Wednesday, October 21, 2020
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CARA को बनाया ईसाई मिशनरियों का अड्डा, विदेश भेजे बच्चे: दीपक कुमार को स्मृति ईरानी ने दिखाया बाहर का रास्ता

दीपक कुमार के बारे में मंत्रालय को जो शिकायतें मिली हैं, उनमें विदेशी संस्थाओं से साँठगाँठ कर बच्चों का विदेश में एडॉप्शन कराने का रास्ता साफ़ करने का मामला सबसे प्रमुख है। विदेशी एजेंसियों से मिलीभगत कर के बच्चों को गोद दिए जाने के इस गोरखधंधे में कई भारतीय संस्थाएँ भी शामिल हो सकती हैं।

केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण अथवा ‘सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्सेज अथॉरिटी’ (CARA) के कामकाज पर सवालिया निशान लगे हैं, क्योंकि इसमें सीईओ दीपक कुमार द्वारा ईसाई मिशनरियों के पैठ बनाने की बात पता चली है। ये संस्था केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत आता है।

इस संस्था का काम है कि देश भर में अनाथ बच्चों को गोद लिए-दिए जाने (एडॉप्शन) पर फ़ैसला लेना। बताया गया है कि हर वर्ष 4000 के क़रीब बच्चे गोद लिए जाते हैं और इनमें से अधिकतर विदेश जाने वालों की संख्या है। इस पूरी प्रक्रिया की मॉनिटरिंग यही ताक़तवर निकाय करता है।

सूचना मिली है कि पिछले 4 सालों में विदेश भेजे जाने वाले बच्चों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। मंत्रालय में तैनात संयुक्त सचिव आस्था खतवानी से कारा का प्रभार वापस ले लिया गया है। CARA के सीईओ व सेक्रेट्री दीपक कुमार को भी पद से हटाने का फैसला हुआ। दीपक कुमार के खिलाफ कई तरह की अनियमितताएँ सामने आई थीं, जिसके बाद ये निर्णय लिया गया।

कहा जा रहा है कि दीपक कुमार के कार्यकाल के दौरान दुनियाभर में भारत से गोद लिए गए बच्चों को लेकर कई शिकायतें सामने आ रही थीं। दरअसल, ये पूरा मामला जबरन ईसाई धर्मान्तरण से जुड़ा है। बच्चों को गोद लेकर ईसाई बना दिए जाने की कई शिकायतें सामने आई थीं। इसी कारण दीपक कुमार के विरुद्ध क़दम उठाए गए। अब सवाल उठता है कि आखिर ईसाई मिशनरियों की इन करतूतों के पीछे लोगों का ध्यान क्यों नहीं गया?

सूत्रों के अनुसार, जब से दीपक कुमार ने कारा (CARA) के सीईओ का प्रभार सँभाला, तभी से नियमों को ताक पर रख कर बच्चों को गोद दिए जाने की प्रक्रिया अपनाई जाने लगी। सूत्रों का ये भी कहना है कि दीपक कुमार ने अनियमितताएँ बरतते हुए अपने करीबियों को CARA में बिठाया और इसका एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह संचालन शुरू कर दिया। मंत्रालय को काफी शिकायतें मिलीं कि एडॉप्शन की प्रक्रिया में संविदा कर्मचारियों द्वारा रक़म की वसूली की जा रही है।

इसके बाद महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस सम्बन्ध में जाँच की और मामले को संज्ञान में लिया। दीपक कुमार को हटाने जाने के बाद कारा में तैनात कई अन्य अधिकारियों पर भी गाज गिरना तय मना जा रहा है। उधर आस्था की जगह अनुराधा चगति को कारा का प्रभार सौंपा गया है। अब इस मामले में मंत्रालय सख्त कार्रवाई करने की तैयारी में जुट गया है।

हमारे सूत्रों के अनुसार, दीपक कुमार के बारे में मंत्रालय को जो शिकायतें मिली हैं, उनमें विदेशी संस्थाओं से साँठगाँठ कर बच्चों का विदेश में एडॉप्शन कराने का रास्ता साफ़ करने का मामला सबसे प्रमुख है। विदेशी एजेंसियों से मिलीभगत कर के बच्चों को गोद दिए जाने के इस गोरखधंधे में कई भारतीय संस्थाएँ भी शामिल हो सकती हैं। कई बीमार दम्पतियों को भी बच्चे गोद दिए गए, जिससे इन आरोपों को बल मिला है। आइए, आगे बढ़ने से पहले एडॉप्शन के आँकड़ों पर एक नज़र डालते हैं:

वर्ष देश में एडॉप्शन विदेश में एडॉप्शन
2010 5693628
20115964629
2012-13 4694308
2013-14 3924430
2014-15 3988374
2015-16 3011666
2016-17 3210578
2017-18 3276651
2018-19 3374653
देश और विदेश के एडॉप्शन के आँकड़े

दीपक कुमार के अंतर्गत कारा में चल रहे नियम-विरोधी कामकाज को लेकर कुछ राज्यों ने पहले ही असंतोष जताया था। इसके अलावा कुछ मामलों में मुंबई व जबलपुर की हाईकोर्ट द्वारा उन्हें फटकार भी लगाया गया था। बावजूद इसके वे पद पर बने रहने में कामयाब रहे थे। अब जब उन्हें निकाल बाहर किया गया है, निष्पक्ष जाँच में इसकी सारी कड़ियाँ सामने आने की उम्मीद है।

दरअसल, दीपक कुमार को इतना बड़ा पद दिए जाने के पीछे भी कुछ बड़े अधिकारियों की मिलीभगत थी। सूत्रों के अनुसार, एक साजिश के तहत 2016 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के ही कुछ बड़े अधिकारी उन्हें लेकर आए थे। वो आर्मी के सिग्नल कोर में फाइबर इंजिनियर थे और उनकी शिक्षा-दीक्षा भी इंजीनियरिंग में ही हुई है। CARA के कामकाज का जो तरीका है, उसे लेकर उन्हें न कोई अनुभव था और ही कोई ज्ञान।

नियमानुसार, ऐसी पद पर आसीन होने से पहले मानविकी विषय में डिग्रीधारी होना आवश्यक है। इस तरह उनके कामकाज के साथ-साथ उनकी नियुक्ति भी जाँच के घेरे में है। कई अधिकारियों में तो उनकी रंगमिजाजी के किस्से भी चर्चा में रहते हैं। मंत्रालय के उच्चाधिकारियों को उनके सोशल मीडिया एकाउंट्स पर भी कुछ आपत्तिजनक कंटेंट्स मिले, जिसका उन्हें हटाए जाने में अहम रोल है।

हमारे सूत्रों का ये भी कहना है कि मनमाफिक कामकाज की प्रक्रिया अपनाने के लिए दीपक कुमार ने कारा के कई नियमों को बदल भी दिया था। उन्होंने अपने सम्बन्धियों को कारा में घुसाने के लिए भी बड़ी चालाकियाँ की। सबसे पहले तो उन्हें चपरासी के रूप में नियुक्ति दी और फिर धीरे-धीरे उनको कारा में एडवाइजर बना कर मोटी रकम देनी शुरू कर दी। भर्ती किए गए संविदाकर्मी फिर विदेशी एजेंसियों के साथ साँठगाँठ कर ख़ुद भी कमाई करने लगे।

चूँकि ये मामल अनाथ बच्चों से जुड़ा हुआ है, इसीलिए जाँच में भी पूरी सावधानी और गोपनीयता बरती जा रही है क्योंकि बच्चों की पहचान बाहर नहीं आनी चाहिए। मंत्रालय के कुछ अधिकारी तो दीपक कुमार का कार्यकाल आगे बढ़ाए जाने के भी हिमायती थे। लेकिन, केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दीपक कुमार को हटा कर मंत्रालय में तैनात मनोज कुमार को अस्थायी रूप से कारा का प्रभार सौंपा है।

ये तो थी निकाय में हुई गड़बड़ियों की बात। अब आते हैं CARA में ईसाई मिशनरियों और क्रिश्चियन संस्थाओं की पैठ पर क्योंकि पूरे मामले की जड़ यही है। दीपक कुमार द्वारा इसे तानाशाही तरीके से संचालित किया जा रहा था। उन्होंने जिन करीबियों की नियुक्ति की, उनमें भी कुछ सेना से थे। किसी भी पद के लिए योग्यता का ध्यान नहीं रखा गया। क्रिश्चियन संस्थाओं के इशारे पर भी कुछ नियुक्तियाँ हुईं।

उनके दो भतीजे हैं अमन और शिशिर। इन दोनों को पहले तीन महीने तक एमटीएस के पद पर 10 हजार रुपए के मासिक वेतन के साथ रखा गया, उसके बाद यंग प्रोफेशनल्स के पद पर बिठा कर वेतन तीन गुना बढ़ा दिया गया। 9 महीने बाद तो इन दोनों को सलाहकार का पद थमा दिया गया और 60 हज़ार रुपए प्रतिमाह दिए जाने लगे। इस तरह की उन्होंने एक-दो नहीं बल्कि कई नियुक्तियाँ की हैं। उनकी अन्य संदिग्ध नियुक्तियों को देखिए:

