हर तीसरे दिन उठते जातीय बवंडरों का हासिल क्या है?

डर का माहौल बनाया जाता रहा, ये कहकर कि डर का माहौल है। ये इतनी बार कहा गया, कि जो अपने बग़ल के गाँव में ईदगाह तक जाता था, वो अपने गाँव में मुसलमानों को दुर्गा पूजा के मेले में शक की निगाह से देखने लगा।

गिनना शुरु करेंगे तो गिनते रह जाएँगे। आस पास देखेंगे तो पता चलेगा कि स्थिति उतनी भयावह न तो है, न थी, न होती है जब तक कि उसे भयावह बना न दिया जाय। 2014 में एक सरकार आती है, जिसका अजेंडा क्लियर है कि क्या करना है, और क्या नहीं करना है। इस अजेंडे से आपको या मुझे असहमति हो सकती है, जिस पर कहीं और चर्चा की जाएगी।

उसके बाद हर विधानसभा चुनाव के पहले, हर चुनावी कैम्पेन की शुरुआत के साथ ही देश के किसी न किसी हिस्से में या तो किसी अकस्मात् दुर्घटना को किसी रंग से रंग दिया जाता है, या व्यवस्थित तरीक़े से दुर्घटनाएँ करा दी जाती हैं। निचोड़ हर बार यही आता है कि देश में समाज का कोई न कोई तबक़ा असुरक्षित महसूस कर रहा है।

इन सारी आशंकाओं, असुरक्षाओं, असहिष्णुताओं का जन्म एक लोकसभा चुनाव के शुरुआत से लेकर आज तक होता आ रहा है जहाँ एक ऐसी पार्टी को सत्ता मिल जाती है जिसके अजेंडे को हमेशा नीच, हीन, बाँटने वाला और रूढ़िवादी बताया जाता रहा। ये इतनी बार कहा गया, और वोटबैंक के लिए इतने तुष्टीकरण किए जाते रहे कि समाज पहले ही बँटकर बिखर रहा था। जिन्हें नहीं दिख रहा हो, वो चुनावों के परिणामों में वो बिखराव देख सकते हैं।

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देश को जाति और धर्म के नाम पर बाँटने की ज़रूरत नहीं है, वो पहले से ही बँटा हुआ है। संविधान में ऐसी व्यवस्थाएँ हैं कि माइनॉरिटी और मेजोरिटी स्टेट या ज़िले के स्तर पर तय नहीं होता, बल्कि देश के स्तर पर तय होता है। संविधान में वो व्यवस्थाएँ भी हैं जो कि एक तरफ समानता की बातें करती हैं, और दूसरी तरफ अपने ही लक्ष्य को वोटबैंक से ढकेलकर अनंतकाल तक की राजनीतिक विजय सुनिश्चित करने की होड़ में सभी को लगा देती है।

दंगों का इतिहास एक पार्टी के दामन पर इतना ज़्यादा ख़ून फेंक चुका है कि जहाँ भी वो सरकार रही है, दंगे हुए हैं। लेकिन दंगा देश में एक ही दिखता है, उससे पहले या बाद के दंगे ग़ायब हो जाते हैं। नैरेटिव पर शिकंजा कसने वालों के शिकंजों में ढील आती दिखती है; जो दीवारें इन्होंने दशकों से भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण के सीमेंट से तैयार किया था, उसमें दरार बनाने जब लोग पहुँचते हैं तो लाज़िम है कि दर्द तो होगा ही।

‘कोलीशन धर्मा’ और ‘अलाएंस’ की राजनीति के दौर में लोकसभा चुनावों में केन्द्र में किसी को मेजोरिटी मिल जाय ये जब सोच के परे हो रहा था तो एक पार्टी सत्ता में पूर्ण बहुमत के आँकड़ें को पार कर जाती है, तो दर्द होना समझ में आता है। फिर एक के बाद एक राज्य या तो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसके हिस्से आने लगते हैं, और बाप का राज मानकर चलती पार्टियों के लोग सत्ता से बाहर फेंक दिए जाते हैं, तो दर्द होना समझ में आता है।

भ्रष्टाचार, ख़रीद-फ़रोख़्त, तोड़-जोड़ और तुष्टीकरण की राजनीति हर पार्टी ने की है, करती रहेगी। ये एक सच है, इसको मान लीजिए, उसके बाद ही चर्चा कीजिए। स्थिति आदर्श नहीं है। अम्बेडकर और गाँधी को कोट करने वाले आधे समय मतलब की बातें कोट करते हैं लेकिन गाय और मुसलमानों को लेकर उनके विचार कोट करते वक़्त मनु स्मृति के वो हिस्से निकाल लेते हैं जो दो श्लोक के बीच से निकाल लिया गया हो।

