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बेंगलुरु मेट्रो का किराया बढ़ाने के पीछे क्या है सिद्दारमैया सरकार की मंशा? कर्नाटक की वित्तीय स्थिति बदहाल: जानें- क्यों BJP सांसद तेजस्वी सूर्या ने दिखाई ‘खाली डिग्गी’?

बेंगलुरु की नम्मा मेट्रो (Namma Metro) से सफर करने वालों के लिए राहत की खबर यह है कि फिलहाल मेट्रो का किराया नहीं बढ़ेगा। दरअसल, कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार की 09 फरवरी 2026 से नम्मा मेट्रो के किराए में करीब 5 फीसदी तक बढ़ोतरी करने की तैयारी थी। लेकिन बीजेपी के आरोपों और यात्रियों के विरोध के बाद इस फैसले पर रोक लगा दी गई है।

वहीं बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर्या लगातार किराया बढ़ोतरी के विरोध में मोर्चा खोले बैठे हैं। सोमवार (09 फरवरी 2026) को बेंगलुरु की आरवी मेट्रो पर तेजस्वी ने ‘खाली डिग्गी’ दिखाकर प्रदर्शन किया, तो पुलिस ने उन्हें हिरासत ले लिया। अब सवाल उठता है कि आखिर इस खाली डिग्गी के मायने क्या हैं? क्यों कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार किराया बढ़ाना चाहती है और BJP इस फैसले को गलत क्यों बता रही है? इन सवालों के जवाब जानना बेहद जरूरी है।

BMRCL का किराया बढ़ाने का प्रस्ताव

दरअसल, बेंगलुरु मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (BMRCL) ने प्रस्ताव रखा था कि हर टिकट पर 1 से 5 रुपए तक ज्यादा वसूले जाएँगे। अगर यह लागू होता तो न्यूनतम किराया 10 रुपए से बढ़कर 11 रुपए और अधिकतम किराया 90 रुपए से बढ़कर 95 रुपए हो जाता। यह बढ़ोतरी पूरे मेट्रो नेटवर्क पर लागू होने वाली थी।

BMRCL का कहना था कि यह सालाना किराया संशोधन है, जिससे बढ़ते ऑपरेशन खर्च, बिजली, कर्मचारियों के वेतन और रखरखाव की लागत को पूरा किया जा सके। लेकिन जैसे ही किराया बढ़ने की बात सामने आई, लोगों में नाराजगी बढ़ गई।

पहले से ही बेंगलुरु मेट्रो देश की सबसे महँगी मेट्रो मानी जाती है। रोजाना मेट्रो से ऑफिस जाने वाले कर्मचारी, छात्र और आम यात्री बोले कि अगर हर दिन 2-3 बार मेट्रो ली जाए तो महीने के आखिर में 60 से 100 रुपए तक अतिरिक्त बोझ पड़ेगा, जो हर किसी के लिए आसान नहीं है।

BJP सांसद तेजस्वी सूर्या का सिद्दारमैया सरकार पर आरोप

इस बीच बीजेपी ने सीधे तौर पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार पर हमला बोला। बीजेपी युवा मोर्चा के अध्यक्ष और बेंगलुरु दक्षिण से सांसद तेजस्वी सूर्या ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया। उन्होंने कहा कि बेंगलुरु पहले ही महँगाई से जूझ रहा है और मेट्रो किराया बढ़ाना आम लोगों पर सीधा हमा है। तेजस्वी सूर्या ने मेट्रो से आवाजाही करने वाले यात्रियों से बातचीत कर उनकी प्रतिक्रिया जानी।

बाद में तेजस्वी सूर्या ने पत्रकारों को बताया कि यात्री बार-बार किराया बढ़ने से नाखुश हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर केंद्र सरकार को किराया बढ़ोतरी के लिए दोषी ठहराकर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया। तेजस्वी सूर्या ने यह भी कहा कि घाटे की भरपाई का बोझ सीधे यात्रियों पर डालना गलत है और सिद्दारमैया सरकार को पहले अपने खर्च और सिस्टम को सुधारना चाहिए।

तेजस्वी सूर्या ने मौजूदा समिति की गणनाओं में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए किराया निर्धारण समिति के गठन की भी माँग की। इसके अलावा उन्होंने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार में आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल खट्टर से भी बात की और किराया बढ़ोतरी को तुरंत रोकने की माँग की।

इस पर मनोहर लाल खट्टर ने अधिकारियों को मेट्रो के किराए में प्रस्तावित बढ़ोतरी को अस्थायी रूप से रोक देने का निर्देश दिया और समिति के निष्कर्षों की व्यक्तिगत समीक्षा का आश्वासन दिया। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सिद्दारमैया सरकार औपचारिक अनुरोध करती है तो एक नई समिति पर विचार किया जा सकता है।

सिद्दारमैया सरकार की पुलिस ने तेजस्वी सूर्या को हिरासत में लिया

इतना ही नहीं सोमवार (09 फरवरी 2026) को बेंगलुरु के आरवी रोड मेट्रो स्टेशन के बाहर किराया बढ़ोतरी के खिलाफ खाली डिग्गी लेकर प्रदर्शन करते हुए तेजस्वी सूर्या को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इस पर तेजस्वी सूर्या ने एक्स पर लिखा, “मुझे गिरफ्तार करने से मेरी आवाज नहीं दबेगी! यह शर्मनाक है कि कॉन्ग्रेस सरकार ने मुझे सच उजागर करने के लिए गिरफ्तार किया। यह एक ‘खाली डिग्गी’ सरकार है।”

उन्होंने आगे कहा, “कर्नाटक की आर्थिक स्थिति खराब है, और किराए और बढ़ती लागत के रूप में इसकी कीमत चुका रहे हैं। अब कोई बहाना नहीं चलेगा। मुख्यमंत्री को बजट में ‘व्हाइट पेपर’ प्रश्तुत करना होगा और एक सवाल का जवाब देना होगा- राज्य की वित्तीय स्थिति इतनी कमजोर क्यों है, जैसा कि आपने FFC के समक्ष स्वीकार किया था?”

तेजस्वी ने सवाल पूछा, “कर्नाटक में महँगाई क्यों बढ़ती जा रही है? राज्य में कीमतें प्रतिदिन क्यों बढ़ रही हैं?” उन्होंने आगे कहा, “वित्तीय स्थिति सुधारें, मेट्रो को दी जाने वाली अप्रत्यक्ष वित्तीय सहायता बहाल करें और मेट्रो का किराया अपने आप कम हो जाएगा। इसके अलावा कुछ भी कहना छल है।”

कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार का पक्ष

वहीं कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार ने मेट्रो किराया बढ़ाने के फैसले को केंद्र सरकार पर थोपने की कोशिश की। सरकार का कहना है कि यह फैसला सीधे राज्य सरकार का नहीं है। कॉन्ग्रेस सरकार के मुताबिक, बेंगलुरु मेट्रो का किराया एक तय नियम और प्रक्रिया के तहत फेयर फिक्सेशन कमेटी (Fare Fixation Committee) की सिफारिशों से तय होता है। इसमें राज्य सरकार की सीधी भूमिका नहीं होती।

सरकार का कहना है कि मेट्रो के संचालन और किराया निर्धारण की जिम्मेदारी BMRCL और केंद्र सरकार से जुड़े नियमों के दायरे में आती है। इसीलिए कॉन्ग्रेस सरकार पर किराया बढ़ाने का आरोप लगाना गलत है। कर्नाटक सरकार ने यह भी कहा कि बीजेपी इस मुद्दे को राजनीतिक रंग दे रही है और जनता में भ्रम फैलाने की कोशिश कर रही है।

TMC का विरोध पड़ा महँगा? पार्टी की गुंडागर्दी पर रील बनाने वाले इन्फ्लुएंसर की गिरफ्तारी पर विवाद: समझें- क्यों लोग बता रहे इसे राजनीतिक बदला

कोलकाता पुलिस ने 25 साल के सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर शमिक अधिकारी को यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया है। शमिक को ऑनलाइन ‘नॉनसेन’ के नाम से जाना जाता है। उन्हें गुरुवार (5 फरवरी 2026) को दमदम से पकड़ा गया। पहले उन्हें गलत तरीके से कैद करने, हमला करने और महिला की इज्जत से खिलवाड़ करने के आरोप में पकड़ा किया गया था, लेकिन बाद में 22 साल की पीड़िता के बयान के आधार पर पुलिस ने रेप का केस भी जोड़ दिया।

शमिक को शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को कोर्ट में पेश किया गया और अब उन्हें 16 फरवरी 2026 तक पुलिस कस्टडी में रखा गया है। पुलिस के मुताबिक, महिला ने शिकायत की थी कि शमिक ने उसे 2 फरवरी 2026 की रात करीब साढ़े नौ बजे से अगले दिन शाम 5 बजे तक अपने बेहाला वाले घर में जबरन रोका रखा।

इस दौरान महिला का आरोप है कि उसे मारा-पीटा गया, धमकाया गया। उसने कहा कि शमिक ने उसे गलत तरीके से छुआ, कपड़े खींचे और फिर जबरन यौन हमला किया।

पुलिस ने कोर्ट को बताया कि पीड़िता का मेडिको-लीगल टेस्ट एमआर बांगुर अस्पताल में हुआ। एक महिला पुलिस अधिकारी ने उसका बयान दर्ज किया और इसके बाद भारतीय न्याय संहिता की रेप वाली धारा FIR में जोड़ी गई। पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान मिले और वह काफी आघात में थी, इसलिए शिकायत करने में देरी हुई।

पुलिस ने आगे कहा कि शमिक ने पीड़िता को अश्लील फोटो भेजकर धमकाया था। जाँचकर्ताओं के मुताबिक टावर लोकेशन से पता चला कि शिकायत में बताए समय पर दोनों आरोपित और पीड़िता अपराध वाली जगह पर मौजूद थे।

शमिक की तरफ से कहा गया कि दोनों पुराने दोस्त हैं और लंबे समय से जानते हैं। उस रात गलतफहमी हुई थी, लेकिन कोई जबरदस्ती नहीं की गई। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर जाँच में कुछ बचा ही नहीं है तो पुलिस कस्टडी की क्या जरूरत है।

वायरल रील जिसने छेड़ दी राजनीतिक बहस

शमिक कोई आम इंफ्लुएंसर नहीं हैं। इंस्टाग्राम पर उनके करीब 4.20 लाख और फेसबुक पर 4 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। लेकिन राजनीतिक सुर्खियों में तब आए जब उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट ‘@yournonsane’ पर 21 जनवरी को एक रील पोस्ट की। पश्चिम बंगाल में आने वाले चुनाव से सिर्फ दो महीने पहले की बात है।

यह रील वायरल हो गई, 30 लाख से ज्यादा व्यूज और 3.5 लाख से ज्यादा लाइक्स आए। इसमें शमिक ने टीएमसी सरकार पर तीखा हमला किया था। वीडियो में वे खुद को आम वोटर दिखाते हैं जो वोट डालने जा रहा है। वहाँ एक लोकल टीएमसी गुंडा वोटरों को सिर्फ सत्ताधारी पार्टी को वोट देने का दबाव डालता है और नहीं मानने पर धमकी देता है।

वीडियो में आगे राज्य की स्थिति दिखाने वाले फ्लैशबैक थे। इसमें 26 हजार सरकारी टीचर्स की नौकरी जाने और उसका भावनात्मक असर दिखाया गया। रात में अकेली चलती महिला को कुछ लोग पीछे चल रहे हैं।

रील में आरजी कर रेप-मर्डर केस का भी जिक्र था। उस केस में कोलकाता कोर्ट ने दोषी संजय रॉय को उम्रकैद की सजा सुनाई और राज्य सरकार को पीड़िता के माता-पिता को 17 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया, हालाँकि पीड़िता के माता-पिता ने कहा कि उन्हें न्याय चाहिए, मुआवजा नहीं।

वीडियो ने सीधे सत्ताधारी सरकार को निशाना बनाया और चुनाव से ठीक पहले आया, इसलिए कई लोगों ने इसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना। वायरल होने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ आने लगीं।

TMC ने BJP से लिंक का किया दावा

रील वायरल होने के बाद कई टीएमसी लीडर्स और सपोर्टर्स ने दावा किया कि शमिक का बीजेपी से लिंक है। उनका कहना था कि वह सिर्फ कंटेंट क्रिएटर नहीं, राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं।

TMC प्रवक्ता रिजू दत्ता ने सोशल मीडिया पर कड़ा बयान दिया और शमिक को ‘बीजेपी यूट्यूबर’ कहा। पोस्ट में उन्होंने कहा कि वही शख्स जो पश्चिम बंगाल सरकार पर महिलाओं की सुरक्षा में नाकाम होने का आरोप लगा रहा था, अब खुद महिला की इज्जत से खिलवाड़ और मारपीट के केस में फंसा है।

