा पर आश्रित अपीलों से विरोधाभासी दिखती है। वर्मा के मामले ने यह साबित किया कि लिबरलवाद कभी-कभी स्पष्ट पाखंड और डबल स्टैंडर्ड से जुड़ा हो सकता है।
गैरी शिह का प्रोफाइल और विवादास्पद रिपोर्टिंग
वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, गैरी शिह ने 2018 में अखबार में शामिल होकर यरुशलम ब्यूरो चीफ के रूप में इजराइल, फिलिस्तीनी इलाके और मध्य पूर्व से जुड़ी खबरों की कवरेज की। इससे पहले वे 2021-2025 तक नई दिल्ली ब्यूरो चीफ रहे और भारत सहित अन्य दक्षिण एशियाई देशों में राजनीति, विदेश नीति, खुफिया और टेक्नोलॉजी पर रिपोर्टिंग की।
शिह ने इससे पहले एसोसिएटेड प्रेस, रॉयटर्स और द न्यूयॉर्क टाइम्स में भी काम किया। उनकी भारत पर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग के लिए 2024 में पुलित्जर पुरस्कार के फाइनलिस्ट होने का गौरव हासिल हुआ और उन्हें 2020 ओसबोर्न इलियट पुरस्कार भी मिला। वह चीनी मूल के हैं।
मीडिया रंबल के अनुसार, शिह ने बीजिंग से AP के लिए रिपोर्टिंग की, जहाँ उन्होंने चीन में सरकार की कार्रवाई, घरेलू राजनीति और विदेश नीति को कवर किया। उन्होंने रॉयटर्स के लिए सिलिकॉन वैली की सोशल मीडिया कंपनियों और न्यू यौर्क टाइम्स के लिए नॉर्दर्न कैलिफ़ोर्निया की रिपोर्टिंग भी की।
विशेष रूप से यह कहा जा सकता है कि वाशिंगटन पोस्ट में भारत-विरोधी रुख रखना कोई अनोखी बात नहीं, बल्कि यह कर्मचारी बनने की प्रवृत्ति मानी जाती है। इसी परंपरा के अनुरूप, गैरी शिह ने अपने लेखन का इस्तेमाल खालिस्तान समर्थकों के पक्ष में और प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो की सरकार के साथ मिलकर भारत पर बिना ठोस प्रमाण आरोप लगाने के लिए भी किया।
इस मिलीभगत ने पत्रकारिता की ईमानदारी की काँच की दीवारों को तोड़ दिया
रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) और कनाडाई सरकार ने 14 अक्टूबर 2024 को भारत के खिलाफ गंभीर, लेकिन बिना आधार के आरोप लगाए। आरोप यह थे कि भारतीय एजेंट, अधिकारी और वरिष्ठ कूटनीतिज्ञ, जिनमें उस समय भारत के उच्चायुक्त संजय कुमार वर्मा भी शामिल थे, उन्होंने कनाडाई धरती पर अपराधिक गतिविधियों में भाग लिया।
कनाडा के इन दावों पर वाशिंगटन पोस्ट ने घंटों के भीतर एक स्टोरी प्रकाशित की, जिसे गैरी शिह और ग्रेग मिलर ने लिखा। इस रिपोर्ट में अमित शाह को भी कथित अवैध आपराधिक ऑपरेशंस में शामिल बताया गया। लेख में सूत्र के रूप में कनाडा की नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर नतालि ड्रूइन और विदेश मंत्रालय के डिप्टी मिनिस्टर डेविड मॉरिसन को उद्धृत किया गया।
हालाँकि बाद में यह खुलासा हुआ कि अखबार को RCMP और कनाडाई अधिकारियों के आरोपों से पहले ही तैयार ब्रीफिंग मिल चुकी थी। रिपोर्ट वास्तव में प्रेस कॉन्फ़्रेंस का इंतजार कर रही थी। इसमें आतंकवादी हरेदीप सिंह निज्जर की हत्या और अन्य लक्षित हमलों को भारत पर आरोपित किया गया। कनाडा के NSA ने सभी आरोपों को मीडिया हाउस तक पहुँचाने का आदेश पहले ही दे दिया था, जबकि कोई औपचारिक निष्कर्ष या सबूत सार्वजनिक नहीं हुए थे।
इस खुलासे ने वाशिंगटन पोस्ट की स्वतंत्र पत्रकारिता और अखबार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। यह साबित हो गया कि इसके लेखक ओटावा के प्रभाव में आकर न्यू दिल्ली की छवि को नुकसान पहुँचाने वाले औजार के रूप में काम कर रहे थे।
अगर आप चाहें, मैं अब तक के सभी घटनाक्रम और पत्रकारों के प्रोफाइल को मिलाकर एक संयुक्त हिंदी न्यूज आर्टिकल तैयार कर सकता हूँ, जो वाशिंगटन पोस्ट की छंटनी, विवादास्पद रिपोर्टिंग और भारत-विरोधी गतिविधियों को पूरी तरह कवर करे।
भारत पर लगातार हमले, कॉन्सपिरेसी थ्योरी को बढ़ावा
वाशिंगटन पोस्ट के माध्यम से गैरी शिह ने भारत पर कई तरह के आरोप लगाए है। उनके अनुसार भारत ने नेटफ्लिक्स और अमेजन से दर्दनाक कंटेंट हटवाया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक पर घृणा भाषण फैलाया और पाकिस्तान में आतंकवादियों की हत्या करवाई।
उनके लिए सुनहरा मौका तब आया जब अमेरिका ने कहा कि भारत ने 2023 में प्रतिबंधित संगठन सिख फॉर जस्टिस के प्रमुख गुरपतवंत सिंह पन्नून को मारने का प्रयास किया।
इस पर गैरी शिह ने प्रचार चैनल द वायर पर करण थापर से बातचीत में दावा किया कि पूर्व R&AW प्रमुख समंत कुमार गोयल पूरी साजिश में शामिल थे। उन्होंने अपने लेख में लिखा, “अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने आकलन किया है कि पन्नून को निशाना बनाने वाले ऑपरेशन को उस समय के रॉ प्रमुख सामंत गोयल ने मंजूरी दी थी।” बाद में 2024 में अपने इंटरव्यू में उन्होंने इसे “अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ की समझ के अनुसार” के रूप में बचाव करने की कोशिश की। यह मामला भी दिखाता है कि शिह ने लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसे चुनौतीपूर्ण रूप में पेश करने का प्रयास किया।
गैरी शिह ने अपने बयान में कहा “यह कोई अकेली या अलग घटना नहीं थी, बल्कि इस पर एजेंसी के उच्च अधिकारियों, जिनमें सचिव समंत कुमार गोयल भी शामिल हैं की मंजूरी थी। यदि हम अपने स्रोतों से मिली जानकारी पर ध्यान दें, तो यह साफ है कि उन्हें इन खतरों को खत्म करने के लिए दबाव डाला गया था और यही हमारी समझ का आधार है कि यह एक ऑपरेशन था।”
हालाँकि, उनकी यह रिपोर्टिंग कई सवालों के घेरे में आई, खासकर कनाडाई सरकार के साथ उनकी साझेदारी और भारत पर बार-बार झूठे आरोप लगाने की प्रवृत्ति को देखते हुए। शिह ने 2022 में भारत की तुलना चीन से करने में भी कोई झिझक नहीं दिखाई, जो उनके बौद्धिक धोखे और पक्षपात को उजागर करता है।
मोदी सरकार ने स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई और रूस-यूक्रेन युद्ध में पश्चिमी दबाव के सामने झुकी नहीं, लेकिन शिह ने इसे भी आलोचना का विषय बनाया क्योंकि सरकार ने उनके पसंदीदा पश्चिमी दृष्टिकोण का समर्थन नहीं किया।
उन्होंने कहा “मानवाधिकार, जलवायु परिवर्तन, धार्मिक अल्पसंख्यकों का व्यवहार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दों पर मोदी चीन के समान पृष्ठ पर हैं। पश्चिमी पाखंड की यह धारणा भारतीय कूटनीतिज्ञों की ओर से आ सकती है, लेकिन यह वास्तव में चीनी कूटनीतिज्ञों से आती हो सकती है।”
यह टिप्पणी उन्होंने कारवाँ के एक लेख पर प्रतिक्रिया में दी थी, जो लिबरल लेखक सुषांत सिंह द्वारा लिखा गया था। पूर्व भारतीय विदेश सचिव कन्वल सिब्बल ने शिह की इस तुलना को सटीक रूप से खारिज करते हुए कहा
“कोई भी व्यक्ति जो बौद्धिक ईमानदारी रखता है, भारत और चीन को इन मुद्दों पर बराबर नहीं मान सकता। शिह को चीन से निकाला गया और अब वह भारत की स्वतंत्रता का लाभ उठा रहा है।” यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि गैरी शिह लगातार भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाने और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने में लगे रहे।
निष्कर्ष
वाशिंगटन पोस्ट की हालिया छंटनी और कर्मचारियों की बर्खास्तगी मीडिया हाउस में पिछले कुछ वर्षों में जारी बायआउट और स्टाफ कटौती का हिस्सा है। ये बदलाव उस समय की आलोचना और संपादकीय निर्णयों के कारण हुए, जब अखबार ने 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से पहले किसी राष्ट्रपति उम्मीदवार का समर्थन न करने का निर्णय लिया। यह निर्णय अमेज़न के संस्थापक जेफ बेज़ोस ने लिया था। इसके बाद अखबार ने कई हजार सब्सक्राइबर खो दिए।
दिलचस्प बात यह है कि 1970 के दशक से अधिकांश राष्ट्रपति चुनावों में अखबार ने उम्मीदवार का समर्थन किया और सभी उम्मीदवार डेमोक्रेट्स रहे। इसके अलावा, बेज़ोस द्वारा पिछले साल अखबार के ओपिनियन सेक्शन को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मुक्त बाजार के दृष्टिकोण पर केंद्रित करने का निर्णय लेने के बाद, उस विभाग के संपादक ने इस्तीफा दे दिया था।
कंपनी को पक्षपाती और राजनीतिक रूप से प्रेरित रिपोर्टिंग के लिए जाना जाता है और इसमें भारत और मोदी सरकार के प्रति गहरी पूर्वाग्रह और नफरत रही है। प्रांशु वर्मा और गैरी शिह ने इस पक्षपाती नैरेटिव को आगे बढ़ाने में पूरी मेहनत की और इस अनैतिक परंपरा के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हालाँकि, इस नए घटनाक्रम ने कंपनी की आंतरिक समस्याओं पर फिर से ध्यान आकर्षित किया। यह साबित हुआ कि विशेष रूप से भारत को निशाना बनाकर रिपोर्टिंग करने वाले आधुनिक पत्रकार (ब्राउन सेपियंस) भी लिबरल मीडिया में नौकरी की सुरक्षा की गारंटी नहीं रखते। चाहे उनका देश विरोधी दृष्टिकोण कितना भी स्पष्ट क्यों न हो, वे आखिरकार हटा दिए जाते हैं या आसानी से बदल दिए जाते हैं।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान गुरुवार (05 फरवरी 2026) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में करीब 97 मिनट लंबा भाषण दिया। इस दौरान पीएम ने कॉन्ग्रेस, TMC समेत विपक्षी दलों पर जमकर हमला बोला और मौजूदा राजनीतिक हालात से लेकर बीते दशकों की नीतियों तक का जिक्र किया।
