Sunday, September 20, 2020
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रंजन गोगोई तो बहाना है, राम मंदिर निशाना है: पूर्व CJI को राज्यसभा भेजे जाने से खफा BBC ने रोया ‘सिद्धांतों’ का रोना

सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट लम्बा-चौड़ा था और उसे बिना पढ़े अगर बीबीसी ऐसे दावे कर रहा तो उसका कुछ नहीं किया जा सकता। चीजें 'मीडिया ट्रायल' से नहीं चलती। जनता ने चुनावों में राफेल मुद्दे को नकार दिया, सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष को झटका दिया सो अलग। क्या अब बीबीसी जनता और न्यायपालिका से ऊपर जाकर ये तय करेगा कि कौन से सवाल ज़रूरी हैं और कौन से नहीं?

बीबीसी या उसे ‘बिग बीसी’ कह लीजिए। इस ब्रिटिश प्रोपेगंडा मीडिया संस्थान को आज भी लगता है कि भारत उसके आकाओं का गुलाम है। वो आज भी 1947 से पहले के ज़माने में जी रहा है, जब उसके ही देश के तथाकथित जज सफ़ेद बालों वाली विग लगा कर कोर्ट में बैठते थे कठघड़े में खड़े किसी निर्दोष और मासूम भारतीय की ओर इशारा कर के कहते थे- ‘हैंग हिम’। बीबीसी आज भी उसी मुद्रा में है और वो चाहता है कि भारत की न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका ठीक उसी तरह काम करे, जैसा वो चाहता है। उसका ताज़ा निशाना पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई हैं।

पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राज्यसभा सांसद के रूप में मनोनीत किया है। नियमानुसार राज्यसभा में 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नॉमिनेट किए जाते हैं और रंजन गोगोई को भी किया गया। कहानी शुरू होती है जनवरी 2018 से जब रंजन गोगोई सहित तब सुप्रीम कोर्ट के 4 सबसे वरिष्ठ जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मोदी सरकार पर गम्भीर आरोप लगाए थे। शेखर कपूर सरीखे पत्रकार उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बढ़-चढ़ कर मौजूद रहे थे। उस घटना के बाद से गोगोई मीडिया के वर्ग विशेष के प्यारे बन गए थे। बीबीसी जैसे संस्थानों ने इसे बढ़-चढ़ कर चलाया था।

तो फिर रंजन गोगोई अचानक से गिरोह विशेष के दुश्मन कैसे बन गए? 2019 के चुनाव में राफेल मुद्दा हावी था और अपनी हर रैली में राहुल गाँधी आँकड़े बदल-बदल कर बताते थे कि घोटाला हुआ है। ‘द हिन्दू’ के नेतृत्व में बीबीसी जैसे संस्थानों ने प्रोपेगंडा पोर्टल्स के साथ मिल कर राफेल मामले में एक से बढ़ कर एक फिक्शन गढ़े। मुद्दा फ्लॉप हो गया और चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद इस पर बातें होनी भी बंद हो गईं। सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार को क्लीन चिट दी।

इसके बाद आया राम मंदिर मामला। दशकों से अटके इस मामले में तत्कालीन सीजेआई गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने फ़ास्ट-ट्रैक सुनवाई कर के निपटाया। बस, यही वो मौका था जब वो मीडिया के सबसे बड़े दुश्मन बन गए क्योंकि उन्होंने राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया। यहाँ सवाल उठता है कि अगर बीबीसी को दोष ही देना है तो सिर्फ़ रंजन गोगोई को ही क्यों? राफेल मामले में तो उनके साथ जस्टिस एसके कॉल और जस्टिस केएम जोसफ भी थे। केएम जोसफ भी उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल थे, जिसमें मोदी सरकार पर निशाना साधा गया था। फिर बीबीसी केवल गोगोई को ही क्यों निशाना बना रहा है?

