रोमिला थापर जी, सीवी न सही सुरख़ाब के जो पर लगे हैं आप पर वही दिखा दीजिए हमें…

इसे ऐसे दिखाना कि सरकार के साथ मिल कर जेएनयू प्रशासन तबाही मचाने पर तुली हुई है, और इससे तो विश्वविद्यालय ही बर्बाद हो जाएगा, ये तो अलग लेवल का प्रपंच है। आप बस ये सवाल अपने आप से पूछिए कि इससे विश्वविद्यालय कैसे बर्बाद हो गया? जवाब मिले तो ज़रूर बताएँ।

चाहे वो माओवंशी लेनिननंदन कामभक्त वामपंथी हों या अपनी ही बात पर कट्टर बन कर डटे रहने वाले लिबरपंथी, दोनों के ध्येय में हमेशा से अभिजात्यता या किसी भी तरह के ‘मैं बड़ा हूँ’ वाली बातों को लेकर, थ्योरेटिकली, नकारात्मक मानसिकता रही है। कहने का तात्पर्य यह है कि इन्होंने हमेशा समाज को एकरूपता में रहते देखना चाहा है, ये बात और है ये सब कहने की बातें हैं और पब्लिक में बीड़ी पीने वाले कामपंथियों को पार्टियों में मुफ्त की मार्लबोरो पीते देखा गया है।

ख़ैर, मुद्दा यह है कि भारत की प्रसिद्ध कहानीकार, जिन्हें लिबरपंथी-वामपंथी लॉबी इतिहासकार भी मानती है, रोमिला थापर से जेएनयू प्रशासन ने नए नियमों का हवाला देते हुए कहा कि वो अपनी सीवी भेज दें। इस पर हो-हल्ला मच गया और बहुत सारे लोग आहत हो गए, क्योंकि आहत होना हमारा राष्ट्रीय उद्योग है। आहत होने वालों को रोमिला थापर के अलावा दर्जन भर और प्रोफेसरों से माँगे गए सीवी से कोई मतलब नहीं है क्योंकि रोमिला तो रोमिला हैं!

ये सब हो क्या रहा है?

रोमिला थापर 1991 में जेएनयू से रिटायर हो चुकी हैं। विश्वविद्यालयों में रिटायर हो चुके प्रोफेसरों को भी उनकी अकादमिक क्षमता और उनकी सहमति को देखते हुए प्रोफेसर एमेरिटस/एमेरिटा की पदवी दी जाती है जिसमें उन्हें आर्थिक लाभ तो नहीं मिलता पर विश्वविद्यालय उनसे शैक्षणिक सेवाएँ लेता रहता है। इसे यूनिवर्सिटी द्वारा एक सम्मान के तौर पर देखा जाता है।

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रोमिला थापर समेत 21 प्रोफेसरों को विश्वविद्यालय ने यह पद दिया हुआ था। इन 21 लोगों में 17 सोशल साइंस और ह्यूमैनिटीज संकायों से आते थे, और चार विज्ञान से। यूनिवर्सिटी की एक्जीक्यूटिव काउंसिल ने इस बात पर गौर करते हुए, अन्य बातों को ध्यान में लेते हुए, प्रोफेसर एमेरिटस (या एमेरिटा) के पद हेतु नियम तय किए ताकि कई प्रोफेसर जो दूसरे विभागों से रिटायर हो चुके हैं, उनके अनुभव और शिक्षण से भी यूनिवर्सिटी लाभान्वित हों।

साथ ही, ध्यान देने योग्य बात यह है कि नियम यह भी बनाया गया कि 75 की उम्र के बाद ऐसे प्रोफेसरों के पदों की समीक्षा होनी चाहिए और देखना चाहिए कि उनका स्वास्थ्य आदि उन्हें इस योग्य बनाता है कि वो यूनिवर्सिटी के क्रियाकलापों में अपना बेहतर योगदान दे सकें। इस हेतु सीवी मँगाना इस प्रक्रिया का हिस्सा है।