  • सेना से ही आने वाले संजय बारशीला को CARA में डायरेक्टर के पद पर बहाल किया गया।
  • दीपक ने अपने मित्र किसी जॉर्ज की पत्नी मिनी जॉर्ज को सीनियर प्रोफेशनल के पद पर बिठा दिया।
  • सेना में अपने वरिष्ठ अधिकारी की पत्नी शालिनी पीयूष को भी सीनियर प्रोफेशनल का पद दिया गया।
  • अपनी क़रीबी क्षिप्रा और अपने लिए जासूसी करने वाले अनुराग पांडेय और एक दीपांशू मूँगनी को यंग प्रोफेशनल के पद पर बिठा दिया।
  • आर्मी से ही रिटायर्ड सुमित पाठक को जूनियर प्रोफेशनल का पद दिया गया।
  • रत्ना मालेकर को भी पद दिया गया।

बच्चों को अडॉप्ट करने के लिए उन समूहों, विदेशी एजेंसियों को प्राथमिकता दी गई जिनके CARA के अधिकारियों से हित जुड़े थे। सीईओ दीपक कुमार के मित्र जगन्नाथ पति के बेटे का कनाडा में न सिर्फ़ एडमिशन कराया बल्कि उसके रहने की भी व्यवस्था की थी। इसके बदले एडॉप्शन की प्रक्रिया में उस एजेंसी को लाया गया और फिर उसे लाभ पहुँचाया गया।

इसमें भारतीय पेरेंट्स को जम कर इंतजार कराया गया और उनकी सीनियोरिटी को धता बताते हुए विदेशियों को प्राथमिकता दी गई। भारतीय पेरेंट्स इंतजार करते रहे। भारत में अगर किसी को इस प्रक्रिया में लाभ पहुँचाया भी गया तो उन्हें ही जो काफी संपन्न थे। मानसिक व शारीरिक रूप से कमजोर बच्चों को भी ख़ासी परेशानी हो रही है, जिन्हें उन संस्थाओं में रहने को मजबूर किया उनके देखरेख और पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की गई।

इसके अलावा प्रशिक्षण के लिए आने वाली धनराशि में भी घपला किया गया। स्वीकृत राशि को खर्च तो कर दिया गया लेकिन प्रशिक्षण के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई। अडॉप्ट किए गए बच्चों के फॉलोअप की कोई व्यवस्था नहीं की गई। साथ ही दीपक कुमार ने CARA में अपने द्वारा नियुक्त किए गए सभी कर्मचारियों व अधिकारियों का कार्यकाल भी 1 वर्ष के लिए बढ़ा दिया, ताकि उन्हें हटाने में मशक्कत करनी पड़े।

बच्चों की ज़िंदगी से किस तरह खेला गया, इसका एक उदाहरण देखिए। बिहार की एजेंसी में निवासरत सरस्वती को 2018 में अमेरिका के एक पेरेंट्स से रिफरल दे कर मैच कराया गया और उक्त एजेंसी को आदेश दिया गया कि वो प्रक्रिया पूरी करे। एडॉप्शन के बाद सरस्वती को अमेरिकन दम्पति द्वारा जम पर प्रताड़ित किया गया, उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया। अंततः सरस्वती की मृत्यु हो गई।

CARA के अधिकारियों ने ख़ुद के बचने के लिए बिहार की ही उक्त एजेंसी को जिम्मेदार ठहरा दिया और सरकार से उसकी मान्यता ख़त्म कराने के लिए अनुशंसा कर दी। ब्लेम गेम में वो ये भूल गए कि विदेश में अनाथ बच्चों को गोद देने के लिए CARA की अनुमति आवश्यक है। इसके अलावा दीपक कुमार पर एलटीसी घोटाले में संलिप्त रहने के भी आरोप लगे हैं। मंत्रालय इन मामलों की जाँच में लगा हुआ है।

जहाँ तक ईसाई मिशनरियों कि बात है, भारत मे उनका प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। बड़े पादरियों पर यौन शोषण के आरोप लगे हैं। चर्चों मे ननों के यौन शोषण की की वारदातें सामने आई हैं। इन सबके अलावा अब बच्चों को गोद लेने के मामलों मे उनका दाखल ये बताता है कि वो धर्मांतरण के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं। और उनकी मदद करते हैं दीपक कुमार जैसे लोग, जो सरकारी संस्थाओं मे जमे हुए हैं।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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