2014 और उसके बाद के दस साल भारतीय समाज के लिए निर्णायक होंगे। इसका इतिहास प्री और पोस्ट-मोदी युग के नाम से जाना जाएगा। क्योंकि इस व्यक्ति ने, खुद को और अपने पार्टी को उस मुक़ाम पर पहुँचाया जहाँ ‘राम मंदिर’ और ‘गोधरा’ के हार्ड मेटल संगीत बजाने के बावजूद लोगों ने पूर्ण बहुमत से तीन चौथाई बहुमत तक की सरकारें इसके नाम कर दीं।

लोग लगे रहे रोहित वेमुला में, और वो ये कहते हुए मरा कि मेरी लाश पर राजनीति मत करना। ऊना के दलितों का पिटना, जुनैद की मौत, नजीब का गायब होना, असहिष्णुता की फ़सल, बीफ़ ईटिंग फेस्टिवल, भारत तेरे टुकड़े होंगे, केरल चाहे आज़ादी, वर्धमान-धूलागढ़ के दंगे, गौरक्षकों का खेल, दभोलकर-पनसरे-गौरी लंकेश की हत्या, जातिवाद की बहती नई पछुआ बयार…

ये सारी बातें हुई नहीं, व्यवस्थित तरीक़े से हुईं। इसमें दुर्घटना को मुद्दा बनाया गया। चर्चों में किसी की चोरी को अल्पसंख्यकों को डराने की बात से जोड़ा गया। जॉन दयाल जैसे चिरकुट चिल्लाते रहे हर रोज़, रवीश कुमार उमर खालिदों और कन्हैया जैसे टुचपुँजिया नेताओं को प्राइमटाइम और फ़ेसबुक वॉल पर जगह देते रहे। डर का माहौल बनाया जाता रहा, ये कहकर कि डर का माहौल है। ये इतनी बार कहा गया, कि जो अपने बग़ल के गाँव में ईदगाह तक जाता था, वो अपने गाँव में मुसलमानों को दुर्गा पूजा के मेले में शक की निगाह से देखने लगा।

ये कौन सा तंत्र है? ये आपको नहीं दिख रहा क्या? ये कौन लोग हैं, जो केरल की डेंटल हॉस्पिटल की दलित छात्राओं की ख़ुदकुशी पर एक शब्द नहीं बोलते क्योंकि चुनाव हो चुके थे, लेकिन वेमुला की मूर्ति लगाकर ‘जय भीम’ करते नज़र आते हैं? ये कौन लोग हैं जो उमर ख़ालिद का चेहरा पहने हर वैसी जगह पर होते हैं जहाँ या तो इनके आने से पहले हिंसा होती है, या इनके जाने के बाद? क्या आप इन चेहरों को हर गौरी लंकेश की शोक सभा में नहीं पाते, या हर उस हिंसा में नहीं जहाँ मरने वाले को मुसलमान और दलित के विशेषणों की चादर ओढ़ा दी जाती है?

क्या ये सब 2014 के बाद अकस्मात् घटित हो रहे हैं कि जाट, चारण, राजपूत, चमार, यादव, मुसलमान, म्हार, पटेल, पटीदार, गुर्जर और पता नहीं कौन-कौन लगातार दंगाई होते जा रहे हैं? क्या ये अकस्मात् है कि हर फ़िल्म को किसी जाति की अस्मिता से जोड़कर हिंसा और आगज़नी की जा रही है? क्या ये कहीं उबल रहा था, या ये उफ़ान तात्कालिक है क्योंकि किसी के बाकी के सारे हथकंडे नाकाम हो रहे हैं?

नैरेटिव बनाने की कला इनके हाथों से बाहर जा चुकी है। दो-चार आवाज़ें हैं क्योंकि उनके मालिकों की जेब की तह मोटी है, और उन्हें आशा है कि पार्टी सत्ता में आएगी, या उनके कुछ साक्ष्य कहीं किसी दराज़ में क़ैद हैं। बाक़ियों में से आधे ने तो चुनावी जीत के बाद ही अपनी प्रवक्ता-वादी सोच चैनलों के कार्यक्रमों के ज़रिये दिखा दी थी, और बचे हुए आधे ने शुरु में गाली-घृणा और अजेंडाबाज़ी करके अपने दुकान का नुकसान करके अब अपनी आवाज़ सत्ता की तरफ कर ली है।

नैरेटिव तय करने वालों के पास हमेशा से माध्यमों पर क़ब्ज़ा रहा है। वो हमेशा से एकतरफ़ा प्रवचन देकर देश का अजेंडा तय करते थे। टीवी, अख़बार, इंटरनेट संस्करणों के कॉलम जैसे प्लेटफ़ॉर्म को इन्होंने निचोड़ा है, और प्रवचन की तरह ‘एक बार कह दिया तो कह दिया’ टाइप भुनाया है। इनको कभी भी दूसरे तरफ़ से सीधी प्रतिक्रिया मिली ही नहीं। कभी भी इनके टीवी डिबेट पर आम आदमी ने हमला नहीं किया था, कभी भी इनके अख़बार के कॉलम पर पब्लिकली पब्लिश होने वाले पत्रों में वो पत्र नहीं आते थे जिसमें घोर असहमति थी।