ब्लू आईड बेबी और हुआँ-हुआँ चिल्लाने वाले लोग

अब रोमिला थापर को ये बात चुभ गई कि उनसे, जिसने भारत का इतिहास लिखा है, उससे सीवी माँगी जा रही है! ये तो हद बात हो गई कि रोमिला थापर से सीवी माँगी जा रही है! लेकिन यही सारे लोग प्रधानमंत्री की डिग्री तो खूब माँग रहे थे। कह रहे थे कि जाँच होने में क्या जाता है। जबकि मंत्री या प्रधानमंत्री बनने के लिए डिग्री के होने या न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन, प्रोफेसर से सीवी माँग लेना आखिर ईशनिंदा की तरह क्यों लिया जा रहा है?

नहीं देना है तो मत दो, पद छोड़ दो क्योंकि अगर इसी जेनयू का एकेडमिक काउंसिल योग पर आधारित पाठ्यक्रम को विश्वविद्यालय के भगवाकरण के तौर पर देखते हुए नकारता रहता है क्योंकि उस काउंसिल में वामपंथियों का वर्चस्व है, तो फिर एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल कोई नियम बना कर, उसे लागू करना चाहती है तो समस्या क्या है?

मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि जब सीवी में कोई समस्या नहीं है तो इसे अपने सम्मान पर लेने जैसी कौन सी बात हो गई? सीवी माँगने की बात पर जेएनयू के शिक्षक समूह ने इसे दिल पर लेते हुए कहा है कि इस तरीके से विश्वविद्यालय प्रशासन ने रोमिला थापर को नीचा दिखाने की कोशिश की है और अपमान किया है। साथ ही, वो यहाँ तक कह बैठे कि प्रशासन को माफी माँगनी चाहिए।

अपनी पत्नी की हत्या का आरोप झेल रहे शशि थरूर ने बताया कि देश के इंटेलेक्चुअल्स का अपमान हो रहा है और ये बहुत ही बुरी बात है कि उनसे सीवी माँगी गई है। रवीश कुमार ने करीब तीन एकड़ लम्बी पोस्ट लिख कर ट्रेडमार्क धूर्तता से बताया कि देश के युवाओं के साथ क्या-क्या गलत हो रहा है। उन्होंने बताया कि देश के युवा मुर्दा हो चुके हैं और उनकी सियासी समझ थर्ड क्लास हो चुकी है। ये बताना रवीश जी भूल गए कि ये सियासी समझ की पाठशाला करोड़ों रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपित प्रणय रॉय के कुलपतित्व में चलने वाली रवीश कुमार यूनिवर्सिटी ऑफ सियासी साइंसेज के व्हाट्सएप्प कैम्पस में चलती है या फिर वो सोचते हैं कि वो जिसे थर्ड क्लास कह देंगे, वो वैसा हो जाएगा।

रवीश कुमार की पीड़ा या फिर घमंड?

बात यह है कि रवीश ‘मैं मनीला जा रहा हूँ’ कुमार स्वयं में इतने डूब चुके हैं कि वो जेएनयू के वीसी पर थीसिस चुरा कर वीसी बनने का इशारा भी कर दिया। उन्होंने रोमिला थापर की किताबों की बात तो की लेकिन उसी इंटरनेट पर जेएनयू के वीसी के किताबों और शोधपत्रों का नाम नहीं पढ़ सके क्योंकि उसकी क्या ज़रूरत है।

