Sunday, April 21, 2024
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शाहीन बाग की महान उपलब्धि: एक बच्चे से कट्टरपंथियों ने कलम की जगह बंदूक चलवा दी

क्या कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने इस तरह का घटिया माहौल बना दिया इस देश में कि एक नाबालिग कट्टा खरीदने को मजबूर हो गया? क्या हिन्दुओं को गाली दे कर, उनके धार्मिक प्रतीकों का अपमान करके, उनकी स्त्रियों को बुर्के में दिखा कर, उनके खिलाफ आजादी के नारे लगा कर, उन्हें कैलाश भेजने की बातें करके ही इस देश का ताना-बाना बचाया जा सकता है?

जामिया में गोली चल गई, किसी शादाब को लग गई। खून बह गया। एक युवा ने दूसरे युवा पर गोली चला दी। क्या ये एक सामान्य बात है? क्या आज का युवा इतना उन्मादी हो गया है कि वो पुलिस की मौजूदगी में पिस्तौल तान दे और ट्रिगर दबा दे? एक कच्ची उम्र का नाबालिग आखिर ऐसा क्या देख लेता है, उसने ऐसा क्या महसूस कर लिया, कि वो कैराना से तीन हजार रुपए में एक तमंचा खरीद लाता है, और मीडिया की मौजूदगी में घोड़े पर उँगली रख कर दबा देता है?

ये बातें आपको सामान्य तरीके से समझ में नहीं आएँगी, क्योंकि ये घटना सामान्य नहीं है। गोली चलाने वाला एक नाबालिग है। हमने उसके दोस्त से बात की, उसके शिक्षक से बात की। वो पढ़ने में एक सामान्य छात्र की तरह है। दो साल पहले तक वो भी किसी के दिल में बसने के लिए फुलझड़ियों वाली शायरी किया करता था। कच्ची उम्र का प्यार अक्सर ऐसे ही अपनी अभिव्यक्ति पाता है, कभी शायरी से, कभी किसी और तरीके से।

उसने भी प्रेम करना चाहा होगा, वो भी बड़ा हो कर पुलिस, डॉक्टर, इंजीनियर या फौजी बनना चाहता होगा। वो भी वही सब करना चाहता था जो एक आम छात्र चाहता है। फिर पिछले कुछ समय में ऐसा क्या हो गया कि वो देसी कट्टा खरीद कर घूमने लगा? आखिर क्या बदल गया पिछले कुछ समय में कि फेसबुक पर उसके पोस्टों का लहजा ऐसा हो गया मानो उसने कुछ विचित्र सा देख लिया हो, या उसे कुछ ऐसा समझ में आने लगा हो, जो पहले भी था, लेकिन उसने कभी महसूस न किया हो?

उसका एक करीबी दोस्त बताता है कि वो पिछले कुछ समय से, हिन्दू विरोधी प्रदर्शनों और कुछ लोगों की बयानबाजी से परेशान हो गया था। इस उम्र में ही वो ऐसे सोचने लगा मानो समाज पर कुछ लोग अपनी ही विचारधारा को थोप रहे हैं, और उसे अब कुछ तो करना ही होगा। दोस्त ने हमसे बात करते हुए कहा कि वो शरजील इमाम जैसों की बातों से, शाहीन बाग के इस उत्पाती प्रदर्शनों से, CAA पर चल रहे पोस्टरों की हिन्दू-घृणा से बहुत परेशान हो चुका था।

फिर उसने एक दिन योजना बनाई कि कोई अगर कुछ नहीं कर रहा, तो वो ही इस शाहीन बाग की नौटंकी को खत्म कर देगा। यह उसका बचपना था, और कुछ नहीं। आखिर शाहीन बाग में बैठे कट्टरपंथियों से एक नाबालिग, कच्ची उम्र का बच्चा कैसे जीत पाएगा? वहाँ तो ऐसे-ऐसे शातिर लोग हैं जो कश्मीरी पंडितों के साथ खड़े होने में भी ऐसे शब्दों के साथ खड़े होते हैं जैसे उनके जख्मों पर नमक रगड़ रहे हों। वो तो कश्मीरी पंडितों के दर्द को याद करते हैं, लेकिन दर्द देने वाली इस कौम के लिए एक शब्द नहीं निकलता।

इसलिए, एक किशोर वय का लड़का, जब शरजील इमाम जैसों के बारे में सुनता होगा कि वो असम में पाँच लाख कट्टरपंथियों की भीड़ के साथ भारत से पूर्वोत्तर को काटने की योजना बना रहा है, तो इस छोटे से जीवन में ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ से अपना दिन शुरू करने वाला बालक परेशान नहीं होगा कि IIT और JNU जैसी जगह में पढ़ने वाले लड़के आतंकियों की जुबान बोल रहे हैं?

