भारत में त्यौहार केवल छुट्टियाँ नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक जीवंत माध्यम हैं। मकर संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाया जाने वाला लोहड़ी का पर्व उत्तर भारत, विशेषकर पंजाब और हरियाणा की आत्मा है। कड़कड़ाती ठंड, ढोल की थाप और अग्नि के चारों ओर नाचते-गाते लोग… यह दृश्य भाईचारे और नई फसल के स्वागत का प्रतीक है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। जिस तरह दिवाली और होली को ‘प्रदूषण’ और ‘पानी की बर्बादी’ के नाम पर निशाना बनाया गया, अब वही नैरेटिव लोहड़ी के साथ भी जोड़ा जा रहा है। मीडिया और सोशल मीडिया के एक वर्ग के जरिए लोहड़ी की पवित्र अग्नि को ‘वायु प्रदूषण’ का कारण बताकर बदनाम किया, जबकि उसी समय पश्चिमी देशों से आए ‘बॉनफायर’ (Bonfire) को एक आधुनिक और कूल ‘कल्चर’ के रूप में पेश किया। इस दोहरी मानसिकता के पीछे का सच और लोहड़ी के वास्तविक महत्व को समझने का प्रयास करते हैं।
लोहड़ी और बॉनफायर: केवल नाम का अंतर नहीं, बल्कि नीयत और इतिहास का फर्क है
आजकल के दौर में किसी भी त्यौहार पर अपनी राय बनाने या उसे सही-गलत ठहराने से पहले हमें यह समझना चाहिए कि वह त्यौहार शुरू क्यों हुआ था। आज हम ‘लोहड़ी’ और ‘बॉनफायर’ दोनों को एक ही तराजू में तौल देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इन दोनों के बीच का अंतर सिर्फ भाषा का नहीं है।
इनके पीछे की भावना, इनका इतिहास और इनका मकसद एक-दूसरे से पूरी तरह अलग है। जहाँ एक तरफ लोहड़ी हमारी मिट्टी और किसान की मेहनत से जुड़ी है, वहीं बॉनफायर का इतिहास कुछ ऐसा है जिसके बारे में जानकर आप हैरान रह जाएँगे।
लोहड़ी: क्यों यह किसान की मुस्कान और प्रकृति का धन्यवाद है?
लोहड़ी का नाम सुनते ही हमारे मन में आग की लपटें और उसके चारों ओर नाचते-गाते लोगों की तस्वीर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह शब्द कहाँ से आया? जानकारों का मानना है कि लोहड़ी शब्द ‘लोह’ और ‘ड़ी’ के मेल से बना है। यहाँ ‘लोह’ का अर्थ उस लोहे के तवे से है जिस पर रोटियाँ सिंकती हैं और ‘ड़ी’ का संबंध ‘रेवड़ी’ से है। यह त्यौहार उस समय आता है जब उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड अपने चरम पर होती है और किसान की रबी की फसल (जैसे गेहूँ और सरसों) खेतों में लहलहाने लगती है।
किसानों के लिए लोहड़ी का मतलब है ‘आर्थिक आजादी’ और ‘समृद्धि’। महीनों की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद जब फसल कटने को तैयार होती है, तो किसान सबसे पहले अग्नि देवता का आभार व्यक्त करता है। वह अग्नि में तिल, गुड़, गजक और मक्का अर्पित करता है। यह केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह कहना है कि ‘हे ईश्वर, आपकी कृपा से हमारे घर में अन्न आया है, इसे स्वीकार करें और आगे भी हमें खुशहाल रखें।’ यह त्यौहार इंसान और प्रकृति के गहरे रिश्ते को दर्शाता है।
लोहड़ी का वैज्ञानिक और सामाजिक आधार
अगर हम वैज्ञानिक नजरिए से देखें, तो लोहड़ी के समय उत्तर भारत (खासकर पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली) में तापमान गिरकर 3 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। इतनी भयानक ठंड में शरीर को ऊष्मा (Heat) की जरूरत होती है। प्राचीन समय से ही, जब बिजली या हीटर नहीं होते थे, तब ‘सामूहिक अग्नि’ ही वह जरिया थी जो लोगों को ठंड से बचाती थी।
सामाजिक रूप से भी इसका बड़ा महत्व है। लोहड़ी के बहाने पूरा मोहल्ला या गाँव एक ही आग के पास बैठता है। इसमें कोई अमीर या गरीब नहीं होता। ऊँच-नीच का भेद मिटाकर लोग साथ बैठते हैं, मूँगफली खाते हैं और दुख-सुख बाँटते हैं। यानी यह आग केवल लकड़ी नहीं जलाती, बल्कि समाज के बीच की कड़वाहट को जलाकर भाईचारे की मिठास पैदा करती है।
बॉनफायर का ‘स्याह’ इतिहास: जिसे हम मजा समझते हैं, उसका सच क्या है?