रवीश जी नहीं पढ़ेंगे क्योंकि डॉ जगदीश कुमार ने अशोक और चंद्रगुप्त मौर्य पर नहीं लिखा, उन्होंने फलाँ बात पर किताब नहीं लिखी जिससे अंग्रेजी का ज्ञान भी बढ़ता है। ये बात और है कि डॉ जगदीश ने आईआईटी मद्रास से पीएचडी की है, और वाटरलू यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रिकल और कम्प्यूटर इंजीनियरिंग से पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च किया। साथ ही, वो आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर भी हैं। इसके साथ ही कई महत्वपूर्ण और ख्यातिप्राप्त पदों से जुड़े रहे हैं और शैक्षणिक कार्यों के लिए विशेषणों से सराहे गए हैं।

रवीश जी को इसमें रूचि नहीं होगी क्योंकि वो एक लाइन में उन्हें चोर बता गए कि आजकल थीसिस चुरा कर लोग वीसी बन जाते हैं। रवीश लिखते हैं कि जब वीसी को रोमिला थापर की सीवी मिलेगी तो वो देख पाएँगे कि कोई रोमिला थापर कैसे बनता है। जैसे कि प्रोफेसर जगदीश कुमार को मोदी ने नागपुर में पेड़ों पर संतरा गिनते देखा था और दस तक की गिनती सही पाने पर जेएनयू का वीसी बना दिया।

रवीश कुमार जैसों की यही करतूत इन्हें लगातार पब्लिक डिस्कोर्स से बाहर करती जा रही है, लोग इन्हें गम्भीरता से नहीं लेते। रवीश जी, आप मनीला में हैं, आपको मैग्सेसे अवार्ड मिला है, गले में मेडल ज़रूर पहनिए, लेकिन ध्यान रहे कि प्रोफेसर रोमिला को महान बताने के लिए प्रोफेसर जगदीश कुमार का हीन होना आवश्यक नहीं है।

प्रोफेसर जगदीश नैनोइलेक्ट्रॉनिक डिवाइस, नैनोस्केल डिवाइस मॉडलिंग और सिमुलेशन, इनोवेटिव डिवाइस डिजाइन और पावर सेमिकन्डक्टर डिवाइसेज पर काम करते हैं। लेकिन मैं भी आप ही की तरह आपको नीचा दिखाने के लिए, आपके ही अंदाज में यह कह सकता हूँ कि रवीश के लिए सेमीकंडक्टर और बस कंडक्टर एक ही बात है, तो वो क्या जाने जगदीश कुमार क्या हैं। और हाँ रवीश जी, प्रोफेसर जगदीश ने इन विषयों पर 200 से ज्यादा पेपर पब्लिश किए हैं।

सुरखाब के पर अगर लगे हैं, तो वो कहाँ हैं?

आखिर रोमिला थापर से सीवी क्यों न माँगी जाए? इसे ऐसे क्यों दिखाया जा रहा है कि विश्वविद्यालय ने रोमिला थापर के ऊपर कोई परमाणु हथियार डेटोनेट कर दिया है? लिबरपंथी और वामपंथी क्षुब्ध क्यों हैं? रोमिला थापर ने जो इतिहास लिखा है उस पर सम्यक चर्चा होने पर पता चलता है कि उन्होंने कल्पनाशीलता के आधार पर तथ्य बना दिया। बच्चों की किताबों में इतिहास पहुँचाने वाली रोमिला थापर से यह पूछा जाना चाहिए कि भारत के अनेकों राजाओं और राजवंशों के इतिहास को चंद पन्नों में समेटने के पीछे, और इस्लामी आतंकियों के परपोतों के प्रेमसंबंधों तक को पढ़ाने और अंग्रेजों के पापों को सामान्यीकृत करने के पीछे क्या उद्देश्य रहा होगा?

इन रामचंद्र गुहा और थापर जैसों से पूछना चाहिए कि जिस गजनवी ने भारत पर सत्रह बार आक्रमण किया था उसके हिम्मत की दाद देने वाली, कभी न हार मानने वाली बात को हमें बचपन में क्या सोच कर पढ़ाया जाता रहा? क्या अपने ही देश पर सत्रह बार आक्रमण कर, मंदिर लूटने वाले, गाँव जलाने वाले, बलात्कारी और आतंकी लुटेरे को भारत के बच्चे प्रेरक कहानी मान कर पढ़ें कि देखो वो तुम्हारे पूर्वजों का बलात्कार करने के लिए, तुम्हारे मंदिर तोड़ने के लिए सत्रह बार तक प्रयासरत रहा… इसका जवाब कौन देगा?

