बात यह है कि हर मामले में खास मजहब का लड़का ही क्यों होता है? ईसाई या सिक्ख लड़के आखिर किसी हिन्दू लड़की को अपना नाम हिन्दू वाला बता कर प्रेम करते क्यों नहीं पाए जाते?
जब बर्बरता तुम्हारी शिक्षा की आधारशिला है, हत्या तुम्हारे लिए एक सम्मानजनक कर्म है, बलात्कार पुण्य और काफिरों के धार्मिक स्थल तोड़ना जन्नत-उल-फिरदौस में कमरे रिजर्व करवाता है, फिर कोई सामान्य बुद्धि-विवेक वाला तुमसे या तुम्हारे मजहब को स्नेहाशिक्त भाव से कैसे देख सकता है?
हिन्दू 'बीरबल की खिचड़ी' के उस ब्राह्मण की तरह है जो तुम्हारे शाही किले में जलते दीपक की लौ से भी ऊष्मा पाता है। हिन्दू को बस इससे मतलब है कि उसके आराध्य का मंदिर बन रहा है। लेकिन सवाल यह है, हे सत्ताधीश! कि क्या तुम्हें हिन्दुओं से कुछ मतलब है?
वामपंथीऔर उदारवादियों को यदि किसी मजहब में ज्ञान देना ही है तो उन्हें उन मजहब से शुरुआत करनी चाहिए, जहाँ समाज को शिक्षित करने की सजा गला रेतने के रूप में मिलती है।