आज मीडिया में इस बच्चे को, जिसे काउंसलिंग की आवश्यकता है, जिसे बैठ कर यह समझाने की आवश्यकता है कि इस्लामी कट्टरपंथियों से सरकार और उसकी एजेंसियाँ निपट लेंगी, इसमें बच्चों को परेशान होने की जरूरत नहीं है, उस बालक को ‘टेररिस्ट’ कहा जा रहा है। यह कुछ ऐसा ही लग रहा है जैसे कुछ मीडिया वालों को इंतजार था कि एक हिन्दू नाम वाला किसी दिन पिस्तौल के साथ मिल जाए, फिर उनकी ‘हिन्दू आतंकी’ वाली थ्योरी सही साबित हो जाएगी।

अफजल गुरु, बुरहान वानी, याकूब मेमन जैसे आतंकवादियों के बापों और बच्चों के नाम और उनके लक्ष्य गिनाने वाले लोग यह भूल रहे हैं कि गोली चलाने वाला कौन है, और उसके ट्रिगर पर उँगली किसकी है। सनद रहे कि सत्तर साल के इतिहास में शायद यह पहला उदाहरण है जहाँ एक हिन्दू बच्चा कुछ कट्टरपंथियों की करतूतों से परेशान हो कर कानून अपने हाथ में लेता है, पुलिस की मौजूदगी में गोली चलाता है।

उसके दोस्त ने यह भी बताया कि वो शाहीन बाद को खत्म करने निकला था। आप ही सोचिए कि जिस शाहीन बाग में हर दिन हिन्दुओं के प्रति घृणा का भोजन पोस्टरों और नारों के रूप में मुक्तहस्त बाँटा जा रहा है, जहाँ हजारों की भीड़ है, स्वास्तिक जलाए जा रहे हैं, हिन्दू महिलाओं को बुर्के में दिखाया जा रहा है, जिसकी जड़ में ‘हिन्दुओं से आजादी’ के नारे हैं, जहाँ आठ साल की बच्चियाँ रेडिकलाइज हो चुकी हैं, जिन्हें दिल्ली पुलिस और सुप्रीम कोर्ट धरना करने से हिला नहीं सकी है, उसे एक नाबालिग, एक कट्टे की एक गोली से खत्म करने निकला था!

चाहे जितनी भी हास्यास्पद सोच रही हो उस बच्चे की, लेकिन उसे ऐसा बनाया किसने? क्या शरजील इमाम जैसे लोग इसके लिए जिम्मेदार नहीं? क्या शाहीन बाग में हिन्दूविरोधी जहर बाँटने वाले उसे ऐसा बनाने के लिए जिम्मेदार नहीं? आज जो लोग उसके फेसबुक पोस्ट को निकाल रहे हैं, बता रहे हैं कि वो तो इस रैली में जाता था, उस रैली में जाता था, इस पार्टी में था, उस संघ का सदस्य कहता था खुद को, वो यह भी तो जानने की कोशिश करें कि उसे किसी रैली में जाने की जरूरत क्यों पड़ी?

क्या कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने इस तरह का घटिया माहौल बना दिया इस देश में कि एक नाबालिग कट्टा खरीदने को मजबूर हो गया? हमारा समाज कहाँ जा रहा है? हम इस देश को कहाँ ले जा रहे हैं? कहाँ गई वो गंगा-जमुनी तहजीब? क्या हिन्दुओं को गाली दे कर, उनके धार्मिक प्रतीकों का अपमान करके, उनकी स्त्रियों को बुर्के में दिखा कर, उनके खिलाफ आजादी के नारे लगा कर, उन्हें कैलाश भेजने की बातें करके ही इस देश का ताना-बाना बचाया जा सकता है जिसकी नींव सरदार पटेल, महात्मा गाँधी, बच्चों के अतिप्रिय चाचा नेहरू ने रखी थी?

