Tuesday, October 27, 2020
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गोकुलपुरी वाली चार्ज शीट एक महीने पुरानी है, इसे ‘खुलासा’ कह कर वामपंथी अभी क्यों नाच रहे हैं?

एक पुरानी चार्ज शीट को एक तय टाइमिंग के साथ, एक ही गिरोह के कुछ लोग सिर्फ इसलिए चर्चा में लाना चाह रहे हों क्योंकि उसमें हिन्दुओं का नाम है, तो वो नैरेटिव चलने ही नहीं देंगे। उन्हें तो फन उठाने से पहले ही कील वाले जूतों से मसल देंगे।

NDTV की नगमा सहर और निधि कुलपति से ले कर ‘द हिन्दू’ तक अचानक से लगभग एक महीने पुरानी चार्ज शीट को ले कर इस तरह से माहौल बना रहे हैं जैसे कि वो कल ही आई हो। चार्ज शीट में दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में एक व्हाट्सएप्प ग्रुप की बात की गई है जिसकी जाँच हो रही है। साथ ही, नौ मुसलमानों की हत्या के संबंध में कुछ हिन्दुओं को गिरफ्तार भी किया गया है।

सबसे पहला सवाल यह उठता है कि आखिर एक महीने पुरानी चार्ज शीट पर आज चर्चा क्यों और किस लहजे में हो रही है? नगमा सहर के शो पर पूरे घटना क्रम को ऐसे दिखाया गया जैसे ये ब्रेकिंग न्यूज हो और यह चार्ज शीट तो कल ही इनके हाथ लगी हो, और बाकी दुनिया को कुछ पता ही नहीं है। आराम से, शब्दों को चबा-चबा कर बोला गया कि मरने वाले मुस्लिम थे, मारने वाले हिन्दू और व्हाट्सएप्प ग्रुप का नाम ‘कट्टर हिन्दू एकता’ आदि था।

लक्ष्य क्या हो सकता है इसका?

अगर एक महीने पहले के माहौल को याद करेंगे तो लक्ष्य समझना बहुत ही सरल है। उस समय तीन चार्ज शीट के छोटे-छोटे हिस्से बाहर आए थे। जिसमें एक ताहिर हुसैन वाला था, एक बलिदानी रतन लाल जी की भीड़ हत्या से संबंधित था और एक अंकित शर्मा की क्रूर और निर्मम हत्या से। उसी समय दिलबर नेगी से ले कर दिल्ली पुलिस पर मुस्लिम भीड़ के हमले की प्लानिंग और फारूख फैजल के राजधानी स्कूल की छत आदि की भी चर्चा हो रही थी।

लेकिन इस समय अधिकतर चार्ज शीट या खबरों में मुसलमानों द्वारा पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार पत्थर, पेट्रोल बम, एसिड की बोतलें, रॉड, गुलेल, हथियार आदि की चर्चा हो रही थी। साथ ही, वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथियों के हिमायतियों का मीडिया समूह और तथाकथित बुद्धिजीवी लिबरल गिरोह, ये चिल्लाने में लगा हुआ था कि चार्ज शीट में तो कपिल मिश्रा का नाम है ही नहीं, ये तो बिकी हुई पुलिस है आदि।

तो इस समय, अगर गोकुलपुरी वाली चार्ज शीट पर भी वामपंथी-लिब्रांडू गिरोह चर्चा करने लग जाता तो उन्हें अपने ही कुतर्कों के कारण दूसरी चार्ज शीटों को भी सही मानना पड़ता। अगर वो यह कहते कि सफूरा जरगर, खालिद सैफी, ताहिर हुसैन, फारूख फैजल आदि की गिरफ्तारी गलत है, लेकिन गोकुलपुरी वाले हिन्दुओं की सही है, तो उनका दोगलापन बिलकुल ही नग्न हो कर सार्वजनिक हो जाता।

