मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में हालात इस समय बहुत खराब हैं और वहाँ युद्ध जैसे हालात बन गए हैं। इजरायल और ईरान के बीच जो पुरानी दुश्मनी छिपी हुई थी, वह अब खुलकर एक बड़ी लड़ाई के रूप में सबके सामने आ गई है। ईरान ने न केवल इजरायल को निशाना बनाया है, बल्कि उसने दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया है।
ईरान ने एक साथ सात देशों– इजरायल, UAE, सऊदी अरब, कुवैत, जॉर्डन, कतर और बहरीन पर खतरनाक मिसाइलों से हमला किया है, जिससे पूरी दुनिया में डर का माहौल है। ईरान ने अमेरिका के 7 सैन्य अड्डों को अपना निशाना बनाया है और वहाँ ऐसे धमाके हुए हैं जिन्हें देखकर किसी की भी रूह कांप जाए। हर तरफ आग की लपटें और धुआँ ही धुआँ दिखाई दे रहा है।
कैसे शुरू हुई जंग
ईरान और इजरायल के बीच तनाव तो बहुत पहले से था, लेकिन 13 जून 2025 को इनके बीच एक बड़ा और सीधा युद्ध शुरू हुआ, जिसे ‘बारह दिवसीय युद्ध’ कहा जाता है। उस समय इजरायल ने ‘ऑपरेशन राइजिंग लॉयन’ के तहत ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमला किया था। इसके बाद से ही दोनों देशों के बीच छिटपुट हमले जारी रहे। ताजा विवाद तब बढ़ा जब शनिवार (28 फरवरी 2026) की सुबह इजरायल ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान की राजधानी तेहरान और कई अन्य शहरों पर हमला कर दिया।
इजरायल ने अपने इस नए मिशन का नाम ‘लायन्स रोर‘ (शेर की दहाड़) रखा है। इस हमले में ईरान के खुफिया और रक्षा मंत्रालय को निशाना बनाया गया, जिसके बाद ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई को सुरक्षित जगह पर ले जाना पड़ा। इस हमले में ईरान के मिनाब शहर में एक स्कूल पर मिसाइल गिरने से 24 मासूम छात्राओं की मौत हो गई, जिसने ईरान को बुरी तरह भड़का दिया।
महीनों की सीक्रेट प्लानिंग और ‘सरप्राइज अटैक’ की पूरी कहानी
इजरायल और अमेरिका के बीच इस बड़े हमले की तैयारी कोई रातों-रात नहीं हुई, बल्कि इसके लिए पिछले कई महीनों से पर्दे के पीछे गहरी प्लानिंग चल रही थी। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स और इजरायली मीडिया के मुताबिक, इस पूरे ऑपरेशन का खाका वाशिंगटन और इजरायल ने मिलकर बहुत पहले ही तैयार कर लिया था। हमले की तारीख कई हफ्ते पहले ही तय कर ली गई थी, ताकि दोनों देशों की सेनाएँ पूरी तरह तालमेल बिठा सकें। इस मिशन में इजरायल अपनी पूरी ताकत झोंक रहा है और अमेरिका हर कदम पर उसके साथ खड़ा है।
इस हमले की सबसे चौंकाने वाली बात इसका समय था। आमतौर पर ऐसे बड़े सैन्य हमले रात के अंधेरे में किए जाते हैं, लेकिन इजरायल और अमेरिका ने जानबूझकर सुबह का समय चुना। इसके पीछे की सोच यह थी कि ईरानी सेना सुबह के वक्त किसी बड़े हमले की उम्मीद नहीं करेगी, जिससे उन्हें संभलने का मौका न मिले। रिपोर्ट के अनुसार, इस संयुक्त हमले का ‘शुरुआती चरण’ कम से कम चार दिनों तक चलने के लिए डिजाइन किया गया है, जिसमें ईरान के मिसाइल सिस्टम और सैन्य ठिकानों को जड़ से खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है।
ईरान का पलटवार और ‘ऑपरेशन फतह-ए-खैबर’
इजरायल और अमेरिका के इस साझा हमले का जवाब देने के लिए ईरान ने ‘ऑपरेशन फतह-ए-खैबर’ शुरू किया। ईरान ने घोषणा की कि वह अमेरिका को विनाशकारी जवाब देगा और उसने एक साथ करीब 400 बैलिस्टिक मिसाइलें दाग दीं। ईरान ने साफ कर दिया कि उसके लिए अब कोई लक्ष्मण रेखा नहीं बची है। ईरान ने न केवल इजरायल की राजधानी तेल-अवीव पर मिसाइलों की बौछार की, बल्कि मध्य पूर्व के उन सभी देशों को निशाना बनाया जहाँ अमेरिका के सैन्य ठिकाने मौजूद हैं।
ईरान की इन मिसाइलों ने इजरायल के साथ-साथ कतर, बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब, जॉर्डन और UAE (दुबई और अबू धाबी) में तबाही मचा दी। सायरनों की आवाजें पूरे इलाके में गूँजने लगीं और लोग अपनी जान बचाने के लिए बंकरों की तलाश करने लगे।
अमेरिका के 7 सैन्य अड्डों पर मिसाइल अटैक
ईरान ने अपनी कार्रवाई में सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को पहुँचाया है। उसने अमेरिका के छह से सात बड़े सैन्य ठिकानों को मिसाइलों से ध्वस्त कर दिया। बहरीन में मौजूद अमेरिकी नौसेना के ‘पाँचवीं फ्लीट’ (5th Fleet) के मुख्यालय पर हुआ हमला सबसे भयानक था, जिससे वह बेस पूरी तरह तबाह नजर आ रहा है।
