Wednesday, August 4, 2021
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पत्रकारिता का पीपली लाइवः स्टूडियो से सेटिंग, श्मशान से बरखा दत्त ने रिपोर्टिंग की सजाई चिता

आज श्मशान में बैठकर रिपोर्टिंग हो गई है। कैमरे को गिद्ध की आँख ने रिप्लेस कर दिया है। स्टूल भी नहीं है कि न्यूज़ खड़ी हो सके। पुरानी बाल्टी को औंधें कर उसपर लैपटॉप रख खबर गढ़ी जा रही है। दर्शक हतप्रभ है। यह सोचते हुए कि क्या यात्रा है! क्या संवाददाता है! विज़ूअल न्यूज़ मेकिंग की पराकाष्ठा। नए तरह के रिपोर्ताज़।

स्टूडियो में बैठकर समाचार पढ़ने के दिनों से टीवी न्यूज़ पहले ही बहुत आगे चला गया था। चलते-चलते कारगिल तक पहुँचा और वहाँ रुक कर सारी सराहना बटोर कर अपने क़ब्ज़े में कर ली। जहाँ खड़े होकर रिपोर्टिंग की, अक्सर पाकिस्तानी गोले वहीं आकर गिरने लगे। युद्ध को लाइव देखने की कल्पना कभी न करने वाले दर्शकों को लगा कि समाचार के प्रति ऐसा समर्पण! हे ईश्वर, हर संवाददाता को ऐसे ही समर्पित बना दें ताकि हम न्यूज़ एंजॉय कर सकें।

कारगिल से आगे गई तो गुजरात को कवर किया। कवरेज जैसी रही, वह किसी से छिपा नहीं है। वहीं गुजरात में ईकोसिस्टम का निर्माण हुआ। वकीलों, एनजीओ और न्यूज़ चैनल का अटूट रिश्ता। एक दशक तक चला। कश्मीर पहुँची तो अपने ही घरों से भगाए गए पंडितों को विलेन करार दे दिया। बोली; सरकारी नौकरियों पर पंडितों का क़ब्ज़ा था तो और क्या होता?

न्यूज़ की महानता का जो सस्वर पाठ कारगिल से शुरू हुआ था वह अब 24 घंटों के अटूट पाठ में बदल चुका था। आगे जाकर मुंबई टेरर अटैक तक पहुँचा। जिस तरह से अटैक को कवर किया, उसे देखकर सब हतप्रभ। क्या समर्पण है! क्या ईमानदारी है! क्या संवाददाता है! क्या न्यूज़ है!


वो तो बाद में पता चला कि न्यूज़ केवल भारतीय नहीं देख रहे थे, पाकिस्तानी भी वही न्यूज़ देख रहे थे और उसका फ़ायदा भी उठा रहे थे। नॉन स्टेट ऐक्टर केवल एक तरफ़ नहीं थे। सफ़र चलता रहा और एक वर्ष के अंदर ही संवाददाता कैबिनेट फ़ाइनेलाइज करने लायक़ हो गए।

टीवी न्यूज़ वालों की विशेषता यह कि वे ख़ुद तो सब कुछ लाइव दिखा लेते हैं पर उनके बारे में कुछ भी लाइव नहीं होता। उनके बारे में सब कुछ वर्षों बाद न्यूज़ बनता है। घटनाओं को न्यूज़ बनाने वाले लोग जब बाद में ख़ुद न्यूज़ बनने लगे तब जाकर जनता को पता चला कि जिन्हें वे संवाददाता समझ रहे थे वे दरअसल कुछ और ही थे।

भारत भर को पीपली लाइव बनाने वाले अब तक लाइव को अलग ही ऊँचाई पर ले चढ़े हैं। ऐसी ऊँचाई पर जहाँ से भारतीय अब पहले से अधिक छोटा दिखाई देता है। भारतीयों के लिए पहले से ही मन में कोई इज़्ज़त नहीं थी। अब भारत के लिए भी नहीं है। हाल यह है कि सराहना के लिए हाफ़िज़ सईद को मुँह खोलना पड़ता है। क्या करें, देश में इंटॉलरन्स इतना बढ़ गया है कि कोई सराहना भी नहीं करता। ऐसे में विदेशी टैलंट ही समझ पाएगा कि सराहना क्या होती है और कैसे की जाती है।

चलते-चलते कोरोना तक पहुँचे हैं। एक वर्ष पहले से किसी आशा में बैठे थे। विशेषज्ञ को लाकर चैनल पर बैठाया। वो बोला; इतने बिलियन संक्रमित होंगे। इतने मिलियन मर जाएँगे। विशेषज्ञ लाख और करोड़ में बात नहीं करता। जब भी करता है बिलियन और मिलियन में करता है। लाशें देखने की इच्छा लिए बैठे रहे। नहीं दिखाई दीं तो निराश हो गए। जीवन बर्बाद लगने लगा था कि तब तक कोरोना की दूसरी लहर आ गई। सूखे जीवन में फिर से बरखा हुई और फिर से जीवन हरा-भरा हो गया है।

बरखा दत्त के ट्वीट से लिया गया स्क्रीनशॉट

आज श्मशान में बैठकर रिपोर्टिंग हो गई है। कैमरे को गिद्ध की आँख ने रिप्लेस कर दिया है। स्टूल भी नहीं है कि न्यूज़ खड़ी हो सके। पुरानी बाल्टी को औंधें कर उसपर लैपटॉप रख खबर गढ़ी जा रही है। दर्शक हतप्रभ है। यह सोचते हुए कि क्या यात्रा है! क्या संवाददाता है! विज़ूअल न्यूज़ मेकिंग की पराकाष्ठा। नए तरह के रिपोर्ताज़।

टीवी स्टूडियो से चलकर न्यूज़ चिता तक पहुँच गई है।

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