जहाँ संविधान को गाली दी गई, वहाँ की हाथों में तिरंगा लिए लोगों की तस्वीरें वायरल की गईं। जहाँ हिन्दू धर्म का अपमान हुआ, वहाँ कश्मीरी पंडितों के लिए झूठा शोक मनाया गया।
तब भी तो हुए थे कृषि सुधार। 'हरित क्रांति' की नींव रखने वाले लाल बहादुर शास्त्री को वामपंथियों ने अमेरिका का एजेंट तक कहा, जम कर विरोध किया, पर वो झुके नहीं।
अयोध्या में भूमि पूजन हो चुका है। निधि समर्पण अभियान चल रहा है। ऐसे में सहज जिज्ञासा हो सकती है कि इस सवाल का क्या तुक है? वजहें ठोस है और हर हिंदू के लिए जानना जरूरी है।
ट्विटर के इस कदम का विरोध करने वाले ये वही 'निष्पक्ष' उदारवादी लोग हैं, जो कुछ ही दिन पहले डोनाल्ड ट्रंप का ट्विटर अकाउंट बंद किए जाने का जश्न मना रहे थे।
वास्तविकता ये है कि आप इतने दिनों से एक ऐसी भीड़ के जमावड़े को किसान का आंदोलन कहते रहे। जिसकी परिभाषा वामपंथी मीडिया गिरोह और विपक्षियों ने गढ़ी और जिसका पूरा ड्राफ्ट एक साल पहले हुए शाहीन बाग मॉडल के आधार पर तैयार हुआ।