यह बेस अमेरिका के लिए समुद्री सुरक्षा के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, कतर के ‘अल उदेद’ एयर बेस पर भी हमला हुआ, जहाँ करीब 10,000 अमेरिकी सैनिक तैनात रहते हैं। यह बेस अमेरिकी सेंट्रल कमांड का मुख्य केंद्र है।
UAE के अबू धाबी और दुबई में भी धमाकों की आवाजें सुनी गईं, जहाँ कम से कम एक व्यक्ति की मौत की खबर सामने आई है। ईरान ने कुवैत और जॉर्डन में भी अमेरिकी हेडक्वॉर्टर पर हमला किया, जिससे पूरी दुनिया को यह संकेत मिला कि अगर जंग जारी रही तो कोहराम मच सकता है।
युद्ध के पीछे का असली कारण और विवाद
इस महायुद्ध के पीछे का सबसे बड़ा कारण ईरान का ‘बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट’ और परमाणु हथियारों को लेकर चल रही खींचतान है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चाहते हैं कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के साथ-साथ अपने मिसाइल बनाने के काम को भी रोक दे, लेकिन ईरान इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। ईरान इन मिसाइलों को अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी मानता है।
ईरान का कहना है कि जब 2025 में इजरायल और अमेरिका ने उसकी परमाणु साइट्स पर हमला किया था, तब इन्हीं मिसाइलों ने उसकी रक्षा की थी। ईरान ने साफ कह दिया है कि वह मिसाइल कार्यक्रम पर कोई समझौता नहीं करेगा। इसी असहमति के कारण बातचीत ठप हो गई और अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान को चारों तरफ से घेरकर हमला करना शुरू कर दिया।
ईरान की मिसाइल ताकत और अंडरग्राउंड सिटीज
ईरान के पास इस समय पूरे मध्य पूर्व में मिसाइलों का सबसे बड़ा खजाना है। ईरान के पास ऐसी मिसाइलें हैं जो 2000 से 2500 किलोमीटर की दूरी तक मार कर सकती हैं, यानी वे आसानी से इजरायल तक पहुँच सकती हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ईरान ने जमीन के अंदर कम से कम पाँच ‘मिसाइल शहर’ बना रखे हैं, जहाँ हजारों बैलिस्टिक मिसाइलें छिपी हुई हैं।
इनमें से ‘सेजिल’ नाम की मिसाइल सबसे खतरनाक मानी जाती है, जिसकी रफ्तार 17,000 किलोमीटर प्रति घंटा से भी ज्यादा है। इसके अलावा इमाद, गदर और शहाब-3 जैसी मिसाइलें भी ईरान के शस्त्रागार में शामिल हैं। इन्हीं मिसाइलों के दम पर ईरान अमेरिका और इजरायल जैसी ताकतों को चुनौती दे रहा है।
भारत के लिए चिंता और प्रवासी भारतीयों पर असर
इस बढ़ते संघर्ष ने भारत की भी चिंता बढ़ा दी है क्योंकि खाड़ी देशों में करीब 93 लाख भारतीय रहते हैं। संयुक्त अरब अमीरात में 38.9 लाख और सऊदी अरब में 26.5 लाख भारतीय काम कर रहे हैं। जिन इलाकों में हमले हो रहे हैं, वहाँ बड़ी संख्या में भारतीय मौजूद हैं।
अबू धाबी और दुबई जैसे शहरों में हुए धमाकों से वहाँ रहने वाले प्रवासी भारतीयों के बीच डर का माहौल है। भारत सरकार इस पूरी स्थिति पर करीब से नजर रख रही है क्योंकि अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो वहाँ रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। सरकार आपातकालीन योजनाओं पर काम कर रही है ताकि जरूरत पड़ने पर नागरिकों को सुरक्षित निकाला जा सके।
युद्ध के परिणाम और भविष्य का खतरा
ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच छिड़ी इस जंग ने मध्य पूर्व को एक गहरे संकट में डाल दिया है। कतर जैसे देशों में अमेरिकी नागरिकों को बंकरों में छिपने के आदेश दिए गए हैं और दोहा जैसे मुख्य एयरबेस को बंद करना पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस लड़ाई से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल जाएगी, जिसका असर दुनियाभर की अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों पर पड़ेगा।
अमेरिका ने ईरान की मिसाइल ताकत को खत्म करने की ठान ली है, वहीं ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपनी रक्षा के लिए किसी भी रेड लाइन को पार कर सकता है। फिलहाल दोनों तरफ से हमले जारी हैं और शांति की कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही है। अगर यह जंग नहीं रुकी, तो यह पूरे विश्व के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है।