पीएम मोदी ने अपने भाषण में विशेष रूप से कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके ऐतिहासिक नेतृत्व को निशाने पर लिया। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के दौर की नीतियों, कार्यशैली और सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि उस समय देशवासियों को समस्या के रूप में देखा गया। उनके अनुसार, कॉन्ग्रेस की राजनीति परिवारवाद, सत्ता के केंद्रीकरण और जनता से दूरी पर आधारित रही, जिसका असर देश की संस्थाओं, अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ा।
उन्होंने TMC पर घुसपैठियों के समर्थन का आरोप लगाते हुए इसे देश के युवाओं, जनजातीय समुदाय और गरीबों के अधिकारों से जोड़कर देखा। इसके साथ ही उन्होंने UPA सरकार के दौरा की बैंकिंग व्यवस्था, सार्वजनिक उपक्रमों की हालत और किसानों की अनदेखी का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि NDA सरकार के दौरान हर क्षेत्र में तस्वीर बदली है।
घुसपैठियों की वकालत करने वाली TMC अपने गिरेबान में झाँके
प्रधानमंत्री ने बंगाल की ममता बनर्जी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “TMC ने बहुत कुछ कहा। जरा खुद को अपने गिरेबान में झाँके। निर्मम सरकार, पतन के जितने भी पैरामीटर हैं, उन सभी पैरामीटर में नए-नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। और यहाँ उपदेश दे रहे हैं। क्या हाल कर रखा है। ऐसी निर्मम सरकार से लोगों का भविष्य अंधकार में डूब रहा है। लेकिन उनको कोई परवाह नहीं है। सत्ता सुख के सिवाए कोई आकांक्षा नहीं है। और वे यहाँ उपदेश देते हैं।”
घुसपैठियों के मुद्दे पर पीएम मोदी ने कहा, “घुसपैठ… दुनिया का समृद्ध से समृद्ध देश अपने यहाँ गैर-कानूनी नागरिकों को बाहर निकाल रहा है। हमारे देश में घुसपैठियों को बचाने के लिए अदालतों पर प्रेशर डाला जा रहा है। मेरे देश का नौजवान ऐसे लोगों को माफ नहीं करेगा। जो घुसपैठियों को वकालत करने के लिए ताकत लगा रहे हैं और घुसपैठिए मेरे देश के नौजवानों का हक छीन रहे हैं…रोटी छीन रहे हैं..आदिवासियों की जमीन छीन रहे हैं। बेटे-बेटियों की जिंदगी पर खतरे पैदा हो रहे हैं। लेकिन उनके लिए महिलाओं पर अत्याचार होते रहे। सत्ता नीति के सिवाए कुछ करना नहीं है और यहाँ पर हमें उपदेश दे रहे हैं। ऐसी चिंताजनक स्थिति पर आँखें मूँदकर बैठे हैं।”
AAP नेता संजय सिंह को ‘ब्लैक’ पसंद, सत्ताभोगी कॉन्ग्रेस-TMC-DMK पर तंज
पीएम मोदी ने AAP नेता संजय सिंह पर निशाना साधते हुए कहा, “जिनकी पूरी सरकार शराब में डूब गई। जिनके शीशमहल घर-घर में नफरत का कारण बन गए। और शायद उनको ब्लैक शब्द ज्यादा पसंद है। पता नहीं ब्लैक के साथ उनका क्या पुराना रिश्ता है।”
पीएम ने आगे कहा, “ऐसे सभी साथियों से मैं कहूँगा, तुम कितना दुनिया को धोखा दोगे, आईना देख लिया तो अपनी सच्चाई कहाँ छिपाओगे। कॉन्ग्रेस हो, TMC हो, DMK हो… लेफ्ट हो। दशकों से केंद्र में सत्ता के भागीदार रहे हैं, राज्यों में भी सरकारें चलाई हैं। लेकिन उनकी पहचान क्या बनी। आज बिल की चर्चा होती है तब डील की चर्चा होती थी तो ‘Bofors डील’ की याद आती थी। उन्होंने सिर्फ जेब भरने का काम किया, नागरिकों के जीवन में बदलाव लाना। ये उनकी प्राथमिकता नहीं थी।”
UPA सरकार में तबाही की कगार पर थी बैंकिंग व्यवस्था
बैंकिंग सेक्टर की बदली तस्वीर पर बात करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “2014 से पहले फोन बैंकिंग सेक्टर का कालखंड था। गरीबों को बैंकों में दुत्कार मिलती थी। 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी बैंक तक नहीं देख पाई थी। कॉन्ग्रेस नेताओं के फोन पर कुछ लोगों को अरबो रुपए दे दिए गए। और जो ले जाते थे कुछ वो अपनी पर्सनल प्रॉपर्टी मानकर पैसे हजम कर जाते थे। कॉन्ग्रेस और UPA और INDI गठबंधन के राज में बैंकिंग व्यवस्था तबाही के कगार पर खड़ी थी।”
इस सेक्टर में NDA सरकार में सुधार पर पीएम मोदी ने कहा, “चुनौती बड़ी थी, लेकिन हमने समझदारी से काम लिया। रिफॉर्म किए… पारदर्शिता व्यवस्था बनाई। ढेर सारे बैंकिंग रिफॉर्म्स हुए और जो सरकारी बैंक दुर्बल हो गए थे। उनको हमने बड़ी बैंको के साथ Merge कर दिया। इन सारी चीजों का नतीजा ये हुआ कि बैंकों में जो बीमारी घर कर गई थी, उससे बैंकों को मुक्ति मिली। बैंकों का स्वास्थ्य सुधरा। लेन-देन का कारोबार बढ़ा। गरीबों को लोन मिले। पीएम ने सरकार की बैंकिंग से जुड़ी योजनाओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी।”
कॉन्ग्रेस ने PSU को अर्बन नक्सल की तरह मीटिंग कर किया गुमराह
पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग (PSUs) पर बात करते हुए पीएम ने कहा, “PSUs…आमतौर पर PSU को लेकर ये मान्यता बन चुकी थी कि वो बनते ही है बीमार होने के लिए, बर्बाद होने के लिए, बंद होने के लिए। हमने इस पूरी मानसिकता को हकीकतों के आधार पर बदलने में सफलता प्राप्त की। ये लोग (UPA सरकार) PSU को लेकर कितनी गलत फैलाते थे। अर्बन नक्सल की तरह मीटिंग कर गुमराह करने का काम करते थे। इन्होंने LIC, SBI और भी HAL हर एक को… भला-बुरा और भद्दे की तरीके से बर्बाद किया।”
NDA सरकार में हुए सुधार गिनाते हुए पीएम ने कहा, “हमने PSU में भी रिफॉर्म किए। आज LIC उत्तम परफॉर्म कर रही है। जिन PSU को कॉन्ग्रेस नेता ताला लगावाने वाले थे, अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने का काम किया। उन PSU रिकॉर्ड स्तर पर आगे हैं। वो ‘मेक इन इंडिया’ को गति दे रहे हैं। आज कुछ PSU विश्व की विकास यात्रा में भागीदार बन रहे हैं।”
कॉन्ग्रेस ने देश के अन्नदाता को भी नहीं छोड़ा
UPA सरकारों में हुए किसानों की दुर्दशा पर पीएम मोदी ने कहा, “कॉन्ग्रेस ने हमारे देश के अन्नदाता किसानों को भी नहीं छोड़ा। इस देश में 10 करोड़ किसान ऐसे है, जिनके पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है। उनकी तरफ कभी देखा नहीं गया। कॉन्ग्रेस के दिमाग में छोटे किसानों का कोई महत्व नहीं था।”
पीएम सम्मान निधि के बारे में पीएम मोदी ने कहा, “हमारे दिल में किसानों के प्रति दर्द था। इसीलिए पीएम सम्मान निधि योजना लेकर आए। कम समय में छोटे किसाने के बैंक अकाउंट में 4 लाख करोड़ रुपए दिए हैं। इससे छोटे किसानों को नए सपने देखने का सामर्थ्य मिला है।”
इंदिरा गाँधी ने खुद कॉन्ग्रेस के प्लानिंग कमीशन की धज्जियाँ उड़ाई
प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के भाषण का एक हिस्सा सुनाया, जिसमें इंदिरा गाँधी ने हिमाचल प्रदेश में जीप की जगह खच्चरों की आवश्यकता का जिक्र किया था लेकिन उस समय प्लानिंग कमीशन ने कहा था कि यह पॉलिसी नहीं है। इस पर पीएम मोदी ने कहा, “कॉन्ग्रेस के लंबे शासन में यह कार्यशैली रही है। इंदिरा गाँधी जानती भी थी इसे। लेकिन इस कार्यशैली को सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।”
पीएम मोदी ने आगे कहा, “इंदिरा गाँधी जिस प्लानिंग कमीशन की धज्जियाँ उड़ा रही थी, उसकी जन्मदाता उनके पिताजी थे। और प्लानिंग कमीशन को बने और इंदिरा गाँधी के इस भाषण में दो दशक बीत चुके थे। साल 2014 के बाद जब बीजेपी सरकार आई, तो प्लानिंग कमीशन को खत्म कर दिया और नीति आयोग बनाई। आज नीति आयोग बहुत तेजी से काम कर रहा है।”
नेहरू-इंदिरा औ कॉन्ग्रेस बिरादरी देशवासियों को समस्या समझती है
प्रधानमंत्री ने कॉन्ग्रेस को घेरते हुए कहा, “कॉन्ग्रेस और हमारी सोच में जमीन-आसमान का अंतर है। हमारी सोच है कि 140 करोड़ देशवासी, ये इतने सामर्थ्यवान है कि ये चुनौतियों को समाधान दे सकते हैं। ये हमारी सोच है। हमारा विश्वास है देशवासियों पर। लेकिन कॉन्ग्रेस देशवासियों को ही समस्या मानती है।”
पीएम मोदी ने इंदिरा गाँधी के भाषण का जिक्र करते हुए कहा, “देश के बारे में नेहरू और इंदिरा जी की सोच कैसी थी। इंदिरा जी ईरान गई थी, वहाँ भाषण में उन्होंने नेहरू जी के साथ बातचीत का जिक्र करते हुए कहा- जब किसी ने मेरे पिताजी से पूछा कि उनके सामने कितनी समस्याएँ है, तो नेहरू जी ने कहा कि 35 करोड़ (देश की जनसंख्या), आज देश की समस्या 57 करोड़ है इसीलिए मेरी भी समस्या उतनी ही है।”
इस पर पीएम मोदी ने कहा, “35 करोड़ देशवासी नेहरू जी को समस्या लगते थे। फिर इंदिरा जी को भी 57 करोड़ देशवासी समस्या लगते हैं। कोई होता है, जो देशवासियों को समस्या समझता हो। नेहरू जी हो या इंदिरा जी हो या पूरी कॉन्ग्रेस बिरादरी हो। ये लोग भारत के लोगों को समस्या मानते हैं। ऐसी सोच वाले लोग अपने परिवार का ही भला करेंगे, और किसका करेंगे। देश के लोगों का अपमान करते रहना कॉन्ग्रेस के स्वभाव में है, संस्कारों में है। “
