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राम मंदिर निर्माण पर सवाल उठा रहा था वामपंथी पत्रकार, पूर्व CJI ने तर्कों से दिया जवाब तो भड़का: पढ़ें क्या कहता है अयोध्या फैसले का सार

अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक, पुरातात्त्विक और दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर मंदिर के पक्ष में निर्णय दिया।

हाल ही में भारत के पूर्व CJI डी वाई चंद्रचूड़ के साथ एक इंटरव्यू में वामपंथी स्वतंत्र पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने अयोध्या राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए।

जैन ने कुछ आलोचना भरी टिप्पणियों का हवाला देते हुए दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हिंदुओं द्वारा किए गए अवैध कृत्य को सही ठहराता है, क्योंकि उन्होंने आंतरिक प्रांगण (जहाँ विवादित ढाँचा था) पर दावा जताया।

हालाँकि मुस्लिम पक्ष ने बाहरी प्रांगण यानी जहाँ रामलला विराजमान की मूर्ति अस्थायी मंदिर में स्थापित थी, वहाँ कोई दावा नहीं किया था। लेकिन इस इस फैसले से उस समुदाय को दंडित कर दिया गया।

श्रीनिवासन जैन ने कहा कि फैसले की एक आलोचनात्मक व्याख्या यह है कि आंतरिक प्रांगण पर विवाद इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि हिंदुओं ने वहाँ अवैध काम किए, जैसे अपमानजनक हरकतें, जबरदस्ती अधिकार जताना और माहौल बिगाड़ना।

इसके उलट, मुस्लिम पक्ष ने बाहरी प्रांगण पर दावा नहीं किया और न ही वहाँ झगड़ा किया। लेकिन यही बात उनके खिलाफ चली गई, मानो उन्होंने लड़ाई नहीं लड़ी इसलिए उन्हें सजा मिली, जबकि हिंदुओं की सक्रियता उनके पक्ष में साबित हुई।

अपवित्रीकरण का मूल कार्य मस्जिद का निर्माण था: चंद्रचूड़

जैन के दावे पर जवाब देते हुए पूर्व सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने याद दिलाया कि असली अपमानजनक कृत्य मुसलमानों ने किया था, जब उन्होंने एक हिंदू मंदिर के अवशेषों पर मस्जिद खड़ी की।

उन्होंने कहा, “जब आप कहते हैं कि हिंदुओं ने आंतरिक प्रांगण में अपमानजनक काम किए, तो उस बुनियादी अपमानजनक घटना का क्या, जब मस्जिद बनाई गई थी? हम इतिहास की उस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं कर सकते। हमारे पास पुरातात्त्विक साक्ष्य मौजूद हैं और जब यह मान लिया गया कि ऐसा हुआ था, तो फिर आँखें मूँद लेना कैसे सही होगा?” चंद्रचूड़ उस संवैधानिक पीठ का हिस्सा थे, जिसने अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाया था।

फैसले की आलोचना करने वालों का इतिहास के प्रति चयनात्मक दृष्टिकोण है: चंद्रचूड़

जैन द्वारा फैसले पर की गई आलोचनात्मक टिप्पणियों को खारिज करते हुए पूर्व सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि जो लोग सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले की आलोचना करते हैं और यह आरोप लगाते हैं कि न्यायपालिका ने पक्षपात किया, वे इतिहास को चुनिंदा ढंग से देखते हैं।

उन्होंने कहा, “जिन लोगों का आप जिक्र कर रहे हैं, वे इतिहास को चुन-चुनकर देखते हैं। वे एक निश्चित दौर के बाद की घटनाओं को नजरअंदाज कर देते हैं और केवल वही बातें उठाते हैं जो उनकी सोच के अनुकूल हों।”