हम अपने बच्चों को कैसा समाज देना चाह रहे हैं? आखिर वो अपने धर्म को इतना क्यों पकड़ रहा है? वो कट्टर क्यों प्रतीत होता है? आखिर हिन्दू धर्म को मानने वाला कट्टर क्यों बनना चाह रहा है? वो सोच क्या रहा है? क्या ऐसे बच्चे और भी हैं? क्या इस्लामी कट्टरपंथियों और आतंकियों के आतंक से इस समाज के बच्चे अब डरने लगे हैं? क्या अब हिन्दुओं के बच्चों में कट्टरपंथियों से बच कर रहने का डर घर कर चुका है?

इस देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी को आज यह सोचने की आवश्यकता है कि वो देश की सबसे बड़ी आबादी से क्या चाहते हैं। समुदाय विशेष को यह सोचना होगा कि उनके समुदाय के कुछ लोग काँवरियों पर पत्थर क्यों फेंकते हैं हर साल? उन्हें जवाब देना होगा कि दुर्गा पूजा के दौरान पिछले कुछ सालों से मूर्तियों को तोड़ने की खबरें क्यों आ रही हैं? इस्लाम को शांति का मजहब बताने वाले यह भी बताएँ कि बीस महीने में बीस जगहों पर हिन्दुओं को मंदिर कैसे तोड़ दिए जाते हैं? गाय का मांस खा कर बोर न होने वाले मजहब के लोग यह भी बताएँ कि पिछले दो साल में उन्नीस हिन्दुओं की जान लेने वाले लोग संविधान के हिसाब से चलेंगे या गौरक्षकों की हत्या करते रहेंगे?

एक बच्चे ने बंदूक उठा ली। इससे खराब बात और क्या हो सकती है? मैं फिर से कहता हूँ कि एक बच्चे ने बंदूक उठा ली भाई साहब! उसके हाथों में तो कलम होनी चाहिए थी। उसे तो सुलेख पर मेहनत करनी थी, उसे तो अपनी उम्र की किसी लड़की से प्रेम की बातें करनी थी, लेकिन उसने समाज में आते हुए बदलाव को देखा और कलम की जगह बंदूक उठा गया।

कल कुछ लोग प्राइम टाइम में उसके फेसबुक, उसकी तस्वीरें शेयर करते हुए मुस्कुरा रहे थे मानो कह रहे हों कि तुमने शरजील पर बात करने की कोशिश की, ये लोग हमें तो हिन्दू आतंकी मिल गया। वो एक बच्चे को जहरीला कह रहे हैं, उसे आतंकवादी लिख रहे हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने आज तक यह नहीं बताया कि शाहीन बाग में हिन्दू स्त्रियों को बुर्के में दिखाने का क्या औचित्य है। वो यह नहीं बता पाए कि गाय को काट कर कमल पर क्यों दिखाया गया है? वो यह नहीं समझा पा रहे हैं कि स्वास्तिक को आग में क्यों दिखाया जा रहा शाहीन बाग में?

एक पूरी आवाम जहरीली हो गई है आँख के अंधों! एक कौम के पढ़े-लिखे जहीन लोग मंचों से इस्लामी निजाम की माँग कर रहे हैं कान के बहरों! समुदाय विशेष का नेता चिल्ला रहा है कि हिन्दुओं का बहिष्कार करो, उससे सामान मत खरीदो, उसका सिम फेंक दो। वो कौम की बात करते हुए गाँधी को फासीवादी कह रहे हैं। वो मंचों से लच्छेदार अंग्रेजी और फूलदार उर्दू में कह रहे हैं कि उनकी स्ट्रेटेजी क्या है, वो संविधान को नकारने की बात कर रहे हैं।

इस पर कितने प्राइम टाइम हुए? इस भीड़ में कितनी बार आतंकियों को खोजा गया? आखिर उस शाहीन बाग में एक ही तरह की मीडिया से, एक ही समूह से कुछ लोग बात क्यों करते हैं? मेट्रो स्टेशन से उतरने के बाद, तंग गलियों में हर दस मीटर पर घूरती कट्टरपंथियों की आँखों के बीच से क्यों गुजरना पड़ता है शाहीन बाग जाने के लिए? आखिर आँखों में सूरमा घिसे, डरावनी और खूँखार सूरत वाले लड़के तलाशी क्यों लेते हैं? एक समानांतर सरकार क्यों चल रही है शाहीन बाग में जहाँ पुलिस तक को बैरिकेड से आगे जाने पर अनकही मनाही है?