कॉन्ग्रेस ने राष्ट्रपति का अपमान किया, संविधान शब्द बोलने का नहीं अधिकार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में राष्ट्रपति अभिभाषण पर विपक्ष के हंगामे पर कहा, “कॉन्ग्रेस ने बीते दिनों राष्ट्रपति का अपमान किया। चुनाव के बाद राष्ट्रपति के लिए जो शब्द कहे गए, शर्मिंदगी महसूस होती है कि ये कैसे लोग हैं, भारत की राष्ट्रपति के लिए क्या बोल रहे हैं। कल लोकसभा में भी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा नहीं हो पाई। ये राष्ट्रपति पद, उसका घोर अपमान किया है। उन लोगों को संविधान शब्द मुँह पर बोलने का भी अधिकार नहीं है।”
उन्होंने आगे कहा, “गरीबी से निकली हुई महिला। आदिवासी समाज से निकली महिला। आपने लोकसभा में जो अपमान किया, वो आपने आदिवासी समाज का अपमान किया है। आपने महिला का अपमान किया है। भारत के सर्वोच्च पद पर विराजमान, संविधान ने जिनको पद दिया, आपने संविधान का अपमान किया है।”
असम और पूरे नॉर्थ ईस्ट का कॉन्ग्रेस ने किया अपमान
बड़ी दर्दनाक लोकसभा की घटना है। और शायद हताशा-निराशा तो समझ सकते हैं। लेकिन इसके लिए देश के पवित्र लोकतंत्र के मंदिर को ही… उस समय चेयर पर असम के ही हमारे माननीय सांसद बैठे थे। उसम समय कागज फेंके गए। यह नॉर्थ ईस्ट का अपमान है। असम के नागरिकों का अपमान है। कल फिर किया। उस समय आंध्र के दलित परिवार का बेटा चेयर पर बैठा। उसका अपमान किया। सदन ने इनको काम दिया है, लेकिन वो दलित समाज से आते हैं, इसीलिए आप अपमान करते हो।
ऐसा लगता है कि कॉन्ग्रेस को असम की जनता के प्रति बड़ी नफरत है। जब भारत रत्न भूपेंद्र हजारी जी, नॉर्थ ईस्ट में वाणी से बाँधकर रखा था। हमने उन्हें भारत रत्न देने का निर्णय किया। इस पर भी इनको (कॉन्ग्रेस) को ऐतराज। खड़गे जी होते तो उनके हाजिरी में कहता मैं। उन्होंने वीडियो में जो कहा, वह अपमानति था। कहा ये तो सिंगर थे। ये लोग किसी का अपमान करने में कभी भी पीछे नहीं रहते हैं। उन्होंने भूपेंद्र हजारी का अपमान किया। ये असम का अपमान है, कला का अपमान है।
कॉन्ग्रेस के भीतर सिखों के प्रति नफरत
बीजेपी नेता रवनीत बिट्टू को राहुल गाँधी द्वारा ‘गद्दार’ कहे जाने पर प्रधानमंत्री मोदी का गुस्सा फूटा। पीएम ने कहा, “कॉन्ग्रेस के शातिर दिमाग वाले युवराज ने, एक नेता को गद्दार कह दिया। अहंकार कितना सातवें आसमान पर पहुँच चुका है। कॉन्ग्रेस के कितने टुकड़े हुए। कई लोग दूसरे दलों में गए लेकिन औरों को नहीं कहा गद्दार। कल सांसद को गद्दार इसीलिए कहा क्योंकि वो सिख थे। ये सिखों का अपमान था।”
पीएम ने आगे कहा, “कॉन्ग्रेस के अंदर कूट-कूटकर सिखों के प्रति नफरत भरी है, वो इसी का प्रदर्शन था। कॉन्ग्रेस को इसा जरा भी दर्द नहीं, वरना आज खड़े होकर वे खेद प्रकट कर सकते थे। लेकिन सिखों के प्रति उनके मन में जो नफरत भरी पड़ी है। ये वही था। उनका परिवार देश के लिए शहीद हुआ। ऐसे लोग कॉन्ग्रेस को नहीं डुबाएँगे तो और क्या करेंगे।”
सांसद सदानंद मास्टर पर भी पीएम मोदी ने कहा, “दूसरी तरफ सदानंद मास्टर जी का दृश्य है। राजनीति के कारण उनके दोनों पैर काट दिए गए। भरी जवानी में पैर काट दिए। लेकिन संस्कार इतने है कि वाणी में कभी अपशब्द नहीं निकलते।”
कॉन्ग्रेस ‘मोदी की कब्र खोदने’ के कार्यक्रम करवा रही
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “वैसे कॉन्ग्रेस के हमारे साथिया का मुझ पर जरा विशेष प्रेम है। और जब मैंने देश के लिए जीना सीखा है। हम विकसित भारत की जमीन मजबूत कर रहे हैं। एक तरफ देश के युवाओं के लिए जमीन मजबूत कर रहा हूँ, तो दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस मोदी की कब्र खोदने के कार्यक्रम करवा रही है। और मोहब्बत की दुकान खोलने वाले मोदी तेरी कब्र खुदेगी के नारे लगा रहे हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “ये कौन-सी मोहब्बत की दुकान है, जो देश के नागरिक के कब्र खोदने के सपने देखती हो। ये कौन-से संविधान से उनसे सीखा है। क्या ये संविधान का अपमान नहीं है… क्या ये मानवता का अपमान नहीं है… लेकिन उनका इसका कोई खेद नहीं है। इसके बाद बयान देंगे कि देखो प्रधानमंत्री राज्यसभा में भी रो रहा था। किस प्रकार के संस्कार से पले-बढ़े लोग हैं ये। पिछले 25 साल से संसद का एक भी सत्र ऐसा नहीं गया, जिसमें इस सदन के अंदर मोदी को गाली देने का काम न किया हो इन लोगों ने। मेरे स्वास्थ्य का राज है कि मैं रोज दो किलो गाली खाता हूँ।”
कॉन्ग्रेस ने प्रधानमंत्री पद को परिवार की जागीर समझा
पीएम ने कहा, “मोदी की कब्र खुदेगी सिर्फ नारा नहीं है। इनके भीतर नफरत का प्रतिबिंब है… अभिवय्क्ति है। क्योंकि हमने 370 की दीवार गिरा दी। इसीलिए मोदी की कब्र खोदना चाहते हैं। हमने नॉर्थ ईस्ट में बम-बंदूक और आतंक का जो छाया बना रहता था। वहाँ शांति और विकास की राह अपनाई। इसीलिए कब्र खोदना चाहते हैं। पाकिस्तानी आतंकियों को घर में घुसकर जवाब देते हैं, इसीलिए कब्र खोदना चाहते हैं। ऑपरेशन सिंदूर करते हैं, इसीलिए वो मोदी की कब्र खोदते हैं। माओवादी आतंक से देश को मुक्ति दिला रहे हैं, इसीलिए मोदी की कब्र खोदना चाहते हैं।”
पू्र्व पीएम जवाहर लाल नेहरू पर निशाना साधते हुए पीएम मोदी ने कहा, “नेहरू जी ने देश के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया था। सिंदु जल समझौता करके। उस सिंधु जल समझौते को हमने साइड में डाल दिया क्या इसीलिए आप मोदी की कब्र खोदने के नारे लगा रहे हो। कॉन्ग्रेस पचा नहीं पा रही कि मोदी यहाँ तक पहुँचा कैसे। उनकी परेशानी बढ़ती जा रही है कि पहुँचा तो पहुँचा लेकिने अब तक टिका कैसे है। इसीलिए उन्हे एक ही रास्ता दिख रहा है कि ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी।”
पीएम ने आगे कहा, “ये तो मानकर बैठे थे.. इनका लोकतंत्र संविधान से कोई लेना-देना नहीं। उन्हें लगता है कि प्रधानमंत्री पद इनके परिवार की जागीर है। दूसरा कोई और बैठ नहीं सकता। ये जो इनके भीतर नफरत भरी है, मोहब्बत की दुकान भरी हुई है। ये उसका परिणाम है। इसीलिए कोई क्यों बैठा सोचते हैं और सोचते हैं कि ये तो उनका पैतृक अधिकार था। इसीलिए मोदी की कब्र खोदना चाहते हैं।”
पीएम मोदी ने कहा- 140 करोड़ देशवासी मेरा रिमोट
प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा, “कॉन्ग्रेस को देश ने दशकों तक अवसर दिया है। देश ने आपके लिए भी अपना भविष्य दाँव पर लगाया था। आपने गरीबी हटाओ के नारे लगाए, गुमराह किया। लाल किले से हर प्रधानमंत्री के भाषण में गरीबी हटाने की बात कही गई, लेकिन कुछ नहीं किया गया। लेकिन मोदी ने गरीब को सशक्त करने के लिए कदम उठाया। मैं देश के गरीबों को सलाम करता हूँ। उन्होंने देश की योजनाओं को समझा और स्वीकारा।”
उन्होंने आगे कहा, “इनकी सरकार रिमोट से चलती थी। मेरी सरकार भी रिमोट से चलती है। 140 करोड़ देशवासी मेरा रिमोट हैं। 140 करोड़ देशवासियों की आकांक्षाएँ, देश के नौजवानों के संकल्प.. इनके लिए हम जीते हैं। इनके लिए सरकार चलाते हैं। सत्ता हमारे लिए सुख का रास्ता नहीं है, सेवा का माध्यम है।”
कॉन्ग्रेस ने महात्मा गाँधी का चुराया सरनेम, विकसित भारत 2047 पर सवाल उठाने वाले ‘निराशावादी’
पीएम मोदी ने कॉन्ग्रेस को घेरते हुए कहा, “चोरी करना जिनका पुश्तैनी धँधा है। जिन्होंने एक गुजराती का सरनेम भी चुरा लिया। महात्मा गाँधी का सरनेम चुरा लिया। देश की जनता ऐसे लोगों को खूब पटक भी देती है।”
विकसित भारत 2047 अभियान पर सवाल उठाने वाली कॉन्ग्रेस पर पीएम मोदी ने कहा, “कुछ हमारे साथी इतने निऱाशावादी लोग, बदलती हुई दुनिया से अभिग्य लोग कहते हैं कि मोदी क्या बोल रहा है। 2047 किसने देखा है। जो फाँसी पर चढ़ जाते थे, जो लाठी खाते थे, जो काला पानी की सजा में अंडमान निकोबार की सेलुलर जेल में जीवन बिताते थे, पढ़ाई छोड़ देते थे। अगर वो सोचते कि हमारे कालखंड में तो आजादी मिलेगी नहीं तो मैं क्यों कुछ करूँ। ये (कॉन्ग्रेस) इतने निराशावादी लोग हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “जब मैं डिजिटल इंडिया की बात करता था… UPI की बात करता था। तब ये लोग कहते थे कि गरीब आदमी फोन पर कैसे काम करेगा। 3 साल के भीतर ही देश ने दिखा दिया कि ये हो सकता है। मैं हैरान था ये देखकर। इकोसिस्टम को जवाब मिल गया। जब हाथ में फोन लेकर UPI चलता है न, तो जवाब अपनेआप मिल जाता है।”
भारत के शहरी परिवहन सेक्टर में इस समय एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है। एक तरफ सरकार समर्थित भारत टैक्सी ऐप का लॉन्च हुआ है, तो दूसरी ओर ओला, उबर और रैपिडो से जुड़े ड्राइवरों ने शनिवार (7 फरवरी 2026) को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान कर दिया है।
यह स्थिति यात्रियों, ड्राइवरों और डिजिटल ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री के लिए एक अहम मोड़ साबित हो सकती है। ड्राइवर अपनी आय और किराया नीति को लेकर नाराज हैं, जबकि सरकार ड्राइवर-फ्रेंडली मॉडल को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
भारत टैक्सी ऐप क्या है?
