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ममता बनर्जी जिन घुसपैठियों के होने से करती थीं ‘इनकार’, शुभेंदु सरकार ने आते ही किया ‘प्रहार’: एक चेतावनी और बंगाल बॉर्डर पर मची अवैध बांग्लादेशियों के वापस भागने की होड़!

बंगाल में ममता बनर्जी नेतृत्व वाली TMC सरकार में पिछले 15 सालों तक घुसपैठ के मुद्दे को या तो नकारा गया या फिर उसे राजनीति कहकर टाल दिया गया। लेकिन सरकार बदलते ही जिसे तेजी से सीएम शुभेंदु के नेतृत्व में फेंसिंग, डिटेंशन सेंटर, पहचान और डिपोर्ट की कार्रवाई शुरू हुई और उसके बाद बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने ममता बनर्जी के दावों पर सवाल खड़े कर दिए।

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2026 में घुसपैठ का मुद्दा सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनकर उभरा। बीजेपी ने पूरे चुनाव में लगातार बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा उठाया, जबकि ममता बनर्जी और TMC इसे पूरी तरह नकारती रहीं। उल्टा ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को घुसपैठिया घोषित कर डाला। लेकिन चुनावी नतीजों के बाद अब जमीन पर जो तस्वीर दिख रही है, उसने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

राज्य में शुभेंदु सरकार के बनते ही घुसपैठियों के खिलाफ ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति के तहत सख्त कार्रवाई शुरू हुई तो बंगाल से से ऐसे वीडियो सामने आने लगे, जहाँ घुसपैठिए अपने देश वापस लौटते दिखाई दे रहे हैं। कहीं लोग बॉर्डर पार जाने का इंतजार कर रहे हैं तो कहीं प्रशासन की कार्रवाई के डर से राज्य को छोड़ रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब ममता बनर्जी कहती थीं कि बंगाल में घुसपैठिए हैं ही नहीं तो आखिर ये लोग कौन हैं जो कार्रवाई शुरू होते ही दुम दबाकर भागते नजर आ रहे हैं?

बंगाल में घुसपैठियों की बदलती तस्वीर

बंगाल में सरकार बनाते ही बीजेपी ने घुसपैठ के मुद्दे को प्राथमिकता दी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सरकार गठन के तुंरत बाद साफ कर दिया कि अब बंगाल में ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ नीति लागू होगी। सीएम शुभेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों को चेतावनी दी, “जल्दी-जल्दी भागो। हम उन्हें जेल में रखकर खिलाना नहीं चाहते। आखिर हम जेल में उन्हें खाना खिलाने पर अपना पैसा क्यों बर्बाद करें?”

सरकार की इस कार्रवाई के बाद बंगाल के बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आईं, वह विपक्ष की आँखों को चुभने वाली थीं। उत्तर 24 परगना जिले के हाकिमपुर चेकपोस्ट पर 100 से ज्यादा बांग्लादेशी परिवार अपने सामान के साथ बॉर्डर के पास जमा दिखाई दिए। यहाँ बांग्लादेशी खुद बता रहे थे कि उन्होंने भारत में घुसपैठ की है।

हावड़ा में तीन साल से रहे एक घुसपैठिए ने कहा कि एक व्यक्ति की मदद से वह भारत आया था, उसके साथ 10 और लोग थे और यहाँ वह बिना आधार कार्ड और राशन कार्ड के तीन साल तक रहा। उसने बताया कि उन 10 लोगों में से अब वह अकेला लौट रहा है।

इन्हीं में से एक बांग्लादेशी महिला ने कहा कि TMC ने उन्हें ‘लक्ष्मी भंडार’ से पैसे दिए। इतना ही नहीं महिला ने बताया कि आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी भी बनाकर दिए, इसके बदले उन्हें सिर्फ TMC को वोट देना था।

बंगाल में बीजेपी सरकार की घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई

बंगाल के बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, उनके पीछे या सिर्फ डर या अफवाह नहीं, बल्कि सरकार की घुसपैठियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई है। विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान बीजेपी ने घुसपैठ को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था और दावा किया था कि बंगाल में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या नेटवर्क तेजी से बढ़ा है।

अब वही बीजेपी सत्ता में आने के बाद शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में उसी मुद्दे पर तेजी से फैसले लेती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा है कि उनकी सरकार ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ की नीति पर काम करेगी। इसी दौरान उनका बयान भी काफी चर्चा में रहा, जब उन्होंने कहा, “क्या ये घुसपैठिए हमारे दामाद हैं? उन्हें जल्दी-जल्दी भगाओ।”

घुसपैठ के मुद्दे को केवल चुनाव तक सीमित न रखकर बीजेपी ने सरकार गठन के महज दो दिन बाद, 11 मई 2026 को सीएम शुभेंदु अधिकारी की हुई पहली कैबिनेट बैठक में भारत-बांग्लादेश बॉर्डर पर फेंसिंग के लिए बीएसएफ को जमीन देने का फैसला लिया गया। शुभेंदु अधिकारी सरकार ने ऐलान किया कि सीमा के 27 किलोमीटर हिस्से में फेंसिंग के लिए करीब 75 एकड़ जमीन बीएसएफ को सौंपी जाएगी और अगले 45 दिनों में प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

