Sunday, May 16, 2021
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नीतीश को बिहार का सीएम बनाने के पीछे भाजपा की कौन-सी मजबूरी है?

नीतीश किस स्तर के 'मूडियल/ईगोइस्ट' नेता हैं, वो हमने 2014-15 में दो बार देख लिया है जब वो मोदी के नाम से बगावत करने के साथ, भाजपा बिहार से भी नाता तोड़ कर लालूपुत्र तेजस्वी के साथ चले गए।

सबसे पहला कारण तो यही है कि नीतीश सत्ता के लिए जब राजद से एक बार हाथ मिला सकता है तो उसे दोबारा हाथ मिलाने में कोई समस्या नहीं होगी। वो यह भी कह देगा, “राजनीति में कोई भी स्थाई दुश्मन नहीं होता।”

16 लोकसभा सांसद हैं जदयू के, भले ही सारे नरेन्द्र मोदी के कारण गए हों, लेकिन अब पाँच साल के लिए तो वही हैं। नीतीश बिहार में भाजपा को सत्ता से बाहर तो कर ही सकते हैं, बल्कि केन्द्र में भी दुखदायी समस्या बन सकते हैं। इसलिए, भले ही त्वरित निवारण सही न हो, पर 69 साल के नीतीश को शांत रखना भाजपा की विवशता कह सकते हैं।

अब सवाल यह है कि भाजपा विवश क्यों है? क्योंकि भले ही जे पी नड्डा खूब बड़े रणनीतिकार हों, लेकिन बिहार का सत्य यही है कि केन्द्र को चालीस सांसद से मतलब है, जो कि बिहार से मिल रहा है। उसके अलावा बिहार, केन्द्र सरकार को कुछ खास वापस नहीं करता, बल्कि हमेशा ‘विशेष पैकेज’ का रोना रोता रहता है। ऐसे राज्य पर भाजपा की कोई खास नजर है भी नहीं।

भाजपा को बिहार में जमने के लिए इन पाँच सालों में जमीनी स्तर पर संगठनात्मक कार्य करने होंगे। नीतीश के अगले पाँच साल जो भी रहें, भाजपा के लोगों को 2024 और 2025 में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी अभी से करनी चाहिए। बिहार हमेशा गरीबी का रोना नहीं रो सकता, समुद्र न होने की बकैती नहीं कर सकता।

नीतीश और सुशील मोदी दोनों से भाजपा को सीटों का घाटा ही हुआ है, लाभ नहीं। इन दोनों के कारण भाजपा को रात के नौ बजे तक परिणाम की प्रतीक्षा करनी पड़ी क्योंकि हम जहाँ भी गए, लोगों को भाजपा से पार्टी के तौर पर समस्या नहीं थी, बल्कि सुशील मोदी को हर एक व्यक्ति एक ‘बेकार नेता’ कह रहा था। वहीं, नीतीश से नाराजगी उनकी सीटों की संख्या में भी दिखी, और लोगों ने उनकी पार्टी को जहाँ भी वोट दिया वहाँ यह कह कर दिया कि उन्होंने कुछ खास किया नहीं, और हम नाराज भी हैं, लेकिन इतने नाराज नहीं है कि तेजस्वी जैसे को सत्ता दे दें।

इसलिए, इन दोनों को कूटनीति से ही हटाना होगा। सुशील मोदी को शायद उत्तरपूर्व में राज्यपाल बनाने की तैयारी चल रही है, नीतीश को पाँच अंतिम साल और। नीतीश ने स्वयं ही कहा है कि वो अंतिम बार लड़ रहे हैं, हो सकता है कि आगे पलट जाएँ, अतः भाजपा को उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए।

हो सकता है कि नीतीश वास्तव में बिहार के लिए यह पाँच साल ऐसे काम करें कि उन्हें लोग याद रखें। पहले तीन साल के काम की मार्केटिंग अगले आठ साल कर के, फिर राजद से हाथ मिला कर सत्ता पाने, और वापस भाजपा के साथ आ कर, मोदी के नाम पर अगले पाँच साल टिकने की तैयारी करने वाले नीतीश को ‘इतिहास’ में सुशासन बाबू के नाम को धूमिल होते देखने की बजाय, वापस उसे जनस्मृति का हिस्सा बनाने की इच्छा तो होगी ही।

भाजपा की योजना लम्बे नहीं, बहुत लम्बे समय की होती है। सामान्य पत्रकार या नागरिकों के अनुभवों से दस-बीस गुणा ज्यादा अनुभव वाले लोग शीर्ष नेतृत्व में बैठते हैं। कहा जाता है कि भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा के पास भाजपा बिहार के नेता यह समस्या ले कर गए थे कि नीतीश को मुख्यमंत्री न बनाया जाए। नड्डा ने विचार करने के बाद अमित शाह से चर्चा की, अमित शाह भी सहमत दिखे। फिर बात प्रधानमंत्री मोदी तक पहुँची, जिन्होंने पंद्रह मिनट में इस बात को खारिज कर दिया कि नीतीश मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे।

सीधा निर्देश यह था कि भाजपा का कोई भी नेता या प्रवक्ता नीतीश से इतर कोई बात न करे। इसीलिए, आपको परिणाम वाले दिन हर प्रवक्ता ‘नीतीश जी ही मुख्यमंत्री बनेंगे’ कहता दिखा। क्योंकि नीतीश किस स्तर के ‘मूडियल/ईगोइस्ट’ नेता हैं, वो हमने 2014-15 में दो बार देख लिया है जब वो मोदी के नाम से बगावत करने के साथ, भाजपा बिहार से भी नाता तोड़ कर लालूपुत्र तेजस्वी के साथ चले गए।

इसलिए, नीतीश कुमार को किसी भी तरह से ऐसा इशारा देना कदाचित आग से खेलने जैसा था। आगे मर्जी नीतीश कुमार की है कि वही मुख्यमंत्री बनेंगे या कुछ और देखने को मिलेगा। शायद ही ऐसा कुछ अलग आपको देखने को मिले, लेकिन एक ‘आँत में दाँत’ वाले नेता के साथ रिस्क लेना सूझ-बूझ की बात तो है ही नहीं।

एक ऐसे राज्य से, जहाँ से न तो केन्द्र को पैसा मिलता है, न ही प्रदेश को कोई विशेष लाभ, भाजपा सिर्फ पाँच साल के लिए अपने समर्थन के सांसदों की संख्या गँवाना नहीं चाहेगी क्योंकि भाजपा बहुत लम्बा समय ले कर चलती है। इसकी सारी योजनाएँ दीर्घकालिक होती हैं, चाहे वो ढाँचागत विकास हो या फिर सामान्य जन को छूने वाली बातें (बिजली, पानी, शौचालय, गैस, बत्ती, बैंकिंग आदि)।

इसलिए, बिहार को पाँच साल और भी नीतीश को देने का रिस्क भाजपा लेती दिख रही है क्योंकि तुलनात्मक रूप से विकास के कार्य तो हुए हैं, लेकिन आशा के अनुरूप और आनुपातिक रूप से बहुत कुछ होने को रह गया है। हो सकता है कि नीतीश अपनी ही छवि सुधारने को ले कर बिहार पर अगले पाँच साल उद्योग और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर ध्यान दें, और तब तक भाजपा अपने स्तर से बिहार में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी में जमीनी स्तर पर गंभीरता से कार्य करना शुरु करे।

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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