भारत टैक्सी भारत का पहला सहकारी (को-ऑपरेटिव) राइड-हेलिंग ऐप है, जिसे केंद्र सरकार के सहयोग से लॉन्च किया गया है और इसका उद्घाटन केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने किया।
यह ऐप दिल्ली और गुजरात के कुछ शहरों में शुरू हो चुका है और आगे चलकर पूरे देश में विस्तार करने की योजना है। भारत टैक्सी का मुख्य उद्देश्य निजी कंपनियों जैसे ओला और उबर के मुकाबले एक भारतीय, पारदर्शी और ड्राइवर-केंद्रित विकल्प देना है, जिसमें ड्राइवरों से कोई कमीशन नहीं लिया जाएगा और उन्हें हर राइड की 100% कमाई मिलेगी।
इस प्लेटफॉर्म पर पीक ऑवर्स में सर्ज प्राइसिंग लागू नहीं होगी, जिससे यात्रियों को किफायती और स्थिर किराया मिलेगा। साथ ही, ड्राइवरों को एक्सीडेंटल और हेल्थ इंश्योरेंस, रिटायरमेंट सेविंग्स, सपोर्ट सिस्टम और शेयर सर्टिफिकेट जैसी सुविधाएँ दी जाएँगी, जिससे वे सिर्फ सेवा प्रदाता नहीं बल्कि इस प्लेटफॉर्म के हिस्सेदार भी बनेंगे।
ओला, उबर और रैपिडो ड्राइवर क्यों कर रहे हड़ताल
देशभर में ओला, उबर और रैपिडो से जुड़े कैब, ऑटो और बाइक टैक्सी ड्राइवर शनिवार (7 फरवरी 2026) को देशव्यापी हड़ताल पर रहेंगे। इस विरोध को ‘ऑल इंडिया ब्रेकडाउन’ नाम दिया गया है, जिसका नेतृत्व तेलंगाना गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन (TGPWU) कर रही है और इसे कई राष्ट्रीय श्रमिक संगठनों का समर्थन मिला है।
इस हड़ताल के दौरान ड्राइवर लगभग 6 घंटे तक अपने ऐप्स से लॉग-ऑफ रहेंगे, खासकर सुबह और शाम के पीक टाइम में, जिससे यात्रियों को कैब, ऑटो और बाइक टैक्सी बुक करने में भारी परेशानी हो सकती है।
App-based transport workers across India will observe an All India Breakdown on 7 Feb 26. No minimum fares. No regulation. Endless exploitation.
Govt must act NOW.
Millions of app-based drivers are pushed into poverty while aggregators profit.
— Telangana Gig and Platform Workers Union (@TGPWU) February 4, 2026
ड्राइवरों की हड़ताल की मुख्य वजह कम होती कमाई, मनमाना किराया, बढ़ता खर्च और काम की असुरक्षित स्थिति है। यूनियन का आरोप है कि ओला, उबर, रैपिडो, पोर्टर और अन्य एग्रीगेटर कंपनियाँ मोटर वाहन एग्रीगेटर दिशानिर्देश, 2025 के बावजूद किराया अपनी मर्जी से तय कर रही हैं और न्यूनतम बेस फेयर लागू नहीं कर रहीं। इससे ड्राइवरों की आय अस्थिर हो गई है और कई ड्राइवर आर्थिक संकट और गरीबी की ओर धकेले जा रहे हैं, जबकि प्लेटफॉर्म कंपनियाँ मुनाफा कमाना जारी रखे हुए हैं।
यूनियन का कहना है कि कंपनियों को दिए गए Clause 17.3 के तहत बेस फेयर को 50% तक घटाने की अनुमति ड्राइवरों के लिए बेहद नुकसानदेह है, इसलिए इस प्रावधान को हटाया जाना चाहिए।
ड्राइवरों का आरोप है कि किराया लगातार कम किया जा रहा है, जबकि ईंधन की कीमतें, वाहन मेंटेनेंस, लोन की EMI, बीमा और अन्य खर्च बढ़ते जा रहे हैं, जिससे मेहनत के बावजूद ड्राइवरों के हाथ में बहुत कम पैसा बचता है।
ड्राइवर सरकार से माँग कर रहे हैं कि ऐप-आधारित टैक्सी सेवाओं (जैसे ओला-उबर) के लिए न्यूनतम किराया तय किया जाए, ताकि उन्हें कम पैसे में काम न करना पड़े। वे चाहते हैं कि किराया नीति साफ, समझने में आसान और पारदर्शी हो और किराया तय करने से पहले ड्राइवर यूनियनों की राय ली जाए।
इसके अलावा, यूनियन की माँग है कि प्राइवेट गाड़ियों का कमर्शियल इस्तेमाल रोका जाए या फिर ऐसी गाड़ियों को कमर्शियल कैटेगरी में बदला जाए, ताकि मोटर व्हीकल एक्ट और एग्रीगेटर गाइडलाइंस 2025 के नियमों का सही तरीके से पालन हो सके।
ड्राइवर चाहते हैं कि उन्हें बेहतर काम की सुविधाएँ, सामाजिक सुरक्षा, बीमा, पेंशन और स्थिर आमदनी मिले। उनका कहना है कि अभी गिग वर्कर्स (ऐप पर काम करने वाले ड्राइवर) को न तो तय सैलरी मिलती है और न ही स्थायी सुरक्षा, जिससे उनका भविष्य असुरक्षित रहता है।
इकोनॉमिक सर्वे 2025–26 के अनुसार, भारत में गिग वर्कर्स की संख्या बढ़कर 1.2 करोड़ हो गई है, लेकिन करीब 40% गिग वर्कर्स महीने में ₹15,000 से भी कम कमाते हैं। इससे साफ पता चलता है कि इस सेक्टर में आय की अस्थिरता एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
FASTag और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) से जुड़ाव
मुख्य रूप से ऐप-आधारित
मुख्य उद्देश्य
ड्राइवर-फ्रेंडली और न्यायपूर्ण व्यवस्था
मुनाफा-केंद्रित
‘भारत टैक्सी’ को लेकर बढ़ा लोगों का विश्वास
देश में कैब सेवाओं को लेकर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। एक तरफ ओला, उबर और रैपिडो के ड्राइवर हड़ताल कर रहे हैं, जिससे लोगों को सफर करने में परेशानी हो सकती है। वहीं दूसरी तरफ ‘भारत टैक्सी’ एक अच्छा और भरोसेमंद विकल्प बनकर सामने आई है।
भारत टैक्सी को इस तरह बनाया गया है कि यात्रियों को सस्ता, सुरक्षित और साफ-साफ किराया मिले। इसमें सर्ज प्राइसिंग नहीं होती, यानी ट्रैफिक या भीड़ के समय किराया अचानक नहीं बढ़ेगा। यात्रा बुक करने से पहले ही पूरा किराया दिख जाता है, जिससे लोगों को यह भरोसा रहता है कि बाद में कोई छुपा हुआ चार्ज नहीं लगेगा।
इस ऐप की सबसे खास बात यह है कि यहाँ ड्राइवर सिर्फ कर्मचारी नहीं, बल्कि प्लेटफॉर्म के हिस्सेदार होते हैं। ड्राइवरों को राइड का पूरा किराया मिलता है, जिससे उनकी कमाई बेहतर होती है। भारत टैक्सी एक सरकार समर्थित भारतीय प्लेटफॉर्म है, जो ओला और उबर जैसी कंपनियों की जगह एक मजबूत विकल्प बन सकती है।
राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के रावला थाना क्षेत्र में खौफनाक हत्या का मामला सामने आया है। यहाँ शादी के महज तीन महीने बाद एक पत्नी ने अपने ही पति को मौत के घाट उतारने की ऐसी साजिश रची, जिसे जानकर हर कोई सन्न रह गया। यह हत्या अचानक नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे महीनों से की जा रही सोची-समझी प्लानिंग थी।
इस हत्या की प्लानिंग इंदौर के राजा रघुवंशी हत्याकांड की तरह थी, जहाँ राजा की पत्नी सोनम रघुवंशी ने प्रेमी राज के साथ मिलकर हत्या की योजना बनाई थी और घुमाने के नाम पर मौत के घाट उतार दिया था।
7 साल का प्रेम संबंध, जिसे परिवार भी जानता था
सादुलशहर निवासी अर्जु उर्फ अंजली (23) और संजय उर्फ संजू (25) पिछले करीब 6 से 7 साल से एक-दूसरे के प्रेम संबंध में थे। दोनों श्रीगंगानगर के एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। पढ़ाई के दौरान दोस्ती हुई, जो धीरे-धीरे प्यार में बदल गई। दोनों अक्सर मिलते-जुलते रहते थे और एक-दूसरे के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं करते थे।
इस रिश्ते की जानकारी अंजली के परिजनों को भी थी, लेकिन सामाजिक दबाव, पारिवारिक प्रतिष्ठा और अन्य कारणों से उन्होंने अंजली की शादी रावला निवासी आशीष कुमार (27) से कर दी। आशीष पढ़ा-लिखा युवक था, जिसने Msc कर रखी थी और हाल ही में एक निजी स्कूल में शिक्षक के पद पर नौकरी शुरू की थी।
30 अक्टूबर 2025 को अंजली और आशीष की शादी हुई। लेकिन यह शादी अंजली की मर्जी से नहीं थी। शादी के बाद भी उसका मन अपने प्रेमी संजय में ही अटका रहा। वहीं संजय भी इस शादी से बेहद परेशान था और लगातार अंजली के संपर्क में बना हुआ था।
शादी के बाद बढ़ता तनाव और पढ़ाई का बहाना
शादी के बाद अंजली ससुराल में खुश नहीं थी। उसे लगने लगा कि अब वह संजय से दूर हो गई है और शायद दोबारा कभी उसके साथ नहीं रह पाएगी। इसी बेचैनी में उसने श्रीगंगानगर में MA की पढ़ाई करने का बहाना बनाया और पति आशीष से वहाँ जाकर रहने की इजाजत माँगी। अंजली की योजना पढ़ाई के नाम पर संजय के साथ दोबारा नजदीकी बढ़ाना।
लेकिन आशीष ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। उसने साफ कह दिया कि वह अकेले किसी दूसरे शहर में रहने की अनुमति नहीं देगा। आशीष के इस इनकार को अंजली ने प्रेम संबंध के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट मान लिया। इसी नाराजगी को उसने संजय के साथ साझा किया और यहीं से एक खौफनाक साजिश की नींव पड़ी।
मायके में बनी मौत की योजना
हत्या से करीब 16 दिन पहले अंजली मायके गई। परिजनों को लगा कि वह कुछ दिन आराम करने और घरवालों से मिलने आई है, लेकिन असल में वह संजय से मिलने और आगे की योजना बनाने गई थी। इसी दौरान अंजली और संजय ने आशीष को रास्ते से हटाने का पूरा प्लान तैयार किया।
उन्होंने तय किया कि हत्या ऐसी जगह की जाएगी, जहाँ कोई गवाह न हो और बाद में उसे सड़क हादसा या लूट का रूप दिया जा सके। उन्होंने जगह, समय, हथियार और भागने के रास्ते तक की पूरी रूपरेखा बनाई। संजय ने अपने दो दोस्तों, रोहित उर्फ रॉकी और बादल उर्फ सिद्धार्थ को भी इस साजिश में शामिल कर लिया।
