16-17 दिसंबर 2025 को बांग्लादेश में जब उस्मान हादी की हत्या की नाराजगी लेकर इस्लामी कट्टरपंथी सड़कों पर उतरे तो उनका ये गुस्सा 18 दिसंबर 2025 को एक दीपू चंद्र दास नाम के हिंदू युवक को मारकर, उसका शव पेड़ पर बाँधकर, शरीर जलाकर शांत हुआ।
Dipu Chandra Das, a garment factory worker, was handed over to a violent Muslim mob by his manager and lynched in full public glare.
— OpIndia.com (@OpIndia_com) December 24, 2025
He was tied to a tree and his body was burnt alive as a message to other Hindus in the country.
The killing was carried out under the false… pic.twitter.com/pinADZu8v1
घटना के बाद दीपू का जला हुआ धड़ और खोपड़ी देखकर उसका परिवार रोता रहा, इंसाफ माँगता रहा लेकिन यूनुस सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। बाद में मीडिया में खबर आई, भारत में विरोध हुआ, सोशल मीडिया पर आवाज उठी, विदेशों से मानवाधिकारों पर प्रश्न हुए तब जाकर अपनी इज्जत बचाने के लिए यूनुस सरकार ने इस पर प्रतिक्रिया देनी उचित समझी।
मीडिया में पहले दो दिन कहा गया कि आरोपितों की गिरफ्तारी हो गई है। करीबन दो दिन तक यही बताया जाता रहा कि कब 7 लोग गिरफ्तार हुए और कब 12। आज इसी दिखावे के क्रम में एक खबर ये भी आई है कि वहाँ यूनुस सरकार के मंत्री अबरार ने दीपू चंद्र दास के परिजनों से मुलाकात की है। कुल मिलाकर मीडिया में माहौल ऐसे बनाया जा रहा है जैसे यूनुस सरकार दीपू चंद्र दास की हत्या को लेकर बहुत चिंतित है और जितना हो सकेगा कार्रवाई करेगी।
हालाँकि इस सरकार की सच्चाई क्या है इसे इन खबरों से मत समझिए… समझना है तो याद करिए बांग्लादेश का बीता डेढ़ साल।
शेख हसीना सरकार को हटाने के लिए कैसे इस्लामी कट्टरपंथियों ने बांग्लादेश की व्यवस्था को पैरों तले रौंद दिया था और खबरें आई थी कि बांग्लादेश में 2000+ से ज्यादा हिंदुओं का उत्पीड़न हुआ है। उस समय भी यही बात सामने आई थी कि एक्शन लिया जाएगा, कार्रवाई होगी, दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा।
कुछ दिन तक यही राग चला और बाद में एक खबर आई कि अगस्त 2024 में छात्र प्रदर्शन के दौरान जिन लोगों पर केस हुए उनपर से मामले को वापस लिया जा रहा है।
ये खबर उन हिंदुओं के लिए बड़ा आघात था जो इस्लामी भीड़ के बीच रहते हुए इस्लामी कट्टरपंथियो से इंसाफ की उम्मीद लगाए बैठे थे। यूनुस सरकार ने एक पल में उस हिंसा को छात्र प्रदर्शन का नाम देकर सब अपराध धो-पोंछकर साफ कर दिया। वहीं उस कथित छात्र प्रदर्शन में शामिल लोगों को कानूनी संरक्षण देने तक की बात कही।

बकायदा बांग्लादेश के गृह मंत्रालय की ओर से आधिकारिक बयान जारी हुआ- “एक नए गैर-भेदभावपूर्ण बांग्लादेश की यात्रा शुरू हो गई है। जो छात्र और नागरिक इस उथल-पुथल में शामिल थे, उन्हें 15 जुलाई से 8 अगस्त के बीच उनके कार्यों के लिए दंड, गिरफ्तारी या परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा।”
अब बताइए क्या सच में बांग्लादेश की यूनुस सरकार जो दिखावा कर रही है कि उन्होंने दीपू चंद्र दास के हत्यारों को पकड़ लिया है, मंत्री उनके परिवार से मिल रहे हैं, उसके कोई भी मायने हैं…?