जैन ने यह कहकर फैसले पर सवाल उठाया कि कोर्ट ने माना था कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को गिराए जाने का ठोस सबूत नहीं है, क्योंकि मंदिर और मस्जिद के बीच कई सदियों का अंतर है। इस पर चंद्रचूड़ ने साफ जवाब दिया, “हमारे पास पुरातात्त्विक खुदाई से पर्याप्त साक्ष्य हैं, खुदाई की रिपोर्ट ही इसका सबूत है।”

उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर संदेह जता रहे हैं, वे असल में ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर अपनी कहानी गढ़ना चाहते हैं। चंद्रचूड़ के अनुसार, “सच तो यह है कि आलोचक मस्जिद के बुनियादी इतिहास को नजर अंदाज कर देते हैं और केवल वही अंश उठाते हैं, जो उनके पक्ष को मज़बूत करते हैं।”

जैन का यह दावा कि मुस्लिम पक्ष को इसलिए सजा मिली क्योंकि उन्होंने विवादित जमीन पर अपना दावा नहीं जताया, बिल्कुल निराधार लगता है। मस्जिद खुद ही उनका दावा थी, जो एक हिंदू मंदिर के अवशेषों पर खड़ी की गई थी और वह जमीन मूल रूप से मुसलमानों की भी नहीं थी।

वास्तव में, अयोध्या जन्मभूमि ही एकमात्र उदाहरण नहीं है, देश में ऐसे कई स्थल हैं जहाँ मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों को तोड़कर अपने दावे ठोके और आज भी वे ढाँचे खड़े हैं।

यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले पर बेबुनियाद शंकाएँ उठाई गईं। एक खास तबका, जिसमें कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी और इतिहासकार शामिल हैं, झूठी कहानियाँ गढ़कर मस्जिद के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करता रहा।

राम जन्मभूमि को वापस पाने की लड़ाई सदियों तक चली और कई अदालतों से होकर गुजरी। इस लंबे संघर्ष में दोनों पक्षों को अपना पक्ष और सबूत रखने का पूरा मौका मिला।

1528 में मस्जिद निर्माण से शुरू हुआ यह विवाद आखिरकार 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सुलझा। संवैधानिक पीठ ने सभी साक्ष्यों और दलीलों को सुनने के बाद यह तय किया कि विवादित स्थल भगवान राम का है। इस पीठ में मुस्लिम जज जस्टिस एस अब्दुल नजीर भी शामिल थे।

सुप्रीम कोर्ट ने एएसआई की रिपोर्ट को मान्यता दी, जिसमें साबित हुआ कि मस्जिद के नीचे हिंदू ढाँचा मौजूद था। साथ ही अदालत ने माना कि यह स्थान सदियों से हिंदुओं के लिए पवित्र रहा है। पुरातात्त्विक साक्ष्यों के अलावा, ऐतिहासिक दस्तावेज भी इस बात की गवाही देते हैं कि हिंदू हमेशा से इस स्थान को राम जन्मभूमि मानते आए हैं।

राम जन्मभूमि के पक्ष में ऐतिहासिक साक्ष्य

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जो परिशिष्ट (ऐडेंडम) एक अज्ञात जज ने लिखा, उसमें हिंदुओं की राम जन्मभूमि से जुड़ी आस्थाओं का विस्तार से जिक्र किया गया। इसमें ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला दिया गया था, जिनमें आईन-ए-अकबरी, अंग्रेज व्यापारी विलियम फिंच के विवरण, जेसुइट मिशनरी फादर जोसेफ टाइफेनथालर की रिपोर्ट और गुरु नानक की अयोध्या यात्रा का वर्णन करने वाली जन्म साखियाँ शामिल थीं।

आइन-ए-अकबरी

आईन-ए-अकबरी, जो मुगल सम्राट अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल ने 16वीं सदी में फारसी भाषा में लिखी थी, उसमें अयोध्या का जिक्र भगवान रामचंद्र के निवास स्थान के रूप में मिलता है।

इसमें श्री रामचंद्र को विष्णु का अवतार बताया गया है और अयोध्या को प्राचीन काल के सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना गया है। इस ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि त्रेता युग में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को अयोध्या नगरी में राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या के गर्भ से भगवान राम का जन्म हुआ।

