Friday, April 3, 2026
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बांग्लादेश में ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ का दौर खत्म: जिसने भारत से निभाई दुश्मनी, इस्लामी कट्टरपंथियों के हवाले किया मुल्क… नहीं रहीं वो खालिदा जिया

खालिदा जिया के शासन में उत्तर-पूर्वी भारत के उग्रवादी समूहों को बांग्लादेश में पनाह मिलने के आरोप लगे। 2001-2006 के कार्यकाल में पाकिस्तान से नजदीकियाँ बढ़ीं और जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामी दलों से गठबंधन किया।

बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष बेगम खालिदा जिया का मंगलवार (30 दिसंबर 2025) सुबह निधन हो गया। वे 80 वर्ष की थीं। लंबी बीमारी से जूझ रही खालिदा जिया ढाका के एवरकेयर अस्पताल में भर्ती थीं, जहाँ उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी पार्टी बीएनपी ने सोशल मीडिया पर इस दुखद खबर की पुष्टि की।

खालिदा जिया की मौत से बांग्लादेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत हो गया है। वे दशकों तक देश की सियासत की धुरी रहीं और अपनी कट्टर प्रतिद्वंद्वी शेख हसीना के साथ उनकी दुश्मनी ने पूरे देश को प्रभावित किया।

अविभाजित भारत में जन्म, परिवार ने चुना पाकिस्तान

खालिदा जिया का जन्म 15 अगस्त 1945 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसिडेंसी के जलपाईगुड़ी जिले में हुआ था, जो आज पश्चिम बंगाल का हिस्सा है। उनका बचपन का नाम खालिदा खानम ‘पुतुल’ था। उनका परिवार एक साधारण व्यापारी परिवार से था। 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनका परिवार पूर्वी बंगाल (आज का बांग्लादेश) के दिनाजपुर जिले में आकर बस गया। खालिदा जिया ने दिनाजपुर की मिशनरी स्कूल और गर्ल्स स्कूल में पढ़ाई की। वे खुद को ‘सेल्फ-एजुकेटेड’ बताती थीं और हाई स्कूल की डिग्री के कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं हैं।

15 साल की उम्र में फौजी अफसर से निकाह, आगे चल कर बनी फर्स्ट लेडी

साल 1960 में मात्र 15 साल की उम्र में खालिदा की शादी पाकिस्तानी आर्मी के कैप्टन जियाउर रहमान से हो गई। जियाउर रहमान बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के प्रमुख नायक थे। उन्होंने 1971 के मुक्ति संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने। शादी के बाद खालिदा जिया एक साधारण गृहिणी बनकर रह गईं। वे दो बेटों तारेक रहमान और आरफ रहमान की परवरिश में व्यस्त रहीं। उस समय उन्हें एक शर्मीली और घरेलू महिला के रूप में जाना जाता था, जो राजनीति से दूर रहती थीं।

शौहर और राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या के बाद संभाली पार्टी

जियाउर रहमान ने 1978 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की स्थापना की। वे 1977 से राष्ट्रपति थे और देश को सैन्य शासन से लोकतंत्र की ओर ले जा रहे थे। लेकिन 30 मई 1981 को चटगाँव में एक असफल सैन्य तख्तापलट में जियाउर रहमान की हत्या कर दी गई। इस घटना ने खालिदा जिया की जिंदगी बदल दी। शौहर की मौत के बाद बीएनपी संकट में पड़ गई। कई नेता पार्टी छोड़कर चले गए। ऐसे में खालिदा जिया ने 1982 में पार्टी की सदस्यता ली और 1984 में बीएनपी की चेयरपर्सन बन गईं। एक गृहिणी से राजनीतिक नेता बनने की उनकी यात्रा प्रेरणादायक थी।