अतः, उन्होंने उस वक्त जी-जान लगा कर यह कहा कि दिल्ली पुलिस ने मुसलमानों को निशाना बनाया है और वो अमित शाह के निर्देशों पर विद्यार्थियों को सता रही है, मुसलमानों को जेल में डाल रही है। ये माहौल खूब बनाया गया और केन्द्र सरकार ने सफूरा जरगर को मानवीय आधारों पर बेल देने की बात को सहमति दे दी। वामपंथियों ने इसे अपनी जीत की तरह देखा।

फिर ये कई दिनों तक शांत बैठे रहे। इन्होंने दिल्ली दंगों पर खास बात-चीत की नहीं। इसके बाद, सीधा कल, एक पुरानी चार्ज शीट को चुना गया और उसमें से हिन्दू नामों को हायलाइट करने की सामूहिक कोशिश हुई। ‘द हिन्दू’ में लम्बा लेख छपा कि कैसे हिन्दुओं ने लोगों से नाम पूछे, ‘जय श्री राम’ और ‘हर-हर महादेव’ बुलवाया और फिर उनकी हत्या की।

आज के ‘द हिन्दू’ की रिपोर्ट

इसे इस गिरोह के सदस्यों द्वारा घुमाया जा रहा है और शेयर किया जा रहा है क्योंकि अभी तक सिर्फ यही एक चार्ज शीट है जिसमें हिन्दू आरोपित हैं, और मुसलमान पीड़ित। एक महीने के बाद इसे चुनना और उसे किसी ‘हमने चार्ज शीट के हिस्सों को देखा है’ कह कर चलाना बताता है कि वामपंथी मीडिया का घाघपना अभी भी बाकी है।

13 जून को ही आ चुकी थी यह चार्ज शीट

आप यह सोचिए कि एक चार्ज शीट सूरज के पूरब में उगने जैसा सार्वभौमिक सत्य हो गया, जो उसी दिल्ली पुलिस से दाखिल किया है जिसने ताहिर हुसैन, सफूरा जरगर, खालिद सैफी, उमर खालिद से ले कर मौजपुर, जाफराबाद, चाँद बाग के दंगाइयों और साजिशकर्ताओं को नामित किया है। वहीं, बाकी सारी चार्ज शीट को पक्षपाती कहा गया और इसी दिल्ली पुलिस को डिस्क्रेडिट करने की कोशिश की गई। ऐसे कैसे चलेगा वामपंथी लम्पटों!

क्या हिन्दू समुदाय दंगाइयों के आने का इंतज़ार करता?

इस खबर का दूसरा पक्ष अब यह है कि क्या हिन्दू समुदाय के लोग दंगाइयों के इंतजार में बैठे रहते कि आओ और हमें उसी तरह से जला दो जैसे गोधरा में 59 कारसेवकों को मुसलमानों ने ट्रेन में जला दिया था? अगर इन हिन्दुओं ने कुछ मुसलमानों की हत्या की है तो न सिर्फ कानून उन्हें सजा देगा, बल्कि कोई भी हिन्दू यह कहने नहीं आएगा कि ‘अरे, वो तो छात्र है’, ‘अरे, वो तो गर्भवती है!’

हर व्यक्ति को यह ध्यान रहना चाहिए कि दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों की सुनियोजित योजना बनी थी। ताहिर हुसैन की चार्जशीट में उसने खुद ही कबूला है कि जनवरी में शाहीन बाग में उसकी मुलाकात तथाकथित छात्रों, उमर खालिद और खालिद सैफी, के साथ हुई और उन्होंने दंगों की योजना बनाई।

हर दस से पंद्रह मुसलमानों के घरों की छत पर गुलेल लगे हुए थे। ऊँची बिल्डिंगों से गोलियाँ चलाई गईं थी। मुसलमानों को पहले से पता था कि कहाँ हिन्दुओं का घर है, किधर उनकी दुकान है। बाजार में हिन्दू की दुकानें जला दी गई, बीच में मुस्लिम की दुकान साबुत खड़ी मिली। मस्जिद की छत पर पत्थरों का ढेर मिला। ताहिर हुसैन और फारूक फैजल की बिल्डिंगों से हजारों एसिड की बोतलें और पेट्रोल बम हिन्दुओं के ऊपर फेंके गए, पत्थरों की बारिश हुई…

