जब बर्बरता तुम्हारी शिक्षा की आधारशिला है, हत्या तुम्हारे लिए एक सम्मानजनक कर्म है, बलात्कार पुण्य और काफिरों के धार्मिक स्थल तोड़ना जन्नत-उल-फिरदौस में कमरे रिजर्व करवाता है, फिर कोई सामान्य बुद्धि-विवेक वाला तुमसे या तुम्हारे मजहब को स्नेहाशिक्त भाव से कैसे देख सकता है?
हिन्दू 'बीरबल की खिचड़ी' के उस ब्राह्मण की तरह है जो तुम्हारे शाही किले में जलते दीपक की लौ से भी ऊष्मा पाता है। हिन्दू को बस इससे मतलब है कि उसके आराध्य का मंदिर बन रहा है। लेकिन सवाल यह है, हे सत्ताधीश! कि क्या तुम्हें हिन्दुओं से कुछ मतलब है?
वामपंथीऔर उदारवादियों को यदि किसी मजहब में ज्ञान देना ही है तो उन्हें उन मजहब से शुरुआत करनी चाहिए, जहाँ समाज को शिक्षित करने की सजा गला रेतने के रूप में मिलती है।
हिन्दुओ! अपनी सहिष्णुता को अपनी कमजोरी मत बनाओ। सहिष्णुता की सीमा होती है, पागल कुत्ते के साथ शयन नहीं किया जा सकता, भले ही तुम कितने ही बड़े पशुप्रेमी क्यों न हो।
हमें वे तस्वीरें देखनी चाहिए जो फ्रांस की घटना के पश्चात विभिन्न शहरों में दिखती हैं। सैकड़ों की सँख्या में फ्रांसीसी नागरिक सड़कों पर उतरे यह कहते हुए - "हम भयभीत नहीं हैं।"
जिनके लिए शिया भी काफिर हो चुका हो, अहमदिया भी, उनके लिए ईसाई तो सबसे पहला दुश्मन सदियों से रहा है। ये तो वो युद्ध है जो ये बीच में हार गए थे, लेकिन कहा तो यही जाता है कि वो तब तक लड़ते रहेंगे जब तक जीतेंगे नहीं, चाहे सौ साल लगे या हजार।