Tuesday, July 16, 2024
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बेटियाँ जो ब्याही जाएँ मुड़ती नहीं हैं… : काश! हर लड़की की किस्मत अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता नंदा जैसी होती और मिल पाता इसका जवाब

दुनिया मान लें कि एक इंसान के तौर पर उनकी भी आर्थिक और अन्य तरह कि जरूरतें हो सकती हैं। तब कहीं जाकर हमें ये नहीं कहना पड़ेगा, फसलें जो काटी जाएँ, उगती नहीं हैं, बेटियाँ जो ब्याही जाएँ, मुड़ती नहीं हैं...'

सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपनी जायदाद का सबसे खास बंगला ‘प्रतीक्षा’ बेटी श्वेता बच्चन नंदा के नाम किया कर दिया है। इस बंगले की डील साइन करने के लिए उन्होंने 8 नवंबर, 2023 को 50.65 लाख रुपए रजिस्ट्रेशन और स्टैंप ड्यूटी के दिए और बंगला श्वेता का हो गया।

पर्दे के एंग्री मैन का ये कदम अपने पीछे कई सवाल छोड़कर गया है। मसलन दुनिया में ऐसी कितनी बेटियाँ होती हैं जिन्हें श्वेता जैसी किस्मत नसीब होती हैं और कितने ऐसे पिता हैं जो ऐसी सोच रखते हैं या फिर ऐसा कदम उठाते है जो ये दिखाती है कि बेटा और बेटी केवल और केवल संतान हैं।

एक जेंडर के तौर पर वो अपने बच्चों में हर तरह की समानता के पक्षधर होते हैं जिसमें अचल संपत्ति भी शामिल होती है। शायद इस सवाल का जवाब हमारे समाज में हमेशा ही पूरी ईमानदारी से नहीं दिया गया या फिर उसकी कोशिश ही नहीं की जाती, क्योंकि इसका एहसास मुझे शायद 3-4 साल की उम्र में ही बहुत शिद्दत के साथ हो गया था।

मेरे दिमाग में ये सवाल 70 के दशक से ही घूमता रहा कि क्यों मेरी आमा यानी दादी अपने पिता के घर में हमेशा नहीं रह सकती? मसला ये था कि मेरे दादा जी लोहाघाट जो अब उत्तराखंड के चंपावत जिले में पड़ता है के एक गाँव के थे। वो बचपन में अनाथ हो गए।

उनकी एक दीदी थी जिनकी शादी हुई और वो अपने ससुराल चली गईं। उनके मामा उन्हें अल्मोड़ा ले आए। शादी मेरी दादी से हुई थी और घर बार न होने की वजह से उनके ससुर यानी मेरी दादी के पिता ने उन्हें अपना घर रहने को दिया। आमा कहती थी कि उनके बोज्यू यानी पिता कहते थे,”रेबा तू यहीं रहना।”

इसी घर में मैं भी पैदा हुई। मेरे पैदा होने तक आमा के बोज्यू स्वर्ग सिधार गए थे। लेकिन जब से मैंने होश संभाला तो उस घर में रहने के दौरान हर वक्त ये जताया जाता कि जैसे हमें वहाँ रहने देने से आमा के भाई और उनका परिवार हम पर कोई एहसान कर रहे हों।

मुझे भी होश संभालने के बाद हर पल एहसानों के इस बोझ का एहसास हमेशा होता रहा। रहते तो हम आमा के पिता के घर में थे, लेकिन उनके भाई के परिवार के रवैये से हर वक्त ऐसा एहसास होता रहता कि जैसे हम किराए के घर में हैं, जबकि मेरी आमा भी उसी पिता की संतान थी जिनके उनके भाई थे।

इससे बालमन पर ऐसा असर पड़ा कि मैं सोचा करती कि मैं कभी शादी नहीं करूँगी। मुझे लगता था कि शादी के बाद लड़कियाँ पिता के घर में वैसे नहीं रह पाती जैसे शादी से पहले रहती थी। आमा से अक्सर पूछा करती थी कि आमा ये तो आपके पिता का घर फिर क्यों आप यहाँ नहीं रह सकती जब आपके पिता आपको यहाँ रहने को कह गए हैं।

आमा का हर वक्त यही जवाब होता, “रूचूलि ब्याह के बाद लड़कियाँ मायके में नहीं रहती ससुराल ही उनका घर होता है।” खैर इस बात को तीन दशक हो गए। हमारा अपना घर भी मेरे पापा-चाचा ने बना लिया और हम आमा के पिता का घर छोड़कर अपने घर आ गए, लेकिन पापा की अप्रैल 2020 में मौत के बाद ये सवाल फिर से मेरे आगे आकर खड़ा हो गया।

हालाँकि, हम चार बहनें हैं हमारा चाचा का बेटा है, लेकिन घरवालों की सोच चेलियाँ (बेटियाँ) तो ब्याह के चली गई। अब उनका ससुराल ही उनका घर है उन्हें मायके की अचल संपत्ति की क्या जरूरत। मेरी सास भी कहती हैं कि शादी में बेटियों का हिस्सा दे दिया जाता है।

क्या वो हिस्सा ऐसा होता है कि कोई होनी-अनहोनी होने पर एक पंछी लंबी उड़ान की तरह बेटी अपने उस आरामदायक घोसले में उसी आराम से रह पाएँ। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हम सब जानते हैं कि अमूमन ऐसा नहीं हो पाता।

लेकिन मेरी समझ में आजतक ये बात नहीं आई कि कैसे जिस घर में बचपन, जवानी गुजारी वो शादी के बाद बेगाना क्यों हो जाता है? क्यों बेटियाँ शादी के बाद मेहमान बन जाती हैं?