30 जनवरी की रात को घूमने के लिए ले गई बाहर
30 जनवरी 2026 की रात अंजली रोज की तरह आशीष के साथ खाना खाने के बाद उसे घूमने के लिए बाहर ले गई। आशीष को जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह उसकी जिंदगी की आखिरी सैर होगी। अंजली उसे गाँव से बाहर एक सुनसान सड़क पर ले गई।
वहीं झाड़ियों में पहले से संजय अपने दोनों साथियों के साथ छिपा हुआ था। जैसे ही अंजली ने इशारा किया, तीनों आरोपित अचानक बाहर निकले और आशीष पर डंडों से ताबड़तोड़ हमला कर दिया। आशीष जमीन पर गिर पड़ा, लेकिन उसकी सांसें अभी चल रही थीं।
यह देखकर आरोपितों ने उसके गले में मफलर डालकर पूरी ताकत से गला घोंट दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। यह पूरी वारदात कुछ ही मिनटों में अंजाम दे दी गई, लेकिन इसके पीछे की योजना कई दिनों से तैयार की जा रही थी।
हत्या के बाद गढ़ी हादसे और लूट की कहानी
हत्या के बाद अंजली ने खुद अपने कानों के झुमके और आशीष का मोबाइल फोन आरोपितों को दे दिया, ताकि मामला लूट जैसा लगे। योजना यह थी कि पुलिस को लगे कि किसी अज्ञात वाहन की टक्कर या लूट के दौरान आशीष की मौत हुई है।
अंजली खुद सड़क पर बेहोशी का नाटक करती हुई लेट गई। कुछ देर बाद परिजनों और पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस मौके पर पहुँची और दोनों को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने आशीष को मृत घोषित कर दिया। शुरुआत में पुलिस ने मामला सड़क दुर्घटना मानकर जाँच शुरू की, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने पूरी कहानी पलट दी।
पोस्टमॉर्टम और तकनीकी जाँच से खुली साजिश
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में आशीष के सिर पर गंभीर चोटों और गले पर दबाव के स्पष्ट निशान मिले। डॉक्टरों ने साफ कहा कि यह सामान्य सड़क हादसा नहीं, बल्कि बेरहमी से की गई हत्या है। इसके बाद पुलिस ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड, मोबाइल लोकेशन और एफएसएल जाँच शुरू की।
जाँच में सामने आया कि घटना से पहले और बाद में अंजली और संजय के बीच लगातार बातचीत हो रही थी। मोबाइल लोकेशन भी घटनास्थल के आसपास मिली। सख्ती से पूछताछ करने पर अंजली टूट गई और पूरी साजिश का खुलासा हो गया। पुलिस ने इस मामले में अंजली, उसके प्रेमी संजय और उसके दोनों साथी रोहित और बादल को गिरफ्तार कर लिया है।
तीनों युवकों को 5 दिन की और अंजली को 2 दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा गया है। पुलिस अब यह भी जाँच कर रही है कि क्या इस साजिश में कोई और व्यक्ति शामिल था, हत्या के लिए हथियार कहाँ से लाए गए और योजना कितने समय से बनाई जा रही थी।
भारत दुनिया में सड़क दुर्घटनाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित देश है। राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) कुल सड़क नेटवर्क का केवल 2.3% हैं, लेकिन यहाँ होने वाली मौतें देश की कुल सड़क हादसों में हुई मौतों का 36% से ज्यादा होती हैं। हालाँकि वर्ष 2025 में पहली बार तीन साल की बढ़ती प्रवृत्ति टूटी और एनएच पर दुर्घटनाएँ तथा मौतें दोनों 11% से अधिक घटीं।
सड़क परिवहन एवँ राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के लोकसभा में पेश आँकड़ों के अनुसार, 2025 में एनएच पर 1,34,307 दुर्घटनाएँ हुईं और 57,482 लोगों की जान गई, जो 2024 के 1,50,958 दुर्घटनाओं और 64,772 मौतों से काफी कम है।
इस ऐतिहासिक कमी में उत्तर प्रदेश का योगदान सबसे बड़ा रहा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य ने 2017 से ही सड़क सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। चाहे राष्ट्रीय राजमार्ग हों या राज्य की सड़कें, गुणवत्ता सुधार, इंजीनियरिंग में सुधार, सख्त प्रवर्तन और त्वरित आपात सहायता… सब पर लगातार काम हुआ। परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश में एनएच पर मौतें 2024 के 9,560 से घटकर 2025 में 6,973 रह गईं यानी 2,587 जानें बचीं। यह देश में सबसे बड़ी गिरावट है।
साल 2025 के आँकड़ों में यूपी ने की सुधारों की अगुवाई
MoRTH के प्रोविजनल आँकड़े (eDAR पोर्टल पर राज्यों से प्राप्त जानकारी पर आधारित) स्पष्ट दिखाते हैं कि 2025 में एनएच पर कुल दुर्घटनाएँ 16,651 और मौतें 7,290 कम हुईं। इस कमी का नेतृत्व इन पाँच राज्यों ने किया- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना। इनमें से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश ने अकेले 6,072 मौतों की कमी में योगदान दिया।
राज्यवार प्रमुख आँकड़े-
उत्तर प्रदेश: मौतें 9,560 से 6,973 (2,587 कम)
मध्य प्रदेश: मौतें 4,644 से 2,882 (1,762 कम)
पंजाब, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना ने भी उल्लेखनीय सुधार दिखाया।
वहीं कुछ राज्यों में वृद्धि हुई
गुजरात: दुर्घटनाएँ 3,519 से 3,944, मौतें 2,192 से 2,380
झारखंड: दुर्घटनाएँ 2,039 से 2,056, मौतें 1,686 से 1,783
उत्तराखंड: दुर्घटनाएँ 828 से 875, मौतें 543 से 605
दिल्ली: दुर्घटनाएँ 593 से 1,827 (बड़ी बढ़ोतरी)
सड़क दुर्घटना के मामले में यूपी में सबसे ज्यादा सुधार
ये आँकड़े साबित करते हैं कि जहाँ कुछ राज्य पीछे रहे, वहीं उत्तर प्रदेश ने सबसे प्रभावी और व्यवस्थित सुधार किया। यह संयोग नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दूरदर्शी नीतियों और सख्त निगरानी का परिणाम है।
योगी सरकार की नीतियों से आया सुधार
उत्तर प्रदेश में 2025 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर मौतें 9,560 से घटकर 6,973 हो गईं। यह देश में सबसे बड़ी कमी है। यह संयोग नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लगातार सख्ती और बहुआयामी रणनीति का नतीजा है। सरकार बनने के बाद से ही सड़क सुरक्षा को ‘सामाजिक चुनौती’ मानते हुए 4E मॉडल (Education, Enforcement, Engineering, Emergency Care) पर जोर दिया गया है।
यूपी में BJP सरकार बनते ही सड़क सुरक्षा को प्राथमिकता
योगी आदित्यनाथ ने 18 मार्च 2017 को पहली बार मुख्यमंत्री बनते ही सड़क गुणवत्ता और सुरक्षा पर सख्त निर्देश दिए थे। 25 मार्च 2017 को उन्होंने आदेश दिया कि ढाई महीने (जून 2017 तक) में पूरे प्रदेश की सड़कों को गड्ढामुक्त किया जाए। यह अभियान इतना गंभीर था कि अधिकारियों को व्यक्तिगत जिम्मेदारी सौंपी गई और समय-समय पर समीक्षा की गई।
इस शुरुआती कदम ने आधार तैयार किया। गड्ढों से होने वाली दुर्घटनाएँ उत्तर प्रदेश में बहुत आम थीं। गड्ढामुक्त सड़क अभियान ने न केवल सड़कों की गुणवत्ता सुधारी, बल्कि लोगों में विश्वास भी जगाया कि सरकार सड़क सुरक्षा को गंभीरता से ले रही है।
साल 2017 के बाद गड्ढामुक्त अभियान रुका नहीं। हर साल, खासकर त्योहारों से पहले, मुख्यमंत्री ने सख्त निर्देश दिए। सितंबर 2025 में फिर चेतावनी दी गई कि त्योहारों से पहले सभी शहरों और गाँवों की सड़कें गड्ढामुक्त होंगी। नगर निगमों, पीडब्ल्यूडी और ग्राम विकास विभाग को जवाबदेह बनाया गया।
दरअसल, खराब सड़कें दुर्घटनाओं का बड़ा कारण होती हैं, जिसमें वाहन फिसलना, टायर फटना, अचानक ब्रेक लगाने से जुड़ी घटनाएँ आम हो जाती है। ऐसे में योगी सरकार ने गड्ढा मुक्त अभियान को नियमित बना दिया है। सड़कों की गुणवत्ता में सुधार से न केवल एनएच, बल्कि राज्य राजमार्ग और ग्रामीण सड़कों पर भी दुर्घटनाएँ घटीं। यह योगी सरकार की वह नीति है जो लंबे समय तक असर दिखाती है।
कोहरे में सड़क सुरक्षा को लेकर सख्त निर्देश
उत्तर प्रदेश में सर्दियों में घना कोहरा दुर्घटनाओं का बड़ा कारण बनता है। दिसंबर 2025 में यमुना एक्सप्रेसवे पर मथुरा में हुए भीषण हादसे (13 मौतें) के बाद मुख्यमंत्री योगी ने तुरंत समीक्षा की और कड़े कदम उठाए।
एक्सप्रेसवे पर गश्त बढ़ाना, ब्लैक स्पॉट्स पर टीम तैनात करना
रिफ्लेक्टर्स लगाना, 24×7 क्रेन और एम्बुलेंस उपलब्ध कराना
कोहरे में स्पीड लिमिट 120 किमी/घंटा से घटाकर 80 किमी/घंटा करने का प्रस्ताव
टू-व्हीलर सवारों के लिए टोल प्लाजा पर रुकने की व्यवस्था, कंबल और बुनियादी सुविधाएं
टोल प्लाजा पर पब्लिक एड्रेस सिस्टम से रियल-टाइम सूचना
सुरक्षा दिशानिर्देशों वाले पर्चे बाँटना, हेल्पलाइन नंबर 14449 का प्रचार
सड़क पर पार्किंग पूरी तरह प्रतिबंधित
स्ट्रीट लाइटिंग की निरंतर जाँच, खराब लाइट तुरंत ठीक करना