दत्ता ने केस में दर्ज धाराओं का जिक्र किया और बताया कि पीड़िता ने करीब 12 घंटे कैद रखने, मारपीट और धमकी देने का आरोप लगाया है। एक विवादास्पद टिप्पणी में उन्होंने शमिक को बीजेपी आईटी सेल चीफ अमित मालवीय से जोड़ा और कहा कि महिलाओं का गलत इस्तेमाल करने वाले बीजेपी में शामिल हो जाते हैं।

अब टीएमसी की बात है कि यह सीधा-सादा क्रिमिनल मामला है और विपक्ष अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग दे रहा है।

गिरफ्तारी पर उठे सवाल, झूठे मामले में फँसाने का शक

दूसरी तरफ बीजेपी सपोर्टर्स और कई इंफ्लुएंसर्स ने गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाए हैं। कई लोगों ने इशारा किया कि यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई हो सकती है, खासकर क्योंकि शमिक की रील ने राज्य सरकार की कड़ी आलोचना की थी।

कुछ सोशल मीडिया यूजर्स तो यहाँ तक कह रहे हैं कि यौन उत्पीड़न की शिकायत झूठी बनाई गई है ताकि उन्हें चुप कराया जाए। उनका तर्क है कि वायरल वीडियो के ठीक बाद और चुनाव से पहले गिरफ्तारी हुई, जिससे शक पैदा होता है।

बीजेपी आईटी सेल चीफ अमित मालवीय ने ममता बनर्जी की सरकार पर कड़ा हमला बोला। सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल ‘तानाशाही शासन’ बन गया है जहाँ आलोचकों को झूठे और दुर्भावनापूर्ण FIR से निशाना बनाया जाता है।

मालवीय ने लिखा, “यह टीएमसी का शासन मॉडल है: अभिव्यक्ति की आजादी को दबाओ, आलोचकों को डराओ, पुलिस का इस्तेमाल करो और सत्ता में बने रहने के लिए प्रतिष्ठा बर्बाद करो। लेकिन बंगाल देख रहा है। और बंगाल चुप नहीं रहेगा। बीजेपी हर उस शख्स के साथ खड़ी है जो ममता बनर्जी के शासन का शिकार बना है।”

उन्होंने आगे कहा, “पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ मिलकर हम डर को हराएँगे, सत्ता के दुरुपयोग को बेनकाब करेंगे और लोकतंत्र बहाल करेंगे। यह न्याय नहीं है। यह राजनीतिक उत्पीड़न है। और इसका अंत होगा।”

साथी इंफ्लुएंसर्स ने किया शमिक का समर्थन

शमिक को कुछ साथी कंटेंट क्रिएटर्स और सोशल मीडिया यूजर्स का भी समर्थन मिला है। एक एक्स यूजर ने सवाल उठाया कि पश्चिम बंगाल में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बोलने वाले इंफ्लुएंसर्स के खिलाफ क्यों केस हो रहे हैं। उन्होंने पूछा कि ऐसे मामलों में सार्वजनिक आक्रोश क्यों नहीं होता।

समर्थकों का कहना है कि शासन और महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है और इसके लिए कानूनी परेशानी नहीं होनी चाहिए। हालाँकि दूसरे लोग कहते हैं कि क्रिमिनल आरोपों को गंभीरता से लेना चाहिए और राजनीतिक बहस से अलग जाँच होनी चाहिए।

फिलहाल शमिक अधिकारी ने कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है। आने वाले दिनों में कोर्ट की कार्यवाही और जाँच के नतीजे इस मुद्दे में बड़ी भूमिका निभाएँगे।

केस एक अपराध की शिकायत से शुरू हुआ था, लेकिन अब यह राजनीतिक बहस बन गया है जो आरोपी पर लगे आरोपों के साथ-साथ अभिव्यक्ति की आजादी, राजनीतिक दुश्मनी और चुनाव के समय सोशल मीडिया की भूमिका पर सवाल उठा रहा है।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

भारत में काम करते हुए भी पाकिस्तानी बॉस को रिपोर्ट कर रही थी गौरव गोगोई की पत्नी, भेजी कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट: जानिए- असम पुलिस की SIT ने क्या-क्या बताया

कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई के पाकिस्तानी लिंक की जाँच असम स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम यानी एसआटी ने पूरी कर ली है। रिपोर्ट को 8 फरवरी 2026 को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सार्वजनिक कर दी। इसमें लोकसभा में विपक्ष के डिप्टी लीडर और उनकी पत्नी पर गंभीर आरोप लगाए गए।

CM सरमा ने कहा कि राज्य सरकार ने पूरा केस केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज दिए हैं, क्योंकि असम पुलिस के पास सीमित अधिकार हैं। उन्होंने कहा कि ये लिंक राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है और इनकी विस्तृत जाँच की जरूरत है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि एसआईटी जाँच में जो खुलासे हुए हैं वे बेहद संवेदनशील हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक मौजूदा सांसद का शामिल होना, मामले को ज्यादा ‘गंभीर’ बनाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि गोगोई ने 2015 में नई दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन में एक युवक के साथ जाकर हाई कमिश्नर अब्दुल बासित से मुलाकात की थी।

सीएम के मुताबिक, मैं सिंगापुर में था जब मुझे यह तस्वीर मिली कि हमारे असम के सांसद एक युवक के साथ पाकिस्तानी दूतावास गए थे। उन्होंने कहा कि आज तक कॉन्ग्रेस का भी कोई नेता गोगोई की तरह किसी प्रतिनिधिमंडल के साथ पाकिस्तानी दूतावास नहीं गया।

CM के मुताबिक, एलिजाबेथ पहले US के पूर्व सीनेटर टॉम उडाल की सहयोगी थीं, जो भारत विरोधी अरबपति जॉर्ज सोरोस से जुड़े हैं। ये लोग मोदी सरकार समेत दुनिया भर में राष्ट्रवादी सरकारों को गिराना चाहते हैं।

सरमा ने इस मीटिंग की एक वायरल तस्वीर भी दिखाई। उन्होंने कहा कि शुरुआत में लगा कि तस्वीर फोटोशॉप की हुई हैं, लेकिन बाद में पता चला कि यह तस्वीर असली थी। बताया जाता है कि इसके बाद अब्दुल बासित ने असम का दौरा किया, जो कोई इत्तेफाक नहीं था।

उन्होंने कहा कि एलिज़ाबेथ कोलबर्न गोगोई और पाकिस्तानी नागरिक अली तौकीर शेख के ‘संबंधों’ का भी उन्हें पता चला। जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, एलिजाबेथ ने 18 मार्च, 2011 से 17 मार्च, 2012 तक पाकिस्तान में LEAD पाकिस्तान नाम के एक पाकिस्तानी संगठन के लिए काम किया। इस दौरान, कथित तौर पर उनके अली तौकीर शेख के साथ करीबी रिश्ते बन गए, जिन्हें CM सरमा ने पाकिस्तानी आर्मी, इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) और देश के प्लानिंग कमीशन से कनेक्शन रखने वाला ‘पाकिस्तानी एजेंट’ बताया।

सरमा के मुताबिक, शेख सिर्फ पर्यावरणविद नहीं था, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति था जिसने ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर ‘भारत विरोध’ को बढ़ावा दिया। खासकर सिंधु जल संधि और दूसरे भारत-पाकिस्तान के झगड़ों को लेकर भारत की छवि धुमिल करने की कोशिश की। शेख ने 2010 और 2013 के बीच कम से कम 13 बार भारत का दौरा किया, जिससे भारत विरोधी गतिविधियों में उनकी भूमिका का शक जताया गया। सीएम सरमा ने कहा कि UPA सरकार ने उन्हें भारत आने से नहीं रोका, जबकि उनके भारत विरोधी कमेंट्स के बारे में सबको पता था।

सरमा ने SIT रिपोर्ट से कई चौंकाने वाली बातें बताईं, जिसमें दावा किया गया कि एलिज़ाबेथ का भारत ट्रांसफर हो गया था, लेकिन उनके ट्रांसफर के बाद भी उन्हें पाकिस्तानी फर्म से सैलरी मिलती रही। इतना ही नहीं, ट्रांसफर से एक साल पहले उन्हें भारत आने का अपॉइंटमेंट लेटर जारी किया गया था।

SIT जाँच के मुताबिक, LEAD इंडिया को LEAD पाकिस्तान के तहत लाया गया, ताकि एलिजाबेथ की सैलरी पाकिस्तान से भारत ट्रांसफर की जा सके।

CM ने कहा कि LEAD पाकिस्तान सीधे एलिजाबेथ को सैलरी नहीं भेज सकता था, क्योंकि FCRA के तहत फंड ट्रांसफर सिर्फ भारतीयों को की जा सकती है और वह भारतीय नागरिक नहीं हैं। इसलिए उनकी सैलरी देने के लिए एक भारतीय संस्था LEAD इंडिया को फंड भेजा जाता था।

एलिज़ाबेथ कोलबर्न गोगोई, लीड इंडिया में भावना लूथरा के अंडर काम करती थीं, जिनसे SIT ने इस केस के सिलसिले में पूछताछ की थी। लीड इंडिया के फाइनेंशियल रिकॉर्ड की जाँच से पता चला कि LEAD इंडिया को ऑर्गनाइज़ेशनल काम के नाम पर LEAD पाकिस्तान से फंड मिला था। असल में यह पैसा गोगोई की सैलरी के लिए था।

सरमा ने कहा कि एलिजाबेथ के पाकिस्तान में एक्टिव बैंक अकाउंट थे, लेकिन उसने SIT को अकाउंट की डिटेल्स बताने से मना कर दिया। एक और चौंकाने वाली बात यह थी कि उसकी सैलरी भारत में उसके सीनियर से बहुत ज़्यादा थी। जहाँ उसे ₹2,50,000 मिलते थे, वहीं भावना लूथरा की सैलरी ₹50,000 थी।

जाँच के अनुसार, गोगोई को FCRA के ज़रिए पाकिस्तान से कुल ₹82.41 लाख मिले। LEAD इंडिया को LEAD पाकिस्तान से ₹63.48 लाख मिले, जबकि सितंबर 2012 से नवंबर 2014 तक कुल ₹91.27 लाख मिले। इसमें से 90% रकम अकेले गौरव गोगोई की पत्नी को मिली।

इससे यह साफ हो जाता है कि LEAD इंडिया पूरी तरह से LEAD पाकिस्तान के अंडर था, यह एक अजीब अरेंजमेंट है क्योंकि आम तौर पर, इंटरनेशनल ऑर्गनाइज़ेशन की कंट्री यूनिट्स का रैंक और स्टेटस बराबर होता है, और उन्हें रीजनल/ग्लोबल हेड्स चलाते हैं। लेकिन इस मामले में, एक लोकसभा MP की पत्नी पाकिस्तान के सीधे कंट्रोल वाले ऑर्गनाइज़ेशन के अंडर काम करती थी। सीएम ने इसे गंभीर मामला बताया।

जाँच के दौरान SIT ने यह एग्रीमेंट हाथ लगी। CM सरमा के मुताबिक, जब एलिजाबेथ पाकिस्तान से इंडिया ट्रांसफर हुई, तो वह इंडिया में काम करने वाली LEAD पाकिस्तान की ‘शैडो एम्प्लॉई’ बनी रही। उन्होंने कहा कि SIT ने LEAD इंडिया ऑफिस से पाकिस्तान से इंडिया में पैसे के फ्लो को दिखाने वाले डॉक्यूमेंट्स ज़ब्त किए हैं, और भावना लूथरा ने भी इसकी पुष्टि की है।

CM सरमा ने एक और सनसनीखेज आरोप लगाया कि एलिजाबेथ ने भारत से जुड़ी संवेदनशील जानकारी पाकिस्तान को दी। इसमें शेख को भेजा गया 50 पेज का एक कॉन्फिडेंशियल डॉक्यूमेंट भी शामिल है। इसमें इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के सोर्स का जिक्र था। रिपोर्ट को कॉन्फिडेंशियल मार्क किया गया था। यह ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 के सेक्शन 2 का सीधा उल्लंघन है।

पूछताछ के दौरान एलिजाबेथ ने माना कि उसने रिपोर्ट लिखी थी। CM के मुताबिक रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा वह है जिसमें एलिजाबेथ पर लो रिस्क, लो विजिबिलिटी रणनीति को बढ़ावा देने का आरोप है। इस रणनीति के तहत पाकिस्तानी एजेंटों को सलाह दी गई थी कि वे केंद्र सरकार के बजाय राज्य सरकारों और क्षेत्रीय राजनीतिक तनावों का फायदा उठाएँ। उन्होंने लिखा था कि PM मोदी के राज में केंद्र और राज्यों के बीच तनाव बढ़ेगा।

जब वह LEAD इंडिया में काम कर रही थीं, तो 6 बार इस्लामाबाद गईं। LEAD इंडिया छोड़ने और ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट में जुड़ने के बाद तीन बार फिर पाकिस्तान गईं। CM सरमा के मुताबिक, हर बार उन्होंने फ्लाइट के बजाय अटारी बॉर्डर के रास्ते का इस्तेमाल किया। SIT के मुताबिक, LEAD इंडिया की हेड भावना लूथरा ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि एलिजाबेथ पाकिस्तान क्यों गईं।