अब बात करते हैं उस ‘बॉनफायर’ की, जिसे आज की पीढ़ी और मीडिया बहुत ‘कूल’ और ‘मॉडर्न’ मानता है। अक्सर हम देखते हैं कि बड़े होटलों या फार्म हाउसों में ‘बॉनफायर पार्टी’ होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह शब्द कहाँ से आया? बॉनफायर असल में अंग्रेजी के शब्द ‘Bone-fire’ से बना है, जिसका सीधा मतलब है ‘हड्डियों की आग‘।
प्राचीन और मध्यकालीन यूरोप में इस आग का इतिहास बड़ा डरावना था। उस समय जब बड़े पैमाने पर युद्ध होते थे या ऐसी बीमारियाँ (महामारी) फैलती थीं जिनसे हजारों लोग मर जाते थे, तो लाशों के ढेर लग जाते थे। उन लाशों और उनकी हड्डियों को ठिकाने लगाने के लिए जो विशाल आग जलाई जाती थी, उसे ‘बोन-फायर’ कहा जाता था। इतना ही नहीं, जो लोग धर्म या समाज के खिलाफ कुछ बोलते थे (जिन्हें हैरिटिक्स कहा जाता था) या जिन महिलाओं को ‘चुड़ैल’ करार दिया जाता था, उन्हें भी सजा के तौर पर इन्हीं विशाल आग के ढेरों में जिंदा जला दिया जाता था।
आधुनिक दौर की विडंबना: सजा वाली आग ‘मजा’ बन गई
समय बदला और धीरे-धीरे इस ‘बोन-फायर’ को ‘बॉनफायर’ कहा जाने लगा। फ्रेंच भाषा में ‘Bon’ का मतलब ‘अच्छा’ होता है, तो लोगों ने मान लिया कि यह एक ‘अच्छी आग’ है। आज इसे मनोरंजन, शराब और संगीत के साथ जोड़ दिया गया है। इसमें न तो कोई धार्मिक भावना है, न ही प्रकृति के प्रति कोई सम्मान।
सबसे बड़ी विडंबना देखिए- मीडिया और सोशल मीडिया के ‘ज्ञानियों’ का दोहरा मापदंड यहाँ साफ दिखता है। जिस बॉनफायर का इतिहास ‘मौत, सजा और लाशों की हड्डियों’ से जुड़ा है, उसे आज का मीडिया ‘एंजॉयमेंट’ और ‘हाई-फाई कल्चर’ का हिस्सा बताता है। उसके खिलाफ कभी कोई खबर नहीं छपती कि यह पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है।

लेकिन जिस लोहड़ी का आधार ‘जीवन, नई फसल, किसान की खुशी और प्रकृति का पूजन’ है, उसे तुरंत ‘प्रदूषण’ से जोड़ दिया जाता है। उसे बंद करने या रोकने के लिए हर साल अखबारों में लंबी-चौड़ी रिपोर्ट्स छापी जाती हैं। यह सोचना बेहद जरूरी है कि हमारी अपनी पावन परंपरा को ‘विलेन’ और विदेशी ‘सजा वाली आग’ को ‘हीरो’ बनाकर पेश करने के पीछे आखिर मानसिकता क्या है?
