1947 का विभाजन कोई अचानक हुई घटना नहीं थी। इसके लिए मुस्लिमों ने लंबे समय से माँग उठाई थी। मगर फिल्म में दिखाया गया है जैसे हिंदुओं ने उन्हें खदेड़ा हो।
द्रौपदी मुर्मू की उम्मीदवारी ने न केवल यशवंत सिन्हा का समर्थन करने वाले दलों को व्याकुल कर दिया है, बल्कि हिंदुओं के धर्मांतरण में लिप्त ईसाई मिशनरियों को भी इससे तगड़ा झटका लगा है।
अंग्रेजों ने बनाए कुछ मुस्लिम नेता, जिन्होंने 'काफिर राजा' के विरुद्ध कुरान का हवाला देकर मुस्लिमों को भड़काया। फिर संगठित ढंग से हिन्दुओं का नरसंहार हुआ और उनकी दुकानें-घर लूट लिए गए। अंततः 'बुद्धिजीवियों' ने इस इस्लामी दंगे को 'सामंती राजा के खिलाफ जनता का विद्रोह' बता कर दंगाइयों को श्रद्धांजलि देनी शुरू कर दी।