चीटिंग की ख़बर थी, लेकिन इसमें ‘विचित्र’ वाला कम्पोनेंट नहीं मिला। जैसे कि ‘लिंग में बाँधकर ले गए थे पुर्ज़े’ या ‘मलद्वार में रखा था कागज को’, जो कि लल्लनटॉप की विशेषता है। फिर खबर बनेगी कैसे जो लल्लनटॉप पत्रकार को मारक मजा दे दे!
इसमें कोई शक नहीं कि अच्छा हास्य-व्यंग्य सच्चाई के इतने करीब होता है कि कई बार दोनों में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी से लोकसभा चुनावों से ठीक पहले ऐसी 'गलती' हो, इसकी संभावना कम है। यह जानबूझकर किया गया मालूम होता है।
एक तरफ बरखा दत्त को अश्लील तस्वीर भेजने वाला शब्बीर है, वहीं दूसरी ओर 'द वायर' की पत्रकार आरफ़ा खानम हैं जिन्होंने होली मुबारक कहते हुए 'बिस्मिल्ला' शब्द लिखा तो 'सच्चे' मजहबी भड़क उठे।
केजरीवाल के लिए जरूरी है कि वह अब 5 साल पूरे होने से पहले अपने पद की गरिमा को समझ लें और अगले चुनाव होने तक ऐसे गलीच किस्म की राजनीति से खुद को दूर करें, क्योंकि उन्होंने अपने कार्यकाल में 'क्या-क्या' किया है, वो जनता अच्छे से जान और समझ चुकी है।
भारत का हिन्दू उद्गम मानने में समस्या है, असतो मा सद्गमय ‘हिंदुत्व थोपना’ है, पर मजहब विशेष की गलती छुपाने के लिए हिन्दू को Indian बनाने में दिक्कत नहीं है।
कॉन्ग्रेस की मानसिकता का स्तर लगातार गिरता जा रहा है जो उसकी दिमागी रूप से विक्षिप्त होने की दशा को भी उजागर करता है। सोशल मीडिया पर पुरानी तस्वीर को शेयर करना ख़ुद कॉन्ग्रेस के लिए ही भारी पड़ गया, जब लोगों ने इस पर जमकर तंज कसे।
चुनाव आयोग भी फ़ेसबुक के साथ सहयोग करके चुनाव प्रक्रिया में उसकी भूमिका को मान्यता और स्वीकार्यता पाने में सहयोग कर रहा है। क्या चुनाव आयोग को फ़ेसबुक की यह सच्चाई पता है?
“बाजपेयी जी, एंकरिंग आपको संवैधानिक विशेषज्ञ नहीं बनाती है। लोकसभा भंग होने पर ही सरकार केयर-टेकर बनती है। कृपया भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश का संविधान लागू न करें।”