बॉनफायर जैसी चीजों को हाइप देने का कार्य मीडिया में इस तरह किया गया कि आजकल ट्रैवल एजेंसियाँ कहीं अगर छुट्टियों का पैकेज बनाती हैं तो उसमें बॉनफायर नाइट का एक अलग इवेंट की तरह बताया जाता है।
परंपरा के विरुद्ध नैरेटिव: लोहड़ी को बदनाम करने की कोई साजिश
पिछले कुछ सालों में एक अजीब सा चलन देखने को मिला है। जैसे ही कोई हिंदू त्यौहार करीब आता है, अचानक से ‘पर्यावरण प्रेमियों’ की बाढ़ आ जाती है। दिवाली पर पटाखों और होली पर पानी की बर्बादी का नैरेटिव सेट करने के बाद, अब लोहड़ी को निशाना बनाया जा रहा है।
इसे ‘इको-फ्रेंडली’ बनाने के नाम पर असल में त्यौहार की रस्मों को ही खत्म करने का एक सुनियोजित प्रयास किया। मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए लोगों के मन में यह बात बिठाने की कोशिश की जाती है कि आपकी आस्था पर्यावरण की दुश्मन है।
निशाने पर त्यौहार: एक रात की अग्नि बनाम साल भर का प्रदूषण
अखबारों और बड़े न्यूज पोर्टल्स में ऐसी खबरें बड़ी चालाकी से पेश की जाती हैं, जिनसे लगे कि लोहड़ी जलते ही शहर की हवा जहरीली हो गई। वे AQI (हवा की गुणवत्ता मापने वाला पैमाना) के आँकड़े दिखाते हैं। जबकि सच यह है कि दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे शहरों में प्रदूषण का स्तर (PM 2.5 और PM 10) पहले से ही सुरक्षित सीमा से कई गुना ज्यादा होता है।
पूरे साल चलने वाले कारखानों, सड़कों पर दौड़ती करोड़ों गाड़ियों और बड़े-बड़े निर्माण कार्यों से जो धुआँ निकलता है, उस पर चुप्पी साध ली जाती है। लेकिन जैसे ही लोहड़ी की एक रात सांकेतिक अग्नि जलती है, उसे पूरे साल के प्रदूषण का विलेन बनाकर पेश कर दिया जाता है।

मीडिया का दोहरा चरित्र: लोहड़ी ‘धुआँ’ है और बॉनफायर ‘स्टाइल’
मीडिया की दोहरी मानसिकता यहाँ एकदम साफ हो जाती है। जब बात लोहड़ी की आती है, तो हेडलाइंस होती हैं- ‘धुएँ से घुट रहा दम’, ‘पेड़ काटने से पर्यावरण का नुकसान’, या ‘इस बार धुएँ वाली नहीं, स्मॉक-फ्री लोहड़ी मनाएँ’।
लेकिन जैसे ही कोई हाई-प्रोफाइल ‘बॉनफायर नाइट’ होती है, तो वही मीडिया लिखता है- ‘कड़कड़ाती ठंड में बॉनफायर पार्टी का मजा लें’, ‘शहर के वो खास ठिकाने जहाँ आप बॉनफायर का आनंद ले सकते हैं’।
यही काम सोशल मीडिया के ‘इनफ्लुएंसर्स’ भी करते हैं। वे लोहड़ी पर तो ज्ञान देंगे कि लकड़ियाँ नहीं जलानी चाहिए, लेकिन अपनी न्यू ईयर पार्टी या हिल स्टेशन की वेकेशन में बॉनफायर के सामने बैठकर शराब के गिलास के साथ फोटो डालेंगे। वहाँ वह आग ‘लक्जरी’ और ‘स्टेटस सिंबल’ बन जाती है, लेकिन वही आग लोहड़ी के आँगन में जलती है तो ‘पिछड़ापन’ और ‘प्रदूषण’ कहलाने लगती है।
इतिहास के साथ छेड़छाड़: राजाओं की चाटुकारिता या जनता का विद्रोह?