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राम मंदिर फैसले में भी जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अब्दुल नज़ीर शामिल थे। जस्टिस बोबडे फ़िलहाल देश के सीजेआई हैं। तो फिर रंजन गोगोई पर ही निशाना क्यों? क्या पहले किसी जज ने रिटायरमेंट के बाद कोई पद स्वीकारा ही नहीं है या फिर सब कुछ एकदम नया हो रहा है? या मोदी सरकार ने जस्टिस गोगोई को राज्यसभा भेज कर क़ानून और नियमों की अवहेलना की है। इन सभी चीजों की पड़ताल हम करेंगे लेकिन सबसे पहले जानते हैं कि आखिर बीबीसी ने लिखा क्या है?

‘बिग बीसी’ की खुन्नस: रंजन गोगोई पर साधा निशाना

बीबीसी लिखता है कि जजों से उम्मीद की जाती है कि वो कुछ ‘अलिखित सिद्धांतों’ का पालन करें। हालाँकि, अलिखित कहने से स्पष्ट है कि इसका कहीं कोई जिक्र संविधान में नहीं है लेकिन बीबीसी ने अपने हिसाब से जो भी सही मान लिया, वही सिद्धांत सब पर लागू होना चाहिए। बीबीसी यह याद कराना नहीं भूलता कि जिस ज़मीन पर पहले ‘बाबरी मस्जिद हुआ करती थी’, वहाँ राम मंदिर के निर्माण का फ़ैसला सुनाया गया। अगर वहाँ पहले बाबरी मस्जिद हुआ करती थी तो फिर उस बाबरी मस्जिद का निर्माण कब और कैसे हुआ था और उससे पहले वहाँ क्या हुआ करता था, इस पर बीबीसी ने चुप्पी साध रखी है। ये बताने से प्रोपेगंडा ध्वस्त हो जाएगा।

साथ ही बीबीसी लिखता है कि राफेल मामले में कोर्ट के निर्णय के बाद कई ‘ज़रूरी सवाल’ के जवाब नहीं मिले। किसने तय किया कि कौन सा सवाल ज़रूरी है? उन्हीं राहुल गाँधी ने, जिनके आँकड़े हर बार बदल जाते थे? सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट लम्बा-चौड़ा था और उसे बिना पढ़े अगर बीबीसी ऐसे दावे कर रहा तो उसका कुछ नहीं किया जा सकता। चीजें ‘मीडिया ट्रायल’ से नहीं चलती। जनता ने चुनावों में राफेल मुद्दे को नकार दिया, सुप्रीम कोर्ट ने विपक्ष को झटका दिया सो अलग। क्या अब बीबीसी जनता और न्यायपालिका से ऊपर जाकर ये तय करेगा कि कौन से सवाल ज़रूरी हैं और कौन से नहीं?

इसके अलावा रंजन गोगोई पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने सीजेआई रहते भाजपा के घोषणापत्र के आधार पर काम किया। असम में एनआरसी लागू किए जाने को इसके अगले उदाहरण के रूप में दिखाया गया है। एनआरसी वाला निर्णय जिस बेंच ने सुनाया, उसमें जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन भी शामिल थे। लेकिन, बीबीसी का निशाना सिर्फ़ रंजन गोगोई ही हैं। जस्टिस नरीमन 2011 में भारत के सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किए गए थे। तब केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-2 की सरकार चल रही थी, जिसे रिमोट कंट्रोल से सोनिया गाँधी चला रही थी।

इसके बाद बीबीसी के लेख में जस्टिस (रंजन गोगोई) पर सीजेआई रहते लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की बात की गई है। बता दें कि वर्तमान सीजेआई जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता में एक सुप्रीम कोर्ट की आंतरिक समिति ने इस मामले की जाँच की थी और रंजन गोगोई को क्लीन-चिट दिया था। बीबीसी को इस जाँच पर भी भरोसा नहीं। यानी, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले और जाँच पर कोई भरोसा नहीं और मोदी सरकार तो ग़लत है ही, ऐसा इनका सोचना है।

क्या पहले ऐसा नहीं हुआ? सब कुछ नया है?