शेख हसीना के साथ मिलकर खालिदा जिया ने किया तानाशाही का विरोध

1980 के दशक में बांग्लादेश पर जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद का सैन्य शासन था। खालिदा जिया ने इरशाद के खिलाफ लोकतंत्र बहाली की लड़ाई का नेतृत्व किया। वे सात दलों के गठबंधन की प्रमुख बनीं और हड़तालों, प्रदर्शनों के जरिए सैन्य तानाशाही का विरोध किया। इस दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और घर में नजरबंद रखा गया। लेकिन वे डटी रहीं। 1990 में जन आंदोलन के दबाव से इरशाद को सत्ता छोड़नी पड़ी।

लोकतंत्र की बहाली के लिए हुई लंबी लड़ाई में शेख हसीना ने भी मोर्चा थामे रखा। ये वही समय था, जब बांग्लादेश के लिए दोनों बेगमों ने एक पक्ष की तरफ से लड़ाई लड़ी, हालाँकि राजनीतिक वजहों से दोनों हमेशा अलग-अलग खेमों की अगुवाई करती रही।

साल 1991 में बांग्लादेश में पहली बार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हुए। बीएनपी ने भारी जीत हासिल की और खालिदा जिया देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। वे मुस्लिम बहुल देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गईं दूसरी महिला नेता थीं (पहली पाकिस्तान की बेनजीर भुट्टो थीं)। उनके पहले कार्यकाल (1991-1996) में कई महत्वपूर्ण सुधार हुए। उन्होंने संसदीय व्यवस्था बहाल की, विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया, प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त और अनिवार्य बनाया। लड़कियों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया। अर्थव्यवस्था में सुधार आए और बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत हुआ।

साल 1996 में वे चुनाव हार गईं और शेख हसीना की अवामी लीग सत्ता में आई। लेकिन 2001 में बीएनपी की वापसी हुई और खालिदा जिया दूसरी बार प्रधानमंत्री बनीं। इस कार्यकाल में भी कई उपलब्धियाँ रहीं, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप और इस्लामी कट्टरपंथी और आतंकवादियों के उभार ने उनकी सरकार को विवादास्पद बना दिया।

साल 2006 में सैन्य समर्थित अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाली और खालिदा जिया पर भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज किए गए। उन्हें जेल भेजा गया और लंबे समय तक नजरबंद रखा गया। वे हमेशा कहती रहीं कि ये मामले राजनीतिक बदले की कार्रवाई हैं। 2025 में बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य भ्रष्टाचार मामले में उन्हें बरी कर दिया।

साल 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद खालिदा जिया को नजरबंदी से रिहा किया गया। वे फिर से सक्रिय राजनीति में लौटने की तैयारी कर रही थीं, लेकिन स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया। अंतिम वर्षों में वे लीवर सिरोसिस, डायबिटीज, गठिया, हृदय और फेफड़ों की बीमारियों से पीड़ित रहीं। 2025 की शुरुआत में लंदन में इलाज के बाद वे वापस ढाका लौटीं, लेकिन हालत बिगड़ती गई और अब उनका निधन हो गया।

शेख हसीना और खालिदा जिया की प्रतिद्वंद्विता: जानें- ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ के बारे में

बांग्लादेश की राजनीति को दशकों तक परिभाषित करने वाली शेख हसीना (अवामी लीग) और खालिदा जिया (बीएनपी) की दुश्मनी को दुनिया ‘बैटल ऑफ द बेगम्स‘ कहती है। यह प्रतिद्वंद्विता सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और वैचारिक भी थी, जो बांग्लादेश को बार-बार अस्थिरता में धकेलती रही। दोनों महिलाओं ने मिलकर 1991 से 2024 तक बांग्लादेश पर बारी-बारी से शासन किया, लेकिन उनकी लड़ाई ने हड़तालें, हिंसा और राजनीतिक संकट पैदा किए।

