इसमें केवल पासी, धानुक, मंडल और महतो ही नहीं शहीद हुए थे- मरने वालों में झा और सिंह नामधारी भी थे। तो दलहित चिंतकों के लिए इस मामले में रस नहीं होता। इसलिए यह नाम भी गुमनाम ही रह गए, और मुंगेर भी नेताओं के लिए जलियाँवाला जितना जरूरी नहीं बना।
इस समस्या से उबरने के लिए पूरी दुनिया को एक होने की जरुरत है, हम सब को अपने अपने स्तर पर कोशिश करते रहने की जरुरत है। हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने के पीछे भी यही मकसद है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया जा सके। लेकिन साल के किसी एक दिन को इस तरह की दिवस मनाकर हम इस विकराल समस्या को नही सुलझा सकते, इसके लिए पूरे वर्ष सतत प्रयास करते रहने की जरूरत है।
सब कुछ विश्लेषण करने के बाद अपनी ज़मीन वापस पाने के लिये 13 अप्रैल 1984 को बाकायदा ऑपरेशन मेघदूत चलाया गया जिसकी नायक थे लेफ्टिनेंट जनरल प्रेम नाथ हून और लेफ्टिनेंट कर्नल डी के खन्ना। तब से हमारी सेनाएँ सियाचिन की रखवाली कर रही हैं।
यह बिलबिलाहट जनाधार खो चुकी लुटेरी पार्टियों और चाटुकार पक्षकारों का सामूहिक रुदन है। जब तक यह सर्वजन के हित की बात नहीं करेंगे। तब तक इनका भला नहीं होने वाला अब जनता जाग चुकी है, धोखे से न नेता को वोट मिलने वाला है और न ही पक्षकारों को रीडर या दर्शक।
अगर दाखुंदा का शाब्दिक अर्थ देखें तो ये मोटे तौर पर पहाड़ी जैसा अर्थ लिए हुए है। जैसे हिंदी में 'देहाती' कहने पर सिर्फ ग्रामीण का बोध नहीं होता, उसमें 'गंवार', मूर्ख, नासमझ, या दुनियादारी से अनभिज्ञ वाला भाव भी होता है।
राजनैतिक मजबूरियों का कवच पहनकर किसी के पाप नहीं धुलते। अगर किसी प्रधानमंत्री के शासनकाल में घोटाले हुए, समझौतों में देश की सुरक्षा को नकारा गया, तो वो प्रधानमंत्री साक्षात दशरथपुत्र रामचंद्र ही क्यों न हों, पाप के भागीदार वो भी हैं।
ताशकंद फाइल लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मौत के बारे में बात करती हैं। विवेक ने कहा कि उनसे नफरत करने में इन "उदारवादियों" ने लाल बहादुर शास्त्री से सिर्फ इसलिए नफरत करना शुरू कर दिया है क्योंकि वह राष्ट्रवाद के प्रतीक थे।
दलाल, हरामज़ादा, पूतना, दरिंदा, चोर, भड़वा, खूँखार उग्रवादी जैसे अनेक शब्दों का प्रयोग राजनीतिक बयानबाजी में धड़ल्ले से बढ़ता जा रहा है। कभी मोदी से उनकी मर्दानगी का सबूत माँगा जाता है, तो कभी उनकी बूढ़ी माँ को लेकर अभद्र टिप्पणियाँ की जाती हैं।
रैलियों में यह बोला जाएगा, बार-बार बोला जाएगा क्योंकि हाँ, भारत के नागरिकों को पहली बार महसूस हो रहा है कि पाकिस्तान या बाहरी आतंकी मनमर्ज़ी से हमला कर के भाग नहीं सकते। यह सरकार उनकी सीमाओं को लाँघ कर निपटाएगी, बार-बार।
विस्थापितों की अधिकांश जनसंख्या को शेख अब्दुल्ला ने रोक लिया और उन्हें यह भरोसा दिलाया कि उन्हें राज्य में सब कुछ दिया जाएगा। सब कुछ देने के नाम पर पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को 1954 में अनुच्छेद 35-A का संवैधानिक छल उपहार स्वरूप दिया गया।