ज्यादा पहले न जाएँ तो 1998 में जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को कॉन्ग्रेस सरकार ने रिटायरमेंट के बाद ओडिशा से राज्यसभा भेजा था। वो 2004 तक राज्यसभा सांसद रहे थे और अपना कार्यकाल पूरा किया था। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा के बारे में तो यहाँ तक कहा जाता रहा है कि उन्होंने 1984 सिख दंगा मामले में कॉन्ग्रेस को एक तरह से क्लीन-चिट दे दी थी। ऐसा इन दंगों पर पुस्तक लिखने वाले मिट्टा का ही मानना है। आज उस दंगे के कई आरोपित जेल में हैं, जिनका कॉन्ग्रेस से लंबा जुड़ाव रहा है।

इसी तरह बहरुल इस्लाम भी सुप्रीम कोर्ट के जज थे, जिन्होंने राज्यसभा की शोभा बढ़ाई थी। वे जब सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते थे, तब उन्हें 1962 में पहली बार असम से कॉन्ग्रेस पार्टी ने राज्यसभा भेजा। उसके बाद दूसरी बार 1968 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया लेकिन इसके पहले कि वो 6 साल का अपना कार्यकाल पूरा कर पाते, उन्हें तब के असम और नागालैंड हाईकोर्ट (आज के गुवाहाटी हाईकोर्ट) का जज बनाया गया। जब वो रिटायर हुए, उसके बाद फिर से कॉन्ग्रेस ने उन्हें राज्यसभा भेजा। तो फिर अब रंजन गोगोई पर हंगामा क्यों?

वकीलों और जजों को रिटायरमेंट के बाद विभिन्न जाँच समितियों का अध्यक्ष बनाना, किसी आयोग वगैरह के अध्यक्ष का पद देना या सदस्य के रूप में शामिल करना या फिर किसी संवैधानिक संस्था में कोई पद देना- कोई आज की रीत नहीं है। मुद्दा ये है कि रंजन गोगोई पर सवाल उठाने वालों के पास कोई तर्क ही नहीं है, जिससे वो उनके मनोनयन को ग़लत ठहरा सकें। इसीलिए बीबीसी ‘अलिखित सिद्धांतों’ और दुनिया-जहाँ का रोना रो रहा है। गोगोई तो मनोनीत किए गए हैं, बहरुल इस्लाम और रंगनाथ मिश्रा तो कॉन्ग्रेस से राज्यसभा गए थे।

क्या गोगोई को मनोनीत करना संविधान की अवहेलना है?

संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार, राज्यसभा का गठन 250 सदस्यों द्वारा होता है और इनमें से 12 सदस्यों के नाम राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित किए जाते हैं। फ़िलहाल, राज्यसभा में 245 सदस्य हैं। ये 12 लोग कौन हो सकते हैं। साहित्य, विज्ञान, कला तथा समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव के आधार पर इन्हें मनोनीत किया जा सकता है। अब कोई मुर्ख ही होगा जो कहेगा कि रंजन गोगोई के पास कोई अनुभव नहीं है। उन्होंने ख़ुद कहा है कि वो राज्यसभा सांसद का पद इसीलिए स्वीकार कर रहे हैं क्योंकि वो संसद में जुडिशरी की आवाज़ बनना चाहते हैं, न्यापालिका की बातों को वहाँ उठाना चाहते हैं।

तो फिर हंगामा क्यों? दरअसल, हंगामे का कारण है राफेल के मुद्दे पर मोदी सरकार को न घेर पाना और राम मंदिर मामले का निपटारा एकदम शांति से हो जाना। हमेशा ख़ून-खराबे की उम्मीद लेकर बैठे ये मीडिया संस्थान इसीलिए भी नाराज़ हैं क्योंकि तीन तलाक़ और अनुच्छेद 370 जैसे निर्णय शांतिपूर्वक सम्पन्न हुए और उन पर अमल भी हुआ। सीएए के बहाने खड़े हुए आंदोलन ने हिन्दू-विरोधी दंगों का रूप लिया और ये फिर से ये बेनकाब हुए। कोरोना वायरस पर सरकार की तैयारियों से ये पहले ही हैरान हैं। ऐसे में मुद्दों के अभाव से जूझ रहे ये मीडिया संस्थान अभी और कितना गिरते हैं, ये देखने वाली बात होगी।

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अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
चम्पारण से. हमेशा राइट. भारतीय इतिहास, राजनीति और संस्कृति की समझ. बीआईटी मेसरा से कंप्यूटर साइंस में स्नातक.

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