BBC ने जब इस खबर को सोशल मीडिया पर शेयर किया तो उसकी हेडिंग, "असम: पुलिस ‘पिटाई’ से मुसलमान महिला का गर्भपात" रखी, जबकि वेबसाइट पर इसी ख़बर की हेडिंग थी - "असम: पुलिस ‘पिटाई’ से महिला का गर्भपात"। सोशल मीडिया पर शेयरिंग के दौरान हेडिंग में 'मुसलमान' शब्द जोड़ना बीबीसी की नीयत को साफ़ कर देता है।
इन गैरकानूनी शरणार्थियों को इकट्ठा होने दीजिए, एक बड़े जगह पर रखिए तो ये धीरे-धीरे अपने दीवार खड़े करते हैं, गैरमुस्लिम लोगों को उनके इलाके में घुसने से मना करते हैं, फिर संख्या बढ़ने पर स्थानीय प्रशासन से अपने लिए मजहबी आधार पर विशेष अधिकारों की माँग करते हैं, और एक समय आता है कि स्वीडन जैसे देश को बलात्कार के नक्शे पर नंबर एक बना देते हैं।
सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन को केवल इस बात का सबूत चाहिए कि अयोध्या के किस खास जगह पर राम का जन्म हुआ था। वरना इकबाल के इमाम-ए-हिंद को वे भी याद करते हैं। कृपानिधान तो वाजिद अली शाह के भी राम ही थे। लेकिन, किसी ने न लिखा, न गाया। राम किस प्लॉट में पैदा हुए थे?
मदरसों में गुलामों जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं बच्चे। मौलवी उनसे भीख मॅंगवा सालाना लाखों कमाते हैं। पैसा लेकर नहीं आने पर पीटते हैं। शिकायत करने पर धमकाते हैं। दीनी तालीम के नाम पर हो रहा है अमानवीय बर्ताव।
मलाला के साथ पाकिस्तान में जो कुछ हुआ वह दुखद है। लेकिन, श्रीश्री ने तीन साल पहले ही कह दिया था कि वह नोबेल पुरस्कार के लायक नहीं हैं। उनकी बातें कश्मीर पर पाकिस्तानी प्रोपगेंडा की बानगी भर है। उन्हें सिंध में जबरन इस्लामिक धर्मान्तरण नहीं दिखता। असल में बर्मिंघम में रहकर आतंक का अब्बा पाकिस्तान जन्नत ही दिखता है।
हिन्दीभाषियों के घमंड के दूसरे एक्सट्रीम पर वो लोग हैं जो हिन्दीभाषियों को घृणा से देखते हैं। एक बंगाली व्यक्ति ने लिखा कि हिन्दी वाले गुटखा खाने वाले हैं, गाली देने वाले हैं, भ्रूणहत्या करने वाले हैं, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले हैं, ढोकला चुराने वाले हैं, भुजिया खाने वाले रक्तचूसक कीड़े हैं।
मजहब को टोपी-चादर के नाम पर लुभाने की राजनीति अब देश की सरकार को झूठा बता पाकिस्तानी प्रोपगेंडा को हवा देने तक पहुॅंच गई है। ऐसे लोगों को न तो पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद दिखाई दे रहा और न ही बलूचिस्तान का नरसंहार। पूरा का पूरा लिबरल गिरोह और मानवाधिकार के कथित पैरोकार मौन हैं।
आप सोचिए कि हिन्दी जानने से आपकी संस्कृति कैसे प्रभावित हो रही है? अगर यह कहा जाए कि तुम तेलुगु छोड़ दो, और हिन्दी पढ़ो; तमिल में लिखे सारे निर्देश हटा दिए जाएँगे; कन्नड़ में अब नाटक या फिल्म नहीं बनेंगे; मलयालम की किताबों को जला दो... तब उसे हम कहेंगे कि 'हिन्दी थोपी जा रही है।'
उन्होंने इस्लाम के नाम पाकिस्तान का समर्थन किया। जिन्ना पर भरोसा किया। कुरान की कसम खाने वाले सैन्य कमांडर पर यकीन किया। बदले में मिला नरसंहार, जो जारी है 72 साल से। अभिव्यक्ति की आजादी, मानवाधिकारों और मजहब के पैरोकारों के होठ फिर भी सिले।
पठान सही थे या सिख। यह फैसला करना केसरी फिल्म का मकसद नहीं है। चाहे सिख सैनिक अंग्रेज़ों के सिपाही बनकर लड़ें हों या हमला करने वाले पठान आज़ादी के परवाने हों, उन 22 वीरों का 'लास्ट स्टैंड' सब बातों से ऊपर था। इसके बारे में हमें पता होना चाहिए था।