ये उपाय यमुना, आगरा-लखनऊ, पूर्वांचल, बुंदेलखंड और गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे पर लागू किए गए। परिणामस्वरूप कोहरे में होने वाली रियर-एंड टक्करें काफी कम हुईं। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि कोई व्यक्ति खुले में सोता न मिले और बेघरों के लिए रैन बसेलर और अलाव की व्यवस्था हो। यह मानवीय दृष्टिकोण भी योगी सरकार की विशेषता है।
AI आधारित रोड सेफ्टी प्रोजेक्ट लागू करने वाला देश का पहला राज्य
अगस्त 2025 में उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य बना जिसे केंद्र सरकार से AI आधारित सड़क सुरक्षा पायलट प्रोजेक्ट लागू करने की मंजूरी मिली। इसके लिए 2025-26 के बजट में 10 करोड़ रुपये रखे गए। जिसमें-
ITI लिमिटेड और mLogica के साथ सहयोग
दुर्घटना, वाहन, मौसम, सड़क विशेषताएँ और ड्राइवर प्रोफाइल का डेटा एनालिसिस
AI मॉडल से दुर्घटना के कारण पहचानना और भविष्य में रोकथाम
रियल-टाइम डेटा से नीति निर्माण
6 सप्ताह का पायलट प्रोजेक्ट, फिर केंद्र को विस्तृत रिपोर्ट
यह तकनीकी कदम दिखाता है कि योगी सरकार पारंपरिक उपायों के साथ-साथ आधुनिक तकनीक भी अपनाने में सबसे आगे है। AI से दुर्घटनाओं के बारे में पहले से अंदाजा लगाकर उन्हें पहले ही रोका जा सकता है, यह योगी सरकार की दूरदर्शिता का प्रमाण है।
जनवरी को घोषित किया ‘सड़क सुरक्षा माह’
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 21 दिसंबर 2025 को निर्देश दिया कि जनवरी 2026 को पूरे राज्य में ‘सड़क सुरक्षा माह’ मनाया जाए। 4E मॉडल पर आधारित यह अभियान जन आंदोलन बने, इसके लिए विशेष निर्देश दिए गए-
पहला सप्ताह: जागरूकता, तहसील से जिला स्तर तक प्रचार
वास्तविक दुर्घटना केस स्टडी का उपयोग
NSS, NCC, डिजास्टर मित्र, स्काउट्स-गाइड्स की भागीदारी
बार-बार नियम तोड़ने वालों के लाइसेंस जब्त करना, वाहन जब्त करना
ब्लैक स्पॉट्स की स्थायी मरम्मत, रोड सेफ्टी ऑडिट
केवल टेबल-टॉप स्पीड ब्रेकर
एम्बुलेंस, स्कूल वाहन, भारी वाहनों की फिटनेस जांच
300 किमी से अधिक दूरी के लिए दो ड्राइवर अनिवार्य
गोल्डन ऑवर पर जोर, 108 और ALS एम्बुलेंस का रिस्पॉन्स टाइम कम करना
अवैध पार्किंग, अतिक्रमण पर सख्ती
शराब की दुकानों को स्कूल-कॉलेज से दूर रखना
नवंबर 2025 तक राज्य में 46,223 दुर्घटनाओं और 24,776 मौतों की जानकारी सामने आने पर योगी आदित्यनाथ बेहद गंभीर हो गए। उन्होंने इसे ‘पूरे परिवार का आजीवन दर्द’ बताते हुए बेहद कड़े मापदंडों को अपनाने का आदेश दिया, ताकि सड़क दुर्घटनाओं पर कड़ाई से लगाम लगाई जा सके।
एक मॉडल राज्य की दिशा में बढ़े यूपी के कदम
उत्तर प्रदेश ने 2025 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर सबसे बड़ी गिरावट दर्ज कर साबित किया कि दृढ़ इच्छाशक्ति और बहुआयामी रणनीति से सड़क सुरक्षा में क्रांतिकारी बदलाव संभव है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2017 से लेकर 2025 तक हर मौसम, हर चुनौती के लिए त्वरित और सख्त कदम उठाए। कोहरे में विशेष उपाय, AI तकनीक, जन आंदोलन, गड्ढामुक्त अभियान और 4E मॉडल का संतुलित क्रियान्वयन… ये सभी कदम मिलकर उत्तर प्रदेश को सड़क सुरक्षा में मॉडल राज्य बना रहे हैं।
यह प्रयास केवल आँकड़ों में कमी नहीं, बल्कि हजारों परिवारों को आजीवन दर्द से बचाने की दिशा में एक मानवीय पहल है। अन्य राज्य भी उत्तर प्रदेश के इन कदमों से प्रेरणा ले सकते हैं।
भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील में डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया। यद्यपि टैरिफ में यह कमी अस्थायी है, तथापि यह ट्रेड डील भारत को एक नई राह पर लेकर जायेगी। जिससे भारत आर्थिक चुनौतियां एवं संकट धीरे-धीरे समाप्त होती चली जायेंगी। यह टैरिफ छूट भारत को व्यापारिक गतिविधियों में सकारात्मक दिशा की ओर ले जायेगी। भारत वर्तमान में दुनिया की एक बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसमें अपार संभावनाएँ हैं। जहाँ बहुत बड़ी आबादी प्रौढ़ है और श्रम केंद्रित है।
उनके श्रम से भारत की अर्थव्यवस्था गति पकड़ेगी। अमेरिका के साथ यह ट्रेड डील भारत को विकसित देश बनाने के क्रम में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस तरह के बड़े निर्णय भारत को 2047 से पहले ही विकसित भारत के सपने को साकार रूप प्रदान कर सकते हैं।
दरअसल टैरिफ अंतराष्ट्रीय व्यापार में लगने वाला कर है। इसे निर्यात कर भी कहते हैं। अभी कुछ महीने पहले ट्रंप के टैरिफ बढाये जाने पर विपक्षी नेता यह कहते हुए नहीं थक रहे थे कि भारतीय अर्थव्यवस्था दम तोड़ चुकी है। परंतु प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें किसी प्रकार कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और आज जिस रूप में सभी को प्रतिक्रिया मिली है, उससे विपक्ष को दाँतो तले चने चबाने पड़ रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने धैर्य पूर्वक काम करते हुए अपने विपक्षियों को जवाब दिया है और यह बताया कि वैचारिक असहमति तो चलती रहेंगी, राष्ट्रहित पहले है। आज पूरी दुनिया भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष माननीय मोदी जी की कूटनीति की प्रशसंक हैं।
विपक्ष यह आरोप लगाता रहता है कि मोदी काल में अर्थव्यवस्था दर घट रही है, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। सभी राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय आँकड़े यह बता रहे हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था दर लगातार वृद्धि कर रही है। कई संस्थाओं की रिपोर्ट आप देखेंगे तो स्वत: आपको यह ज्ञात होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था किस रूप से आगे की ओर अग्रसर है।
इंडियन इकोनॉमी की फिटनेस रिपोर्ट
वर्ष
WB GDP
IMF GD
ADB GDP
2014
7.4%
7.4%
7.4%
2020
-6.6%
-6.6%
-6.6%
2025
6.3%
6.5%
7.2%
2026
6.6%
6.5%
6. 7%
भारत की GDP विकास दर पर जिस भी रूप में विपक्षी दल प्रश्न चिन्ह लगा रहे थे, यह टैरिफ छूट उन्हें करारा जवाब देता है। भारतीय अर्थव्यवस्था निरंतर प्रगतिशील है लेकिन विपक्ष केवल आलोचना करने के लिए सकारत्मक प्रयास को नकारात्मक दृष्टि के अनुरूप देखता है और उसमें कमियाँ खोजने का असफल प्रयास करता है।
व्यापार समझौते के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ने एक्स पर एक पोस्ट किया, “आज सुबह भारत के प्रधानमंत्री मोदी से बात करके मुझे बहुत सम्मान महसूस हुआ। वह मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में से एक हैं, और अपने देश के एक शक्तिशाली और सम्मानित नेता हैं। हमने कई बातों पर बात की, जिसमें व्यापार और रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध को खत्म करना शामिल है। वह रूसी तेल खरीदना बंद करने और संयुक्त राज्य अमेरिका और वेनेजुएला से बहुत ज्यादा खरीदने पर सहमत हुए। इससे यूक्रेन में चल रहे युद्ध को खत्म करने में मदद मिलेगी, जिसमें हर हफ्ते हजारों लोग मर रहे हैं।”
राष्ट्रपति ट्रंप ने लिखा, “प्रधानमंत्री मोदी के प्रति दोस्ती और सम्मान के कारण और उनके अनुरोध पर, तुरंत प्रभाव से, हम संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए, जिसके तहत संयुक्त राज्य अमेरिका एक कम पारस्परिक टैरिफ लगाएगा, इसे 25% से घटाकर 18% कर देगा। वे भी इसी तरह संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ अपने टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को घटाकर शून्य कर देंगे।”
उन्होंने आगे लिखा, “प्रधानमंत्री ने 500 बिलियन डॉलर से ज्यादा अमेरिकी ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कृषि, कोयला और कई अन्य उत्पादों के अलावा, बहुत ज़्यादा स्तर पर “बाय अमेरिकन” के लिए भी प्रतिबद्धता जताई। भारत के साथ हमारे अद्भुत संबंध आगे और भी मजबूत होंगे। प्रधानमंत्री मोदी और मैं दो ऐसे लोग हैं जो काम पूरा करते हैं, जो ज्यादातर लोगों के बारे में नहीं कहा जा सकता। इस मामले पर ध्यान देने के लिए धन्यवाद!“
प्रस्तुत संदेश भारत और अमेरिका के प्रगाढ़ संबंध की भी व्याख्या करता है। यह संदेश यह भी बताता है कि भारत की विश्व में क्या स्थिति है। भारत का नेतृत्व अन्य देशों के मुकाबले कितना श्रेष्ठ है, इसकी भी पुष्टि इस संदेश के माध्यम से होती है। विपक्षी दल मोदी और ट्रंप की दोस्ती पर भी सवाल उठा रहे थे, यह संदेश उन्हें जवाब भी देता दिखाई देरा है।
अमेरिका द्वारा 18% तक टैरिफ घटाने से भारत पर होने वाले सकारात्मक प्रभावों की बहुत लम्बी सूची है। इससे भारत के सभी क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलेगा। भारत में इस तरह के निर्णय की बेहद आवश्यकता थी। भारत में विनिमार्ण कार्य होने से लोगो को रोजगार उपलब्ध होगा। जिससे प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी।
