Wednesday, July 24, 2024
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अनुसूचित क्षेत्रों में स्थानीय लोगों को 100% आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने बताया असंवैधानिक: झारखंड सरकार के फैसले को किया रद्द

साल 2020 में चेब्रोलू लीला प्रसाद राव एवं अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आंध्र प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्रों में सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को दिए गए 100% आरक्षण को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार को झटका देते हुए अनुसूचित जिलों या क्षेत्रों में शिक्षकों के जारी सौ प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया है। शीर्ष न्यायालय का कहना है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी और इसके पीड़ित अंतत: आदिवासी बच्चे ही होंगे।

जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बी वी नागरत्ना की खंडपीठ ने सितंबर 2020 में झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कोर्ट ने झारखंड सरकार द्वारा इससे संबंधित नियुक्ति की अधिसूचना को रद्द कर दिया है।

साल 2016 में झारखंड राज्य ने एक अधिसूचना किया था, जिसमें राज्य के 13 अनुसूचित जिलों/क्षेत्रों के स्कूलों में स्थानीय उम्मीदवारों/निवासियों के लिए 100% आरक्षण देने की व्यवस्था की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “अधिक मेधावी शिक्षकों की नियुक्ति पर रोक लगाकर कुछ जिलों के शिक्षकों के पक्ष में 100% आरक्षण देकर स्कूल जाने वाले बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता के साथ समझौता नहीं किया जा सकता है।”

इंदिरा साहनी बनाम चीबरोलू राव मामले का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस संबंध में इंदिरा साहनी और चीबरोलू राव जैसे उदाहरणों में तय किया जा चुका है कि आरक्षण सुरक्षात्मक रूप में अनुमोदित है और इसे 100 प्रतिशत बनाकर भेदभावपूर्ण और अनुचित नहीं बनाया जा सकता।

शीर्ष न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक रोजगार कुछ लोगों का विशेषाधिकार नहीं है और इसके अवसर से किसी को अन्यायपूर्ण तरीके से वंचित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि नागरिकों के समान अधिकार हैं और संविधान निर्माताओं ने एक वर्ग का बहिष्कार करके दूसरे के लिए अवसर पैदा करने पर कभी विचार नहीं किया गया।

हालाँकि, राज्य सरकार की ओर से पेश वकील कपिल सिब्बल और सुनील कुमार ने तर्क दिया कि राज्यपाल द्वारा जारी अधिसूचना कानून के अनुरूप थी, क्योंकि यह भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अनुच्छेद 5 (1) के तहत प्रदत्त शक्तियों के तहत दी गई थी। वह राज्यपालों को अनुसूचित क्षेत्रों के लिए कानून बनाने और उन्हें संसदीय कानूनों के दायरे से बाहर करने की शक्ति देता है।

इस पर, न्यायालय ने तर्क दिया कि राज्यपाल मौलिक अधिकारों की गारंटी को नकारात्मक रूप से प्रभावित नहीं कर सकते। अदालत ने कहा, “संबंधित अनुसूचित जिलों/क्षेत्रों के स्थानीय निवासियों के लिए 100% आरक्षण करने का आदेश/अधिसूचना भारत के संविधान के अनुच्छेद 16 (2) का उल्लंघन है, क्योंकि यह गैर-अनुसूचित उम्मीदवार को गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है।”

कोर्ट ने कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 13 के अनुसार, राज्य 107 का पृष्ठ 95 ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगा जो संविधान के भाग III के तहत गारंटीकृत क्षेत्र द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनता या कम करता है। इसके उल्लंघन में बनाया गया कोई भी कानून अनुच्छेद 13 (2) की उल्लंघन पर शून्य होगा।”

सत्यजीत कुमार एवं अन्य बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य मामले को लेकर न्यायालय ने यह भी नोट किया कि अनुच्छेद 16 (3) के साथ अनुच्छेद 35 के अनुसार, स्थानीय डोमिसाइल आरक्षण केवल संसद द्वारा अधिनियमित कानून के माध्यम से प्रदान किया जा सकता है। राज्य विधानमंडल को ऐसा करने की शक्ति नहीं है। इसलिए, अधिसूचना को अनुच्छेद 16(3) और 35 का भी उल्लंघन करने वाला माना गया।

बता दें कि साल 2020 में चेब्रोलू लीला प्रसाद राव एवं अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आंध्र प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्रों में सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को दिए गए 100% आरक्षण को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

दरअसल, साल 2016 में झारखंड सरकार ने राज्य के सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में 2,400 से अधिक टीजीटी शिक्षकों की नियुक्ति के लिए भर्ती निकाली, लेकिन 13 अनुसूचित जिलों में स्थित स्कूलों में नियुक्ति नहीं की। इसके बाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। तब उच्च न्यायालय ने कहा था कि संविधान के अनुरूप नहीं है, क्योंकि इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की ऊपरी सीमा 50% तय की है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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