SIT का एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई का खुलासा

  • सीनेटर टॉम उडाल के जरिए जॉर्ज सोरोस से लिंक
  • अली तौकीर शेख के अंडर LEAD पाकिस्तान में नौकरी
  • पाकिस्तानी बैंक अकाउंट की जानकारी देने से मना कर दिया
  • LEAD इंडिया के साथ पहले से तय नौकरी का कॉन्ट्रैक्ट (जॉइन करने से 18 महीने पहले जारी किया गया)
  • भारत में एंट्री आसान बनाने के लिए ‘शैडो नौकरी’ का इंतजाम
  • रिपोर्टिंग मैनेजर से 500% ज्यादा सैलरी और FCRA का उल्लंघन
  • पाकिस्तान से फंडिंग का सोर्स छिपाया
  • LEAD इंडिया मैनेजमेंट की तरफ से कोई निगरानी नहीं, सीधे पाकिस्तान को रिपोर्ट की गई
  • पाकिस्तान को कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट भेजना (5 अगस्त, 2014)
  • रिपोर्ट में सीक्रेट IB कम्युनिकेशन का जिक्र था
  • पाकिस्तानी एक्टर्स के लिए ‘लो रिस्क लो विज़िबिलिटी’ स्ट्रैटेजी की वकालत की गई
  • राज्य-लेवल पर बातचीत करने और केंद्र सरकार को बायपास करने की सलाह दी गई
  • खुफिया रिपोर्ट में केंद्र-राज्य के राजनीतिक तनाव का फायदा उठाया गया
  • अली तौकीर शेख के साथ नौकरी से पहले एक साथ 3 बार यात्रा
  • LEAD इंडिया में रहते हुए पाकिस्तान की 6 बार बिना इजाजत दौरा
  • ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट जॉइन करने के बाद पाकिस्तान के 3 और दौरे

मुख्यमंत्री ने गौरव गोगोई के बारे में भी बात की और कहा कि 2013 में अपने पहले लोकसभा चुनाव जीतने से 5 महीने पहले, गोगोई इजरायल की यात्रा के दौरान अपना पासपोर्ट खो जाने के बाद ज़मीनी बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान गए थे। CM सरमा ने पाकिस्तान पहुँचने पर गोगोई के सिंगल एंट्री वीजा को मल्टीपल-एंट्री में अपग्रेड करने और बॉर्डर पर झड़पों के बीच पाकिस्तानी शहरों में ISI के आकाओं से मुलाकात का आरोप लगाया।

CM के मुताबिक, गोगोई का वीजा सिर्फ लाहौर के लिए था, लेकिन पाकिस्तान पहुँचने के बाद, उनके वीजा को इस्लामाबाद और कराची तक के लिए बढ़ा दिया गया। यह एक्सटेंशन पाकिस्तान के गृह मंत्रालय द्वारा लिखे गए एक लेटर के आधार पर किया गया था। CM सरमा ने कहा कि SIT ने वीजा लोकेशन बढ़ाने के लिए मंजूरी दिखाने वाला पासपोर्ट हासिल कर लिया है।

CM के मुताबिक, पाकिस्तान जाने के बाद गोगोई की पर्सनैलिटी पूरी तरह बदल गई और उन्होंने दिल्ली में पाकिस्तान हाई कमीशन में न्यूक्लियर पावर प्लांट, यूरेनियम रिज़र्व, बॉर्डर सिक्योरिटी, डिफेंस हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर, एयर पावर, घरेलू हथियार बनाने, जासूसी जैसे कॉन्फिडेंशियल मामलों से जुड़े पार्लियामेंट्री सवाल उठाए। उन्होंने नेशनल वॉटर मिशन स्ट्रेटेजी पर भी सवाल पूछे, जो एलिजाबेथ के काम के एरिया से जुड़ा मामला था।

CM ने एक इंटरव्यू का वीडियो क्लिप भी दिखाया, जिसमें गौरव गोगोई ने कहा था कि वह पाकिस्तान इसलिए गए थे क्योंकि उनकी पत्नी वहाँ काम कर रही थीं, लेकिन CM सरमा ने बताया कि उनकी पत्नी का उनके दौरे से एक साल पहले LEAD इंडिया में ट्रांसफर हो गया था।

हालाँकि गौरव गोगोई की बेटी ब्रिटिश नागरिक है, क्योंकि उसका जन्म लंदन में हुआ था। CM सरमा के मुताबिक उन्होंने अपने भारत में जन्मे बेटे का इंडियन पासपोर्ट सरेंडर कर दिया। उन्होंने दिल्ली में रीजनल पासपोर्ट द्वारा जारी किया गया सरेंडर सर्टिफिकेट दिखाया, जिसमें कहा गया था कि पासपोर्ट 12 मई 2022 को सरेंडर किया गया था। CM सरमा ने इसे बहुत अफसोस की बात बताया कि असम के पूर्व CM तरुण गोगोई के बेटे ने अपने बेटे का इंडियन पासपोर्ट सरेंडर कर दिया।

CM ने एक और गंभीर आरोप लगाया कि जब बेटे कबीर गोगोई के पास इंडियन पासपोर्ट था, तो उसका धर्म हिंदू लिखा था, लेकिन उसके ब्रिटिश पासपोर्ट में किसी धर्म का जिक्र नहीं है। दूसरी तरफ बेटी माया गोगोई के ब्रिटिश पासपोर्ट में उसका धर्म क्रिश्चियन लिखा है।

CM सरमा ने कहा कि उनके बेटे का ईसाई में धर्मांतरण हो रहा है और गौरव गोगोई अब अपने ही परिवार में धार्मिक अल्पसंख्यक हैं।

हिमंता सरमा ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा, “SIT ने सबूत दिया है कि तीन लोगों का पाकिस्तान से सीधा लिंक है— अली तौकीर शेख, एलिजाबेथ गोगोई और गौरव गोगोई। SIT रिपोर्ट देखने के बाद हमारे कैबिनेट मंत्री भी हैरान रह गए।”

उन्होंने आगे कहा कि शुरू में असम पुलिस की CID जाँच कर रही थी। उसमें जब गंभीरता का अंदाजा लगा तो इंटरपोल की मदद की जरूरत पड़ी और असम पुलिस के अधिकार क्षेत्र से बाहर के क्लासिफाइड डेटा तक पहुँच की जरूरत थी। कैबिनेट ने 7 फरवरी को रिपोर्ट पर चर्चा की। कैबिनेट ने कॉन्फिडेंशियल बातों को छोड़कर इसके कुछ हिस्से को बताने की मंजूरी दी। कैबिनेट ने आगे की जाँच के लिए रिपोर्ट को केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजने का फैसला किया है।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने यह भी सवाल उठाया है कि गौरव गोगोई से शादी के इतने साल बाद भी एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई ने अपना UK वीजा क्यों रखा है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि उनके बच्चे भी ब्रिटिश नागरिक क्यों हैं और भारतीय नागरिकता के लिए कोई आवेदन क्यों नहीं किया गया है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

गरीब-पिछड़े छात्रों का ‘अभ्युदय’: CM योगी के ड्रीम प्रोजेक्ट से PCS-NEET-JEE की राह आसान, जानिए कैसे फ्री कोचिंग से UP सरकार प्रतिभाओं को रही तराश

शिक्षा हमेशा से केवल ज्ञान का माध्यम नहीं रही बल्कि सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा हथियार भी रही है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और सामाजिक रूप से विविध राज्य में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना और उसके बाद समाज में बदलाव लाना कई छात्रों का सपना रहता है लेकिन हकीकत यह है कि लाखों गरीब और गाँव के छात्र, चाहे उनमें कितनी भी प्रतिभा क्यों न हो सिर्फ इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि वे महँगी कोचिंग नहीं ले पाते।

दिल्ली, कोटा जैसे शहरों में UPSC, PCS, NEET या JEE की तैयारी के लिए लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं जो एक सामान्य किसान, मजदूर या निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के लिए लगभग असंभव होता है। इसी सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया और मुफ्त कोचिंग के लिए ‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना‘ की शुरुआत की। यह योजना केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए उम्मीद की नई शुरुआत बन गई जिनके पास सपने तो थे लेकिन साधन नहीं थे।

क्या है यह योजना?

‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना’ की शुरुआत 16 फरवरी 2021 को बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रेरणा से की गई थी। इसका मकसद ऐसे प्रतिभाशाली छात्रों को मुफ्त कोचिंग देना है, जो आर्थिक कमजोरी या संसाधनों की कमी के कारण निजी कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। सरकार प्रदेश में युवाओं के लिए 8 नि:शुल्क आवासीय और 150 मुख्यमंत्री अभ्युदय कोचिंग चला रही है। कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस कोचिंग बनने से जुड़ा एक किस्सा भी सुनाया था।

मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना के तहत कई बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जाती है। इसमें संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) की प्रारंभिक और मुख्य परीक्षाओं के साथ साक्षात्कार की तैयारी शामिल है। इसके अलावा JEE और NEET जैसी इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के लिए भी प्रशिक्षण दिया जाता है। वहीं, NDA और CDS जैसी रक्षा सेवाओं से जुड़ी परीक्षाओं की तैयारी की सुविधा भी इस योजना में उपलब्ध है।

योजना के अंतर्गत छात्रों को पढ़ाई की कई सुविधाएँ मुफ्त में दी जाती हैं। छात्रों के लिए ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों तरह की कक्षाएँ चलाई जाती हैं ताकि वे अपनी सुविधा के अनुसार पढ़ सकें। इसके साथ ही ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म की सुविधा दी गई है। सरकारी अधिकारी और विषय विशेषज्ञ छात्रों को मार्गदर्शन देते हैं और उनकी शंकाओं का समाधान करते हैं। छात्रों को करियर काउंसलिंग, पुस्तकालय की सुविधा और इंस्पिरेशनल क्लासेज भी उपलब्ध कराई जाती हैं।

इस योजना के तहत देश के अनुभवी अधिकारी और विशेषज्ञ छात्रों की मदद करते हैं। इसमें 500 से अधिक IAS अधिकारी, 450 से ज्यादा PCS अधिकारी, 300 से अधिक IFS अधिकारी और विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ इस टीम में शामिल हैं। ये सभी अधिकारी और विशेषज्ञ छात्रों के लिए पढ़ाई की सामग्री तैयार करते हैं और ऑफलाइन कक्षाओं के साथ-साथ ऑनलाइन सेशन के जरिए मार्गदर्शन देते हैं ताकि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों को सही दिशा और बेहतर शिक्षा मिल सके।

इतना ही नहीं, छात्रों को इंटरव्यू की तैयारी के लिए ‘मॉक इंटरव्यू’ की सुविधा भी दी जाती है, जिससे वे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा में शामिल हो सकें। सरकार का कहना है कि इस योजना के जरिए कमजोर वर्ग के प्रतिभाशाली छात्रों को आगे बढ़ने का अवसर मिल रहे हैं और उन्हें प्रशासनिक सेवाओं सहित विभिन्न क्षेत्रों में सफलता हासिल करने में भी यह योजना मदद कर रही है।

कैसे कर सकते हैं रजिस्ट्रेशन?

‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना’ के तहत अब प्रदेश के सभी 75 जिलों में मुफ्त कोचिंग की सुविधा उपलब्ध है। इस योजना के जरिए गरीब और ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिभाशाली छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराई जा रही है। योजना में प्रवेश के इच्छुक छात्र ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से पंजीकरण कर सकते हैं। छात्र abhyuday.up.gov.in, abhyudayup.in और yuvasathi.in वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। वहीं, ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन के लिए आम तौर पर जिले के विकास भवन स्थित समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय में पंजीकरण की सुविधा दी जाती है। पंजीकरण के बाद छात्रों का एक व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया जाता है, जिसके माध्यम से आगे की सभी जानकारियाँ साझा की जाती हैं।

‘मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना’ में रजिस्ट्रेशन के लिए कुछ जरूरी दस्तावेजों की आवश्यकता होती है। इसमें आधार कार्ड, उत्तर प्रदेश का निवास प्रमाण पत्र (डोमिसाइल), आय प्रमाण पत्र, शैक्षणिक प्रमाण पत्र जैसे 10वीं, 12वीं या ग्रेजुएशन की मार्कशीट और पासपोर्ट साइज फोटो शामिल हैं। इन दस्तावेजों के माध्यम से छात्रों की पहचान, निवास और आर्थिक स्थिति का सत्यापन किया जाता है।

पात्रता और चयन प्रक्रिया

योजना में प्रवेश के लिए पात्रता भी परीक्षा के अनुसार तय की गई है। JEE और NEET की तैयारी के लिए विज्ञान वर्ग के वे छात्र पात्र हैं, जो कक्षा 11 या 12 में पढ़ रहे हैं या परीक्षा पास कर चुके हैं। IAS और PCS जैसी सिविल सेवा परीक्षाओं के प्रशिक्षण के लिए स्नातक अंतिम वर्ष के छात्र या स्नातक पास कर चुके छात्र आवेदन कर सकते हैं। वहीं, NDA और CDS जैसी रक्षा सेवाओं की परीक्षाओं के लिए पात्रता संबंधित परीक्षा के नियमों के अनुसार होती है।

छात्रों के चयन की प्रक्रिया भी तय की गई है। आम तौर पर कोचिंग का सत्र 1 जुलाई से 30 अप्रैल तक चलता है। हर वर्ष निर्धारित तिथियों के अनुसार संबंधित कोर्स के लिए चयन प्रक्रिया तय की जाती है। छात्रों का चयन प्रवेश परीक्षा, मेरिट सूची या साक्षात्कार के आधार पर किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया जिला स्तरीय समिति द्वारा निर्धारित की जाती है ताकि योग्य छात्रों को योजना का लाभ मिल सके।

गाजियाबाद जिले में इस योजना के कोर्स-को-ऑर्डिनेटर रहे अविनाश ने ‘ऑपइंडिया’ से बातचीत में इस योजना को आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर बताया है। उनके अनुसार, यह योजना उन प्रतिभाशाली छात्रों के लिए वरदान साबित हो रही है जो संसाधनों की कमी के कारण महँगी कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई नहीं कर पाते थे। उन्होंने कहा कि ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से कक्षाएँ संचालित होने के कारण दूर-दराज और ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र भी इस योजना से जुड़ पा रहे हैं। हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि यदि हर जिले में डिजिटल संसाधनों को और मजबूत किया जाए तो ज्यादा छात्रों को लाभ मिल सकता है।

सैकड़ों छात्रों ने लिखी सफलता की कहानी

यह योजना छात्रों के लिए एक प्रभावी मंच साबित हो रही है। इस योजना के तहत मिलने वाली मुफ्त कोचिंग और मार्गदर्शन से छात्रों ने बड़ी-बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल की है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की PCS मुख्य परीक्षा 2024 में अभ्युदय योजना से जुड़े कुल 75 छात्र सफल हुए हैं। इनमें सबसे अधिक 40 छात्र भागीदारी भवन, लखनऊ से चयनित हुए हैं। इसके अलावा लखनऊ के आदर्श पूर्व परीक्षा प्रशिक्षण केंद्र से 18 छात्र और हापुड़ के IAS/PCS कोचिंग सेंटर से 17 छात्रों ने मुख्य परीक्षा में सफलता प्राप्त की है।

इससे पहले भी अभ्युदय योजना के छात्र विभिन्न परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन कर चुके हैं। UPSC 2023 में इस योजना से जुड़े 23 छात्रों का चयन हुआ था। वहीं, UPPCS 2023 में 30 छात्रों ने सफलता हासिल की थी। इसी तरह JEE मेन्स 2024 में 35 छात्र सफल हुए हैं जो इस बात का प्रमाण है कि योजना न केवल सिविल सेवा बल्कि इंजीनियरिंग जैसी कठिन परीक्षाओं में भी छात्रों को आगे बढ़ने का मौका दे रही है।

सरकार के अनुसार, आगामी सत्र के लिए विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु लगभग 27,000 छात्रों ने पंजीकरण कराया है। इतनी बड़ी संख्या में छात्रों का जुड़ना इस बात का संकेत है कि अभ्युदय योजना पर छात्रों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है। खास बात यह है कि इस योजना से सबसे ज्यादा लाभ ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को मिल रहा है, जिन्हें पहले अच्छे मार्गदर्शन और संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता था।

योगी सरकार का समाज बदलने वाला साहसिक कदम

पहले सिविल सेवा या डॉक्टर-इंजीनियर बनने का सपना केवल बड़े शहरों और संपन्न वर्ग के बच्चों तक सीमित था। अब गाँवों और गरीब परिवारों के बच्चे भी इस क्षेत्रों में पहुँच रहे हैं। जब किसी छोटे गाँव का छात्र IAS या PCS बनता है, तो वह केवल अपनी किस्मत नहीं बदलता, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।

योगी सरकार की इस योजना की तारीफ इसलिए जरूरी है क्योंकि इसने शिक्षा को केवल निजी संस्थानों के भरोसे छोड़ने के बजाय सरकारी जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया। आज देश में कोचिंग उद्योग अरबों रुपए का कारोबार बन चुका है, जहाँ गरीब छात्रों के लिए जगह बहुत सीमित है। ऐसे में राज्य सरकार द्वारा मुफ्त कोचिंग की व्यवस्था करना एक साहसिक फैसला है।

हालाँकि, किसी भी बड़ी योजना की तरह अभ्युदय कोचिंग के सामने भी चुनौतियाँ रही हैं। कुछ जगहों पर संसाधनों की कमी, शिक्षकों की गुणवत्ता या अन्य समस्याओं की शिकायतें आई हैं। इसके बावजूद यह तथ्य नहीं बदला जा सकता कि अभ्युदय योजना ने हजारों छात्रों को वह अवसर दिया जो पहले उनके लिए उपलब्ध नहीं था। योगी सरकार इस योजना को केवल एक सरकारी घोषणा नहीं बल्कि लंबे वक्त के लिए शैक्षिक सुधार के तौर में देख रही है।

‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रगान बनने योग्य नहीं, ‘आनंदमठ’ एक इस्लाम-विरोधी किताब: कर्नाटक के संगीतकार TM कृष्णा ने उगला जहर, जानिए कैसे हिंदू घृणा आई सामने

कर्नाटक के संगीतकार टीएम कृष्णा अपने राजनीतिक बयानों को लेकर अक्सर विवादों में रहते हैं। हाल ही में उन्होंने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ और हिंदुओं को लेकर विवादित बातें कही हैं। अपनी किताब का प्रचार करने के लिए यूट्यूब चैनल ‘द देशभक्त’ को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने वंदे मातरम्, आनंदमठ और हिंदू पहचान के लेकर अपनी नापसंदगी खुलकर जाहिर की।

बता दें कि ‘वंदे मातरम्’ प्रसिद्ध भारतीय लेखक और उपन्यासकार बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था। इसे उन्होंने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में प्रस्तुत किया था। यह उपन्यास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और बंगाल में पडे अकाल की पृष्ठभूमि पर आधारित है।

‘वंदे मातरम्’ शब्द स्वतंत्रता सेनानियों के बीच एक लोकप्रिय नारा बन गया था। ब्रिटिश शासन के समय, जब देश कठिन दौर से गुजर रहा था, तब इससे उन्हें प्रेरणा और शक्ति मिलती थी। यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों के अपने देश के प्रते गहरे प्रेम को दर्शाता है, जिसे वे ‘माँ’ के रूप में पूजते थे और उसे गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के उनके संकल्प को भी व्यक्त करता है।

वंदे मातरम में भारत माता को हिंदू देवी के रूप में दर्शाया: टीएम कृष्णा

हालाँकि, टीएम कृष्णा इस गीत के भक्ति भाव को पूरी तरह समझने में असफल हैं और इसे ‘जटिल’ बताते हुए कहते हैं कि यह देश का राष्ट्रगान बनने के योग्य नहीं था। वे कहते हैं, “बहुत साफ शब्दों में कहूँ तो वंदे मातरम का राष्ट्रगान कभी हो ही नहीं सकता था, क्यों वंदे मातरम् एक जटिल गीत है…।”

इसके बाद वे अपनी आलोचात्मक राय को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। वे गीत की संरचना में कमी निकालते हैं और यह भी बताते हैं कि चटर्जी ने इस गीत को एक ही बार में नहीं, बल्कि अलग-अलग चरणों में लिखा था। मानो यही बात इस गीत को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किए जाने से अयोग्य ठहराने के लिए पर्याप्त हो।

वो नोबेल पुरस्कार विजेता रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिए गए भारतीय राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ की तुलना ‘वंदे मातरम्’ से करते हैं। जहाँ दोनों गीत अलग-अलग दृष्टिकोण से भारत का गुणगान करते हैं, वहीं कृष्णा का दावा है कि ‘वंदे मातरम’ की तुलना में ‘जन गण मन’ के लिए अधिक उपयुक्त है। वे ‘वंदे मातरम्’ को हिंदू पहचान से जोड़कर देखते हैं और उसे उसी दायरे तक सीमित मानते हैं, जिससे उन्हें स्पष्ट रूप से घृणा करते हैं।

इसके अलावा, वे ‘वंदे मातरम्’ के अंतिम कुछ ‘स्वर’ या भाव में बदलाव की ओर ध्यान खींचते हैं। उनका कहना है कि इन अंतरों में भारत माता को एक ‘हिंदू देवी’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसे लेकर भी उन्हें इस गीत से आपत्ति है।

‘आनंदमठ’ एक मुस्लिम-विरोधी किताब है: टीएम कृष्णा

टीएम कृष्णा की हिंदू-घृणा यही नहीं रुकती, बल्कि वे किताब ‘आनंदमठ’ को लेकर भी झूठ और भ्रामक दावे करने लग जाते हैं। कृष्णा दावा करते हैं कि उन्होंने ‘आनंदमठ’ के दो अनुवाद पढ़े हैं, और उसे पढ़ने से पता लगा कि यह किताब केवल तत्कालीन सरकार की विरोधी ही नहीं, बल्कि मुस्लिम-विरोधी भी है।

कृष्णा का कहना है, “इस किताब में यह गीत हिंदू सन्यासियों द्वारा गाया जाता है, जब वे उन गाँवों पर हमला कर रहे होते हैं, जहाँ मुस्लिम रहते हैं। यह किताब हिंदू समुदाय की श्रेष्ठता स्थापित करती है और उनके नियंत्रण के फिर से लौटने की आवश्यकता को दिखाती है।”

क्या कोई कह सकता है कि एक ‘कलाकार’ होने के नाते कृष्णा को गीत की ‘संरचना’ या उसके ‘स्वर’ को लेकर अपनी राय रखने का अधिकार है। लेकिन गीत की संरचना की आलोचना से आगे बढ़ते हुए वे इस पर व्यापक और सामान्य आरोप लगाने लगते हैं। वे गीत की प्रशंसा और समर्थन करने वाले लोगों को एक तरह के समूह या पंथ के रूप में पेश करते हैं।

वे कहते हैं, और दिलचस्प बात यह है कि जो लोग आमतौर पर ‘वंदे मातरम्’ का समर्थन करते हैं, वही लोग ‘समान नागरिक संहिता’ की बात भी करते हैं, ‘एक भाषा’ की बात भी करते हैं। उनमें से कुछ यह भी कहते हैं कि संविधान की प्रस्तावना में भगवान का उल्लेख होना चाहिए और ‘धर्मांतरण विरोध’ की भी बात करते हैं।

टीएम कृष्ण और उनकी हिंदू-घृणा

जब टीएम कृष्ण लगातार गीत की आलोचना करते रहते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि उन्हें असल में गीत से नहीं, बल्कि उस बड़ी सोच से परेशानी है, जिसका प्रतीक वे इस गीत को मानते हैं। वे कहते हैं “तो अगर आप देखें, तो वंदे मातरम् उस पूरी सोच का प्रतीक है, जिसे वे भारत मानते हैं, एक हिंदू भारत, एक प्रभुत्व वाला हिंदू भारत, जिसमें दूसरों को तभी जगह दी जा सकती है, जब वे भावनात्मक रूप से अदीन रहें या यह मान लें कि हमारे पूर्व हिंदू थे।”

ऊपर कोट कृष्णा के बयानों से यह साफ हो जाता है कि उनके गुस्से और कटुता का असली निशाना न तो ‘आनंमठ’ है और न ही ‘वंदे मातरम्’, बल्कि वह हिंदू पहचान है, जिसे वे इन दोनों से जोड़ते हैं। कृष्णा अपनी हिंदू-विरोधी सोच को देश की ‘धर्मनिरपेक्ष’ भावना के प्रति चिंता के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं और यह संकेत देते हैं कि हिंदू पहचान अपने आप में एक समानता पर आधारित समाज के विपरीत है।

वे भारत की अपनी कल्पना को ऐसा देश बताते हैं, जहाँ सभी समुदायों के लोगों को जगह मिलती है और किसी के साथ धर्म या विचारधारा के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता। लेकिन ऐसा कहते हुए ही कृष्णा की दोहरी सोच और पाखंड सामने आता जाता है।

साल 2018 में टीएम कृष्णा ने खुले तौर पर यह स्वीकार किया था कि केरल जैसे राज्यों में जब कम्युनिस्टों या इस्लामी संगठनों द्वारा RSS के सदस्यों की हत्या होती है, तो उन्हें कोई सहानुभूति महसूस नहीं होती। इतनी ही नहीं, उन्होंने इसके लिए सीधे तौर पर BJP को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि उसी ने उन्हें इतना ‘असभ्य’ और ‘अमानवीय’ बना दिया है।

जो कृष्णा हर विचारधारा को जगह देने की बात करते हैं, वही खुद उन विचारधाराओं के प्रति असहिष्णुता दिखा चुके हैं जो उन्हें पसंद नहीं हैं, जिनमें हिंदू विचारधारा भी शामिल है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

जाति व्यवस्था को लेकर हिन्दुओं को घेरने वाले बता रहे पूला एंथनी को पहला ‘दलित’ बिशप: ईसाइयत अपनाने के बाद कैथोलिक को लीड करने वाला SC कैसे?