और ऐसे में हिन्दू क्या कर रहा था? उस इलाके का हिन्दू कहाँ जाता? क्या भागने का कोई रास्ता था? आप यह सोचिए कि मुसलमानों ने दो महीने से इसकी प्लानिंग कर रखी थी। सवा करोड़ रुपए के हथियार आदि खरीदे गए थे, व्हाट्सएप्प पर मुस्लिम महिलाओं को लिए संदेश घूम रहे थे कि उनको क्या करना है, और आप इस बात पर उछल रहे हैं कि हिन्दू ने भी ‘कट्टर हिन्दू एकता’ का व्हाट्सएप्प ग्रुप बनाया था?

चार्ज शीट पर बात करनी है तो, सारे पर करो। व्हाट्सएप्प ग्रुप पर बात करनी है तो हर ग्रुप पर करो। जामिया कॉर्डिनेशन कमिटि पर भी बात करो, उनके पोस्टरों पर भी बात करो, ‘फक हिन्दुत्वा’ और ‘हिन्दुओं से आजादी’ पर भी बात करो, और बात करो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के ‘खिलाफत 2.0’ की, ‘हिन्दुओं कैलाश जाओ की’, ‘हिन्दुत्व की कबर खुदेगी, AMU की धरती पर’ की… बात करो कि शाहीन बाग में भारत का झंडे का हरा रंग उस हिजाब में ऊपर कैसे है, पोस्टरों में हरा रंग सत्तर प्रतिशत कैसे है, बुर्के में हिन्दू महिला की तस्वीर क्यों और स्वास्तिक के चिह्नों को टूटा और जलता हुआ कौन दिखा रहा था?

ये चाहते हैं कि हम इसका जवाब दें कि हिन्दुओं ने मुसलमानों को क्यों मारा? दंगों में हर उस समुदाय का व्यक्ति मरता या घायल होता है जो उस इलाके में रहता है, या वहाँ से उस वक्त गुजरता है। दो महीने की प्लानिंग वाले मुस्लिम समुदाय की हरकतों पर चर्चा क्यों नहीं हो रही? हिन्दू नामों को ले कर आँखों में चमक क्यों?

मुसलमानों द्वारा पूर्वनियोजित दंगों के बीच एक हिन्दू के पास विकल्प क्या हैं?

एक हिन्दू जिसने कहीं भी धार्मिक दंगों की शुरुआत नहीं की, हमेशा झेला है और आत्मरक्षा में खड़ा हुआ है, उसके पास विकल्प क्या हैं? आपको लगता है कि चाँद बाग, गोकुलपुरी, जाफराबाद, भजनपुरा, मौजपुर आदि के हिन्दुओं को इसका आभास नहीं हुआ होगा कि योजना बन रही है? मैंने 23 फरवरी को उस इलाके में रह रहे हिन्दू से बात की थी। मुझे उसकी आवाज का डर बहुत अच्छे से याद है कि उसका परिवार राशन गिन रहा था कि बंद कमरे में कितने दिन बचे रहेंगे।

गोकुलपुरी के हिन्दुओं से क्या उम्मीद कर रहे हैं आप? कि दंगे होने वाले हों, और वहाँ के हिन्दू इंतजार करें कि मुसलमानों का समूह आए और काट कर निकल जाए? क्योंकि दंगों में तो यही होता है। खास कर ऐसे दंगों में जहाँ दो महीने से प्लानिंग चल रही हो और हिन्दुओं के घरों, दुकानों और स्कूल तक को चिह्नित किया जा चुका हो… वहाँ अगर हिन्दुओं ने दंगों के बीच या उससे तुरंत पहले एक व्हाट्सएप्प ग्रुप बना लिया तो दंगों का सूत्रधार वही हो गया?