टैरिफ के आने से भारतीय निर्यात सस्ता होगा, कम टैरिफ से भारतीय सामान अमेरिका में सस्ते दाम पर बिक पाएँगे। निर्यात में वृद्धि, टेक्सटाइल, गारमेंट्स, ज्वेलरी, लेदर और इंजीनियरिंग गुड्स का निर्यात बढ़ेगा। रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। निर्यात आधारित उद्योगों में उत्पादन बढ़ने से नौकरियाँ बढ़ेंगी। भारत में उत्पादन की मात्रा में बढ़ोतरी होगी।
प्रस्तुत टैरिफ छूट से वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत को चीन, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। उद्योग के स्तर पर भी भारत में बडे़ परिवर्तन देखने को मिलेंगे। पश्चिम एक बाजार के रूप में भारत को दिखाई देगा। भारत में उद्योगों में भी वृद्धि देखने को मिलेगा।
पहले ऊँचे टैरिफ से प्रभावित MSME और निर्यातक कंपनियों को बड़ी राहत मिलेगी। इस बहुमुखी परिवर्तन से भारत एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की ओर और तेजी से बढ़ेगा। आर्थिक विकास को निर्यात और उत्पादन बढ़ने से GDP विकास दर को सकारात्मक समर्थन मिलेगा।
भारत–अमेरिका व्यापार संबंध में भी मजबूती देखने को मिलेगी। व्यापार के माध्यम से अमेरिका और भारत का एक दूसरे के सहयोग से यह संबंध और भी प्रगाढ़ हो सकता है, क्योंकि अन्य देशों को यह लाभ नहीं मिल सकेगा। अमेरिका ने यह केवल भारत के लिए किया है।
यह टैरिफ छूट देश के भीतर बैठे मोदी सरकार की आलोचन करने वाले विपक्षी समूह के मुंह पर तमाचा है। उन्हें प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कुशल नेतृत्व की झांकी प्रदान की है, जिसमें वह अर्थव्यवस्था के स्तर पर विकास कर रहे भारत की नई तस्वीर देख सकते हैं।
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद के खात्मे का जो संकल्प लिया गया था, वह अब केवल एक राजनीतिक बयान नहीं रह गया है, बल्कि जमीनी हकीकत में बदलता हुआ दिखाई दे रहा है।
दशकों तक जिन इलाकों को लाल आतंक का गढ़ माना जाता था, जहाँ हिंसा, डर और अस्थिरता आम जनजीवन का हिस्सा बन चुके थे, वहाँ अब धीरे-धीरे शांति, विकास और भरोसे की वापसी हो रही है। जैसे-जैसे तय की गई डेडलाइन करीब आ रही है, वैसे-वैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीर भी बदलती दिख रही है।
नक्सलवाद जिन इलाकों में पैर जमाए बैठा था, वहाँ विकास रुक गया था, प्रशासन कमजोर पड़ गया था और आम लोग डर के साए में जीवन जीने को मजबूर थे। लेकिन हाल के वर्षों में खासतौर से 2025 और 2026 की शुरुआत में हुई निर्णायक कार्रवाइयों ने यह संकेत दे दिया है कि लाल आतंक अब अपने अंतिम दौर में पहुँच चुका है।
नक्सल मुक्त छत्तीसगढ़ के आँकड़े
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान अब निर्णायक चरण में पहुँच चुका है और नवंबर 2025 से अक्टूबर 2025 के बीच राज्य के कई नक्सल प्रभावित जिलों में बड़ी सफलताएँ दर्ज की गई हैं, जिससे बस्तर अंचल में माओवादी नेटवर्क की पकड़ तेजी से कमजोर हुई है।
नारायणपुर जिले में 25 नवंबर 2025 को 28 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 19 महिलाएँ शामिल थीं और 22 नक्सलियों पर कुल 89 लाख रुपए का इनाम घोषित था, ये सभी दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी से जुड़े थे और पूर्वी बस्तर डिवीजन की मिलिट्री कंपनी नंबर 6 के सक्रिय कैडर रहे, जिनमें पंडी ध्रुव उर्फ दिनेश, दुले मंडावी उर्फ मुन्नी, छत्तीस पोयम और पदनी ओयम जैसे हार्डकोर सदस्य भी शामिल थे, जिन्होंने SLR, INSAS और .303 राइफलें पुलिस को सौंपीं।
नारायणपुर नक्सली सरेंडर (फोटो साभार: ETV Bharat)
नारायणपुर जिले में ही 2025 के दौरान कुल 287 नक्सली मुख्यधारा में लौट चुके हैं, जो इस बात का संकेत है कि यह इलाका अब तेजी से नक्सल प्रभाव से बाहर आ रहा है। इसी तरह कांकेर जिले में नॉर्थ सब-जोनल ब्यूरो से जुड़े 21 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 4 DVCM, 9 ACM और 8 पार्टी सदस्य शामिल थे।
ये सभी केशकाल डिवीजन के कुएमारी और किसकोडो एरिया कमेटी से जुड़े थे और उन्होंने 3 AK-47, 4 SLR, 2 INSAS, 6 .303 और 1 BGL लॉन्चर सहित कुल 18 हथियार जमा किए, जबकि कांकेर के कामतेड़ स्थित BSF कैंप में करीब 50 नक्सलियों ने भी सरेंडर किया, जिनमें बटालियन कमांडर स्तर के कैडर भी शामिल थे।
24 जुलाई 2025 को छत्तीसगढ़ के बीजापुर में 25, दंतेवाड़ा 15, नारायणपुर 8, सुकमा 5 और कांकेर 13 में एक ही दिन में कुल 66 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिन पर ₹1.3 करोड़ से अधिक का इनाम घोषित था, जिससे यह साफ हुआ कि बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा और कांकेर जैसे परंपरागत नक्सल प्रभावित जिले अब धीरे-धीरे उग्रवाद से बाहर निकल रहे हैं।
(फोटो साभार : X_@ITBP_official)
इसके अलावा 15 और 16 अक्टूबर 2025 को छत्तीसगढ़ में दो दिनों के भीतर 197 नक्सलियों ने हथियार डाले, जिसमें 16 अक्टूबर को 170 और 15 अक्टूबर को 27 नक्सली शामिल थे, जो हाल के वर्षों में राज्य का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण अभियान माना जा रहा है।
2025 में अब तक छत्तीसगढ़ में 1000 से अधिक नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं, जबकि 2024–25 के दौरान 500 से अधिक नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए, जिससे बस्तर, नॉर्थ बस्तर, अबूझमाड़, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर, सुकमा और दंतेवाड़ा जैसे इलाकों में नक्सल संगठन की कमर टूट चुकी है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार, जनवरी 2024 में बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद से अब तक छत्तीसगढ़ में 2100 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, 1785 गिरफ्तार हुए और 477 मुठभेड़ों में ढेर किए गए, जबकि अबूझमाड़ और नॉर्थ बस्तर को आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित किया जा चुका है।
छत्तीसगढ़ और ओडिशा : नक्सल मुक्त होते इलाके
ओडिशा के मलकानगिरी जिले में गुरुवार (05 फरवरी 2026) नक्सल विरोधी अभियान को बड़ी सफलता मिली है। यहाँ एक टॉप माओवादी कमांडर सुखराम मरकाम ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया। उस पर 21 लाख रुपए का इनाम घोषित था और वह लंबे समय से फायरिंग, IED ब्लास्ट, अपहरण और आम नागरिकों की हत्या जैसी गंभीर घटनाओं में शामिल रहा है।
मलकानगिरी के SP विनोद पाटिल ने इसे बड़ी कामयाबी बताते हुए कहा कि नक्सलियों के लिए हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का यही सही समय है। उन्होंने बाकी नक्सली कैडरों से भी सरेंडर करने की अपील की। सरेंडर के दौरान आरोपित ने SLR राइफल, कारतूस और दो शक्तिशाली IED भी पुलिस को सौंपे, जिससे इलाके की सुरक्षा और मजबूत हुई है।
(फोटो साभार: दैनिक जागरण)
पुलिस के अनुसार, इस सरेंडर के बाद मलकानगिरी जिला अब प्रभावी रूप से नक्सल मुक्त हो गया है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि लगातार चलाए गए सुरक्षा अभियानों, मजबूत खुफिया तंत्र और प्रशासन की सतर्कता का नतीजा है।
इसी तरह छत्तीसगढ़ के एक बड़े नक्सल प्रभावित इलाके को भी नवंबर 2025 में आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित किया गया था। यह इलाका कभी नक्सली हिंसा और डर का केंद्र हुआ करता था, लेकिन अब वहाँ शांति लौट रही है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और स्थानीय प्रशासन की सक्रियता से नक्सलियों की पकड़ कमजोर पड़ गई।
मलकानगिरी के कुछ हिस्सों को भी हाल ही में नक्सल मुक्त घोषित किया गया है। पहले जहाँ पुलिस का पहुँचना भी खतरे से खाली नहीं था, अब वहाँ चौकियाँ मजबूत हो रही हैं, सड़कें बन रही हैं, संचार सुविधाएँ बेहतर हो रही हैं और सरकारी योजनाएँ आम लोगों तक पहुँच रही हैं।
ये घटनाएँ इस बात का साफ संकेत हैं कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक दौर में पहुँच चुकी है। पुलिस और प्रशासन की मेहनत से प्रभावित इलाकों में धीरे-धीरे सामान्य जीवन लौट रहा है, लोग बिना डर के रह पा रहे हैं और विकास का रास्ता खुल रहा है।
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के गोगुंडा इलाके में सुरक्षाबलों ने माओवादी आतंक के प्रतीक बने कुख्यात नेता रमन्ना के 20 फीट ऊँचे स्मारक को ध्वस्त कर दिया है। CRPF की 74वीं बटालियन ने एंटी-नक्सल ऑपरेशन के तहत इस ढाँचे को विस्फोट के जरिए जमींदोज किया।
फोटो साभार – ईटीवी भारत