हैदराबाद के आर्कबिशप कार्डिनल पूला एंथनी को कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया का अध्यक्ष चुना गया है। CBCI भारत में कैथोलिक क्रिश्चियंस का ऐसा संगठन है, जो धार्मिक नियम कानून तय करता है।

पूला एंथनी को अध्यक्ष चुने जाने को मीडिया में ऐसे दिखाया गया कि एंथनी देश के पहले ऐसे दलित क्रिश्चियन हैं, जो देश के लगभग 2 करोड़ कैथोलिक को लीड करेंगे!

दलित और क्रिश्चियन एक साथ कैसे?

अब सवाल ये उठता है कि आखिर कोई दलित और क्रिश्चियन एक साथ कैसे हो सकता है? ईसाई तो कैथोलिक होते हैं, प्रोटेस्टेंट होते हैं और जाति व्यवस्था तो हिंदुओं में होती है।

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र…अगड़ा-पिछड़ा, दलित-OBC ये सब तो हिंदुओं के वर्गीकरण हैं? फिर भला कार्डिनल एंथनी दलित कैसे हुए और ‘दलित’ रहते हुए वो ईसाइयत के प्रति कितने समर्पित हो सकते हैं। इसके बावजूद मीडिया में ये कहा जा रहा है कि वो दलित हैं! ईसाइयों में जब सब बराबर होते हैं, तो फिर कोई दलित कैसे हो गया।

ईसाइयत की किताब बाइबिल तक कहती है कि सब बराबर हैं, सबको गॉड ने बनाया है। सब गॉड के लिए बराबर हैं। भारत में गाँव-गाँव धर्मांतरण करवाती मिशनरियाँ यही बताती घूमती हैं कि सनातन छोड़ोगे, तो जाति व्यवस्था में ऊपर बढ़ोगे? ईसाई बनोगे तो बराबर हो जाओगे। जाति व्यवस्था से मुक्ति मिलेगी।

बराबरी की बात कह बरगलाते हैं मिशनरी

जो एसटी- एससी समाज के लोग ईसाइयत को अपनाते हैं, उनके लिए यह दलील दी जाती हैं कि वे जाति व्यवस्था से तंग आकर ईसाइयत की तरफ आकर्षित हुए।

लेफ्ट लिबरल लॉबी भी इसी बात को लेकर सनातन को गालियाँ देती है कि यहाँ जाति-व्यवस्था हावी है। यहाँ कथित नीची जातियों को बराबर नहीं माना जाता, यहाँ कथित तौर पर लोगों को मंदिरों में घुसने की आजादी नहीं है, यहाँ उन्हें दलित और अगड़ा-पिछड़ा में बांटा जाता है, इसीलिए लोग सनातन छोड़ कर ईसाइयत अपना लेते हैं।

तो ये जाति सूचक शब्द आखिर ईसाई बनने के बाद भी पूला एंथनी के साथ कैसे चिपका रह गया? और अगर ईसाई बनने के बाद भी कोई दलित रह जाता है, तब तो ईसाइयत अपनाने और धर्मांतरण को लेकर जो भी प्रचार-प्रसार किया जाता है, वह सब गलत है। इसका कोई जवाब ना लेफ्ट लिबरल लॉबी के पास होगा और ना सनातन को डेंगू मलेरिया बताने वाले नेताओं के पास!

मीडिया ने भी दलित कार्डिनल एंथनी की बात कही

कार्डिनल एंथनी कैसे इतने दूर तक पहुँचे और कैसे ये ऐतिहासिक है! मीडिया यही बताने में लगा है। चाहे इंडियन एक्सप्रेस हो या टाइम्स ऑफ़ इंडिया। हर कोई इस बात को हाईलाइट कर रहा है कि देखिए दलित व्यक्ति अब 2 करोड़ लोगों के धार्मिक तौर तरीके मैनेज करेगा!

उनकी कहानी बताने वाली ईसाईयत से जुड़ी वेबसाइट्स भी कार्डिनल एंथनी में ‘दलित’ को ढूँढ रही है। बताती हैं कि दलित माता-पिता के घर पैदा हुए एंथनी युवावस्था में मिशनरी की हेल्प से गरीबी से बाहर आए। अब मिशनरी की सहायता से कैसे कोई गरीब आदमी ‘गरीबी’ से बाहर निकलता है, ये सबको पता है। पैसे का लालच, पढ़ाई और इलाज का लालच धर्मांतरण के लिए आम बात है। इसको लेकर आए दिन घटनाएँ देशभर में घटती रहती हैं।

देश का संविधान भी नहीं मानता कि ईसाईयत में कन्वर्ट होने वाला दलित रह सकता है। उन्हें माइनॉरिटी कह सकते हैं, लेकिन SC/ST नहीं कहा जाता है।

ऐसे धर्मांतरण के मामलों को लेकर साल 2004 में रंगनाथ मिश्रा आयोग बनाई गई। इस आयोग ने सिफारिश दी थी कि अनुसूचित जाति का दर्जा पूरी तरह से धर्म से अलग होना चाहिए और ईसाई और मुस्लिम दलितों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।

लेकिन UPA सरकार भी इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर पाई, क्योंकि ये आधार ही गलत है। ये सीधे तौर पर दशकों से हाशिये पर पड़े लोगों के साथ धोखा होगा। ईसाई-मुस्लिम बने लोग एससी-एसटी के अधिकारों पर डाका डालने लगेंगे।

कमेटी ने तो ये भी कहा था कि दलित क्रिश्चियन भी गैर बराबरी का शिकार है, लेकिन सवाल फिर वही है कि अगर ईसाईयत में सभी बराबर हैं तो गैर बराबरी कैसे और कोई पिछड़ा-दलित कैसे हो सकता है? सब तो चर्च जाने वाले और जीसस को मानने वाले हुए।

केरल में अगड़ा-पिछड़ा-दलित क्रिश्चियन

दरअसल ये ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल दिखाता है कि ईसाइयत अपनाने वाले लोगों को खुद मिशनरियाँ ही बराबर नहीं मानती। जो बराबरी की बात कर पिछड़ों-दलितों और जनजातीय समाज के लोगों को बरगलाते हैं और धर्मांतरण करवाते हैं, वो पहचान तब भी नहीं छूटती जब कोई ईसाइयत के ऊँचे स्थान पर पहुँच जाता है।

केरल जैसे राज्यों में तो आज भी ईसाइयों के भीतर भयानक जातिवाद है। यहाँ कुछ ईसाई अपने को ऊँची जाति का बताते हैं और दलित से ईसाइयत अपनाने वाले लोगों को हीन भावना से देखते हैं। मिशनरी यहाँ कुछ नहीं कर पातीं।

असल में बराबरी का फर्जीवाड़ा सिर्फ और सिर्फ उस सनातन को कमजोर करने के लिए है, जिसने ना सिर्फ समय आने पर अपने में बदलाव किए हैं, बल्कि ऐसी व्यवस्थाएँ बनाई हैं कि पिछड़ों की भरपाई हो। आज राम मंदिर में पुजारी दलित समाज से हैं! किसी मंदिर में कोई नहीं पूछता कि आप किस जात से हो।

‘हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं पर पूर्ण प्रतिबंध पर पुनर्विचार करें’: केरल HC ने दी ‘सौहार्दपूर्ण’ तरीका अपनाने की सलाह, जानें- इस आदेश में समस्या वाली बात क्या है

केरल हाई कोर्ट ने 30 जनवरी 2026 को कहा कि गैर-हिंदुओं के लिए हिंदू मंदिरों में प्रवेश पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने वाले नियम पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए ताकि यह संविधानिक सिद्धांतों के अनुरूप हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि धार्मिक स्थानों को नियंत्रित करने वाले कानून सामाजिक अशांति या विवाद का साधन नहीं बनना चाहिए।

यह फैसला डिवीजन बेंच ने सुनाया, जिसमें जस्टिस राजा विजयराघवन वी और जस्टिस के वी जयकुमार शामिल थे। कोर्ट ने उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें हिंदू त्योहार के दौरान मंदिर में ईसाई पुजारियों के प्रवेश को चुनौती दी गई थी।

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि वह यह देखे कि केरल हिंदू पब्लिक प्लेसेस ऑफ पब्लिक वर्शिप नियम, 1965 के नियम 3(ए) को वर्तमान रूप में बनाए रखना चाहिए या धार्मिक हितधारकों से सलाह लेकर इसमें संशोधन किया जाना चाहिए।

ऑपइंडिया ने इस फैसले का विश्लेषण किया।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला 7 सितंबर 2023 को अडूर श्री पार्थसारथी मंदिर, पथानमथिट्टा जिले में श्रीकृष्ण जयंती के समारोह के दौरान घटित घटनाओं से उत्पन्न हुआ। मंदिर प्रशासन ने समारोह के हिस्से के रूप में आयोजित सार्वजनिक कार्यक्रम में दो ईसाई पादरियों को आमंत्रित किया।

कार्यक्रम के बाद पादरियों को श्रीकोविल (अंदरूनी पूजा क्षेत्र) के पास ले जाया गया और उन्हें भेंट दी गई। चूँकि पादरी अपने पोशाक में थे, ऐसे में हिंदू भक्तों ने आपत्ति जताई और दावा किया कि केरल हिंदू पब्लिक प्लेसेस ऑफ पब्लिक वर्शिप (एथोराइजेशन ऑफ एंट्री) एक्ट, 1965 और उसके तहत बने नियमों के अनुसार गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है।

मंदिर के भक्त सनील नारायणन नंपूतिथि ने केरल हाई कोर्ट का रुख किया और मंदिर प्रशासन पर आरोप लगाया कि उन्होंने ईसाई पादरियों को प्रवेश की अनुमति देकर कानून का उल्लंघन किया। उन्होंने मंदिर सलाहकार समिति के सदस्यों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई, जिसमें उनके पद से हटाना भी शामिल था, की माँग की। साथ ही उन्होंने सभी गैर-हिंदुओं के मंदिर परिसर में प्रवेश पर रोक लगाने और परिसर की पवित्रता बहाल करने के लिए उपचारात्मक अनुष्ठानों के प्रदर्शन का निर्देश देने की भी माँग की।

गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर स्पष्ट प्रतिबंध

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 1965 के नियमों का नियम 3(ए) स्पष्ट रूप से गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश करने से रोकता है। उन्होंने कहा कि ईसाई पादरियों का खासकर पादरी के कपड़ों में प्रवेश कानून का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता का कहना था कि चाहे तांत्री द्वारा अनुमति दी गई हो या नहीं, मंदिर प्रशासन के पास कानूनी प्रतिबंध को नजरअंदाज करने का कोई अधिकार नहीं है।

इसके अलावा यह भी कहा गया कि इस प्रकार का प्रवेश स्थापित रीति-रिवाज और धार्मिक प्रथाओं को कमजोर करता है, जिससे मंदिर की पवित्रता कम हो जाती है। याचिकाकर्ता ने जोर देकर कहा कि मामला आतिथ्य या शिष्टाचार का नहीं है, बल्कि हिंदू पूजा स्थलों को नियंत्रित करने वाले कानूनी और धार्मिक मानकों के कड़ाई से पालन का है।

देवस्वोम बोर्ड और मंदिर अधिकारियों का रुख

अपने जवाबी हलफनामे में त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने माना कि मंदिर सलाहकार समिति ने श्री कृष्ण जयंती के मौके पर निकाली गई शोभा यात्रा का उद्घाटन करने के लिए एक ईसाई पादरी को बुलाया था।

कार्यक्रम के बाद पादरी और अन्य लोग मंदिर में प्रवेश करना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने पुजारियों से अनुमति माँगी। इसके बाद मंदिर के तांत्रिक ने उन्हें मंदिर में प्रवेश करने की इजाजत दे दी।

बोर्ड का कहना है कि यह प्रवेश केवल औपचारिक था और अनुमति के आधार पर हुआ था, इसे किसी का अधिकार नहीं माना जा सकता। बोर्ड ने यह भी दावा किया कि इससे मंदिर की परंपराओं, रीति-रिवाजों या धार्मिक नियमों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।

इसके अलावा, बोर्ड ने कहा कि अगर नियमों का कोई उल्लंघन हुआ भी होता, तो अधिकतम कार्रवाई सिर्फ उस व्यक्ति को मंदिर परिसर से बाहर निकालने तक ही सीमित होती, न कि मंदिर अधिकारियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कदम उठाने तक।

मंदिर सलाहकार समिति के सदस्यों ने भी बोर्ड की बात का समर्थन किया और कहा कि प्रवेश तांत्रिक की अनुमति से ही हुआ था। समिति ने यह भी बताया कि उस समय किसी भी श्रद्धालु ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। समिति का आरोप है कि यह याचिका कोर्ट की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल है और इसका मकसद बेवजह विवाद खड़ा करना है।

