क्या आपने वृंदावन के श्री बाँके बिहारी मंदिर में दर्शन किए हैं? यदि आपका जवाब हाँ है तो आप भी तंग गलियों से गुजरे होंगे। भीड़भाड़, धक्कामुक्की में दर्शन किए होंगे। अव्यवस्था देखी होगी। आपने भी इस जगह के विकास की जरूरत महसूस की होगी।
हाल के वर्षों ने हिंदू समाज के सामने काशी, उज्जैन, अयोध्या ने उदाहरण प्रस्तुत किए हैं कि कैसे एक कॉरिडोर के निर्माण से धार्मिक स्थलों की तस्वीर बदली जा सकती है। बदहाली और बदइंजामी बीते दिनों की बात हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने श्री बाँके बिहारी मंदिर के कॉरिडोर के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया है।
लेकिन इस फैसले पर एक तरफ सपा और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियाँ राजनीति कर रही हैं। दूसरी तरफ स्थानीय गोस्वामी समाज भी विरोध कर रहा है। सपा-कॉन्ग्रेस जैसी हिंदू पार्टियों का एजेंडा तो समझ में आता है, लेकिन मंदिर से जुड़े लोग क्यों इसका विरोध कर रहे हैं, यह जानने के लिए ऑपइंडिया के पत्रकार मौके तक पहुँचे। सभी पक्षों से बात की ताकि पाठकों तक विरोध से लेकर समर्थन तक की सही तस्वीर पहुँचे। साथ ही गोस्वामी समाज के विरोध के नाम पर मीडिया में परोसे जा रहे प्रोपेगेंडा को भी खत्म किया जा सके।
बाँके बिहारी मंदिर कॉरिडोर क्यों जरूरी?
हम 5 जून 2025 को दिल्ली से करीब 150 किलोमीटर दूर वृंदावन पहुँचे। वृंदावन में प्रवेश करते ही हमारी गाड़ी को होमगार्ड के एक जवान ने रोकते हुए पार्किंग में लगाने को कहा। लेकिन मीडिया से होने की बात जानने के बाद उसने हमे आगे जाने दिया। हम ई-रिक्शा के भारी ट्रैफिक को चीरते हुए हम गौतम पाड़ा चौराहे तक पहुँचे। यहाँ से बाँके बिहारी मंदिर करीब 500 मीटर दूर है, लेकिन गाड़ी आगे ले जाना संभव नहीं था। वहीं पार्किंग में गाड़ी लगाकर हम पैदल आगे बढ़े।
करीब 500 मीटर पैदल चलने के बाद हम सुबह करीब 11 बजे बाँके बिहारी पुलिस चौकी वाली मंदिर की मुख्य गली के सामने पहुँचे। अधिकांश पेड़े वाली दुकानों के सामने जूते-चप्पल उतरे हुए थे। जगह-जगह नालियाँ जाम थीं। कूड़ा-कचरा फैला हुआ था। यही हाल मंदिर के गेट नंबर-1 और 2 का भी था। सीढ़ियों पर श्रद्धालुओं के जूते-चप्पल बिखरे हुए थे।
श्रद्धालु बोले- क्या करें, कोई व्यवस्था ही नहीं है
अयोध्या के एपी पांडेय बाँके बिहारी जी का दर्शन कर बाहर निकले। एक दुकान के निचले हिस्से से जूते उठाते हुए ऑपइंडिया को बताया, “क्या करें कोई व्यवस्था नहीं है। यहाँ कॉरिडोर बनना चाहिए।”
एक अन्य श्रद्धालु अशोक कुमार गुप्ता ने कहा, “यहाँ दर्शन करने में ज्यादा समस्या होती है। अयोध्या में अच्छे से दर्शन हो जाता है। यहाँ हमारे बच्चे भीड़ में दब गए थे।”
साथ में खड़ी एक महिला भक्त का कहना था, “वीआईपी दर्शन के नाम पर किसी से 501 तो किसी से 1001 रुपए लिए जा रहे हैं। भीड़ से बच्चों की जान निकली जा रही थी। बच्चे बिना दर्शन के ही बाहर आ गए। इतना दूर दर्शन करने आए और दर्शन न मिले तो इससे बड़ा दुख और क्या होगा। अंदर जो गार्ड (सुरक्षाकर्मी) लगे हैं, उनका व्यवहार बहुत गंदा है। यहाँ भी कॉरिडोर बनना चाहिए।”