क्यों बेटियाँ पिता के घर और संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार नहीं हो सकती? ये समाज का दबाव है या सोच जो हमें पिता की संपत्ति पर पुरजोर हक जताने से रोकती है।

हर पिता अक्सर फक्र से कहते हैं कि मेरी बेटी मेरा अभिमान, लेकिन बेटी के शादी के बाद ये अभिमान पराया क्यों हो जाता है। क्यों बेटी पर इतना नैतिक दवाब होता है कि अपने ही पिता के घर में शादी के बाद चार दिन से अधिक रह लें तो आस-पड़ोस की नाते-रिश्तेदारों की नजरें ऐतराज जताने लगती हैं, सवाल करने लगती है।

क्यों शादी के बाद मायके की संपत्ति सदा के लिए भाई के लिए छोड़ जाने का नैतिक दबाव बेटियों को ही झेलना होता है? कहते हैं न कि समाज जैसा होता है सिनेमा उसका ही प्रतिबिंब होता है।

तभी तो आए दिन फिल्मों में ‘बेटियाँ जो ब्याही जाएँ मुड़ती नहीं हैं… बाबा मैं तेरी मलिका, टुकड़ा हूँ तेरे दिल का, एक बार फिर से दहलीज़ पार करा दे, बाबुल का ये घर गोरी कुछ दिन का ठिकाना है, भैया तेरे अँगना की, मैं हूँ ऐसी चिड़िया रे, रात भर बसेरा है, सुबह उड़ जाना है’ जैसे गाने सुनाई पड़ते हैं।

हर कोई जैसे मान के बैठा हो कि शादी के बाद बेटी के लिए पिता का घर उसका अपना नहीं था। बस कुछ दिन का ही ठिकाना था। कितने माँ और पिताओं को इतनी हिम्मत होती है कि वो खुलेआम अपनी जायदाद बेटा और बेटी में बराबर बाँट सकें।

इसका खुलेआम ऐलान कर सकें जैसे कि अमिताभ बच्चन ने ये साल 2017 में ट्वीट कर किया था, “जब मैं मरूँगा, जो भी जायदाद मैं अपने पीछे इस दुनिया में छोड़कर जाऊँगा वो मेरे बेटे और बेटी के बीच बराबर बाँटा जाएगा, क्योंकि हम एक हैं।”

मैं यहाँ अमिताभ बच्चन का महिमा मंडन नहीं कर रही, लेकिन उन्होंने बेटा-बेटी को एक समझने की बात केवल हवा में नहीं कही। उसे साबित करके भी दिखाया। वहीं कितने भाईयों में ये जिगरा होता है कि वो अभिषेक बच्चन की तरह अपने पिता के बेटी को जाददाद देने का फैसला बगैर किसी नाखुशी के मंजूर कर पाएँ। ये मान पाएँ कि उनकी बहन केवल लड़की नहीं बल्कि उन्ही जैसी उनकी एक इंसान है।

शायद ऐसे माँ-पिता और भाई समाज में अँगुलियों पर गिनने लायक ही हों, क्योंकि बहन-बेटियों की सोशल कडिशनिंग ही समाज में ऐसे की जाती है कि वो दिल-दिमाग से ये मानने लगती हैं कि उन्हें पिता की जायदाद में क्योंकर हिस्सा चाहिए बस भाई का परिवार चलना चाहिए, फिर भले ही वो लाख मुश्किलों का सामना कर ससुराल में रह रही हों या भयकंर आर्थिक तंगी झेल रही हों।

लड़कियों के जायदाद के मामले में मैंने इतने साल में बस यही बदलाव देखा कि भले ही बहन-बेटियाँ पिता की जायदाद पर हक न जता सकें, लेकिन वो अपने पिता के सरनेम पर पूरा हक जताती हैं। जैसे कि मैं पूरे हक से लिखती हूँ- ‘रचना वर्मा बंजारा’ दरअसल ‘बंजारा’ मेरे पिता का तखल्लुस है जिससे वो अपनी साहित्यिक रचनाओं और अपनी बनाई कलाकृतियों और पेंटिंग में दर्ज किया करते थे और वर्मा उनका सरनेम था।

लेकिन ये बदलाव हकीकत में हो तो बात बनें जब लड़कियों, बहन, बेटियों को बगैर कहें, बगैर किसी कानूनी दाँव-पेंच के उनके पिता की जायदाद में ही नहीं बल्कि समाज में एक इंसान की तरह लिया जाए। न कि उनके जेंडर के आधार पर उनको तोला जाएँ।

दुनिया मान लें कि एक इंसान के तौर पर उनकी भी आर्थिक और अन्य तरह कि जरूरतें हो सकती हैं। तब कहीं जाकर हमें ये नहीं कहना पड़ेगा, फसलें जो काटी जाएँ, उगती नहीं हैं, बेटियाँ जो ब्याही जाएँ, मुड़ती नहीं हैं…’

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रचना वर्मा
रचना वर्मा
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