विलियम फिंच के लेख

इस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज व्यापारी विलियम फिंच, जो मुगल सम्राट जहाँगीर के समय कैप्टन हॉकिन्स के साथ भारत आए थे, उन्होंने अपनी यात्रा-वृत्तांत में अयोध्या का जिक्र किया है।

उन्होंने वहाँ भगवान रामचंद्र के किले और मकानों के खंडहर देखे और लिखा कि भारतीयों की आस्था है कि यहीं भगवान रामचंद्र का जन्म हुआ था, जिन्होंने मानव रूप धारण किया था।

फादर जोसेफ टिफेन्थलर के वृत्तांत

जेसुइट मिशनरी फादर जोसेफ टाइफेनथालर 1766 से 1771 के बीच भारत आए और यहाँ का ऐतिहासिक व भौगोलिक विवरण लैटिन भाषा में लिखा, जिसे बाद में फ़्रेंच और अंग्रेजी में अनुवाद किया गया।

उनकी यह रचना इलाहाबाद हाईकोर्ट में सबूत (Ext. 133, सूट-5) के तौर पर पेश की गई और अदालत ने इस पर भरोसा किया। सुप्रीम कोर्ट के जज ने उनके विवरण से तीन अहम निष्कर्ष निकाले-

पहला –  औरंगजेब ने रामकोट नामक किले को गिरवाकर उसकी जगह तीन गुम्बदों वाली मस्जिद बनवाई। उस जगह पर मौजूद काले पत्थर के 14 खंभों में से 12 खंभे मस्जिद के भीतर इस्तेमाल किए गए और दो खंभे प्रवेश द्वार पर लगाए गए।

दूसरा – मस्जिद के बाईं ओर जमीन से पाँच इंच ऊँचा एक चौकोर स्थान था, जिसे चूने से बने किनारों से सजाया गया था। इसकी लंबाई लगभग 5 गज और चौड़ाई 4 गज थी। इसे हिंदू बेदी (झूला) कहते थे, क्योंकि मान्यता थी कि यहीं भगवान विष्णु ने राम के रूप में जन्म लिया था।

तीसरा – बाबर या औरंगज़ेब ने यह स्थान इसलिए गिराया ताकि हिंदुओं को अपनी आस्था का पालन करने से रोका जा सके। फिर भी, राम जन्मभूमि स्थल पर हिंदू लोग आज भी परिक्रमा करते हैं और भूमि पर दंडवत प्रणाम करते हैं।

गुरु नानक की अयोध्या यात्रा

परिशिष्ट (ऐडेंडम) में जन्म साखियों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें गुरु नानक की अयोध्या यात्रा का वर्णन मिलता है। इनमें दर्ज है कि 1510 ईस्वी में गुरु नानक राम जन्मभूमि के दर्शन के लिए अयोध्या आए थे, यानी 1528 में मस्जिद बनने से पहले ही।

यह रिकॉर्ड हिंदुओं के दावे को मजबूती देता है कि उस समय अयोध्या में भगवान राम का मंदिर मौजूद था, जिसे जन्मस्थान माना जाता था।

इसके अलावा, ब्रिटिश हुकूमत के कई आधिकारिक दस्तावेजों में उस मस्जिद को  जन्मस्थान मस्जिद कहा गया है। यह भी साबित करता है कि सबकी समझ में यह बात थी कि मस्जिद वास्तव में राम जन्मस्थान पर बनी है।

परिशिष्ट के अंत में यह निष्कर्ष निकाला गया, “हिंदुओं की आस्था और विश्वास मस्जिद बनने से पहले भी और उसके बाद भी हमेशा यही रहा है कि भगवान राम का जन्मस्थान वही है, जहाँ बाबरी मस्जिद खड़ी की गई। इस आस्था को ऊपर बताए गए दस्तावेज़ी और मौखिक साक्ष्यों से प्रमाणित किया गया है।”

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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