यह स्मारक माओवादी संगठन के लिए डर और वैचारिक प्रचार का माध्यम था, जिसे खत्म कर सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर बड़ा प्रहार किया है। यह कार्रवाई बस्तर और सुकमा क्षेत्र को नक्सलमुक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार का वर्ष रहा 2025
साल 2025 को नक्सलवाद के खिलाफ एक निर्णायक और ऐतिहासिक वर्ष माना जा रहा है, क्योंकि इस दौरान सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के खात्मे के लिए बड़े और प्रभावी ऑपरेशन किए।
जंगलों में फैले नक्सली नेटवर्क को खत्म किया गया, कई बड़े नक्सली कमांडरों को मार गिराया गया या गिरफ्तार किया गया और उनके फंडिंग व हथियार सप्लाई के रास्तों पर सख्त कार्रवाई करते हुए रोक लगाई गई।
इस साल सैकड़ों नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए या पकड़े गए, कई बड़े संगठन कमजोर हो गए और बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस के संयुक्त अभियानों से नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या भी घट गई।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, नक्सली हिंसा की घटनाओं में पिछले वर्षों की तुलना में बड़ी गिरावट आई है, जिससे साफ है कि सरकार की नीति अब सिर्फ बचाव तक सीमित नहीं रही, बल्कि आक्रामक, मजबूत और निर्णायक हो चुकी है।
पहले कैसे थे हालात? जब डर ही कानून था
नक्सल प्रभावित इलाकों के पुराने हालात पर नजर डालें, तो साफ समझ आता है कि इन क्षेत्रों में सामान्य जीवन इनके लिए कितना मुश्किल था। कई गाँवों में स्कूल सालों तक बंद रहे, क्योंकि शिक्षक और अभिभावक दोनों ही नक्सली हिंसा से डरते थे। स्वास्थ्य सेवाएँ लगभग न के बराबर थीं, डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ का वहाँ पहुँचना मुश्किल माना जाता था।
सड़कें अधूरी थीं, मोबाइल नेटवर्क कमजोर या बिल्कुल नहीं था और बैंकिंग सुविधाएँ लोगों की पहुँच से बाहर थीं। ग्रामीणों से जबरन वसूली आम बात थी और नक्सली फरमान ही कई जगहों पर स्थानीय कानून का रूप ले चुके थे। शाम ढलते ही लोग अपने घरों में कैद हो जाते थे और बच्चों का भविष्य अंधकार में डूबता जा रहा था।
नक्सली केवल हथियारों के बल पर नहीं, बल्कि डर, प्रतीकों और मानसिक दबाव के जरिए लोगों पर काबू पते थे। उनके झंडे, पोस्टर और उनके ‘स्मारक’ आम लोगों के भीतर डर का काम करती थी।
बदलती जमीनी हकीकत: विकास, शिक्षा और भरोसे की वापसी
अब वही इलाके धीरे-धीरे एक नई पहचान की ओर बढ़ रहे हैं। जिन क्षेत्रों में पहले सरकारी गाड़ियाँ भी मुश्किल से पहुँच पाती थीं, वहाँ अब नई सड़कें बन रही हैं, पुल तैयार हो रहे हैं और मोबाइल व इंटरनेट नेटवर्क मजबूत किया जा रहा है। बैंकिंग सेवाएँ, डाक सुविधाएँ और राशन वितरण प्रणाली पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी हो गई हैं।
स्कूल दोबारा खुल रहे हैं, बच्चों की नियमित उपस्थिति बढ़ रही है और युवाओं में शिक्षा व रोजगार को लेकर नई जागरूकता दिखाई दे रही है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सक्रिय हो रहे हैं, एम्बुलेंस सेवाएँ पहुँच रही हैं और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ ग्रामीणों तक पहुँचने लगा है।
छत्तीसगढ़ का सुकमा अब बदलते दौर की नई कहानी लिख रहा है। घने जंगल, मुश्किल भौगोलिक हालात और सीमित सरकारी पहुँच के चलते यहाँ लंबे समय तक ‘लाल आतंक’ पनपता रहा लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं।
केंद्र और राज्य सरकार की पहल पर शुरू हुई ‘आम बगीचा योजना’ ने इलाके की नक्सली पहचान को पलट देना शुरू कर दिया है। छोटे-छोटे बागानों ने ग्रामीणों की आमदनी बढ़ाई है, महिलाओं ने व्यवसाय में कदम रखा है और कुछ तो ‘लखपति दीदी’ बनने की ओर अग्रसर हैं।
यह सिर्फ आर्थिक बदलाव नहीं है बल्कि सुरक्षा, आत्मविश्वास और सामाजिक सोच में भी स्पष्ट सुधार दिख रहा है। जब विकास यहाँ तक पहुँचता है, तो असर केवल पैसों तक सीमित नहीं रहता, यह लोगों की उम्मीदें, हौसला और भविष्य की चुनौतियों से निपटने की शक्ति भी बढ़ाता है।
‘आम बगीचा परियोजना’ का मुख्य उद्देश्य यह है कि ग्रामीण लोग खेती के अलावा स्थायी और टिकाऊ तरीकों से आय हासिल कर सकें। अस्थिरता के बीच छोटे-मोटे खेत और बारहमासी फसलें जोखिम भरी होती हैं। फलों के पेड़, खासकर संकर किस्में, कुछ सालों के भीतर नियमित फल देने लगती हैं और कई वर्षों के लिए आय का स्रोत बन जाता हैं।
मर्काम धूलाने कहा की “प्रशासन की मदद से हमने आम, नींबू और नारियल लगाए, अब कमाई होने वाली है।”
#WATCH | Sukma, Chhattisgarh: Local Markam Dhula says, "They (people from administration) came to my house and asked me about planting lemon, mango trees, and coconut trees. We said we would plant them… It's been 2 years… Now the harvest is about to come… There are 350… pic.twitter.com/OBWdIKGso5
प्रशासन ने देखा कि सुकमा की मिट्टी और जलवायु फलों के लिए अनुकूल है, इसलिए यहाँ बागवानी को बढ़ावा देना मतलब लोगों को लंबे समय के लिए आर्थिक सुरक्षा देना है। साथ ही महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ जैसी योजनाओं से जोड़कर उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ाने की भी कोशिश की जा रही है।
जहाँ पहले डर का माहौल था, वहाँ अब सामान्य जीवन की वापसी हो रही है। लोग खुले तौर पर अपने व्यवसाय शुरू कर रहे हैं, कृषि और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है और विकास की नई उम्मीदें जन्म ले रही हैं।
क्या कहते है आँकड़े
सरकारी और गृह मंत्रालय के ताज़ा आँकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुकी है। संसद में साझा किए गए नवीनतम डेटा के अनुसार, भारत में नक्सली हिंसा अपने चरम वर्ष 2010 की तुलना में करीब 89% तक घट चुकी है।
जहाँ 2010 में 1,936 हिंसक घटनाएँ दर्ज हुई थीं, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर लगभग 218 रह गई है। इसी तरह, नक्सल हिंसा से होने वाली मौतों में भी 91% तक की गिरावट आई है।
2010 में जहाँ 1005 मौतें दर्ज हुई थीं, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर लगभग 93 से 150 के बीच सिमट कर रह गया है। नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 से घटकर 2025 में केवल 11 रह गई है, जबकि सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या 36 से घटकर सिर्फ 3 (बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर छत्तीसगढ़) तक सिमट गई है, जो रेड कॉरिडोर के लगभग पतन का संकेत है।
2025 में ही सुरक्षा बलों ने 317–364 नक्सलियों को मार गिराया, जिनमें 12 से अधिक शीर्ष कमांडर शामिल थे, साथ ही 942-1022 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और लगभग 2000-2337 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जो संगठन के आंतरिक मनोबल के टूटने और सरकार की पुनर्वास नीति की सफलता को दर्शाता है।
बीते एक दशक में 8000 से अधिक नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौट चुके हैं और सरकार की सरेंडर कम रिहैबिलिटेशन नीति, आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण, मासिक वजीफा और रोजगार योजनाओं ने इस बदलाव को गति दी है।
जैसे-जैसे 31 मार्च 2026 की तारीख नजदीक आ रही है, नक्सली संगठनों के भीतर बेचैनी और भ्रम की स्थिति बढ़ती जा रही है। निचले स्तर के कैडर हथियार छोड़ रहे हैं, नेतृत्व संकट गहरा रहा है और संगठन के भीतर अविश्वास की भावना पैदा हो रही है।
फंडिंग नेटवर्क कमजोर पड़ रहे हैं, सप्लाई चैनल टूट रहे हैं और कई नक्सली समूह अपने अस्तित्व को लेकर असमंजस में हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि हाल के समय में बड़ी संख्या में नक्सली स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर चुके हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि लाल आतंक अब अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है।
लाल आतंक से आजाद होती जमीन: बदलती पहचान और नई उम्मीदें
जहाँ पहले बारूद की गंध और हिंसा का साया था, वहाँ अब विकास, शिक्षा और अवसरों की चर्चा हो रही है। नई पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर अधिक आशावान दिखाई दे रही है। छोटे व्यापार, कृषि आधारित उद्यम, पर्यटन और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है।
नक्सल प्रभावित रहे इलाके अब हिंसा की पहचान से बाहर निकलकर विकास और संभावनाओं की पहचान गढ़ने लगे हैं। लोग अपने क्षेत्र को डर से नहीं, बल्कि उम्मीद और अवसर से जोड़कर देखने लगे हैं।