जो सचिन और लता के स्नैपचैट विडियो, रोस्ट के नाम पर घटिया दर्जे की गाली-गलौज का कार्यक्रम से लेकर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ और ‘वंदे मातरम्’ क्यों गाएँ पर फ़ंडामेंटल राइट और ‘डिस्सेंट’ की बात कहते रहते थे, वो आज गाली सुनने पर बिलबिला रहे हैं कि माहौल खराब हो रहा है।

माहौल अगर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ और प्रशांत पुजारी जैसे अनगिनत हिन्दू/संघ प्रचारकों के साथ बाईस रिपोर्टरों की हत्या पर ख़राब और असुरक्षित नहीं हो रहा, तो माहौल इस गाली-गलौज से भी ख़राब नहीं होगा। एक वृहद् समाज में जहाँ हर तरह के लोग हैं, छिटपुट घटनाएँ हमेशा हुई हैं, दोनों तरफ से हुई हैं। लेकिन कभी भी वहाँ उमर ख़ालिद और मेवानी जैसे दोमुँहे लोगों की भीड़ नहीं उतरती थी। वहाँ कभी भी नेताओं की लाश वाली पिकनिक और सेलेक्टिव आउटरेज़ या साइलेंस नहीं दिखती थी। ये ख़बरें या तो हर किसी को आहत करती थीं, या किसी को पता नहीं चलता था।

आज आलम ये है कि हर मौत में एक आइडेंटिटी तलाश ली जाती है। मरने वाला आईटी कर्मचारी ‘युवक’ नहीं ‘मुस्लिम टेकी’ हो जाता है। बतकही से हुआ विवाद मीडिया में गोमांस बनकर डिबेट का हिस्सा हो जाता है। जातिगत आरक्षण से हो रहे प्रतिभा पलायन और भीतर तक उबाल लिए बैठे लोगों को फिर से ऐसे आंदोलनों के कारण बोलने का अवसर दिया जाता है जिनकी आवाज़ में विद्वेष के सिवा और कुछ नहीं। किसी की मौत पर शोकसभा के लिए तमाम लॉबी प्रेसक्लब पहुँचती है और ट्वीट-स्टॉर्म उठाती है, और वैसी ही बाईस और मौतों पर एक अदद ट्वीट भी नहीं।

फिर भी आपको लगता है कि ये सब खुद ही हो रहा है और इसके पीछे कभी व्यवस्था काम नहीं कर रही तो आप निरे भोले हैं। आपको लगता है कि अचानक से देश में भय का माहौल आ गया है, जहाँ हर तीसरे दिन कोई जाति किसी और से भिड़ जाती है, तो आपको कई बातें सोचनी चाहिए। आपको दिखता है कि आपका मुसलमान या दलित मित्र 2014 के बाद हर कही-अनकही सरकारी पॉलिसी के माध्यम से सताया जा रहा है, तो आपको दिमाग का इलाज करा लेना चाहिए।

तेरह दिन से तेरह महीने, फिर पाँच साल और शून्य से सात, सात से सत्रह, और उन्नीस तक पहुँचने वाली सरकार की बातों में कुछ तो है जिससे लगातार उसे सफलता मिल रही है। या तो आपका पक्ष इतना कमज़ोर है कि आपकी बात जनता को समझ में नहीं आती, या आपका सच जनता को पता चल गया है, या फिर उन्हें मोदी और भाजपा में ही संभावना दिख रही है। ईवीएम वाला राग तो अलापना बंद ही कर दीजिए क्योंकि जब बुलाया गया तो आपको मशीन घर ले जाना था।

आँखें खोलिए और देखिए कि इन जगहों पर कौन लोग हैं जो हर इंटरसेक्शन में पाए जाते हैं। उन्हें तलाशिए जो हत्या के बाद ही तय कर देते हैं कि गुनहगार कौन है, और फ़ैसला आने या उसके बीच की प्रक्रिया में उलटा परिणाम आने पर शायरी लिखने लगते हैं। आप खोजिए तो सही कि क्या ये लोग सच में दलितों और मुसलमानों के हिमायती हैं या फिर दंगे भड़काकर विधानसभा और लोकसभा में या तो पहुँचना चाहते हैं, या किसी की मदद कर रहे हैं। बहुत कुछ साफ़ हो जाएगा। क्लीन चिट तो किसी पार्टी या व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता, लेकिन इनके हिस्से का काग़ज़ उतना भी सफ़ेद नहीं है, जितना चिल्लाकर बताया जाता रहा है।

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