बंगाल में पत्रकारों की पिटाई पर चुप्पी Editors Guild के ‘गुप्त’ रोग का परिचायक

एडिटर्स गिल्ड के ट्विटर पेज पर केवल न्यूज़लॉन्ड्री और 'द प्रिंट' जैसे ख़ास मीडिया पोर्टल्स के लिंक्स शेयर किए जाते हैं। उनका पिछला बयान 7 मार्च को आया था। उससे पहले उन्होंने उन पत्रकारों के बचाव में बयान दिया था, जो पहले से ही VIP स्टेटस रखते हैं।

भारत में ग़रीब ऑटो वालों से लेकर करोड़ों कमाने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकीलों तक, सभी की अपनी एक अलग यूनियन है। इस एकता का प्रभाव यह होता है कि उनमें से अगर किसी एक को भी कोई दिक्कत आती है तो पूरा समूह उसके साथ खड़ा हो जाता है। ऐसे ही भारत में डिजाइनर पत्रकारों का भी एक प्रतिनिधिमंडल है, समूह है, दल है या यूँ कहिए गिरोह है। यह एडिटर्स गिल्ड है। एडिटर्स गिल्ड भी एक प्रकार के ‘गुप्त’ रोग से ग्रसित है, जिसे सीधी भाषा में ‘गुप्ता’ रोग भी कहा जा सकता है। आख़िर शेखर गुप्ता जैसे ‘निष्पक्ष’ पत्रकार जिस गिरोह के अध्यक्ष हों, उसके बारे में और कहा भी क्या जा सकता है? चाहे मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस हो या फिर आईआईटी के हॉस्टलों में मिल रहे खाने की भी जाति बता देना, इन सब में शेखर बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहते हैं या यूँ कहिए कि वो ऐसे कार्यक्रमों के योजनाकार होते हैं।

एडिटर्स गिल्ड इतना हिम्मती है कि ये मेघालय हाईकोर्ट के किसी निर्णय पर तो अफ़सोस जता सकता है लेकिन इतना कुटिल भी है कि बंगाल में पत्रकारों के पीटे जाने पर चुप्पी साध सकता है। एडिटर्स गिल्ड राहुल गाँधी द्वारा किसी पत्रकार पर की गई टिप्पणी को लेकर भाजपा नेताओं की आलोचना कर सकता है। जी हाँ, आपने बिलकुल सही पढ़ा। जैसा कि हमें पिछले कुछ दिनों में पता चला है, प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेना अब इस देश में पाप हो गया है। अगर प्रधानमंत्री गिरोह विशेष को इंटरव्यू नहीं देते तो सिर्फ़ वही नहीं बल्कि उनका इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार भी ख़राब हो जाते हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने इसी तरह एएनआई की सम्पादक स्मिता प्रकाश पर टिप्पणी की थी। उनकी भी गलती यही थी- प्रधानमंत्री का इंटरव्यू लेना।

पत्रकारों के हितों की बात करने वाले एडिटर्स गिल्ड से जनता ने राहुल के उस बयान के ख़िलाफ़ बयान जारी करने की माँग की थी, जिसमें उन्होंने स्मिता के बारे में कहा था कि वो सवाल भी ख़ुद पूछ रही थीं और जवाब भी ख़ुद दे रही थीं। लोगों द्वारा लगातार आवाज़ उठाने के बाद एडिटर्स गिल्ड ने चुप्पी तोड़ते हुए एक बयान तो जारी किया था, लेकिन उसमें राहुल गाँधी द्वारा स्मिता प्रकाश पर की गई टिप्पणी को लेकर आपत्ति जताने से ज्यादा पुराने घिसे-पिटे मुद्दों पर भाजपा नेताओं को निशाना बनाया गया था। यही एडिटर्स गिल्ड आज एक बार फिर सवालों के घेरे में है। उस दौरान केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली सहित कई बड़े नेताओं ने एडिटर्स गिल्ड पर निशाना साधा था। लेकिन एडिटर्स गिल्ड के मुखिया गुप्ता जी हैं। गुप्ता जी उन बातों को गुप्त ही रखते हैं, जिनसे ममता और राहुल जैसे नेताओं की छवि को चोट पहुँचे।

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आइए सबसे पहले जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में ऐसा हुआ क्या, जिसके कारण एडिटर्स गिल्ड की आलोचना की जानी चाहिए। पश्चिम बंगाल स्थित आसनसोल में सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों पर हमले किए। लाठी-डंडों से लैस तृणमूल के गुंडों ने सजीव और निर्जीव वस्तुओं के बीच फ़र्क़ को नज़रअंदाज़ करते हुए गाड़ियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और रास्ते में आए लोगों की पिटाई की। इसी जद में रिपब्लिक टीवी के पत्रकार भी आ गए। क्या महिला और क्या पुरुष, तृणमूल के गुंडों ने कोई फ़र्क़ नहीं किया। इतना ही नहीं, सरकार द्वारा पोषित गुंडों ने वहाँ चुनाव कवर कर रहे पत्रकारों को खदेड़ दिया और कैमरामैन से लेकर क्रू में शामिल अन्य लोगों पर भी हमले किए।