सरकार ने बीएसएफ को जमीन देकर सीमावर्ती इलाकों में लंबे समय से अधूरी फेंसिंग की वजह से घुसपैठ के संकट को खत्म करने की कोशिश की। लेकिन वहीं, ममता सरकार ने इस जमीन के मुद्दे को कोर्ट तक घसीटा लेकिन बीएसएफ को जमीन नहीं दी।

अब राज्य में घुसपैठियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने के लिए सरकार 23 जिलों में ‘होल्डिंग सेंटर‘ यानी डिटेंशन सेंटर बनवा रही है मालदा और मुर्शिदाबाद में ये सेंटर बन भी चुके हैं, जिनमें 12 बांग्लादेशी घुसपैठियों को पकड़कर रखा गया है। इन घुसपैठियों पर ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ की नीति लागू होगी। सबसे पहले इन घुसपैठियों की पहचान कर डिटेंशन सेंटर तक लाया जा चुका है, अब अगले पड़ाव में इनकी सरकारी रिकॉर्ड खंगालकर डिलीट किए जाएँगे और फिर बीएसएफ को सौंप दिया जाएगा। बीएसएफ ने सीमा पार करवाकर वापस बांग्लादेश भेज देगी।

सरकार की इसी कार्रवाई के बाद ही उत्तर 24 परगना जैसे जिलों में घुसपैठिए वापस बांग्लादेश लौटने का इंतजार करते दिखे।

ममता बनर्जी लगातार घुसपैठ से करती रही इनकार

बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में जहाँ बीजेपी ने घुसपैठ को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया, वहीं ममता बनर्जी लगातार इस पूरे मुद्दे को राजनीतिक एजेंडा बताती रहीं। चुनाव से पहले कई रैलियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों ने ममता बनर्जी ने बीजेपी पर हिंदू-मुस्लिम की राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि घुसपैठ का मुद्दा सिर्फ बंगाल को बदनाम करने के लिए उठाया जा रहा है।

20 मार्च 2026 को कोलकाता के रेड रोड पर ईद की नमाज के बाद ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही ‘सबसे बड़ा घुसपैठिया‘ बता दिया। उन्होंने कहा कि लोगों को घुसपैठिया कहकर उनके वोटिंग अधिकार छीने जा रहे हैं और बीजेपी धर्म के नाम पर देश को बाँटने की कोशिश कर रही है।

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर भी ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ खड़ी दिखीं। उन्होंने 3 अप्रैल 2026 को दक्षिण दिनाजपुर की रैली में उन्होंने कहा कि अगर घुसपैठियों के वोट से सरकार बनी है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस्तीफा दे देना चाहिए। इसे पहले जनवरी 2025 में ममता बनर्जी ने घुसपैठ को लेकर केंद्र सरकार और बीएसएफ पर ही आरोप मढ़ दिया।

लेकिन जब बीजेपी ने ममता सरकार पर घुसपैठियों को संरक्षण देने और वोटबैंक की राजनीति करने का आरोप लगाया तो मता बनर्जी ने इससे मुँह मोड़ लिया। चुनाव के दौरान ममता बनर्जी लगातार यह संदेश देने की कोशिश करती रहीं कि घुसपैठ का मुद्दा असल में बंगाल चुनाव को ध्रुवीकृत करने की रणनीति है। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद जब शुभेंदु अधिकारी सरकार ने घुसपैठ के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू हुई और बॉर्डर इलाकों से लौटते घुसपैठियों की तस्वीरें सामने आने लगीं तो अब ममता बनर्जी चुप हैं।

TMC की तुष्टिकरण की राजनीति ने बंगाल की कहाँ लाकर खड़ा कर दिया?

बंगाल में ममता बनर्जी नेतृत्व वाली TMC सरकार में पिछले 15 सालों तक घुसपैठ के मुद्दे को या तो नकारा गया या फिर उसे राजनीति कहकर टाल दिया गया। लेकिन सरकार बदलते ही जिसे तेजी से सीएम शुभेंदु के नेतृत्व में फेंसिंग, डिटेंशन सेंटर, पहचान और डिपोर्ट की कार्रवाई शुरू हुई और उसके बाद बॉर्डर इलाकों से जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने ममता बनर्जी के दावों पर सवाल खड़े कर दिए। अगर बंगाल में घुसपैठिए थे ही नहीं, तो फिर कार्रवाई शुरू होते ही बॉर्डर पर लौटने वालों की भीड़ क्यों दिखाई देने लगी?

असल फर्क सरकार की नीयत और इरादों का होता है। जब सरकार कानून लागू करने की इच्छा रखती है तो सिस्टम जमीन पर दिखने लगता है। लेकिन जब राजनीति तुष्टिकरण और वोटबैंक के इर्द-गिर्द घूमने लगे, तब घुसपैठ भी ‘मुद्दा’ नहीं लगता। यही वजह रही कि वर्षों तक सीमा से जुड़े सवाल दबे रहे और बंगाल की कानून-व्यवस्था, पहचान और सुरक्षा पर लगातार सवाल उठते रहे। अब पहली बार कार्रवाई के बाद जो तस्वीर सामने आई है, उसने यह बहस फिर जिंदा कर दी है कि आखिर बंगाल का यह हाल बनने दिया किसने?

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