कोर्ट की टिप्पणियाँ

केरल हाई कोर्ट ने कहा कि केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल (प्रवेश प्राधिकरण) अधिनियम, 1965 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि हिंदुओं के सभी वर्गों और समुदायों को मंदिरों में प्रवेश मिले और जाति के आधार पर भेदभाव खत्म किया जाए।

कोर्ट ने कहा कि 1965 के नियमों का नियम 3(क) भले ही गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश से रोकता हो, लेकिन मूल कानून (अधिनियम) में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर कोई साफ और स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है।

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अधीनस्थ कानून (नियम) ऐसे प्रतिबंध नहीं लगा सकता, जो मूल अधिनियम में मौजूद ही नहीं हैं। कोर्ट ने दोहराया कि प्रत्यायोजित कानून का काम मूल कानून को पूरा करना है, न कि उसे बदलना या उसकी जगह लेना।

कोर्ट के निष्कर्ष और निर्णय

अपने फैसले में कोर्ट ने यह साफ किया कि किसी के अधिकार के रूप में मंदिर में प्रवेश करने और तांत्रिक द्वारा अतिथि या आमंत्रित व्यक्ति के रूप में अनुमति देने में फर्क है। कोर्ट ने माना कि मंदिर की धार्मिक और आध्यात्मिक व्यवस्था में तांत्रिक की महत्वपूर्ण और आधिकारिक भूमिका होती है। इसलिए, तांत्रिक द्वारा दी गई अनुमति को कानूनी उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का मकसद समाज में सौहार्द और भाईचारा बनाए रखना है। कोर्ट के अनुसार, कानूनों को समय के साथ बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार विकसित होना चाहिए।

कोर्ट ने चेतावनी दी कि अधीनस्थ नियमों की सख्त और कठोर व्याख्या से धार्मिक तनाव या असंतुलन पैदा नहीं होना चाहिए। हालाँकि, कोर्ट ने नियम को रद्द करने से इनकार कर दिया और यह फैसला सरकार पर छोड़ दिया कि देवस्वोम बोर्ड, तांत्रिकों, धार्मिक विद्वानों और अन्य संबंधित पक्षों से सलाह लेने के बाद नियम में बदलाव किया जाए या नहीं।

यह फैसला मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण और हिंदुओं के लिए अन्यायपूर्ण क्यों है?

इस फैसले को संविधानिक सद्भाव की रक्षा के रूप में दिखाया जा रहा है, लेकिन यह एक पुरानी और गंभीर समस्या को उजागर करता है, यानी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदू धार्मिक स्थलों में बार-बार न्यायिक हस्तक्षेप।

भारत और दुनिया के कई हिस्सों में धर्म के आधार पर पूजा स्थलों में प्रवेश की सीमाएँ सामान्य रूप से लागू हैं और इन्हें विवादास्पद नहीं माना जाता। उदाहरण के तौर पर, गैर-मुसलमानों को मक्का और मदीना में प्रवेश की अनुमति नहीं है।

वेटिकन में भी धार्मिक नियमों के अनुसार सख्त प्रवेश व्यवस्था है। कई चर्च और सिनेगॉग भी बड़े धार्मिक कार्यक्रमों में केवल अपने अनुयायियों को ही प्रवेश देते हैं। इन नियमों को न तो असंवैधानिक कहा जाता है और न ही समाज को बाँटने वाला।

लेकिन जब बात हिंदू मंदिरों की आती है, तो वे अक्सर अदालती जाँच, नए अर्थों और नैतिक दबाव के दायरे में आ जाते हैं। केरल हाई कोर्ट का यह संकेत कि गैर-हिंदुओं पर प्रतिबंध असंवैधानिक हो सकता है, इस बात को नजरअंदाज करता है कि धार्मिक संस्थानों को अपनी आध्यात्मिक पहचान बनाए रखने का अधिकार है। मंदिरों को पर्यटन स्थल नहीं बनाया जा सकता।

यह तर्क कि हिंदू धर्म सिर्फ एक जीवन शैली है और इसलिए सभी के लिए खुला होना चाहिए, बार-बार हिंदू धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करने के लिए इस्तेमाल किया गया है।

यह भूल जाता है कि हिंदू मंदिर सार्वजनिक पार्क या सांस्कृतिक भवन नहीं हैं, बल्कि पवित्र स्थल हैं, जो आगम, परंपरा और सदियों पुराने धार्मिक नियमों से संचालित होते हैं और भी चिंता की बात यह है कि कोर्ट ने उस नियम पर सवाल उठाया, जो हिंदू मंदिरों की पवित्रता की रक्षा के लिए बनाया गया था, जबकि यह अधिनियम खुद हिंदू धार्मिक मामलों में सरकारी हस्तक्षेप का नतीजा है।

हिंदू मंदिर पहले से ही देवस्वोम बोर्डों के जरिए सरकारी नियंत्रण में हैं, जबकि मस्जिद और चर्च अधिक स्वतंत्र हैं। अब अगर हिंदुओं से यह भी छीन लिया जाए कि कौन उनके पवित्र स्थलों में प्रवेश कर सकता है, तो यह धर्मनिरपेक्षता का असमान और पक्षपाती प्रयोग होगा।

धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह नहीं है कि हिंदू हर चीज और हर किसी को बिना सवाल स्वीकार करें, खासकर जब अन्य धर्म अपनी विशिष्टता और सीमाओं को बिना किसी विवाद के लागू करते हैं। हिंदू अकेले धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार नहीं हैं और उनके मंदिर सामाजिक प्रयोगों की प्रयोगशाला नहीं होने चाहिए।

आप यहाँ फैसला पढ़ सकते हैं /

(यह रिपोर्ट मुख्य रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)



SC/ST एक्ट पर सवाल उठाना न तो अपराध है, न ही ‘सवर्ण वर्चस्व’ का प्रमाण

हरिनगर, बिहार के दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान थाना क्षेत्र का एक ब्राह्मण बहुल गाँव है। आज यह गाँव अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (SC/ST Act) के दुरुपयोग के कारण राष्ट्रीय चर्चा में है।

इस गाँव के 70 ब्राह्मणों को SC/ST एक्ट में नामजद किया गया है। साथ ही 100-150 अज्ञात भी एफआईआर में जोड़ दिए गए हैं। नतीजा यह है कि भय और गिरफ्तारी की आशंका से गाँव के अधिकांश पुरुष घर छोड़ चुके हैं। पीछे छूट गई हैं रोती-बिलखती महिलाएँ, बुजुर्ग और युवतियाँ। गाँव में पुलिस तैनात है, शांति समिति की बैठकें हो रही है, लेकिन न्याय कहीं दिखाई नहीं देता।

यह बात पुलिस भी स्वीकार कर चुकी है कि पूरा विवाद मजदूरी के पुराने झगड़े से शुरू हुआ। विवाद के दो पक्ष हैं- एक ब्राह्मण और दूसरा पासवान। लेकिन SC/ST एक्ट के प्रयोग ने इस विवाद को ऐसा रूप दे दिया कि एक पक्ष स्वतः अपराधी और दूसरा स्वतः पीड़ित घोषित कर दिया गया।

यह भी सामने आया है कि कई ऐसे ब्राह्मणों पर भी एफआईआर हुई है जो घटना के समय गाँव में थे ही नहीं। पहले मारपीट एक ब्राह्मण के साथ हुई थी। ब्राह्मणों को गाली-गलौच का सामना करना पड़ा। ब्राह्मण पक्ष की शिकायत पर भी पूर्व में एक एफआईआर दर्ज हुई थी, लेकिन उनके पास SC/ST एक्ट जैसा कोई ‘कवच’ नहीं था।

यही इस पूरे प्रकरण की केन्द्रीय विडंबना है।

पुलिस की विवशता या प्रणाली की विफलता?

स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब पुलिस जानती है कि मामला मजदूरी विवाद से जुड़ा है, तो क्या इसमें SC/ST एक्ट जैसे अत्यंत कठोर कानून का प्रयोग आवश्यक था? पुलिस ‘कानूनी बाध्यता’ की बात कर रही है, लेकिन यह बाध्यता चयनात्मक क्यों दिखती है?

यदि इसी तरह का हमला किसी ओबीसी या कथित सवर्ण जातियों पर होता या यदि ब्राह्मण टोले पर पासवानों के समूह ने हमला किया होता तो क्या तब भी इतने ही सख्त कानूनों में कार्रवाई होती?

उत्तर स्पष्ट है- नहीं। यही ‘नहीं’ बताता है कि संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और न्याय इस व्यवस्था में मिसिंग है।

जब कानून शाश्वत पीड़ित और शाश्वत शोषक तय कर दे

भारत का संविधान सामाजिक न्याय की भावना से जन्मा है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम भी उसी उद्देश्य से बना। उद्देश्य था- ​सदियों के उत्पीड़न से गुजरे समाज को सुरक्षा प्रदान करना।

लेकिन हरिनगर जैसे मामले बताते हैं कि यह कानून संरक्षण का नहीं, दुरुपयोग का औजार बन चुका है। यह ऐसा सत्य है जिसे अदालतें जानती हैं। पुलिस जानती है। आम नागरिक जानता है। तो क्या कानून बनाने वाले इससे अनजान हैं? नहीं। वे जानते हैं। लेकिन राजनीतिक नफा-नुकसान के कारण मौन हैं।

ध्यान रहे मौन रहने वाली राजनीति न तो मजबूत होती है, न न्यायपूर्ण।

कानून की सबसे बड़ी विशेषता ही सबसे बड़ी समस्या

SC/ST एक्ट की मूल विशेषताएँ हैं;

  • तुरंत गिरफ्तारी
  • जमानत पर कठोर रोक
  • शिकायत को प्रथम दृष्टया सत्य मानना

ये सब पीड़ित की सुरक्षा के लिए बनाए गए थे। लेकिन व्यवहार में यह कानून व्यक्तिगत रंजिश, भूमि विवाद, नौकरी या ठेके की लड़ाई, राजनीतिक प्रतिशोध का हथियार बन चुका है।

बरी होना भी जीवन नहीं लौटा पाता

इस कानून का दुरुपयोग कोरी कल्पना नहीं है। विष्णु तिवारी को भूमि विवाद में SC/ST एक्ट के तहत फँसाया गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बरी किया, लेकिन 20 साल जेल में बीत चुके थे। माता-पिता, भाई सब चले गए। लेकिन वे अंतिम संस्कार तक में शामिल नहीं हो सके।

लाल सिंह पर इसी कानून के तहत गेहूँ पिसाई के पैसों के विवाद को लेकर केस ठोक दिया गया। राजस्थान हाई कोर्ट से यह कलंक हटाने में उन्हें 32 साल लग गए।

इन मामलों पर सवाल उठाने को अक्सर ‘संवेदनहीनता’ या ‘सवर्ण वर्चस्व’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। ऐसा करने वाले यह भूल जाते हैं कि न्याय की बुनियाद सवालों पर ही टिकी होती है।

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जब SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई और प्रारंभिक जाँच का सुझाव दिया तो विरोध में एक संगठित दबाव खड़ा किया गया। अदालत को ‘दलित विरोधी’ बताया गया। सरकार को मजबूरन संशोधन कर कोर्ट के निर्देशों को निष्प्रभावी करना पड़ा।

यही खतरनाक पैटर्न आज UGC इक्विटी रूल पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद भी दिखाई दे रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या सामाजिक न्याय तर्क और संतुलन से नहीं, बल्कि राजनीतिक शोर और भावनात्मक ब्लैकमेल से तय होगा?

ऐसा भी नहीं है कि स्ट्रीट पावर से न्याय और संतुलन के प्रयासों को बाधित करने का काम केवल SC/ST एक्ट या UGC इक्विटी रूल तक ही सीमित है। कृषि कानूनों के मामले में भी हम ऐसा ही देख चुके हैं। किसानों के व्यापक हित के इस कानून को केवल इस कारण से वापस लेना पड़ा, क्योंकि कुछ समूह तमाम प्रयासों के बावजूद सड़क से हटने को तैयार नहीं थे। आंतरिक सुरक्षा की स्थिति को देखते हुए मजबूत सरकारों को भी कई बार लचीला रवैया अपनाना पड़ता है। ऐसे में यह समाज का भी दायित्व है कि वह न्याय और संतुलन लाने के प्रयासों में बाधक न बने। इसके पक्ष में उठने वाली आवाजों को एक समूह का विरोधी या सवर्ण मानसिकता बताकर खारिज न करे।

न्याय का अर्थ संतुलन है, पक्षपात नहीं

SC/ST एक्ट में सुधार की बात करने वाले भी मानते हैं कि भेदभाव एक कटु सत्य है। वे भी मानते हैं कि इससे बचाने के लिए कठोर कानून आवश्यक हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भेदभाव का कारण केवल जाति ही नहीं है। आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक हैसियत भी कारक हैं। हर शिकायत सच्ची नहीं होती। हर आरोपित अपराधी नहीं होता।

यदि कानून निर्दोष को भी अपराधी की तरह ट्रीट करे, तो वह सामाजिक न्याय नहीं, कानूनी आतंक बन जाता है।

समाधान क्या है?