दोबारा, प्रश्न वही है कि निरीह हिन्दुओं के पास विकल्प क्या थे? सर झुका कर मर जाना,या फिर एक भीड़ का सामना करना और लड़ते हुए मरना? दूसरी बात, जब माहौल दंगों का होता है, जब पगलाई हुई मजहबी उन्माद से ओतप्रोत भीड़ बंदूक़, तलवार, रॉड, एसिड और पेट्रोल बम ले कर जमीन पर भी पीछे पड़ी हो और छतों से भी हमला कर रही हो, तो हिन्दुओं को पास विकल्प क्या रह जाते हैं?

दंगों में सोचने का वक्त नहीं होता। पूर्वनियोजित साजिश करने वाले जब आपका आना-जाना, घर-दुकान, बच्चों के स्कूल चिह्नित कर लेते हैं, तब आपके पास बचाव का क्या रास्ता है? जब दो स्कूल में से एक हिन्दू का हो, दूसरा फारूख फैजल का, एक से मुसलमान अपने बच्चों को दोपहर में ही निकाल कर ले जाने लगते हैं, दूसरे की छत से ट्रेनिंग किए हुए लड़ाकों की तरह मुसलमान उतरते हैं और हिन्दू स्कूल को फूँक देते हैं… तो हिन्दू के पास बचाव के विकल्प क्या हैं?

हत्या करना यही नहीं, लेकिन हत्यारों की भीड़ के सामने सर झुका कर कट जाना भी कायरता ही है। जिन्होंने हत्या की, उस पर कानून अपना काम करेगा लेकिन एक या दस चार्ज शीट भी आ जाएँ, जिसमें हिन्दुओं का नाम हो, तो भी हिन्दुओं के ऊपर दंगों का अपराध नहीं डाला जा सकता। हिन्दू इस देश में हर बार दंगाइयों का शिकार ही बना है। अगर उसकी जनसंख्या ज्यादा न होती तो सफाया हो चुका होता।

हर दंगे के बाद हिन्दू इसलिए जीवित बच जाता है कि सामने की उन्मादी भीड़ की योजना के बाद भी सिर्फ संख्या बल के कारण वो उनका सामना कर पाता है। अगर ऐसा न होता और हिन्दू ही उन्मादी होते तो हमारी बच्चियों को पाकिस्तान और बांग्लादेश में खींच कर जबरन निकाह न कराया जाता, बलात्कार न होते, जमीन नहीं हड़पी जाती, उनकी संख्या घट कर विलुप्तप्राय न हो रही होती!

इसलिए, ये ज्ञान तो कोई न ही दे कि हिन्दू दंगे कर रहे थे! हिन्दू दंगे करते नहीं, दंगाइयों से लड़ते हैं, क्योंकि हमने गंगा-जमुनी तहजीब की गंगा का सम्मान किया है और उन्होंने जमुना को अपनी मजहबी कालिमा से इतना प्रदूषित कर दिया है कि उसका बहाव ही खत्म हो चुका है। इसी सर्वसमावेशी नीति के कारण 59 कारसेवक जला दिए जाते हैं और इतिहास लिखा जाता है कि हिन्दुओं ने गोधरा किया!

अरे हिन्दुओं ने गोधरा नहीं किया, वो गोधरा से बच रहे थे। किसी की जान लेने पर उतारू एक भीड़ जब पागलों की तरह काफिरों की सामूहिक हत्या की प्लानिंग कर रही हो, उनके भगवा वस्त्र देख कर पूरी ट्रेन की बॉगी ही आग के हवाले कर दे, तब आप सोचते हैं कि एक पूरा समुदाय घुटनों पर बैठ जाए और कहे, ‘रघुपति राघव राजा राम’?

