जब सुशासन की ही पोल खुल चुकी हो तो उसके बड़बोले मंत्री के दावों पर गौर करना बेमानी है। लेकिन, यह सियासत है। और वो भी बिहार की, जिसके समीकरण दिल्ली से ही तय होने हैं। लिहाजा हर ट्वीट के पीछे का गणित समझना जरूरी हो जाता है।
कमलेश तिवारी की हत्या के बाद एक आम हिन्दू की तरह, आपकी तरह- मैं भी गुस्से में हूँ और व्यथित हूँ। समाधान तलाश रहा हूँ। मेरे 2 सुझाव हैं। अगर आप चाहते हैं कि इस गुस्से का हिन्दुओं के लिए कोई सकारात्मक नतीजा निकले, मेरे इन सुझावों को समझें।
"इस्लाम मुस्लिमों को कबूल नहीं करने देगा की भारत उनकी मातृभमि है। वे कभी नहीं कबूल करेंगे कि हिन्दू उनके स्वजन हैं।" राजनीतिक फायदे के लिए आंबेडकर के नाम का इस्तेमाल करने वाले भी आखिर क्यों आज उनकी इन बातों की चर्चा नहीं करते?
सुन्नी, शिया समुदाय को सच्चा नहीं मानते। शिया भी सुन्नियों को सच्चा मुस्लिम नहीं मानते। ये सालों या दशकों नहीं बल्कि सदियों से लड़ा जा रहा 'शांतिप्रिय समुदाय' का युद्ध है। इसके ख़त्म होने के भी कोई आसार नज़र नहीं आते।
जो पुलिस व्यवस्था पिछली सरकार में कुछ ख़ास नहीं कर रही थी, वही यूपी पुलिस इस सरकार में बदले रूप में कैसे दिखती है, इस पर भी अलग अलग वजहें गिनाई जा सकती हैं। हाँ, बदला निजाम सबको पसंद आ रहा या नहीं, कुछ लोग भीतर ही भीतर इससे नाराज तो नहीं होंगे, इसके बारे में भी सोचा जा सकता है।
हिन्दू ये देख कर सिनेमा नहीं देखता कि उसमें पांडे है कि खान। हिन्दू ये देख कर सामान नहीं खरीदता कि दुकानदार चौधरी है कि मलिक। हिन्दुओं का कोई हलाल सिस्टम है ही नहीं जहाँ बकरे के पैदा होने से ले कर, उसके कटने, छिलने, पैक होने और दुकान में रखे जाने तक बस एक ही मजहब के लोग हैं।
हाल ही में ख़बर आई थी कि पाकिस्तान ने हिज़्बुल, लश्कर और जमात को अलग-अलग टास्क सौंपे हैं। एक टास्क कुछ ख़ास नेताओं को निशाना बनाना भी था? ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कमलेश तिवारी के हत्यारे किसी आतंकी समूह से प्रेरित हों।
गौरी लंकेश की हत्या के बाद पूरे राइट विंग को गाली देने वाले नहीं बता रहे कि कमलेश तिवारी की हत्या का जश्न मना रहे किस मज़हब के हैं, किसके समर्थक हैं? कमलेश तिवारी की हत्या से ख़ुश लोगों के प्रोफाइल क्यों नहीं खंगाले जा रहे?
गुजरात पुलिस और योगी की पुलिस को शक की नज़र से देखने वाले यह भी कह सकते हैं कि सबूत मैन्युफैक्चर्ड है। ऐसे लोगों के लिए राँची के काँके में बिरसा मुंडा के नाम पर एक अस्पताल है। वहाँ अच्छी व्यवस्था है।
जब अभियुक्त हिन्दू हो, पीड़ित कट्टरपंथी तब ये शरियत से चलते हैं। तब फतवा निकलता है, तब इसी राष्ट्र के संविधान की होली जला कर कट्टरपंथी वही करता है जो एक बड़ा कट्टरपंथी कहीं से बैठ कर आदेश देता है।