मुस्लिम समाज औरों से धर्म निरपेक्षता की उम्मीद करता है पर खुद धर्मनिरपेक्ष होने के लिए तैयार नहीं है। बोर्ड के प्रस्ताव में केवल मुस्लिम समाज के ईशों की निंदा की बात की गई है।
बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ जो कुछ हुआ वह पूरी दुनिया ने देखा। यह सब देखते हुए यदि हिंदू यह सोचने लगे कि पूरी दुनिया ही उसके विरुद्ध है तो इसमें आश्चर्य कैसा?