यह भय का ही असर है जो अस्पताल में बेड पर कब्जा करने के लिए मजबूर कर रहा है। आवश्यकता न होने के बावजूद ऑक्सीजन सिलेंडर और इंजेक्शन रखने के लिए उकसा रहा है।
‘वाशिंगटन पोस्ट’ की खबर हो या 'गार्डियन' का संपादकीय, ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ का कवरेज हो या ‘सीएनएन’ की कवरेज, ये सभी बस 'व्हाइट मेन्स बर्डन सिंड्रोम' का ज्वलंत उदाहरण है।
सवाल बस इतना था कि क्या गाँधी परिवार ने अस्थायी क्वारंटाइन सेंटर्स, अस्पताल, ऑक्सीजन प्लांट्स बनवाने या प्रवासी मजदूरों के लिए भोजन की व्यवस्था करने में कोई योगदान दिया है?