श्रद्धालु बोले- बाँके बिहारी मंदिर का भी कॉरिडोर बनना चाहिए
दर्शन करके लौटे एक युवा भक्त ने बताया, “काशी, उज्जैन, अयोध्या जैसा यहाँ भी कॉरिडोर बन जाएगा तो भक्तों को सुविधा हो जाएगी। यहाँ भक्तों के लिए न पीने का पानी है और न आराम करने की जगह।”
एक अन्य भक्त ने बताया, “पहले हम रोज आते थे। लेकिन जब से हादसे होने लगे तो महीने में एक बार आते हैं। कई बार भीड़ ज्यादा देखकर हम लोग लौट जाते हैं। कॉरिडोर जरूर बनना चाहिए।”
मंदिर के गेट नंबर 1 के सामने एक दुकान पर बैठकर रबड़ी खा रहे हरिद्वार से आए एक भक्त ने कहा, “जैसे गुरुद्वारों में भक्तों के लिए व्यवस्था होती है, वैसी हमारे किसी भी धार्मिक स्थल पर सुविधाएँ नहीं हैं। यही हाल वृंदावन का है। मंदिर कमेटियाँ पैसे के लालच में ही रहती हैं। यदि यहाँ कॉरिडोर बन जाए तो 10 गुना श्रद्धालुओं के साथ काम भी बढ़ जाएगा।”

शाम के समय 5:30 बजे मंदिर के कपाट खुलने थे। लेकिन 3 बजे से ही भक्तों की भीड़ आनी शुरू हो गई थी। 5:30 बजते-बजते श्रद्धालुओं की करीब 250 मीटर लंबी लाइन लग चुकी थी।
इस बीच भक्त तेज धूप में गेट नंबर 1 पर मंदिर के पट खुलने के इंतजार में जमीन पर बैठे पंखा हिला रहे थे। भक्तों की भीड़ कैमरे को देखते ही सामूहिक तौर पर राधे-राधे का जयकारा लगाने लगती है और बातचीत में कॉरिडोर निर्माण का समर्थन करती है।
कारोबारियों का दावा- मंदिर कमेटी ने नहीं की कोई व्यवस्था
राजकुमार खंडेलवाल की दुकान 1948 से ही मंदिर की मुख्य गली में है। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया, “कॉरिडोर बनना चाहिए। लेकिन दुकान और मकान वालों को मुआवजा मिले।” उन्होंने गली की तरफ दिखाते हुए कहा, “यहाँ की व्यवस्था बहुत ही खराब। नालियाँ जाम पड़ी हैं। चारों और गंदगी है। जूते-चप्पल बिखरे रहते हैं। यात्रियों के लिए लॉकर रूम, टॉयलेट जैसी सुविधा नहीं है। पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं है।”
वे कहते हैं, “इसे आप प्रशासन की कमी समझें या फिर मंदिर कमेटी की, श्रद्धालुओं के बैठने का कोई स्थान नहीं है। मंदिर कमेटी की लापरवाही के कारण ही 2022 में हादसा हुआ था।”

कॉरिडोर निर्माण का कारोबारी गोविंद भी समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा, “कॉरिडोर समय की माँग है। हम इसके लिए हाईकोर्ट तक गए थे। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि कॉरिडोर बनने से वृंदावन की कुंज गलियों का महत्व और यहाँ की प्राचीनता नष्ट नहीं हो।” उनका यह भी कहना था कि कॉरिडोर निर्माण से पहले सरकार को भीड़ मैनेजमेंट पर ध्यान देना चाहिए।
कारोबारी नवीन गौतम ने बताया, “हम कॉरिडोर निर्माण के विरोध में नहीं हैं। लेकिन वृंदावन का स्वरूप नहीं बदलना चाहिए। गोस्वामी समाज की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि जहाँ सांप है सरकार वहीं लाठी चलाए। हमारे ठाकुर जी को कोई नहीं ले जा सकता।”
ऐसा नहीं है कि सभी कारोबारी कॉरिडोर का समर्थन ही कर रहे हैं। कुछेक इसके विरोध में भी हैं। हमने पाया कि ज्यादातर कारोबारी इस मामले पर खुलकर कैमरे के सामने बात करने से भी बचते रहे थे।
बाँके बिहारी कॉरिडोर का विरोध क्यों कर रहे सेवायत गोस्वामी समाज?