यह लेख SC/ST एक्ट को खत्म करने की माँग नहीं करता। लेकिन यह जरूर कहता है कि झूठी शिकायतों पर सख्त कार्रवाई हो। प्रारंभिक जाँच का प्रावधान लौटे। पुलिस को विवेकाधिकार मिले। यह सुनिश्चित किया जाए कि सामाजिक न्याय के लिए लाया गया कानून राजनीतिक हथियार न बने।

भारतीय परंपरा में न्याय को धर्म कहा गया है। न्याय अंधा नहीं, विवेकशील होता है। यदि कानून विवेक खो दे, तो वह धर्म नहीं, दंड बन जाता है।

अंतिम बात

यदि पासवान टोले पर ब्राह्मणों के हमले पर SC/ST एक्ट लगेगा, तो उससे पहले ब्राह्मण पर पासवानों के हमले पर भी उतना ही कठोर कानून लगना चाहिए था। यही समानता है। यही न्याय है।

यदि हम ऐसा समाज चाहते हैं जहाँ पीड़ित को न्याय मिले और निर्दोष को बिना दोषी ठहराए जीने का अधिकार तो SC/ST एक्ट पर सवाल उठाना अपराध नहीं, हमारी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।

ध्यान रहे न्याय का उद्देश्य बदला नहीं, संतुलन होता है। जो कानून निर्दोष को भी अपराधी बना दे, वह सामाजिक न्याय नहीं, कानूनी आतंक होता है।

नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार के बाद बस्तर में राष्ट्रवाद की बहार, राष्ट्रपति ने किया ‘बस्तर पंडुम’ का उद्घाटन: जानें- जनजातीय कला और संस्कृति के इस उत्सव की गाथा

छत्तीसगढ़ का बस्तर कभी वामपंथी आतंकवाद के लिए कुख्यात रहा है। आज यहाँ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की आवाज गूँज रही है और सुनने वालों में पूर्व नक्सली भी हैं। ‘बस्तर पंडुम’ के जरिए माँ दंतेश्वरी की इस पुण्यभूमि की समृद्ध जनजातीय संस्कृति-विरासत का संरक्षण एवं संवर्धन किया जा रहा है। बस्तर में इस बदलाव को ‘डबल इंजन’ सरकार ने मुमकिन किया है।

राष्ट्रपति ने शनिवार (7 फरवरी 2026) को छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में जनजातीय संस्कृति और परंपराओं के सबसे बड़े उत्सव ‘बस्तर पंडुम’ का आज जगदलपुर में उद्घाटन किया। समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि बस्तर के लोग जीवन को उत्सव की तरह जीते हैं और यह महोत्सव दुनिया को बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति की झलक देता है। कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और अन्य मंत्री मौजूद रहे।

राष्ट्रपति ने किया भव्य प्रदर्शनी का अवलोकन

मुर्मु ने इस दौरान बस्तर की माटी की सुगंध और आदिम जनजातीय परंपराओं पर आधारित भव्य प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस दौरान वे कई स्टॉलों पर पहुँची और वहाँ मौजूद स्थानीय निवासियों और कारीगरों से कलाओं-उत्पादों के बारे में जानकारी ली। राष्ट्रपति ने ढोकरा हस्तशिल्प कला, टेराकोटा, वुड कार्विंग, सीसल कला, बाँस कला, लौह शिल्प, जनजातीय वेश-भूषा व आभूषण, तुम्बा कला, बस्तर की जनजातीय चित्रकला, स्थानीय व्यंजन और लोक चित्रों पर आधारित स्टॉल्स को देखा।

प्रदर्शनी का अवलोकन करतीं राष्ट्रपति मुर्मू

प्रदर्शनी में बस्तर की जनजातीय कला और संस्कृति की जीवंत झलक

बस्तर पंडुम के आयोजन स्थल पर लगी जनजातीय हस्तशिल्प प्रदर्शनी में आदिवासी कला और संस्कृति की खूबसूरत झलक देखने को मिली। यहाँ अलग-अलग तरह की पारंपरिक कलाओं को बहुत ही सहज और आकर्षक तरीके से प्रस्तुत किया गया था।

सबसे खास आकर्षण ढोकरा कला से बनी धातु की वस्तुएँ रहीं। इस कला में एक खास तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें पहले मोम से आकृति बनाई जाती है और फिर धातु से उसे आकार दिया जाता है। ढोकरा कला भारत की बहुत पुरानी जनजातीय परंपरा है, जिसमें प्रकृति, देवी-देवताओं और गाँव के जीवन से जुड़े दृश्य साफ दिखाई देते हैं। ढोकरा की हर वस्तु पूरी तरह हाथ से बनाई जाती है। इसे बनाने में मिट्टी, मोम, तार, पीतल और भट्टी जैसी चीजों का इस्तेमाल होता है।

प्रदर्शनी में मिट्टी से बनी टेराकोटा मूर्तियाँ भी दिखाई गईं। ये मूर्तियाँ लोक आस्था, गाँव के जीवन और पुराने विश्वासों को जीवंत रूप में दिखाती हैं। इन्हें देखकर लगता है जैसे गाँव की संस्कृति सामने आ गई हो। लकड़ी की नक्काशी की कला भी लोगों का ध्यान खींच रही थी। सागौन, साल और दूसरी लकड़ियों से बनी मूर्तियों और आकृतियों में कारीगरों की मेहनत और कल्पना साफ नजर आई। पारंपरिक औजारों से बनाई गई ये कलाकृतियाँ सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को सुंदर तरीके से दर्शाती हैं।

प्रदर्शनी का अवलोकन करतीं राष्ट्रपति मुर्मू

इसके अलावा सीसल और जूट से बने कपड़े और हस्तशिल्प भी प्रदर्शनी का हिस्सा थे। ये वस्तुएँ देखने में सुंदर होने के साथ-साथ उपयोगी भी हैं। एक स्टॉल में बाँस से बनी रोजमर्रा की चीजें और सजावटी वस्तुएँ रखी गई थीं, जो आदिवासी जीवन की सरलता को दिखाती हैं।

वहीं, लोहे से बनी कलाकृतियां भी लोगों को खास तौर पर आकर्षित कर रही थीं। जनजातीय आभूषणों का स्टॉल भी बेहद खास था। यहाँ चाँदी, मोती, शंख और अलग-अलग धातुओं से हाथ से बने गहने प्रदर्शित किए गए थे। कुल मिलाकर यह प्रदर्शनी सिर्फ कला का प्रदर्शन नहीं थी बल्कि जनजातीय जीवन, सोच और संस्कृति को करीब से समझने का अवसर थी।

बस्तर पंडुम में क्या है खास?

‘पंडुम’ शब्द का अर्थ उत्सव होता है लेकिन बस्तर पंडुम केवल उत्सव भर नहीं है। यह बस्तर की सांस्कृतिक आत्मा, जनजातीय चेतना और सामूहिक जीवन परंपरा का जीवंत प्रतीक बन चुका है। यह आयोजन आज सिर्फ सांस्कृतिक मंच नहीं रहा बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जनजातीय विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने का एक मजबूत माध्यम बनकर उभरा है।

बस्तर पंडुम के तहत सोमवार (9 फरवरी 2026) तक संभाग स्तरीय सांस्कृतिक प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएँगी, जिनमें 84 टीमों के 700 से अधिक कलाकार भाग ले रहे हैं। महोत्सव में आदिवासी नृत्य, लोकगीत, पारंपरिक वेशभूषा, हस्तशिल्प, जनजातीय खान-पान और स्वदेशी वाद्य यंत्रों का प्रदर्शन किया जा रहा है।

इस वर्ष ‘बस्तर पंडुम’ का आयोजन तीन चरणों में किया जा रहा है- पहला ग्राम पंचायत स्तर पर, दूसरा विकासखंड एवं जिला स्तर पर और तीसरा संभाग तथा राज्य स्तर पर होने वाले भव्य समापन समारोह के रूप में। इन तीनों चरणों के माध्यम से बस्तर संभाग के दूर-दराज और सुदूर अंचलों में रहने वाले आदिवासी कलाकारों, शिल्पकारों, लोक गायकों और नृत्य दलों को अपनी कला और प्रतिभा प्रदर्शित करने का व्यापक मंच मिलेगा।

बस्तर पंडुम के मंच पर माड़िया, मुरिया, गोंड, हल्बा, भतरा सहित विभिन्न जनजातियों के पारंपरिक लोकनृत्य प्रस्तुत किए जाएँगे, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता और जीवंत परंपराओं को दर्शाएँगे। वहीं, मांदर, ढोल, तिरिया और बांसुरी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज पूरे वातावरण को उत्सव और उल्लास के रंगों से भर देगी, जिससे बस्तर की सांस्कृतिक आत्मा सजीव होकर सामने आएगी।

राष्ट्रपति ने ‘बस्तर पंडुम’ के लिए छत्तीसगढ़ सरकार को सराहा

‘बस्तर पंडुम’ महोत्सव को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि उन्हें छत्तीसगढ़ आना, अपने घर आने जैसा लगता है। उन्होंने कहा, “बस्तर की सुंदरता को देखकर लगता है कि माँ दंतेश्वरी ने स्वयं इसे अपने हाथों से सजाया है।” राष्ट्रपति ने छत्तीसगढ़ सरकार की तारीफ करते हुए कहा, “इस वर्ष के पंडुम में पचास हजार से अधिक लोगों द्वारा जनजातीय संस्कृति तथा जीवन-शैली से जुड़े अनेक प्रदर्शन किए जाएँगे। बस्तर की जनजातीय संस्कृति से देशवासियों को अवगत कराने के इस महत्वपूर्ण प्रयास के लिए मैं छत्तीसगढ़ सरकार की सराहना करती हूं।”

बस्तर में विकास का नया सूर्योदय: मुर्मू

राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने संबोधन के दौरान माओवाद से मुख्य धारा में लौट रहे बस्तर की सुंदरता की तारीफ की और कहा कि यहाँ विकास का नया सूर्योदय हो रहा है। उन्होंने कहा, “माओवाद के कारण यहाँ के निवासियों ने अनेक कष्ट झेले। सबसे ज्यादा नुकसान यहाँ के युवाओं, आदिवासियों और दलित भाई-बहनों को हुआ। भारत सरकार की माओवादी आतंक पर निर्णायक कार्रवाई के परिणामस्वरूप वर्षों से व्याप्त असुरक्षा, भय और अविश्वास का वातावरण अब समाप्त हो रहा है। माओवाद से जुड़े लोग हिंसा का रास्ता छोड़ रहे हैं जिससे नागरिकों के जीवन में शांति लौट रही है।”

उन्होंने कहा, “बड़ी संख्या में नक्सलियों ने हथियार छोड़े हैं। सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि जो लोग हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटे हैं, वो सामान्य जीवन जी सकें। उनके लिए अनेक विकास और कल्याणकारी योजनाएँ चलाई जा रही हैं। राज्य सरकार की ‘नियद नेल्लानार योजना’ ग्रामीणों के सशक्तीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। सरकार के प्रयास और इस क्षेत्र के लोगों के सहयोग के बल पर आज बस्तर में विकास का नया सूर्योदय हो रहा है। गाँव-गाँव में बिजली, सड़क, पानी की सुविधा उपलब्ध हो रही है। वर्षों से बंद विद्यालय फिर से खुल रहे हैं और बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।”

राष्ट्रपति ने नक्सलवाद छोड़ मुख्यधारा में लौटे लोगों से देश के संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखने की अपील करते हुए कहा, “यह लोकतंत्र की ताकत ही है कि ओडिशा के एक छोटे से गाँव की यह बेटी, भारत की राष्ट्रपति के रूप में आपको संबोधित कर रही है।” उन्होंने कहा कि गरीब, वंचित और पिछड़े वर्गों का कल्याण करना सरकार की विशेष प्राथमिकता है। पीएम जनमन योजना और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से सबसे पिछड़ी जनजातियों के गाँवों को विकास से जोड़ा जा रहा है।

सरेंडर कर चुके नक्सली भी पहुँचे राष्ट्रपति को सुनने

यहाँ बस्तर पंडुम कार्यक्रम में राष्ट्रपति के संबोधन को सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुँचे, जिनमें सरेंडर कर चुके पूर्व नक्सली भी शामिल थे। कार्यक्रम स्थल पर मौजूद कुछ पूर्व नक्सलियों ने बताया कि वे राष्ट्रपति के विचारों को सुनने और भविष्य को लेकर उनके संदेश को समझने के उद्देश्य से यहाँ आए थे।

छत्तीसगढ़ में कभी करोड़ों रुपए के इनामी रहे सरेंडर नक्सली रूपेश ने कहा कि वे देश और समाज के भविष्य से जुड़े विचारों को जानना चाहते थे, इसलिए राष्ट्रपति का संबोधन सुनने पहुंचे।

2 दिवसीय ‘बस्तर पंडुम’ उत्सव में जनजातीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं का रंगारंग प्रदर्शन जारी है। विभिन्न जनजातियों द्वारा पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, वाद्ययंत्र, वेशभूषा और रीति-रिवाजों की मनमोहक प्रस्तुतियाँ दी जा रही हैं, जिसने पूरे आयोजन को सांस्कृतिक उत्सव में बदल दिया है।

CM विष्णुदेव साय ने क्या कहा?