इन्होंने जो ‘सभ्यता’ की परिभाषाएँ दी हैं, भगत सिंह जैसे बलिदानियों और आजादी के क्रांतिवीरों को बागी और आतंकी तक कहा है, वो इसी गिरोह के तो लोग हैं। उसे रोमिला थापर ‘कॉन्टेक्स्ट’ याद दिलाती हैं लेकिन यह भूल जाती हैं कि ये इतिहास हमारा है, अंग्रेज़ों को पढ़ाने के लिए नहीं है। इनको इतनी इज्जत आखिर क्यों कि सीवी माँग लिया तो ऐसे बात हो रही है जैसे अब तो कयामत आएगी और कब्रों से लाशें निकलकर सड़कों पर पैदल चलने लगेंगी!

फिर तो एक दिन प्रधानमंत्री कहे कि वो संविधान की शपथ क्यों लेगा वो तो चुन कर आया है। राष्ट्रपति बोले कि वो तो राष्ट्रपति है वो बस चिल करेगा और उससे कोई सवाल नहीं पूछेगा! अरे सीवी माँगा है, किडनी निकाल कर देने को नहीं कहा है!

‘विद्या ददाति विनयम्’ पढ़ कर हम बड़े हुए हैं। अंग्रेजी में कहते हैं कि नॉलेज से ह्यूमिलिटी आती है। आदमी विनम्र हो जाता है। ये कैसी विद्या है कि किसी विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार, एक तय उम्र जिसमें बहुत सारे लोग पढ़ाने के काबिल नहीं रह जाते, उनका स्वास्थ्य गिर जाता है, उनसे सीवी माँगा गया तो प्रोफेसर एमेरिटा होने का ऐसा दंभ कि आप बिफर गए!

आप तो बिफरे ही, साथ ही एक पूरा गिरोह पागल हो गया कि अब तो आने वाला जलजला उसकी आइसक्रीम पिघला देगा इसलिए प्रोफेसर जगदीश की ऐसी की तैसी! क्या एक प्रोफेसर एमेरिटा को यह शोभा देता है कि वो इस छोटी सी बात को, एक यूनिवर्सिटी के नियमों को धता बताते हुए ईगो पर ले ले कि तुम्हारी औकात क्या है कि तुमने रोमिला थापर से सीवी माँग ली!

ये प्रोपेगेंडा है जो ऐसे ही तिल का ताड़ बनाता है

ये बिलकुल भी नई बात नहीं है। ये प्रोपेगेंडा का तंत्र है जो इसी निश्चित तरीके से काम करता है। एक बहुत छोटी सी बात को यह ऐसे दिखाता है मानो हम तानाशाही में जी रहे हों और हर बात मोदी के इशारे पर हो रही है। सीवी माँग कर कोई किसी को कैसे अपमानित कर सकता है? इस बात पर अपमानित होना या न होना तो हमारे हाथों में है। इस बात को इतनी तूल आखिर क्यों दी गई?