प्रतिद्वंद्विता की जड़ें 1970 के दशक में हैं। शेख हसीना बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं, जिनकी 1975 में हत्या हुई। खालिदा जिया राष्ट्रपति जियाउर रहमान की बीवी थीं, जिनकी 1981 में हत्या हो गई। दोनों एक-दूसरे पर अप्रत्यक्ष रूप से हत्या की साजिश का आरोप लगाती रहीं। हसीना कहती थीं कि जियाउर रहमान मुजीब हत्याकांड से जुड़े थे, जबकि खालिदा अवामी लीग को अपने शौहर की हत्या का जिम्मेदार ठहराती थीं।

लोकतंत्र की बहाली के लिए 1980 के दशक में दोनों महिलाएँ एक साथ दिखीं। उस समय जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद का सैन्य शासन था। खालिदा जिया ने 1984 में बीएनपी की कमान संभाली, जबकि शेख हसीना 1981 में अवामी लीग की नेता बनीं। दोनों ने इरशाद के खिलाफ लोकतंत्र बहाली का आंदोलन चलाया। 1990 में हड़तालों और प्रदर्शनों से इरशाद को सत्ता छोड़नी पड़ी। यह दोनों का एकमात्र साथ था। उसके बाद दुश्मनी शुरू हो गई।

खालिदा जिया ने जीतकर पहली महिला प्रधानमंत्री बनकर हसीना को हराया। इसके बाद दोनों बारी-बारी सत्ता में आईं, जिसमें खालिदा जिया (1991-96 और 2001-06), शेख हसीना (1996-2001 और 2009-2024) तक सत्ता में रहीं।

खालिदा जिया और शेख हसीना में खूनी संघर्ष

साल 1991 में पहला निष्पक्ष चुनाव हुआ। खालिदा जिया की बीएनपी ने जीत हासिल की और वे देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामी दलों का समर्थन मिला। हसीना विपक्ष में रहीं। 1996 में हसीना की अवामी लीग सत्ता में आई। खालिदा ने धांधली का आरोप लगाया। फिर 2001 में खालिदा की बड़ी जीत हुई। इस दौरान दोनों पार्टियाँ एक-दूसरे पर हिंसा और भ्रष्टाचार के आरोप लगाती रहीं।

2004 में हसीना पर ग्रेनेड हमला हुआ, जिसमें कई लोग मारे गए। हसीना ने इसके लिए खालिदा की सरकार को जिम्मेदार ठहराया। खालिदा के बेटे तारेक रहमान पर भी आरोप लगे।

दोनों के बीच वैचारिक मतभेद भी गहरे थे। हसीना सेक्युलरिज्म और भारत के साथ अच्छे रिश्तों की पक्षधर रहीं, जबकि खालिदा इस्लामिक पहचान और बांग्लादेशी राष्ट्रवाद पर जोर देती थीं। उनकी लड़ाई केरटेकर गवर्नमेंट सिस्टम, भ्रष्टाचार आरोप और चुनावी धाँधली के मुद्दों पर केंद्रित रही। 2007 में सैन्य हस्तक्षेप और 2018 में खालिदा को भ्रष्टाचार केस में जेल भी इसी दुश्मनी का नतीजा थी।

साल 2024 में इस्लामी कट्टरपंथियों के समर्थन से हुए कथित छात्र आंदोलन की वजह से शेख हसीना सत्ता से बाहर हो गईं और वो भारत आ गई, जबकि खालिदा जिया अपनी रिहाई के बाद और सक्रिय हो गई। हालाँकि वो बीमार रहीं।

बहरहाल, शेख हसीना और खालिदा जिया की यह प्रतिद्वंदिता बांग्लादेश की राजनीति को दो हिस्सों में बाँटती रही। हड़तालें, ब्लॉकेड और हिंसा आम हो गई। अब खालिदा जिया के जाने से यह दुश्मनी खत्म लगती है। हसीना निर्वासन में हैं, जबकि बीएनपी के तारेक रहमान आगे आ रहे हैं। बांग्लादेश की राजनीति नया मोड़ ले रही है, ऐसे में ‘बैटलिंग बेगम्स’ का अध्याय इतिहास बन गया।