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि ‘बस्तर पंडुम’ केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और समृद्ध विरासत को समर्पित एक व्यापक मंच है। उन्होंने बताया कि इस बार बस्तर पंडुम के तहत 12 विभिन्न विधाओं में 54000 से अधिक प्रतिभागियों ने पंजीयन कराया, जो इस आयोजन की बढ़ती लोकप्रियता और जनभागीदारी को दर्शाता है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि जो बस्तर कभी नक्सल भय के लिए जाना जाता था, आज वहाँ विकास की नई तस्वीर उभर रही है। सरकार ने 31 मार्च 2026 तक पूरे बस्तर को नक्सलमुक्त करने का लक्ष्य तय किया है। उन्होंने यह भी कहा कि कई गांवों में पहली बार तिरंगा फहराया गया है, जो क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और विकास के नए दौर की शुरुआत का प्रतीक है।

India-US Trade Deal की सबसे जरूरी बातों को समझें, कैसे ये भारत के हित में रही: मोदी सरकार ने कृषि-डेयरी सेक्टर को प्रोटेक्ट करने के लिए उठाए क्या कदम

भारत और अमेरिका के बीच फरवरी 2026 में जिस अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Agreement के ढाँचे पर सहमति बनी है, उसे दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों में एक बड़ा और निर्णायक कदम माना जा रहा है। यह समझौता ऐसे समय में सामने आया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिरता, सप्लाई चेन संकट और भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रही है।

भारत और अमेरिका, दोनों ही देश इस बात को समझते हैं कि आने वाले समय में व्यापार केवल मुनाफे का साधन नहीं रहेगा, बल्कि भरोसेमंद साझेदारी, तकनीकी सहयोग और रोजगार सृजन का मजबूत आधार बनेगा।

यही वजह है कि इस अंतरिम ट्रेड डील को जल्दबाजी में किया गया फैसला नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया एक संतुलित ढाँचा कहा जा रहा है।

इस समझौते की सबसे खास बात यह है कि जहाँ एक ओर भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका का विशाल बाजार खुलने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर भारत ने अपने किसानों, डेयरी सेक्टर और ग्रामीण आजीविका से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखा है।

पीएम मोदी ने बताया दोनों देशों के लिए अच्छी खबर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार (7 फरवरी 2026) को X पर एक पोस्ट में इसे भारत-अमेरिका के लिए बहुत अच्छी खबर बताया है। PM मोदी ने कहा, “दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार समझौते (Interim Trade Agreement) के लिए एक ढाँचा तय हुआ है। मैं राष्ट्रपति ट्रंप को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत बनाने में व्यक्तिगत रुचि दिखाई।”

उन्होंने लिखा, “यह ढाँचा हमारे साझेदारी संबंधों में बढ़ती गहराई, भरोसे और ऊर्जा को दिखाता है। इससे ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती मिलेगी और भारत के मेहनती किसानों, उद्यमियों, MSMEs, स्टार्टअप इनोवेटर्स, मछुआरों और अन्य लोगों के लिए नए अवसर खुलेंगे। इससे महिलाओं और युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होंगे। भारत और अमेरिका दोनों नवाचार (Innovation) को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह ढाँचा निवेश और तकनीकी सहयोग को और मजबूत करेगा।”

वहीं केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बताया है कि इससे भारतीय निर्यातकों के लिए 30 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी बाजार के दरवाजे खुलेंगे। उन्होंने कहा, “इसका सबसे ज्यादा फायदा छोटे उद्योगों (MSMEs), किसानों और मछुआरों को होगा। निर्यात बढ़ने से महिलाओं और युवाओं के लिए लाखों नए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।”

अंतरिम ट्रेड डील का मतलब क्या है और यह क्यों जरूरी थी?

अंतरिम ट्रेड डील का सीधा मतलब है कि यह कोई अंतिम या पूर्ण व्यापार समझौता नहीं है, बल्कि भारत और अमेरिका के बीच होने वाले बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement- BTA) की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है।

फरवरी 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने BTA की औपचारिक शुरुआत की थी, लेकिन ऐसे व्यापक समझौतों को अंतिम रूप देने में आमतौर पर कई साल लग जाते हैं। इसी देरी को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों ने तय किया कि पहले एक ऐसा ढाँचा बनाया जाए, जिससे व्यापारिक रिश्तों को तुरंत गति मिल सके।

इस अंतरिम ढाँचे के जरिए दोनों देशों ने बाजार तक पहुँच बढ़ाने, टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने और सप्लाई चेन को ज्यादा मजबूत व भरोसेमंद बनाने पर सहमति जताई है।

यह समझौता इस बात का भी संकेत देता है कि भारत और अमेरिका लंबे समय तक आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और वे वैश्विक व्यापार में एक-दूसरे को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखते हैं।

अमेरिका का बाजार खुला: भारत को व्यापार और निर्यात में क्या मिला?

इस समझौते से भारत को जो सबसे बड़ा फायदा मिलने वाला है, वह है अमेरिका के 30 ट्रिलियन डॉलर के विशाल बाजार तक बेहतर और आसान पहुँच। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, इससे भारतीय निर्यातकों के लिए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा होंगे।

खास बात यह है कि अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगने वाले रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 18% करने पर सहमति जताई है, जिससे भारतीय सामान वहाँ पहले के मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकेगा। कपड़ा और परिधान, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर उत्पाद, ऑर्गेनिक केमिकल्स, होम डेकोर, हस्तशिल्प और कुछ चुनिंदा मशीनरी जैसे सेक्टरों को इस फैसले से सीधा फायदा मिलेगा।

ये वही क्षेत्र हैं, जिनमें भारत में बड़ी संख्या में छोटे उद्योग, कारीगर और श्रमिक काम करते हैं। इसके अलावा जेनेरिक दवाओं, रत्न और आभूषण, हीरे और विमान के पुर्जों जैसे उत्पादों पर अमेरिका ने टैरिफ पूरी तरह खत्म करने का फैसला किया है, जिससे भारत की निर्यात क्षमता और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को नई मजबूती मिलेगी।

इसके अलावा दोनों दोनों देश टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स, जिसमें ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) और डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाले दूसरे इक्विपमेंट शामिल हैं, इनमें ट्रेड बढ़ाने और उभरते टेक्नोलॉजी सेक्टर में जॉइंट कोऑपरेशन को बढ़ाने पर भी सहमत हुए हैं।

किन सेक्टरों में रोजगार और MSMEs को होगा सबसे ज्यादा फायदा?

यह अंतरिम ट्रेड डील केवल बड़े कॉरपोरेट घरानों के लिए नहीं, बल्कि छोटे उद्योगों के लिए भी अहम मानी जा रही है। कपड़ा, परिधान, चमड़ा, हस्तशिल्प और होम डेकोर जैसे क्षेत्रों में MSMEs की बड़ी भागीदारी है। अमेरिकी बाजार में इन उत्पादों की माँग पहले से मौजूद है और अब टैरिफ कम होने से भारतीय उत्पाद वहां और तेजी से पहुंच सकेंगे।

सरकार का दावा है कि निर्यात बढ़ने से उत्पादन बढ़ेगा और इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा। महिलाओं और युवाओं के लिए नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ श्रम की जरूरत ज्यादा होती है। मछुआरों और फिशरी सेक्टर को भी अमेरिकी बाजार तक बेहतर पहुँच मिलने की उम्मीद है, जिससे तटीय इलाकों में आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी।

अनाज, मसाले और सब्जियाँ: किसानों को कैसे मिला पूरा संरक्षण?

इस समझौते का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पहलू कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। भारत ने साफ कर दिया है कि वह अपने किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। यही वजह है कि गेहूँ, चावल, मक्का और सोयाबीन जैसे प्रमुख अनाजों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।

(फोटो साभार:एक्स @ Piyushgoyal)

इसका मतलब यह है कि अमेरिकी अनाज भारतीय बाजार में सस्ते दामों पर नहीं आ सकेंगे और घरेलू किसानों को कीमतों में गिरावट का डर नहीं रहेगा।

गौरतलब है कि इस ट्रेड डील को लेकर विपक्ष ने भी अफवाहें फैला कर किसानों और छोटे उद्यमियों के भड़काने की कम कोशिश नहीं की थी। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे केंद्र सरकार को भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के खिलाफ किसानों के बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की भी चेतावनी दी थी।

उस दौरान भी केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयान का हवाला देते हुए खरगे के तमाम आरोपों का खंडन करते हुए बताया था कि यह समझौता समाज के सभी वर्गों को लाभ पहुँचाएगा। भाषण में खरगे ने कहा था कि व्यापार समझौता किसानों को बर्बाद कर देगा।

इसी तरह कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा था, “मोदी सरकार ने अमेरिका के सभी कृषि उत्पादों पर जीरो शुल्क लगाने का जो निर्णय किया है उससे एक बात साफ है कि अमेरिका से आने वाला कपास, गेहूँ, सब्जियाँ और दूसरे कृषि उत्पाद भारतीय किसानों की फसलों पर संकट होगा।”

जबकि आँकड़े साफ कहते हैं कि यह समझौता सिर्फ किसानों के हितों को ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र के तमाम कारीगरों को भी पूरी तरह से ध्यान में रखकर लिया गया है। मसालों के मामले में भी भारत ने पूरी सख्ती दिखाई है। काली मिर्च, लौंग, सूखी हरी मिर्च, दालचीनी, धनिया, जीरा, हींग, अदरक, हल्दी, अजवाइन, मेथी, चक्रफूल, कसिया, सरसों, राई और अन्य पाउडर मसालों को पूरा संरक्षण दिया गया है।

(फोटो साभार:एक्स @ Piyushgoyal)

भारत की पहचान ही मसालों से जुड़ी हुई है और इनसे लाखों किसानों की रोजी-रोटी चलती है। इस समझौते में यह सुनिश्चित किया गया है कि अमेरिकी मसाले या उनके विकल्प भारतीय बाजार में आकर घरेलू उत्पादन को नुकसान न पहुँचा सकें।

सब्जियों के मामले में भी आलू, मटर, बीन्स और अन्य दलहनी सब्जियों के साथ-साथ फ्रोजन, डिब्बाबंद और अस्थायी रूप से संरक्षित सब्जियों पर कड़ा नियंत्रण रखा गया है, ताकि सब्जियों के मामले में भी भारतीय किसानों की आमदनी सुरक्षित रहे।

(फोटो साभार:एक्स @ Piyushgoyal)

डेयरी सेक्टर क्यों रहा सरकार की ‘रेड लाइन’?

डेयरी सेक्टर को लेकर भारत ने इस समझौते में सबसे कड़ा रुख अपनाया है। दूध, क्रीम, बटर, घी, चीज, योगर्ट, बटर मिल्क, व्हे प्रोडक्ट्स और अन्य डेयरी उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। अमेरिका जैसे देश की बड़ी डेयरी कंपनियों को भारतीय बाजार में सीधी एंट्री नहीं दी गई है।

(फोटो साभार:एक्स @ Piyushgoyal)

इसका सीधा फायदा भारत के करोड़ों छोटे पशुपालकों को मिलेगा, जिनकी आजीविका दूध उत्पादन पर निर्भर है। भारत का डेयरी सेक्टर सहकारी मॉडल पर आधारित है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। इस समझौते ने यह सुनिश्चित किया है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के नाम पर इस सेक्टर को कमजोर न किया जाए।

मेक इन इंडिया, तकनीक और भविष्य की साझेदारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस समझौते को भारत और अमेरिका दोनों के लिए अच्छी खबर बताते हुए कहा है कि यह ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती देगा और निवेश और तकनीकी सहयोग को बढ़ाएगा। दोनों देश इनोवेशन, डेटा सेंटर्स, जीपीयू, ऊर्जा और उन्नत तकनीकी उत्पादों के क्षेत्र में मिलकर काम करने पर सहमत हुए हैं।

भारत ने अगले पाँच साल में अमेरिका से बड़े पैमाने पर ऊर्जा उत्पाद, विमान और तकनीक खरीदने का इरादा भी जताया है, जिससे व्यापार संतुलन बना रहेगा और सप्लाई चेन मजबूत होगी। भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील का यह ढाँचा केवल व्यापार बढ़ाने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक संतुलित समझौता है, जिसमें भारत ने अपने किसानों, डेयरी सेक्टर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।

एक तरफ जहाँ भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका का विशाल बाजार खुल रहा है, वहीं दूसरी तरफ संवेदनशील कृषि और खाद्य उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। यही संतुलन इस समझौते को खास बनाता है और यही कारण है कि इसे भारत के दीर्घकालिक आर्थिक हितों के लिए एक मजबूत कदम माना जा रहा है।