बंगाल में हिंसा को लेकर न सिर्फ़ एडिटर्स गिल्ड बल्कि बुद्धिजीवियों के हर खेमे में चुप्पी है। भाजपा और संघ कार्यकर्ता केरल और बंगाल में मरने के लिए ही होता है, ऐसा मानकर चलने वाले बुद्धिजीवियों के समूह को उस वक़्त गहरा धक्का लगता है जब अदालत की कार्यवाही को रिपोर्ट करने से हाईकोर्ट किसी पत्रकार को रोक देता है। इन्हें तब और ज्यादा गहरा धक्का लगता है जब किसी भाजपा शासित राज्य में किसी पत्रकार पर अन्य कारणों से एकाध हज़ार का अर्थदंड लगाया जाता है। लेकिन, जब कर्नाटक में एक-एक कर पत्रकारों को गिरफ़्तार किया जाने लगता है तो फिर एडिटर्स गिल्ड उसी ‘गुप्त’ रोग से ग्रसित हो जाता है, जिसमें नियम है कि भाजपा-विरोधी शासित राज्यों में पत्रकारों पर ज़ुल्म भी हो तो उस पर कुछ नहीं बोलना है और भाजपा शासित राज्य में किसी पत्रकार की सीढ़ियों से गिरकर ऊँगली में चोट भी लगती है तो एक ‘Condemnation Letter’ जारी कर दिया जाता है।

इस ‘गुप्त’ या ‘गुप्ता’ रोग की कुछ विशेषताएँ हैं। इसमें न सिर्फ़ बंगाल में पत्रकारों की पिटाई को लेकर आँख-नाक-कान बंद रखना होता है बल्कि विरोध प्रदर्शन करने उतरे सैंकड़ों पत्रकारों की आवाज़ को भी बड़ी चालाकी से नज़रअंदाज़ कर देना होता है। पिछले वर्ष बंगाल में हुए पंचायत चुनावों के दौरान भी पत्रकारों पर कम अत्याचार नहीं किए गए थे। लेकिन, एडिटर्स गिल्ड ने लोकसभा चुनाव से पहले बंगाल सरकार से पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को लेकर कोई अपील नहीं की। अगर एडिटर्स गिल्ड चाहता तो पिछले चुनावों से सबक लेते हुए पहले से ही आवाज़ उठा सकता था ताकि इस चुनाव में तृणमूल और वाम के गुंडें ऐसा न करें, लेकिन अफ़सोस यह कि पत्रकारों का हितैषी होने का दावा करने वाले एडिटर्स गिल्ड ने ऐसा कुछ भी नहीं किया।

एडिटर्स गिल्ड अटॉर्नी जनरल द्वारा ‘द हिन्दू’ जैसे शक्तिशाली अख़बार की आलोचना करने पर उसके साथ खड़ा होकर अटॉर्नी जनरल के बयान की निंदा करता है लेकिन प्रेस और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सैंकड़ों पत्रकार, कैमरामैन और टेक्निकल स्टाफ जब कोलकाता की सड़कों पर उतर अपने ख़िलाफ़ हो रही हिंसा का विरोध प्रदर्शन करते हैं, तब इस गिरोह के कानों में जूँ तक नहीं रेंगती। अगर आप एडिटर्स गिल्ड के ट्विटर पेज की पड़ताल करेंगे तो पाएँगे कि वहाँ केवल न्यूज़लॉन्ड्री और ‘द प्रिंट’ जैसे ख़ास मीडिया पोर्टल्स के लिंक्स शेयर किए जा रहे हैं और उनका पिछला बयान 7 मार्च को आया था, जो मेघालय हाई कोर्ट के निर्णय को लेकर था। उससे पहले उन्होंने उन पत्रकारों के बचाव में बयान दिया था, जो पहले से ही वीआईपी स्टेटस रखते हैं।

अगर राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त जैसे हाई प्रोफाइल, सक्षम, अमीर और पाँच सितारा पत्रकारों को कोई ट्विटर पर ‘रे’ भी बोल दे तो एडिटर्स गिल्ड इस चीज की निंदा में खड़ा होने में देर नहीं लगाता लेकिन जो निचले स्तर के पत्रकार हैं, ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं या गिरोह विशेष के ‘दुश्मन’ चैनलों में काम कर रहे हैं, अगर उन्हें बंगाल में नंगा कर के भी घुमाया जाता है तो एडिटर्स गिल्ड तो छोड़िए, गुप्ताजी या उनके किसी भी साथी की तरफ से चूँ की आवाज़ भी नहीं आती। ‘द प्रिंट’ की पत्रकार को इंटरव्यू के दौरान चिदंबरम खुली धमकी देते हैं लेकिन ‘अपने’ अगर बेइज्जत भी करते हैं तो चलेगा क्योंकि ‘अपने तो अपने होते हैं।’ यहाँ तक कि गुप्ताजी की अपनी वेबसाइट ‘द प्रिंट’ भी इसी ‘गुप्त’ रोग से ग्रसित है जिसमें बंगाल से जुड़ी ऐसी ख़बरों को प्राथमिकता नहीं दी जाती क्योंकि इससे ‘अपनों’ के ख़फ़ा होने का ख़तरा है।

सब कुछ साफ़-साफ़ दिख रहा है लेकिन मीडिया में इसे लेकर शांति है। बंगाल में तृणमूल और केरल में वाम द्वारा संचालित हिंसा राजनीतिक हिंसा है, जिसमें दोनों पक्षों की ग़लती होती है जबकि अगर कोई पेशेवर अपराधी किसी पत्रकार की व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण हत्या कर दे तो इसमें अपराधियों के तार भाजपा से जबरन जोड़ने की कोशिश की जाती है। आम लोगों पर हो रही हिंसा को गिरोह विशेष नज़रअंदाज़ करता है और अपने पेशे के लोगों पर हो रहे अत्याचार को भी छिपाता है। एडिटर्स गिल्ड को पता है कि किस मामले को उठाकर उसे बड़ा बना देना है और किस मामले को जनता तक पहुँचने से रोकना है। उसे पता है कि ‘अपनों’ को फ़ायदा कैसे पहुँचे और यह भी ध्यान रखना है कि उन्हीं ‘अपनों’ को नुकसान न हो। बाकि जो ‘दुश्मन’ हैं, उन्हें नुकसान पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़नी है।

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