विचार

100 दिनों तक दिल्ली बंधक, हिन्दू धर्म का अपमान, संविधान को गाली: वो शाहीन बाग़, जहाँ पनपा दिल्ली दंगों का बीज

जहाँ संविधान को गाली दी गई, वहाँ की हाथों में तिरंगा लिए लोगों की तस्वीरें वायरल की गईं। जहाँ हिन्दू धर्म का अपमान हुआ, वहाँ कश्मीरी पंडितों के लिए झूठा शोक मनाया गया।

मंगोलपुरी से मंगलदोई तक हिंदुओ कहना ही होगा- 21 की दिशा ही नहीं, फिदायीन मोहम्मद आदिल डार भी था

उनका लक्ष्य स्पष्ट है। वे पूरे असम को मंगलदोई बनाना चाहते हैं। तय आपको करना है। बोलेंगे या शुतुरमुर्ग की तरह जमीन में सिर गड़ाए बैठे रहेंगे।

‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, हिंसा फ़ैलाने की स्वतंत्रता नहीं’ – ट्विटर के दोहरे रवैये पर लगाम जरूरी

"अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, हिंसा फ़ैलाने की स्वतंत्रता नहीं है। सोशल मीडिया कंपनियों पर ये लाजिमी है कि वे सख्त कार्रवाई करते हुए इसे रोकें।"

तब शास्त्री नहीं झुके थे, अब मोदी पीछे नहीं हटेंगे: तब भी हुआ था ‘किसान आंदोलन’, ‘हरित क्रांति’ को वामपंथियों ने खून से जोड़ा...

तब भी तो हुए थे कृषि सुधार। 'हरित क्रांति' की नींव रखने वाले लाल बहादुर शास्त्री को वामपंथियों ने अमेरिका का एजेंट तक कहा, जम कर विरोध किया, पर वो झुके नहीं।

जो राम मंदिर भारत की संस्कृति का प्रतीक है, उससे हिंदुओं को नीचा क्यों दिखा रही कॉन्ग्रेस?

अयोध्या में भूमि पूजन हो चुका है। निधि समर्पण अभियान चल रहा है। ऐसे में सहज जिज्ञासा हो सकती है कि इस सवाल का क्या तुक है? वजहें ठोस है और हर हिंदू के लिए जानना जरूरी है।

बजट 2021 में OPC: अकेला व्यक्ति भी शुरू कर पाएगा अब अपनी खुद की कंपनी, सरकार ने दी सहूलियत

सबसे ज्यादा प्रभावित किया बजट में प्रस्तावित ओपीसी यानी वन पर्सन कंपनी के प्रावधान ने। अभी तक आपको कोई भी नया धंधा शुरू करना होता था तो...

ट्रंप पर बैन से खुश थे तो अब अपने गिरोह के लोगों पर लगे प्रतिबंध से नाराज क्यों हैं वामपंथी लिबरल्स?

ट्विटर के इस कदम का विरोध करने वाले ये वही 'निष्पक्ष' उदारवादी लोग हैं, जो कुछ ही दिन पहले डोनाल्ड ट्रंप का ट्विटर अकाउंट बंद किए जाने का जश्न मना रहे थे।

‘छात्र’ हैं, ‘महिलाएँ’ हैं, ‘अल्पसंख्यक’ हैं और अब ‘किसान’ हैं: लट्ठ नहीं बजे तो कल और भी आएँगे, हिंसा का नंगा नाच यूँ ही...

हिन्दू वोट भी दे, अपना कामधाम भी करे और अब सड़क पर आकर इन दंगाइयों से लड़े भी? अगर कल सख्त कार्रवाई हुई होती तो ये आज निकलने से पहले 100 बार सोचते।

इस्लामी हो या खालिस्तानी… निशाना हिन्दू ही है: एक ही ट्रेंड को बार-बार देख कर भी केंद्र और SC शांत क्यों?

अराजकता को जब पलने दिया जाता है तो फिर कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज बचती नहीं। जो दिल्ली दंगों में हुआ, वही खालिस्तानी 'किसान' उपद्रव में।

बिहारी-गुजराती-तमिल-कश्मीरी किसान हो तो डूब मरो… क्योंकि किसान सिर्फ पंजाबी-खालिस्तानी होते हैं, वही अन्नदाता हैं

वास्तविकता ये है कि आप इतने दिनों से एक ऐसी भीड़ के जमावड़े को किसान का आंदोलन कहते रहे। जिसकी परिभाषा वामपंथी मीडिया गिरोह और विपक्षियों ने गढ़ी और जिसका पूरा ड्राफ्ट एक साल पहले हुए शाहीन बाग मॉडल के आधार पर तैयार हुआ।

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