वामपंथियों की पैदल सेना में सबसे ज्यादा लोग दिल्ली जैसी जगहों के कॉलेजों के नए बच्चे होते हैं। व्यवस्थित तरीके से उनके दिमाग में झूठ का सहारा ले कर खास धर्म और विचार के खिलाफ जहर भरा जाता है। रवीश और केजरीवाल से ले कर कामरा, राठी, बनर्जी, पीईंग ह्यूमन आदि इसकी पूरी योजना बनाते हैं।
वह सरकार कितनी अनैतिक थी इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि जो डिप्टी सीएम बना था, उसने सीएम की पार्टी से बगावत कर ही चुनाव जीता था। वे सीएम के बेटे को ही हराकर विधानसभा पहुॅंचे थे।
शरद पवार 1978 में पार्टी तोड़ कर CM बने। 1988 में राजीव ने मुख्यमंत्री बनाया। 1990 में जोड़-तोड़ से सरकार बनाई। 1993 में तत्कालीन CM के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री बने। उन्होंने जो लिगेसी सेट की है, भतीजा उसका ही अनुसरण कर रहा है। मिलें अजित प्रकरण के अन्य किरदारों से।
विचारधारा में अंतर न होते हुए भी जब 50-50 के फॉर्मूले पर शिवसेना ने भाजपा से गठबंधन तोड़कर एनसीपी और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों संग विलय की जो उत्सुकता दिखाई, उसने जनता के सामने उसके सत्तालोलुप चरित्र को सामने लाकर रख दिया। शिवसेना ने हिंदुत्व से समझौता किया।
90 के दशक की शुरुआत में अली मियाँ ने कहा था- यह झगड़ा अदालत के दायरे से बाहर है। अदालत का फैसला शायद ही माना जाए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जिस तरह कुछ नुमाइंदों के सुर बदले हैं उसने एक बार फिर उनकी नीयत को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
1978 में कॉन्ग्रेस पार्टी की वसंतदादा की सरकार से अलग होकर शरद पवार ने कॉन्ग्रेस तोड़ कर सोशलिस्ट कॉन्ग्रेस बना ली थी। कॉन्ग्रेस की सरकार गिरा कर खुद सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बन गए थे। उनके भतीजे अजीत पवार ने वही कड़वी दवा शरद पवार को पिला दी है।
अगर मामला सिर्फ विचारधारा के आधार पर किसी के समर्थन और किसी के विरोध का है, और जेएनयू एवं FTII जैसे संस्थानों के वाम मजहब के छात्र “शिक्षा का भगवाकरण” कहकर किसी नियुक्ति का विरोध कर सकते हैं, तो वही अधिकार आखिर BHU के छात्रों को क्यों नहीं मिलना चाहिए? समस्या की जड़ में यही दोमुँहापन है।
"हिन्दू धर्मशास्त्र कौन पढ़ाएगा? उस धर्म का व्यक्ति जो बुतपरस्ती कहकर मूर्ति और मन्दिर के प्रति उपहासात्मक दृष्टि रखता हो और वो ये सिखाएगा कि पूजन का विधान क्या होगा? क्या जिस धर्म के हर गणना का आधार चन्द्रमा हो वो सूर्य सिद्धान्त पढ़ाएगा?"
तानाजी का ट्रेलर जैसे ही रिलीज हुआ... क्विंट ने इस पर एक लेख लिख मारा। माफ कीजिए, लेख नहीं - जहर लिखा है, जहर! 'लिबरल' नेहरू से लेकर 'मसकुलर' मोदी तक को ठूँस दिया है इसमें। अकबर इनके लिए 'द ग्रेट' हो जाता है लेकिन शिवाजी पर इनकी सुलग जाती है!
सहिष्णुता, प्लूरलिज्म आदि अपने मूल को बचाते हुए, दूसरों को ससम्मान उनके मूल को बचाने में सहयोग देना है। इसका मतलब ये बिलकुल भी नहीं है कि चूँकि उसे पता है कि मंदिर में घंटी बजाना होता है तो वो मंदिर की घंटी तक न पहुँचे तो हम उसे अपने सामने शिवलिंग पर लात रख कर घंटी तक पहुँचते देखते रहें, और कुछ न करें।