सामाजिक मुद्दे

बिहार में बाढ़: न पहली, न आखिरी बार… आखिर क्यों डूबते हैं शहर?

हुजूर! यही हैं हम। यही है हमारा देश… आज केवल मेरा शहर नहीं डूबा, मेरा पूरा राज्य डूब गया है। छपरा, सिवान, पटना सब डूबे हुए हैं। शहर यदि नदियों के बाढ़ से डूब जाएँ तो बात समझ में आती है, पर बरसात से डूबें तो बात समझ में नहीं आती।

बुद्ध-महावीर के स्थल से उस लड़की के गिड़गिड़ाने की आवाज़… आपके कानों तक पहुँची क्या?

शक्ति की आराधना का पर्व शुरू हो गया है। ऐसे में बुद्ध-महावीर की धरती से इस वीडियो का सामने आना और इसमें पीड़िता द्वारा गिड़गिड़ाते हुए कही गई 2 पंक्तियाँ पूरे देश-समाज को झकझोड़ देने वाली है। सवाल है कि एक ग़रीब मजदूर अपनी बेटी के लिए न्याय माँगते हुए कहाँ-कहाँ भटकेगा?

अब वो चिल्लाती भी नहीं…

मैं जब इस समाज का हिस्सा होने के कारण सोचने लगता हूँ तो पाता हूँ कि ये चलता रहेगा क्योंकि मर्दों के दम्भ की सीढ़ी की अंतिम लकड़ी स्त्री पर अपने लिंग के प्रहार के रूप में ही परिणत होती है। पितृसत्ता का विकृत रूप यही है कि लड़की इस क्रूरतम हिंसा के विरोध में इस तरह से अपनी आत्मा को मार चुकी है कि जो करना है कर लो, पर वीडियो मत बनाओ।

साल भर बाद भी सबरीमाला के सवाल बरकरार, आस्था को भौतिकतावादी समाजशास्त्र से बचाने की ज़रूरत

आस्था नितांत निजी विषय है। सार्वजनिक जीवन और समाज जिस तर्क और भौतिक नियम से चालित होते हैं, उनसे आस्था समेत निजी विषयों के नियम-कानून नहीं बन सकते। नियम सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए होते हैं जो समाज और सार्वजनिक क्षेत्र में लागू होते हैं।

आखिर फेसबुक मजहबी बलात्कारियों को बचाना क्यों चाहता है? क्यों डिलीट कर रहा है खबरें?

सवाल यह कि खास मजहब वालों के अपराधी होने पर फेसबुक की इतनी क्यों जलती है कि बदबू हर तरफ फैल जाती है?

आतंक का एक मजहब है: एक ने स्वीकारा, आप भी स्वीकारिए

चाहे वो मोदी हों, मर्कल हों, मैक्राँ हों, जॉनसन हो या कोई वैसा राष्ट्र जो यह नहीं चाहता कि उसके किसी एयरपोर्ट पर, चर्च में, सड़क पर, पार्क में, मंदिर पर या बस-ट्रेन में बम फूटे, छुरा चले, ट्रकों से लोगों को रौंदा जाए, तो सबसे पहला काम तो वो यह करें कि एक स्वर में इस मुसीबत को उसके पूरे नाम से स्वीकारें कि हाँ, कट्टरपंथी आतंकवाद ने इन सारे देशों में दहशत फैलाई है, जानें ली है, परिवारों को तोड़ा है।

मुंबई मेट्रो: ऐसे बॉलीवुड वालों को जब दो टके का नचनिया कहा जाता है तो बुरा नहीं लगता

ऐसी परियोजनाओं के आने या न आने से इस तरह के अमीरों को फर्क नहीं पड़ता। वो शायद मेट्रो में कभी नहीं चढ़ेंगे, क्योंकि उनके पास ड्राइवर के साथ कार उपलब्ध है। वो बुलेट ट्रेन पर भी नहीं बैठेंगे, क्योंकि वो हवाई जहाज से आते-जाते हैं। वो अगर सेट पर लेट भी पहुँचेंगे तो उनकी सैलरी नहीं कटेगी।

रामायण ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ नहीं है सोनाक्षी, यह हमारी सांस्कृतिक विरासत है, हमारा इतिहास है

सोनाक्षी सिन्हा के घर का नाम 'रामायण' है। उनके पिता व भाइयों के नाम रामायण के किरदारों के नाम पर हैं। 'युवाओं के रोल मॉडल' का अवॉर्ड लेने वाले इन सेलेब्स को रामायण का बेसिक ज्ञान भी नहीं? क्या रामलीला, रामकथा और सुंदरकांड से युवा दूर हो रहे हैं?

2.48 लाख पेड़ों में से 2185 ही काटे जाएँगे, 6 गुना लगाए जाएँगे: Aarey पर त्राहिमाम मचाने वाले बेनक़ाब

अपने SUV कारों से 'Save Aarey' प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले सेलेब्स क्या मुंबई की करोड़ों लोगों की ज़रूरतों को समझते भी हैं? सरकार 2185 पेड़ काटेगी तो 13,000 से भी अधिक लगाएगी भी। 3000 एकड़ के आरे क्षेत्र के 2.5% की ही मेट्रो को ज़रूरत है।

बांग्लादेशी या रोहिंग्या इस देश का नहीं है, उसकी पहचान कर, अलग करना समय की माँग

इन गैरकानूनी शरणार्थियों को इकट्ठा होने दीजिए, एक बड़े जगह पर रखिए तो ये धीरे-धीरे अपने दीवार खड़े करते हैं, गैरमुस्लिम लोगों को उनके इलाके में घुसने से मना करते हैं, फिर संख्या बढ़ने पर स्थानीय प्रशासन से अपने लिए मजहबी आधार पर विशेष अधिकारों की माँग करते हैं, और एक समय आता है कि स्वीडन जैसे देश को बलात्कार के नक्शे पर नंबर एक बना देते हैं।

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