ध्यान रहे, और हर मजहबी दंगाई यह याद रखे कि सौ करोड़ हिन्दुओं की धरती है, हर देवता के हाथ में अस्त्र या शस्त्र हैं, रघुपति राघव राजा राम ने लंका में क्या किया ये सबको ठीक से याद रहना चाहिए और कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में क्या किया यह भी। नरसिंह ने लगभग असंभव मृत्यु कैसे दी थी हिरण्यकश्यपु को, वो भी याद रखो ताकि जब तुम गोली, बम, एसिड, पेट्रोल बम ले कर हिन्दुओं को मारने निकलो क्योंकि किसी किताब में काफिरों की हत्या वाजिब बताई गई है, तो दिमाग यह चलता रहे कि नाखून से भी पेट फाड़ा गया है राक्षसों का।

मुसलमानों की पूर्वनिर्धारित योजना बनाम सर्वाइवल के लिए बचता हिंदू

उस समय में जबकि संविधान के प्रस्तावना का पाठ करते हुए, भारत के नक्शे को सामने रख कर, छब्बीस जनवरी को तिरंगा लहरा कर, पूरी दुनिया को शाहीन बाग की हिन्दूघृणा में सनी भीड़ धोखा दे रही थी, और दूसरी तरफ हिन्दुओं को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटने के लिए ताहिर हुसैन और फारुख फैजल जैसे लोग मीटिंग कर रहे थे, हिन्दू समाचार चैनलों पर न्यूज देख रहा था कि महान पत्रकार रवीश जी ने आज मंगल ग्रह के किस क्रेटर पर ‘यहाँ भी बन गया शाहीन बाग’ देख कर स्खलित हो रहे थे!

हिन्दू समाचार ही देखता रहा। यहाँ दिसंबर में जामिया में दंगे कर के टेस्टिंग हुई, फिर जनवरी में जेएनयू में ABVP के बच्चों को वामपंथी गुंडों ने घेर-घेर कर मारा, AMU में भी उसी समय खिलाफत की बातें हो रही थीं… शाहीन बाग की आड़ में शरजील इमाम और सफूरा जैसे लोग मुसलमानों को उकसा रहे थे। हर्ष मंदर कह रहा था कि मुसलमानों को सुप्रीम कोर्ट से न्याय नहीं मिलेगा, उन्हें सड़कों पर आना होगा। सोनिया गाँधी इसे आर या पार की लड़ाई कह रही थी। अमानतुल्ला भीड़ को उकसा रहा था।

हिन्दू इन सारी बातों को समाचार में देख रहा था। क्योंकि हिन्दू अमूमन समाचार ही देखते रहते हैं और फारूख अपनी छत पर गुलेल बना रहा होता है। हिन्दू कभी भी दंगों के लिए तैयार नहीं रहता क्योंकि उसकी प्रवृत्ति दंगा करने की होती ही नहीं। वो तो मोहम्मद बिन कासिम के आगमन से आज तक दंगों को सिर्फ झेलता ही है।

ऐसे में गोकुलपुरी के कुछ नवयुवक क्या करते? आप इस स्थिति में क्या करेंगे जब आप शत-प्रतिशत जानते हों कि एक भीड़ आपके घरवालों को पहली नजर में हाथ काट कर, पैर काट कर दिलबर नेगी की तरह आग में जलने को फेंक देगी? आप उस समय क्या करेंगे जब आपकी गली में IB के कॉन्सटेबल अंकित को चार लोग सेकेंडों में खींच लें और चार घंटे तक चाकुओं से गोदते रहें? आप क्या कर लेंगे जब आपके पिता दूध लेने निकले हों और किसी की छत से उनके सर में गोली मार दी जाए?

