सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन को केवल इस बात का सबूत चाहिए कि अयोध्या के किस खास जगह पर राम का जन्म हुआ था। वरना इकबाल के इमाम-ए-हिंद को वे भी याद करते हैं। कृपानिधान तो वाजिद अली शाह के भी राम ही थे। लेकिन, किसी ने न लिखा, न गाया। राम किस प्लॉट में पैदा हुए थे?
मदरसों में गुलामों जैसी जिंदगी जीने को मजबूर हैं बच्चे। मौलवी उनसे भीख मॅंगवा सालाना लाखों कमाते हैं। पैसा लेकर नहीं आने पर पीटते हैं। शिकायत करने पर धमकाते हैं। दीनी तालीम के नाम पर हो रहा है अमानवीय बर्ताव।
हिन्दीभाषियों के घमंड के दूसरे एक्सट्रीम पर वो लोग हैं जो हिन्दीभाषियों को घृणा से देखते हैं। एक बंगाली व्यक्ति ने लिखा कि हिन्दी वाले गुटखा खाने वाले हैं, गाली देने वाले हैं, भ्रूणहत्या करने वाले हैं, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले हैं, ढोकला चुराने वाले हैं, भुजिया खाने वाले रक्तचूसक कीड़े हैं।
आप सोचिए कि हिन्दी जानने से आपकी संस्कृति कैसे प्रभावित हो रही है? अगर यह कहा जाए कि तुम तेलुगु छोड़ दो, और हिन्दी पढ़ो; तमिल में लिखे सारे निर्देश हटा दिए जाएँगे; कन्नड़ में अब नाटक या फिल्म नहीं बनेंगे; मलयालम की किताबों को जला दो... तब उसे हम कहेंगे कि 'हिन्दी थोपी जा रही है।'
पठान सही थे या सिख। यह फैसला करना केसरी फिल्म का मकसद नहीं है। चाहे सिख सैनिक अंग्रेज़ों के सिपाही बनकर लड़ें हों या हमला करने वाले पठान आज़ादी के परवाने हों, उन 22 वीरों का 'लास्ट स्टैंड' सब बातों से ऊपर था। इसके बारे में हमें पता होना चाहिए था।
विज्ञान कहता है कि पीरियड का शादी की उम्र से कोई रिश्ता नहीं होता। कम उम्र में शादी का लड़कियों के जीवन पर प्रतिकूल असर पड़ता है। बाल विवाह रोकने के लिए कानून भी है। फिर भी मुस्लिम लॉ का हवाला देकर अदालत के फैसले पर सवाल। आखिर इस दकियानूसी सोच और कठमुल्लों के दवाब का क्या है इलाज?
आपने इसीलिए रंजीत का नाम नहीं सुना क्योंकि उसकी मॉब लिंचिंग को लेकर किसी ने आवाज़ ही नहीं उठाई। क्यों नहीं उठाई? क्योंकि आरोपितों में मुस्लिम लोग शामिल हैं। गिरफ्तार आरोपितों में से 2 के नाम अनवर और मिंटू है, जो भाई हैं। लोगों को यह भी बताना पड़ेगा न।
डीएम अनुराग पटेल कहते हैं कि प्रिंट के पत्रकार ने वीडियो बनाया, इसीलिए उस पर मुक़दमे दायर किए गए। डीएम साहब बताएँ कि रेडियो पत्रकार को देखने का हक़ है या उसे सिर्फ़ सुन कर ही काम चलाना है? प्रशासनिक लापरवाही को छिपाने के लिए ख़ुद का मज़ाक बना रहे डीएम।
यह मर्जी का मसला नहीं है। न ही प्रधानमंत्री की अपील या सख्त नियम-कायदों का होना जरूरी है। यह मसला आपकी जिंदगी, आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी से जुड़ा। इसलिए, खुद से ही संभलिए। देर हुई तो न हम बचेंगे न पर्यावरण।
हिन्दू का व्यवसाय धंधा तो मजहब विशीष का कारोबार इबादत कैसे? क्यों असहिष्णुता गणेश चतुर्थी पर ही आती है, मुहर्रम पर नहीं? क्यों कम्पनियॉं मानती हैं कि जूते खाकर भी आप उनका ही प्रोडक्ट खरीदेंगे। जवाब है, हिन्दू आज अपनी ही संस्कृति, दर्शन और इतिहास का मज़ाक बनाने वालों के पोषक बने हुए हैं।