वे केवल बीजेपी को हराना चाहते हैं बाकी उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है कि कौन जीतता है। यहाँ तक कि अब्बास सिद्दीकी के बंगाल जीतने पर भी वे खुश हैं। उनका दावा है कि जब तक मोदी और भाजपा को अनिवार्य रूप से सत्ता से बाहर रखा जाता है। तब तक ही सही मायने में लोकतंत्र है।
असल में कॉन्ग्रेस नेता तो झूठ और सच के फेर में नहीं फँसते- वे तो बस वही बोलते हैं जो राहुल गाँधी को पसंद होता है। केरल की जनता के साथ भी राहुल यही प्रयोग कर रहे हैं।
'मछुआरों के लिए कोई मंत्रालय नहीं है' - जिस तरह से राहुल गाँधी दक्षिण भारत की समुद्री सीमाओं पर घूम-घूम कर झूठ फैला रहे हैं और पालतू मीडिया कोई फैक्ट-चेक नहीं कर रहा, इससे देश का नुकसान हो रहा है।
बस्तर से कॉन्ग्रेसी सांसद दीपक बैज ने जीडीपी के मुद्दे को मोदी की दाढ़ी से जोड़ दिया, कॉन्ग्रेसी नेता प्रेमचंद्र मिश्रा ने बंगाल-चुनाव के साथ तो वहीं तेजप्रताप यादव ने पेट्रोल के दामों के साथ।
जहाँ संविधान को गाली दी गई, वहाँ की हाथों में तिरंगा लिए लोगों की तस्वीरें वायरल की गईं। जहाँ हिन्दू धर्म का अपमान हुआ, वहाँ कश्मीरी पंडितों के लिए झूठा शोक मनाया गया।
तब भी तो हुए थे कृषि सुधार। 'हरित क्रांति' की नींव रखने वाले लाल बहादुर शास्त्री को वामपंथियों ने अमेरिका का एजेंट तक कहा, जम कर विरोध किया, पर वो झुके नहीं।
अयोध्या में भूमि पूजन हो चुका है। निधि समर्पण अभियान चल रहा है। ऐसे में सहज जिज्ञासा हो सकती है कि इस सवाल का क्या तुक है? वजहें ठोस है और हर हिंदू के लिए जानना जरूरी है।