कुछ ‘बुद्धिजीवी’ तो एक कदम और आगे निकल जाते हैं। वे यह भ्रामक बात फैलाते हैं कि लोहड़ी का त्यौहार पुराने समय में राजाओं को खुश करने के लिए शुरू हुआ था। यह सरासर गलत और इतिहास को दबाने की कोशिश है। लोहड़ी का सीधा संबंध दुल्ला भट्टी की बहादुरी से है। मुगल शासन के दौरान दुल्ला भट्टी ने उन गरीब हिंदू लड़कियों को बचाया था जिन्हें गुलामी के बाजार में बेचा जा रहा था।
दुल्ला भट्टी ने उन लड़कियों का पिता बनकर उनका कन्यादान किया और आग जलाकर उनके फेरे करवाए। इसलिए लोहड़ी ‘चाटुकारिता’ का नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ ‘विद्रोह’, ‘न्याय’ और ‘भाईचारे’ का त्यौहार है। इसे केवल एक ‘फैशनेबल कल्चर’ कहना इसकी महानता को कम करना है।
एजेंडे से बड़ी है आस्था
राहत की बात यह है कि अब देश की जनता इन प्रोपेगेंडा फैलाने वालों से ज्यादा समझदार हो गई है। लोग त्यौहार छोड़ नहीं रहे, बल्कि उसे अधिक जिम्मेदारी के साथ मना रहे हैं। चंडीगढ़ और दिल्ली-NCR में बहुत से लोग पेड़ की लकड़ियों की जगह ‘गौकाष्ठ’ (गाय के गोबर से बनी लकड़ी) का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे प्रदूषण भी नहीं होता और हमारी धार्मिक मान्यता के अनुसार अग्नि पूजन और शुद्ध हो जाता है।
इसके अलावा, लोग अब घर-घर छोटी आग जलाने के बजाय पूरे मोहल्ले में एक सामूहिक लोहड़ी जला रहे हैं। इससे लकड़ी भी कम लगती है और आपसी भाईचारा भी बढ़ता है। जनता की यह सजगता उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो पर्यावरण के बहाने हमारी संस्कृति को खत्म करना चाहते थे।
पर्यावरण के नाम पर त्यौहारों को नीचा दिखाना एक ‘फैशन’ बन गया है। आज लोग ओपिनियन के नाम पर यह ज्ञान तो आसानी से दे देते हैं कि दीवाली-होली या लोहड़ी कैसे मनाई जाए, लेकिन वे अपनी जीवनशैली में कोई बदलाव नहीं करते। लोहड़ी के जश्न को रोकने की कोशिश सिर्फ इसलिए की गई ताकि हमारे मन में अपनी ही जड़ों के प्रति अपराध बोध पैदा हो सके।
लेकिन लोहड़ी की आँच को बुझाने वाले यह भूल गए कि इसे मनाने वाले वर्ग (विशेषकर पंजाब और हरियाणा) ने इन्हें कभी मौका ही नहीं दिया। आज जनता तथाकथित ‘एक्टिविस्ट’ से कहीं ज्यादा जागरूक है। लोहड़ी की यह पावन अग्नि हमें याद दिलाती है कि हमारी परंपराएँ प्रकृति का सम्मान करना सिखाती हैं, नुकसान पहुँचाना नहीं। हमें अपनी जड़ों पर गर्व करना चाहिए और ऐसे हर एजेंडे को लोहड़ी की इसी अग्नि में भस्म कर देना चाहिए जो हमें अपनी पहचान से दूर ले जाना चाहता है।


