विचार

सजदे में झुकती महिलाओं के स्तन से पैंटी के रंग बताने तक मजहबी नेता काफी आगे आ गए हैं

ये देखने वाली बात होगी कि आने वाले दिनों में मजहब के महान नेता आज़म खान अंतःवस्त्रों के रंग से नीचे उतरते हुए जननांग और स्तनों के कप साइज से मजहब की भीड़ का ज्ञानवर्धन किस महिला का नाम लेकर करेंगे।

हिंदुस्तान के उत्थान में रमता था बाबा साहब का मन, उनके नाम पर विघटन-घृणा का बीज बोना वामपंथियों की साजिश

"मैं हिंदुस्तान से प्रेम करता हूँ। मैं जियूँगा हिंदुस्तान के लिए और मरूँगा हिंदुस्तान के लिए, मेरे शरीर का प्रत्येक कण हिंदुस्तान के काम आए और मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण हिंदुस्तान के काम आए, इसलिए मेरा जन्म हुआ है।”

भीमा कोरेगाँव: बाबासाहेब अंबेडकर ने नहीं दी थी ब्राह्मणों को गाली, झूठ बोलते हैं अर्बन नक्सली

कोरेगांव की लड़ाई की प्रशंसा ब्रिटेन की संसद तक में हुई थी और कोरेगाँव में एक स्मारक भी बनवाया गया था जिस पर उन 22 महारों के नाम भी लिखे हैं जो कम्पनी सरकार की ओर से लड़े थे। यह प्रमाणित होता है कि कोरेगाँव की लड़ाई दलित बनाम ब्राह्मण थी ही नहीं, यह तो दो शासकों के मध्य एक बड़े युद्ध का छोटा सा हिस्सा मात्र थी।

अल्पसंख्यक ही नहीं बहुसंख्यक भी होते हैं सांप्रदायिक वारदातों के शिकार, छिपाता है मीडिया

हिन्दू आज़ादी से अपने त्यौहार मनाएँ, मुस्लिम बिना व्यवधान से नमाज़ पढ़ें, लेकिन दोनों ही मामलों में अगर कोई बाधा डालने वाला कार्य करता है तो दोनों ही ख़बरों को समान प्राथमिकता दी जाए। एक को छिपाना और एक को विश्व स्तर पर ले जाकर भारत को भीड़तंत्र वाला देश साबित करने का प्रोपेगंडा अब नहीं चलेगा।

चुनाव के समय में पत्रलेखन: प्रचार, आचार, चाटुकार और पत्राचार का फलता फूलता व्यवसाय

बुद्धिजीवी एक दूसरे को पत्र लिख कर आकाश को गिरने से रोककर उसी प्रकार आश्वस्त हैं जैसे नेहरू जी अंग्रेजी में ट्रिस्ट विद मिडनाईट का भाषण दे कर हो गए थे और भारतीय पत्नियाँ पतियों को आदर्श पुरूष होने का आदेश दे कर संतुष्ट हो जाती हैं।

बिहार का गुमनाम जलियाँवाला: नेहरू ‘तारापुर शहीद दिवस’ की घोषणा करके भी मुकर गए, क्या थी वजह?

इसमें केवल पासी, धानुक, मंडल और महतो ही नहीं शहीद हुए थे- मरने वालों में झा और सिंह नामधारी भी थे। तो दलहित चिंतकों के लिए इस मामले में रस नहीं होता। इसलिए यह नाम भी गुमनाम ही रह गए, और मुंगेर भी नेताओं के लिए जलियाँवाला जितना जरूरी नहीं बना।

किस तरह हर दिन हम मौत की तरफ बढ़ रहे हैं, वजह प्रदूषण: रामनवमी पर पर्यावरण बचाने की सार्थक पहल

इस समस्या से उबरने के लिए पूरी दुनिया को एक होने की जरुरत है, हम सब को अपने अपने स्तर पर कोशिश करते रहने की जरुरत है। हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाने के पीछे भी यही मकसद है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया जा सके। लेकिन साल के किसी एक दिन को इस तरह की दिवस मनाकर हम इस विकराल समस्या को नही सुलझा सकते, इसके लिए पूरे वर्ष सतत प्रयास करते रहने की जरूरत है।

सियाचिन के परमवीर: ऑपरेशन मेघदूत से लेकर अब तक की कहानी

सब कुछ विश्लेषण करने के बाद अपनी ज़मीन वापस पाने के लिये 13 अप्रैल 1984 को बाकायदा ऑपरेशन मेघदूत चलाया गया जिसकी नायक थे लेफ्टिनेंट जनरल प्रेम नाथ हून और लेफ्टिनेंट कर्नल डी के खन्ना। तब से हमारी सेनाएँ सियाचिन की रखवाली कर रही हैं।

सेकुलर मीडिया को माया में समावेशी दर्शन और योगी में विघटनकारी राजनीति नज़र आई

यह बिलबिलाहट जनाधार खो चुकी लुटेरी पार्टियों और चाटुकार पक्षकारों का सामूहिक रुदन है। जब तक यह सर्वजन के हित की बात नहीं करेंगे। तब तक इनका भला नहीं होने वाला अब जनता जाग चुकी है, धोखे से न नेता को वोट मिलने वाला है और न ही पक्षकारों को रीडर या दर्शक।

राहुल सांकृत्यायन और सदरुद्दीन एनी: साहित्यकार की कलम भविष्य भी लिख देती है

अगर दाखुंदा का शाब्दिक अर्थ देखें तो ये मोटे तौर पर पहाड़ी जैसा अर्थ लिए हुए है। जैसे हिंदी में 'देहाती' कहने पर सिर्फ ग्रामीण का बोध नहीं होता, उसमें 'गंवार', मूर्ख, नासमझ, या दुनियादारी से अनभिज्ञ वाला भाव भी होता है।

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