अब ये कातिलों से लेकर गबन के आरोपियों का बचाव केवल इस आधार पर करना चाहते हैं कि फलाना मोदी के खिलाफ बोला था, ‘एंटी-RSS’ था, तो अगर इसे जेल भेजा गया तो सरकार के खिलाफ बोलने वालों में ‘डर का माहौल’ बन जाएगा।
प्रोपेगेंडा-पर-प्रोपेगेंडा फैलाते रहना, बार-बार पकड़े जाते रहना, शर्मिंदा होना- अगर यही बिज़नेस मॉडल है तो बात दूसरी है, वरना वायर वालों को बाज आ जाना चाहिए।
हिन्दू राष्ट्र और नागरिकता के सवाल पर आरिफ मुहम्मद ने वायर की पत्रकार को जवाब देते हुए कहा कि यह विचार केवल दूसरे धर्मों में है। खासतौर से मुस्लिमों में जहाँ अहमदिया, बरेलवी, देवबंदी, शिया, सुन्नी सब एक दूसरे को दोयम दर्जे का मानते हैं या ख़ारिज करते हैं। हिंदुत्व में दूसरे दर्जे के नागरिक का कोई विचार नहीं है। यहाँ कोई भी 'धिम्मी' नहीं होता और किसी को भी 'जजिया' के लिए नहीं कहा जाता।
'स्क्रॉल' को आपातकाल वाली फैंटसी पूरी करनी है। उसका सपना है कि काश कोई इंदिरा आज आपातकाल लगा कर उसे झुकने को कहे और वह रेंगने लगे। अंडमान-निकोबार से आँकड़े निकाल कर यह साबित किया जा रहा है कि आपातकाल से पूरा देश ख़ुश था।
नर्स एक बीमार बच्चे के बेड के पास खड़ी होकर कुछ निर्देश दे रही है और हमारे पत्रकार माइक लेकर पिले पड़े हैं! ये इम्पैक्ट किसके लिए क्रिएट हो रहा है? क्या ये मनोरंजन है कुछ लोगों के लिए जिनके लिए आप पैकेज तैयार करते हैं? फिर आपने क्या योगदान दिया इस मुद्दे को लेकर बतौर पत्रकार?
असली खबर से इतनी बड़ी छेड़-छाड़ के बाद प्रकाशित हुआ 'दि प्रिंट' पर ये लेख इस बात का सबूत है कि आज सरकार के प्रति मीडिया गिरोह में इतनी घृणा भर चुकी है कि यदि कोई व्यक्ति सरकार पर झूठा इल्जाम भी लगा दे तो वो उसे पब्लिक डोमेन में पहुँचाने में गुरेज नहीं करेंगे।
कुल मिलाकर 'Self-Styled godman' शब्द हमेशा हिन्दू धर्मगुरुओं के लिए इस्तेमाल होता है, यह मीडिया का आम सत्य है। लेकिन इंडिया टुडे समेत पत्रकारिता का समुदाय विशेष इस शब्द का इस्तेमाल उस हेडलाइन में करता है, जिसमें खबर आज़म नामक मौलवी द्वारा हैदराबाद में एक किशोरी के साथ बलात्कार की है।
अलीगढ़ मुद्दे के साम्प्रदायिक न होने की वजह से अब भारत का समुदाय विशेष शर्मिंदा नहीं हैं, न ही बॉलीवुड की लम्पट हस्तियाँ शर्मिंदगी के बोझ से मेकअप पिघला पा रही हैं, न ही पत्रकारों में वो मुखरता देखने को मिल रही है कि वो अपनी बेटी से नज़रें नहीं मिला पा रहे कि वो उनके लिए कैसा समाज छोड़े जा रहे हैं।
जिसे धार्मिक कर्मकांडों को ढकोसला मानना है, वह काहे का हिन्दू, काहे का ब्राह्मण? उसके विचारों का बोझ हिन्दू क्यों उठाए? उसके विचारों के आधार पर ब्राह्मणों को क्यों निशाना बनाया जा रहा है, जो हिन्दू ही नहीं है?