गोकुलपुरी के हिन्दुओं ने बचाव के लिए, अपने परिवार, अपने समाज की सुरक्षा के लिए, किसी अनहोनी से बचने के लिए शायद एक ग्रुप बनाया कि बुरी स्थिति में क्या किया जाए। हाँ, उन्होंने अगर किसी की हत्या की है, और वो दंगाई नहीं था (या था भी) तो कोर्ट में केस चलेगा, सजा मिलेगी। हत्या को उचित नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन हत्या के पहले की घटनाओं का समुचित आकलन भी आवश्यक है ताकि उन्हें ही सूत्रधार न बना दिया जाए, जिनके ऊपर दो महीनों की प्लानिंग के बाद मजहबी हमले हुए हों।

हर बिंदु पर गौर कीजिए

जिस समय इस चार्ज शीट की बात हो रही है, और आँखों में जिस चमक के साथ इसकी चर्चा हो रही है, उस समय आपके पास इन लम्पटाधीशों, वामपंथी दोगलों और इस्लामी कट्टरपंथियों के समर्थकों के लिए उचित सवाल होने चाहिए। आप यह पूछिए कि रतन लाल जी को मारने की प्लानिंग में पचास लोग जो थे वो किस मजहब के थे? आप पूछिए कि सीसीटीवी तोड़ कर बुर्के वाली महिलाओं की भीड़ दिल्ली पुलिस के जवानों को कैसे खींच लेती है? उन बुर्के के भीतर किनकी अम्मा, दादी, बहन और जानें थीं?

सवाल यह होना चाहिए कि एक व्हाट्सएप ग्रुप पर एक महीने बाद जो नाच रहे हो, दूसरे व्हाट्सएप ग्रुप पर तुम्हारे बाप चर्चा करने आएँगे कि छतों पर एसिड की बोतले रखें, लोहे का गेट बनवाएँ और करेंट प्रवाहित करें? ये कौन बताएगा कि मस्जिद की छत पर रखे पत्थरों और ईंटों के टुकड़ों से दूसरा फ्लोर बनने जा रहा था या फिर हिन्दुओं की हत्या की नींव रखी जा रही थी?

हाँ, हम मानते हैं कि हिन्दुओं के हाथों से कुछ मुसलमान भी मारे गए होंगे, लेकिन मैं यह नहीं मानूँगा कि हिन्दुओं ने दंगा किया। हिन्दुओं के हाथों हो सकता है कि कुछ मुसलमान मारे गए होंगे, लेकिन वो आइसिस स्टाइल की क्रूरता तो सिर्फ़ हिन्दुओं की लाशों पर ही दिखी। विनोद कश्यप को किसने मारा? दिनेश, आलोक तिवारी, मुंशी जी की हत्या किसने की? राहुल ठाकुर, राहुल सोलंकी की हत्या कैसे हुई? शिवानी की शादी के मंडप पर पेट्रोल बमों से आग किसने लगाई? वीरभान को किसने मारा?

इसलिए, एक पुरानी चार्ज शीट को एक तय टाइमिंग के साथ, एक ही गिरोह के कुछ लोग सिर्फ इसलिए चर्चा में लाना चाह रहे हों क्योंकि उसमें हिन्दुओं का नाम है, तो वो नैरेटिव चलने ही नहीं देंगे। उन्हें तो फन उठाने से पहले ही कील वाले जूतों से मसल देंगे। इनसे प्रश्नों के उत्तर में दस प्रश्न पूछिए ताकि ये बिलबिलाएँ और चुप रहें क्योंकि सत्य यही है कि मुसलमानों ने पूर्वनिर्धारित तरीके से हिन्दुओं को घेर कर मारने की योजना बनाई, और उस पर अमल भी किया।

ये दंगे मत भूलिए, और जब तक इस पर फैसले नहीं आते, हर सप्ताह कम से कम एक दिन इन खबरों को पढ़िए ताकि आपको याद रहे कि हिन्दुओं को किस तरह से शाहीन बाग की नौटंकी की आड़ में मूर्ख बना कर रखा गया और काफिरों के नरसंहार की तैयारी की गई थी। ये अगर भूल गए तो गोधरा की तरह यह हिन्दू-विरोधी दंगा भी हिन्दुओं के ही सर पर फेंका जाएगा, और ये मैं होने नहीं दूँगा।

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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