Saturday, April 4, 2026
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EVM की जगह जिस बैलेट पेपर की माँग कर रही थी कॉन्ग्रेस, झारखंड में उसी से मिली करारी हार: जानें- BJP से निपटने के लिए ठोस तरीका ढूँढने की राहुल को क्यों है जरूरत

हर चुनाव में हार के बाद EVM पर सवाल उठाने से थोड़े समय तक और कुछ लोगों तक एक राजनीतिक संदेश तो दिया जा सकता है लेकिन पार्टी के लिए समाधान आत्ममंथन और अपने भीतर सुधार से ही निकलेगा।

झारखंड के नगर निकाय चुनावों 2026 के नतीजे सामने आने लगे हैं। इन नतीजों में साफ दिख रहा है कि झारखंड के सत्तारूढ़ INDI ब्लॉक से जनता का मोहभंग हो रहा है। राज्य की विपक्षी बीजेपी के उम्मीदवार झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM), कॉन्ग्रेस और सत्तारूढ़ गठबंधन समर्थित उम्मीदवारों पर भारी पड़ रहे हैं।

यूँ तो ये चुनाव बिना दलगत आधार पर लड़े गए थे लेकिन पार्टियों ने निर्दलीय उम्मीदवारों को ही अपना समर्थन दिया था। राज्य में 9 नगर निगम, 19 नगर परिषद और 20 नगर पंचायत के लिए चुनाव हुए थे जिनमें बीजेपी भारी पड़ी है। एक खास बात और है, वो ये कि ये चुनाव EVM से नहीं हुए थे बल्कि बैलेट पेपर से लड़े गए थे।

इन चुनाव नतीजों ने कॉन्ग्रेस समेत विपक्ष के उस नैरेटिव को भी बट्टा लिया दिया है जिसमें दावा किया जाता था कि बीजेपी EVM में गड़बड़ी कर चुनाव जीत लेती है। बीजेपी की इस जीत के बाद कर्नाटक में निकाय चुनाव EVM के बजाय बैलेट पेपर से कराने के कॉन्ग्रेस के फैसले पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने EVM के जरिए गड़बड़ी और वोट चारी का दावा करते हुए राज्य में निकाय चुनावों को बैलेट पेपर से कराने का ऐलान किया था। हालाँकि, पार्टी के भीतर ही इस फैसले पर दो फाड़ हो गई थी और कई नेताओं ने इसे पीछे ले जाने वाला फैसला बताते हुए विरोध किया था।

अब, झारखंड के चुनाव नतीजों के बाद कॉन्ग्रेस एक बार फिर अपने फैसले पर फिर से विचार करने पर मजबूर हो जाएगी। क्योंकि अगर झारखंड जैसा हाल कॉन्ग्रेस का कर्नाटक में भी हो गया, बीजेपी ने जीत हासिल कर ली तो पार्टी की तो फजीहत होगी ही साथ ही EVM के जरिए वोट चोरी के जिस मुद्दे को कॉन्ग्रेस को हवा दे रही है उस पर भी ब्रेक लग जाएगा।

ऐसे में पार्टी के भीतर इस फैसले पर जो असंतोष सामने आया है वो आगे और भी गहर सकता है। कॉन्ग्रेस के लिए कर्नाटक का मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि कर्नाटक में पहले ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच कुर्सी को लेकर खींचतान चल रही है। ऐसे में जरा सी चूक कॉन्ग्रेस के लिए भारी पड़ सकती है तो पार्टी को फूँक-फूँककर कदम रखना होगा।

मशीन नहीं, जनमत बोलता है

कॉन्ग्रेस चुनावों में हार को लेकर अक्सर यह तर्क देती आई है कि उसकी पराजय का एकमात्र कारण EVM है। EVM में गड़बड़ी से लेकर वोट चोरी जैसे मुद्दों को लेकर कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी अक्सर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते दिखाई देते हैं।

ऐसे में बैलेट पेपर से आग झारखंड के नतीजों ने यह कम-से-कम इस बात पर तो मुहर लगाई ही है कि जनमत का फैसला किसी मशीन के हेर-फेर से नहीं बल्कि लोगों के वोट की सही ताकत के आधार पर ही हो रहा है।

चुनाव प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और कम विवादित बनाने के लिए देश में EVM को लागू किया गया था। खुद कॉन्ग्रेस ने इसके सहारे दर्जनों बार चुनाव जीते हैं। इसके बाद भी जब-जब कॉन्ग्रेस को हार मिली तो उसने आत्ममंथन के बजाय हार की ठीकरा EVM पर फोड़ना शुरू कर दिया। आत्ममंथन के नाम पर जो बैठकें हुई भीं, उनमें किसी की जवाबदेही नहीं तय की गई और EVM के नाम पर सब अपना-अपना पद बचाते रहे।

EVM पर ठीकरा फोड़ने के बजाय आत्ममंथन करे कॉन्ग्रेस

किसी भी राजनीतिक दल के लिए हार एक संकेत तो होती ही है। ये संकेत EVM पर उँगली उठकार बचने का नहीं बल्कि संगठन की कमजोरी, जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता, स्थानीय मुद्दों से दूरी और नेतृत्व के प्रति लोगों की धारणा से जुड़े होते हैं।

पार्टी को दूसरे गैर जरूरी बातों के बजाय खुद से ये सवाल पूछने चाहिए कि क्या पार्टी का जमीनी ढाँचा मजबूत है? क्या स्थानीय नेतृत्व जनता से जुड़ा हुआ है? क्या चुनावी रणनीति समय के अनुरूप बदली गई है? इसके बजाय कॉन्ग्रेस बार-बार हार का कारण EVM को दिखाने की कोशिश करती हैं।

लोकतंत्र में विश्वास की नींव जनता के भरोसे पर टिकी होती है। यदि लगातार यह कहा जाए कि चुनाव प्रक्रिया ही संदिग्ध है, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगता है। चुनाव आयोग की भूमिका लंबे समय से निष्पक्ष चुनाव कराने की रही है, कई बार कुछ लोगों पर सवाल उठे भी तो वो ऐसे नहीं रहे कि पूरी प्रक्रिया तो ही खराब मान लिया जाए।

संस्था की साख पर बट्टा लगाया जाए। अब कॉन्ग्रेस बार-बार चुनाव प्रक्रिया, EVM पर सवाल उठाकर संस्था की साख को बट्टा लगाने का ही काम कर रही है। झारखंड के निकाय चुनावों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि हार-जीत का फैसला अंत में मतदाता को ही करना होता है। बैलेट हो या EVM, जनता का फैसला ही सबसे ऊपर है। यदि कॉन्ग्रेस को लगातार हार या चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है तो उसे अपनी रणनीति, संगठन और नेतृत्व पर पुनर्विचार करना ही होगा।

राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के सामने तो BJP जैसा संगठित और कैडर आधारित दल है जो जमीनी काम पर भरोसा रखता है ऐसे में उसके लिए चुनौती और गंभीर है। हर चुनाव में हार के बाद EVM पर सवाल उठाने से थोड़े समय तक और कुछ लोगों तक एक राजनीतिक संदेश तो दिया जा सकता है लेकिन पार्टी के लिए समाधान आत्ममंथन और अपने भीतर सुधार से ही निकलेगा। लोकतंत्र में भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि राजनीतिक दल जनता के फैसले को स्वीकार करें और अपनी कमियों को दूर करने के लिए काम करें।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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