इसीलिए, एक बच्चा कलम की जगह बंदूक उठा लेता है। वो किसी संगठन के नाम पर नहीं आता, भले ही कितने फेसबुक पोस्ट निकाल दो। वो किसी दल या संघ का प्रतिनिधि नहीं है, न ही किसी धर्म के ध्वजवाहक बन जाता है, वो एक नाबालिग बच्चा है, जिसे कट्टरपंथी सोच ने अपनी सहिष्णुता त्यागने को मजबूर कर दिया। उसने अपनी नादानी में एक गलत कदम उठाया, लेकिन वो इसका जिम्मेदार नहीं। उसके इस अपराध का भागी शाहीन बाग है, शरजील इमाम जैसे दंगाई विचार वाले कट्टरपंथी हैं, और वो सारे लोग हैं जिन्हें लगता है कि शाहीन बाग की हिन्दूघृणा एक सामान्य घटना है।

हमारे सर शर्म से झुके होने चाहिए कि एक बच्चा आज सड़क पर कट्टा ले कर उतर गया, क्योंकि वो इस अनिश्चितकालीन विरोध से, एक मजहबी भीड़ के बर्ताव से, एक मजहब द्वारा दूसरे धर्म को सतत निशाना बनाते रहने से उदास और निराश था, हमें समझना होगा उसके बाल मन के क्रोध को। अभी तक बाल मन की चंचलता सुनते थे, उसके हठ पर बातें होती थीं, लेकिन हम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जहाँ एक मजहब का कट्टरपंथी चेहरा बाल मन को क्रोध करने पर ढकेलता है।

शर्मिंदगी होनी चाहिए इस समाज को जो धरने के नाम पर कट्टरपंथियों के हौसलों को हवा दे रहा है। इस बेहूदगी का अंत होना चाहिए क्योंकि पढ़ने-लिखने वाले बच्चे, किशोरावस्था के प्रेम का पीछा करने वाले अल्पवयस्क और चंचल, चपल, नटखट नंद-गोपाल इन्हीं मजहबी उन्मादियों के कारण हाथ में बंदूक उठा लेते हैं। इसकी जिम्मेदारी और किसी की भी नहीं है।

इस बच्चे से इसकी परेशानी पूछी जानी चाहिए, उसे उचित मनोवैज्ञानिक सलाह दी जानी चाहिए और जजों की मौजूदगी में इसके द्वारा इस अपराध का माध्यम बनने के पीछे के जिम्मेदार लोग या विचारधारा पर सख्त कदम उठाने चाहिए। क्योंकि अगर एक मजहब इस समाज के ताने-बाने में आग लगाने की फिराक में लगा रहेगा, तो दूसरी तरफ देश के नौनिहाल भयंकर मनोवैज्ञानिक दवाब में आ कर कुछ वैसा कर गुजरेंगे जो असंवैधानिक, गैरकानूनी और जानलेवा हो सकता है।

मीडिया का रोल

ये रक्तपिपासु टीवी मीडिया का काला दौर है। जिस तरह से एक अल्पवयस्क बच्चे को ले कर रिपोर्टिंग हुई है, और उसे एक आतंकवादी की तरह दिखाया जा रहा है, वो बताता है कि देश को सिर्फ बेहतर इंसान नहीं, बेहतर नागरिक चाहिए। क्या हम एक नागरिक के तौर पर असफल होते जा रहे हैं? क्या हमें यह पता नहीं कि शाहीन बाग में अगर कोई हिन्दूघृणा से सने पोस्टर लगाएगा, नारेबाजी करेगा, अलीगढ़ में कोई दंगाई विचारों वाला शरजील पूर्वोत्तर को काटने की बातें करेगा, तो उससे कोई प्रभावित हो सकता है?