वो इसलिए कि पिछले सात-आठ सालों से संघर्षरत वामपंथी-लिबरपंथी समूह को एक भी वैसी बात नहीं दिखी जिसे यह भुना सकें। इनके सारे प्रपंच समय के साथ एक्सपोज होते रहे और लोग सत्य को सामने लाते रहे। चाहे वो असहिष्णुता वाली बातें हो, चाहे वो बीफ को लेकर कथित तौर पर हुई हत्याएँ हों, मुसलमानों की लिंचिंग हो, वंदे मातरम न कहने पर पीटने की बातें हों, या जय श्री राम के नारे को आतंकी बनाने की जिद, इनका एक भी अजेंडा सत्य के सामने टिक नहीं सका।

फिर भी, जब लड़ाई महीनों की नहीं, सालों की नहीं, दशकों को रेंज में लेकर लड़ी जा रही हो तो हर टॉम-डिक-हैरी के नाखून टूटने की खबर को खबर बनाया जाता है। पत्रकार मनीला जाते-जाते अपनी जिम्मेदारी निभा लेता है। नेता सक्रिय हो कर बताने लगते हैं कि भारत में तो बुद्धिजीवियों की कोई कद्र ही नहीं है। उसके बाद उदारवादी विचारधारा के कट्टरपंथी समर्थक यह कहने लगते हैं कि देश में तो आपातकाल है और तानाशाही हो रही है।

विचारधाराओं की लड़ाई के इस दौर में सजग हो कर, तथ्य से, सही सूचना के साथ बात रखने की जरूरत है। सही सवाल उठाने की जरूरत है कि कोई भी प्रोफेसर इतना बड़ा नहीं होता कि वो विश्वविद्यालय से ही बड़ा हो जाए। ये जानने की जरूरत है कि नियम सबके लिए हैं और जब तक वो सामान्य बुद्धि-विवेक के तर्कों से परे न हों, उसका सम्मान करना आवश्यक है।

प्रोपेगेंडा को काटना ज़रूरी है। वरना यही रवीश कुमार जुनैद को बीफ के कारण शहीद बना देता है, लेकिन सत्य सामने आने पर नहीं बताता कि उसकी हत्या सीट के लिए हुई एक झड़प का दुर्भाग्यपूर्ण अंत थी। बीफ की माला जपने वाला यही रवीश कभी भी एक लाइन नहीं बोल पाता कि 2018 के बाद से कितने हिंदुओं को बीफ तस्करी में संलिप्त मुसलमानों ने मौत के घाट उतार दिया। यही रवीश जो पाताल तक जा कर हर घटना को कम्यूनल बना कर, उसके फूफा के मौसे के पोते के भाई का भाजपा कनेक्शन निकाल लाता है, वो मुसलमानों द्वारा बार-बार झूठी हेट क्राइम की खबरें बनवाने या काँवड़ियों पर लगातार हो रही पत्थरबाजी पर नहीं बोल पाता।

इसीलिए, चाहे वो रवीश कुमार हों या पूरा वामपंथी गिरोह, इनसे सवाल पूछते रहिए कि इनसे 1984 के दंगों की बात नहीं पूछ रहे हम, हम पूछ रहे हैं कि हिन्दुओं की हत्या पर, मंदिरों को तोड़ने पर, विसर्जन के जुलूस पर पत्थरबाजी करने पर, काँवड़ियों पर होने वाले हमलों पर, हिन्दुओं की मुसलमानों द्वारा मॉब लिंचिंग पर, मेरठ से पलायन करते हिंदुओं की कहानी पर… इन सब पर आपने कब बोला?

रोमिला थापर की सीवी तो कोई मुद्दा है ही नहीं। सीवी तो एक कागज का टुकड़ा होता है, उससे रोमिला थापर के कथित सामाजिक या अकादमिक उपलब्धियों पर धब्बा नहीं लगता, उनके स्टेटस को धक्का नहीं पहुँचता। लेकिन इसे ऐसे दिखाना कि सरकार के साथ मिल कर जेएनयू प्रशासन तबाही मचाने पर तुली हुई है, और इससे तो विश्वविद्यालय ही बर्बाद हो जाएगा, ये तो अलग लेवल का प्रपंच है। आप बस ये सवाल अपने आप से पूछिए कि इससे विश्वविद्यालय कैसे बर्बाद हो गया? जवाब मिले तो ज़रूर बताएँ।

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