भारत से क्यों नफरत करती थी खालिदा जिया, जड़ में था इस्लाम

खालिदा जिया की भारत विरोधी छवि बांग्लादेश की राजनीति में गहराई से जुड़ी हुई है। कई विश्लेषक उन्हें ‘एंटी-इंडिया’ नेता मानते हैं। लेकिन इसकी जड़ें उनके शौहर जियाउर रहमान की विदेश नीति में हैं। जियाउर रहमान ने बांग्लादेश की विदेश नीति को ‘भारत और पाकिस्तान से समान दूरी’ की नीति पर आधारित किया था।

1971 के मुक्ति युद्ध में भारत ने बांग्लादेश की आजादी में बड़ी भूमिका निभाई थी। शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग भारत की करीबी थी। लेकिन 1975 में मुजीब की हत्या के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ। जियाउर रहमान ने सत्ता संभाली और नीति बदली। वे नहीं चाहते थे कि बांग्लादेश भारत का ‘जूनियर पार्टनर’ बन जाए। उन्होंने भारत की 1971 की मदद को स्वीकार किया, लेकिन देश की संप्रभुता को प्राथमिकता दी। जियाउर रहमान ने पाकिस्तान से संबंध सुधारने शुरू किए, हालाँकि पाकिस्तान ने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था। उन्होंने चीन, सऊदी अरब, अमेरिका और इस्लामी देशों से नजदीकियाँ बढ़ाईं।

इस ‘समदूरी’ नीति का मतलब था- भारत से अच्छे संबंध, लेकिन अत्यधिक निर्भरता नहीं। जियाउर रहमान ने दक्षेस (SAARC) की स्थापना की कल्पना की, ताकि दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग हो और भारत का वर्चस्व कम हो। वे भारत के साथ गंगा जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाते थे। 1977 में जब भारत ने एकतरफा गंगा का पानी रोक लिया, तो जियाउर रहमान ने संयुक्त राष्ट्र और नॉन-अलाइंड मूवमेंट में मामला उठाया, जिससे अंतरराष्ट्रीय दबाव बना और समझौता हुआ।

खालिदा जिया ने अपने शौहर की इसी नीति को आगे बढ़ाया। बीएनपी की विचारधारा में भारत विरोध एक आधारभूत हिस्सा बन गया। विपक्ष में रहते हुए खालिदा जिया ने भारत विरोधी बयानबाजी की। वे अवामी लीग की भारत समर्थक नीतियों की आलोचना करती थीं। उनके शासन में उत्तर-पूर्वी भारत के उग्रवादी समूहों को बांग्लादेश में पनाह मिलने के आरोप लगे। 2001-2006 के कार्यकाल में पाकिस्तान से नजदीकियाँ बढ़ीं और जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामी दलों से गठबंधन किया।

कई घटनाएँ उनकी भारत विरोधी छवि को मजबूत करती हैं। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में विरोध हुआ, लेकिन बीएनपी ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया। 2013 में भारतीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के ढाका दौरे पर खालिदा जिया ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया, जो एक बड़ा कूटनीतिक संकेत था। उनके दौर में सीमा विवाद, पानी बँटवारा और प्रवासियों के मुद्दे पर तनाव रहा।

जानिए- कौन है तारिक रहमान, जो संभालेगा खालिदा जिया की विरासत

हालाँकि, कुछ मौकों पर वे भारत से संवाद करने को तैयार दिखीं। 2012 में उन्होंने भारत का दौरा किया और मनमोहन सिंह से मिलकर उग्रवाद के खिलाफ सहयोग की बात की। लेकिन कुल मिलाकर, बीएनपी की राष्ट्रवादी नीति में भारत को ‘बड़ा पड़ोसी’ के रूप में सतर्कता से देखा जाता था। विश्लेषकों के अनुसार, यह नफरत नहीं, बल्कि मौके की पॉलिटिक्स थी। अवामी लीग भारत को करीबी मानती है, जबकि बीएनपी पाकिस्तान और चीन की ओर झुकाव रखती है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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