मंदिर के प्रांगण में मौजूद सेवादार श्रीनाथ गोस्वामी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “यहाँ कॉरिडोर की कोई आवश्यकता नहीं है। हमने सरकार को दो अन्य विकल्प सुझाए थे। लेकिन सरकार ने उन विकल्पों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। 2016 में इसी तरह के कॉरिडोर का प्रस्ताव जब अखिलेश यादव लेकर आए थे, तब योगी आदित्यनाथ ने विरोध किया था। आज वे खुद इस कॉरिडोर का समर्थन क्यों कर रहे हैं, यह समझ नहीं आ रहा।”

गोपेश गोस्वामी मंदिर कमेटी के प्रवक्ता रह चुके हैं। वर्तमान में मंदिर के शयनभोग सेवाधिकारी हैं। ऑपइंडिया ने उनसे कॉरिडोर के विरोध की वजह पूछी। उन्होंने सबसे पहले ‘वृंदावन में बढ़ती भीड़’ के आँकड़ों को अविश्वनीय कहा। कहा कि वृंदावन में इतनी भीड़ ही नहीं है कि मंदिर और उसके आसपास के इलाके का स्वरुप किसी भी तरह से बदलने की जरूरत हो। उन्होंने योगी आदित्यनाथ सरकार की परियोजना तीर्थ विकास परिषद् को इस पूरे विवाद की जड़ में बताया।
उन्होंने कहा, “इस परिषद् के गठन का उद्देश्य वृन्दावन के अन्य मंदिरों तक भक्तों को पहुँचाना था। लेकिन परिषद् अपने काम में विफल रहा। इसके उपाध्यक्ष शैलजाकान्त मिश्र मंदिर के काम में सदैव से सरकारी दखल चाहते हैं। कॉरिडोर कुछ अधिकारियों और भूमाफियाओं के गठजोड़ का नतीजा है।”
राजयोग सेवाधिकारी ज्ञानेन्द्र किशोर गोस्वामी का कहना है, “अब हमारे पास दो विकल्प बचते हैं। या तो हमें पलायन करना होगा, या फिर आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उनका कहना है यह कॉरिडोर केवल VIP के लिए बन रहा है। जब तक मंदिर की व्यवस्था हमारे हाथ में थी, कभी कोई अव्यवस्था नहीं रही।”

जब हम गोस्वामी समाज के लोगों से बातचीत कर रहे थे उस दौरान इस समाज की महिलाएँ भी बाँके बिहारी मंदिर के बाहर विरोध-प्रदर्शन करने के लिए एकत्र हुईं थी। उनका कहना था कि एक महंत होकर भी योगी आदित्यनाथ उनकी बात नहीं सुन रहे हैं। तिरुपति मंदिर के चर्बी वाले लड्डू की घटना का उदाहरण देते हुए उनका कहना था कि सरकारी नियंत्रण के बाद इसी तरह की अव्यवस्था यहाँ भी देखने को मिलेगी।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने कॉरिडोर के निर्माण के लिए जमीन खरीदने की उत्तर प्रदेश सरकार को अनुमति दे दी है। जमीन की रजिस्ट्री श्री बाँके बिहारी के नाम पर होगी। साथ ही सरकार मंदिर के पैसे का इस्तेमाल भी इस कार्य में कर सकेगी। माना जा रहा है कि कॉरिडोर बनने के बाद 10 हजार से अधिक श्रद्धालु एक साथ दर्शन कर सकेंगे। इस फैसले के बाद बाँके बिहारी मंदिर के लिए यूपी सरकार ने ट्रस्ट की भी स्थापना कर दी है।
-साथ में अनुराग मिश्रा