आप सोचिए कि परचून की दुकान चलाने वाले घर की आर्थिक स्थिति क्या रही होगी? आपको सोचना होगा कि ऐसे परिवार में जब जद्दोजहद अगले दिन का भोजन हो, तो एक बच्चा अपने आसपास चल रहे प्रपंचों से कैसे उब जाता है, और एक दिन वो शाहीन बाग को खतम करने निकल पड़ता है! इस उम्र में भारत के आधे किशोर टिकटॉक पर विडियो बना कर मनोरंजन करने में लगे हैं, और एक किशोर बंदूक खरीदने निकल जाता है!

मीडिया में उसकी मानसिक स्थिति पर चर्चा नहीं हो रही। इस्लामी आतंकी ओसामा बिन लादेन को बेहतरीन पिता बताने वाले, आतंकवादी बुरहान वनी के बाप की जन्मकुंडली निकालने वाले, इस्लाम के जिहाद को आगे बढ़ाने वाले अफजल गुरु के बेटे के दसवीं की मार्कशीट दिखाने वाले, आज इस लड़के के अल्पवयस्क होने पर दुखी हैं कि अब तो इसे ‘वैसी’ सजा नहीं होगी जो रात के दो बजे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुलवाने वाले सोच रहे थे!

अब जबकि उसने स्वीकारा है कि वो किसी संगठन का प्रतिनिधित्व नहीं करता, क्या आज की शाम मीडिया में कल तक उसे भाजपा, संघ, हिन्दू आतंकवाद और धार्मिक उन्माद से जोड़ने वाले इस बच्चे के मनोमस्तिष्क पर पड़े उस जबरदस्त दबाव की बात करेंगे कि वो अकेला ही शाहीन बाग के दंगाइयों से लड़ने निकल पड़ा? क्या वही मीडिया, और ट्विटर वाले जो इस मासूम लड़के को, जिसे मनोचिकित्सा की आवश्यकता है, हिन्दू आतंकी बता रहे थे, वो आज यह कोशिश करेंगे कि स्टूडियो में एक मनोचिकित्सक को बैठा कर उससे पूछें कि एक सहिष्णु धर्म का बच्चा, कलम की जगह बंदूक कैसे उठा लेता है? क्या वो देश की जनता को बताना चाहेंगे ताकि ऐसे बच्चे इस्लामी कट्टरपंथ को लेकर प्रतिक्रियावादी न बन जाएँ?

सवाल कई हैं, जवाब बहुत कम क्योंकि हमने फैसला सुनाना शुरु कर दिया है। रवीश जैसे लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है जब एक हिन्दू नाम उभरता है। वो ‘रामभक्त’ शब्द पर विशेष जोर देता है, वो मुस्कुराता है कि ये तो अपने काम की चीज है, वरना शरजील को डिफेंड करते-करते तो चेहरे पर नैसर्गिक मलिनता फैल रही थी। ये दिन इन गिद्धों की आँखों में बिल्लौरी चमक वाला दिन था।

जबकि, इन्हें यह समाज किस जगह जा रहा है, कुछ लोग इस समाज में कैसी वैमनस्यता फैलाना चाह रहे हैं, कुछ कट्टरपंथी नेता-पत्रकार-वक्ता अपनी पढ़ाई और पोजिशन का उपयोग कट्टरपंथियों के निजाम के लिए क्यों कर रहे हैं, ऐसे प्रश्नों को पूछे जाने की जरूरत है। आज एक समाज और देश के तौर पर हम असफल हो चुके हैं, क्योंकि एक बच्चे ने हाथों में बंदूक उठा ली है!

हमें शर्म आनी चाहिए कि हम शाहीन बाग, जामिया के दंगों, अलीगढ़ के बलवों, लखनऊ के फसादों को ‘प्रदर्शन’ के नाम पर सामान्यीकृत करने लगे हैं। हम एक नए तरह की प्रतिक्रिया को जन्म देना चाह रहे हैं, जहाँ इस्लामी कट्टरपंथ अपने मजहब वालों को तो छोड़िए, हिन्दुओं के बच्चों पर भी मानसिक दबाव बना रहा है कि वो ‘कुछ करें’। ये बहुत बुरा दौर है, अपने बच्चों को बचाइए।

हिन्दू आज खौफ में है, लेकिन वो क्या करे, इसका समाधान क्या है? वहाँ मारो जहाँ सबसे ज्यादा दर्द हो?

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अजीत भारती
अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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