दीपू चंद्र दास पर सिर्फ इसलिए बोला जा रहा है क्योंकि उसे दिखाकर सवाल खड़े हो रहे हैं। वरना हमेशा याद रखिएगा कि यही सरकार डेढ़ साल से हिंदुओं के हर उत्पीड़न पर सिर्फ चुप है। ये सरकार तब भी मौन थी जब 5 अगस्त 2024 को हुए तख्तापलट के बाद से हिंदुओं पर 2000+ हमलों की खबर आई। ये सरकार तब भी चुप थी जब मोरक्को से इनके खुद के राजदूत हारून अल रशीद ने ये बात स्वीकार की थी कि शेख हसीना की सरकार में बोलने की आजादी का फायदा उठाकर बांग्लादेश में भारत के खिलाफ भड़काया गया। इस सरकार ने उस समय भी एक शब्द नहीं बोला था
- जब इसी साल बांग्लादेश में 26 साल के अर्नब कुमार सरकार की चाय पीते समय सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई थी…।
- जब मोबाइल की दुकान चलाने वाले सुदेब हलदर को बेवजह गला रेतकर मार दिया गया।
- जब कॉक्स बाजार के चकरिया में 8-10 लोगों ने 14 साल की लड़की से गैंगरेप कर दिय।
- जब नरैल में हिंदू महिला बसना मलिक के साथ ऐसी दरिंदगी की गई थी क वह बाद में उल्टियाँ कर करके मर गई।
- जब एक हिंदू पत्रकार सौगात बोस के घर पर हमला हुआ। उसके घरवालों की खोपड़ी फोड़ दी गई। हड्डियाँ तोड़ दी गई और सबको बुरी तरह घायल करके अपराधी फरार हो गए।
1 साल में सैंकड़ों नहीं हजारों घटनाएँ ऐसी हुई हैं जब बांग्लादेश की यूनुस सरकार चाहती तो हिंदुओं के लिए मुखर होकर कड़े एक्शन ले सकती थी, लेकिन ये कभी नहीं हुआ। लगातार हिंदू की हत्याओं की खबरों से मीडिया भरा रहा, मंदिर टूटने की घटनाएँ आती रहीं… मगर यूनुस सरकार शांत रही। इसलिए इस बार मीडिया में आ रहे बयानों से भ्रमित मत होइए।
आपको बरगलाने का, ध्यान भटकाने का ये सिर्फ एक तरीका है। इस्लामी कट्टरपंथियों के आगे झुक चुके बांग्लादेश और उसकी सरकार से हिंदुओं को उम्मीद नहीं लगाना चाहिए। उम्मीद होनी चाहिए तो सिर्फ इतनी कि बांग्लादेश में जो हिंदू शेष हैं वो इन कट्टरपंथियों की आतंक से हमेशा बचे रहें। इन परिवारों पर ऐसी मानसिकता की कभी नजर न पड़े।
बांग्लादेश में हिंदुओं की घटती संख्या
ये चिंता सिर्फ इसलिए है क्योंकि 1971 के बाद से बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी सिर्फ और सिर्फ घटी ही है। 1974 में हुई जनगणना के अनुसार बांग्लादेश में हिंदू कुल आबादी का 13.5% फीसद थे। 1981 2001 में 9.3% और 2011 की जनगणना में 8.5% हो गई।
सिर्फ मीडिया में आती खबरें ही नहीं, आँकड़े भी यही बताते हैं कि बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ से अल्पसंख्यक हिंदू वैसे ही परेशान है जैसे पाकिस्तान में है। इस इस्लामी मुल्क में एक तरफ जहाँ लगातारा हिंदुओं की आबादी घटी है वहीं मुस्लिमों की आबादी में लगातार इजाफा हुआ है। 1974 में इनकी आबादी 85.4% थी और अब ये 91.5% हो गई


