संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNSC) में भारत ने एक बार फिर कोई नई बात नहीं कही, बल्कि वही बात दोहराई जिसे वह शुरू से कहता आ रहा है। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार निशाने पर पाकिस्तान ही नहीं, भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव रुकवाने का दावा करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी रहे। क्योंकि भारत ने ट्रंप के इस दावे को कभी नहीं माना। UN के मंच से साफ शब्दों में यह जता दिया गया कि भारत अपने फैसले खुद लेता है, किसी के दबाव में नहीं आता और न ही किसी को श्रेय बाँटने की राजनीति करता है।
यह पूरा मामला संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की ओपन डिबेट का है, जिसका विषय था- ‘अंतरराष्ट्रीय विधि के शासन की पुन: पुष्टि शांति, न्याय और बहुपक्षवाद को पुनर्जीवित करने के मार्ग।’ इसमें बात अंतरराष्ट्रीय कानून, शांति और बहुपक्षीय व्यवस्था की हो रही थी। लेकिन पाकिस्तान ने इस मंच को इस्तेमाल भी वही पुरानी चाल चलने के लिए किया- भारत पर आरोप, खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश और आतंकवाद के मुद्दे से ध्यान भटकाने की कवायद।
इसी बहस में पाकिस्तान की ओर से उसके UN प्रतनिधि आसिम इफ्तिखार अहमद ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर बयान दिया। अहमद ने यह जताने की कोशिश की कि भारत ने हालात को बिगाड़ा, सैन्य तनाव बढ़ाया और क्षेत्रीय शांति को खतरे में डाला। उनकी पूरी स्पीच इसी नैरेटिव पर टिकी थी कि पाकिस्तान किसी आक्रामक कार्रवाई का शिकार हुआ और भारत ने अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी की। यह बयान दरअसल कोई नई बात नहीं थी, बल्कि वही पुराना पाकिस्तान-स्टाइल बचाव था, जिसमें सच्चाई से ज्यादा शोर होता है।
इसके तुरंत बाद भारत की तरफ से UN के स्थायी प्रतिनिधि पर्वतनेनी हरीश ने जवाब दिया और बहस की दिशा ही बदल दी। उनके शुरुआती शब्द थे, “मैं अब सुरक्षा परिषद के निर्वाचित सदस्य और पाकिस्तान के प्रतिनिधि की टिप्पणियों का जवाब दे रहा हूँ, जिनका एकमात्र उद्देश्य मेरे देश और मेरे लोगों को नुकसान पहुँचाना है। उन्होंने पिछले साल मई में चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर का झूठा और स्वार्थपूर्ण विवरण प्रस्तुत किया है।”
पाकिस्तान की सीजफायर की गुहार की बात दोहराई
पर्वतनेनी हरीश ने साफ शब्दों में कहा कि ऑपरेशन सिंदूर को लेकर पाकिस्तान जो कहानी सुना रहा है, वह झूठी, भ्रामक और अपने फायदे के लिए गढ़ी गई है। हरीश ने कहा कि पाकिस्तान को भारत के आतंरिक मामलों, खासकर जम्मू-कश्मीर पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि वही देश दशकों से सीमापार आतंकवाद को ‘न्यू नॉर्मल’ नीति के तौर पर इस्तेमाल करता आया है।
हरीश ने यह भी स्पष्ट किया कि ऑपरेशन सिंदूर कोई युद्ध नहीं था, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ भारत का नपा-तुला, जिम्मेदार और सीमित जवाब था। भारत का उद्देश्य न तो हालात को भड़काना था और न ही किसी तरह की अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को न्योता देना था। उन्होंने रिकॉर्ड पर यह तथ्य रखा कि ऑपरेशन के बाद भी पाकिस्तान कई दिनों तक भारत को धमकाता रहा, लेकिन जब उसे यह समझ आया कि वह इस स्थिति को संभाल नहीं सकता, तब 10 मई 2025 को खुद पाकिस्तानी सेना ने भारत से सीजफायर की गुहार लगाई।
यहीं पर पूरा नैरेटिव पलट जाता है। क्योंकि जब भारत यह कहता है कि लड़ाई रोकने की पहल पाकिस्तान की तरफ से हुई, तो डोनाल्ड ट्रंप के वे तमाम दावे अपने आप कठघरे में आ जाते हैं। ट्रंप बार-बार यह कहते रहे हैं कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव रुकवाया। भारत ने न तब इसका समर्थन किया और न अब। UN के मंच से भारत ने बिना किसी का नाम लिए यह साफ कर दिया कि सीजफायर किसी तीसरे देश के दबाव या मध्यस्थता से नहीं, बल्कि पाकिस्तान की मजबूरी से हुआ था।
ट्रंप के सीजफायर के दावे खारिज, अंतरराष्ट्रीय दबाव में नहीं आता भारत
अगर डोनाल्ड ट्रंप की बात करें, तो वे हर बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम में खुद को निर्णायक खिलाड़ी के तौर पर पेश करते हैं। भारत-पाकिस्तान तनाव भी इससे अलग नहीं रहा। पिछले कुछ समय में ट्रंप बार-बार सार्वजनिक मंचों, इंटरव्यू और राजनीतिक भाषणों में यह दावा करते हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव रुकवाया।
लेकिन भारत ने कभी इस दाने को स्वीार नहीं किया। न सरकार ने, न विदेश मंत्रालय ने और न ही किसी आधिकारिक मंच पर। भारत ने जानबूझकर ट्रंप को श्रेय नहीं दिया, क्योंकि सच्चाई यह थी कि सीजफायर किसी तीसरे देश के दबाव या मध्यस्थता से हुआ ही नहीं था। और यहीं से ट्रंप की बेचैनी शुरू होती है।
इसके बाद भी ट्रंप की टैरिफ की धमकियाँ, भारत के खिलाफ बयानबाजी वगैरह देखने को मिला। लेकिन भारत नहीं झुका। वह आज भी उसी बयान पर टिका है कि सीजफायर में ट्रंप का हाथ नहीं, बल्कि पाकिस्तान की गुहार थी। भारत ने दुनिया को संदेश दिया कि भारत अपने फैसले खुद लेता, न कि किसी विदेशी ताकतों के कहने पर।
UN में भी भारत ने वही बात दोहराई कि वह अपने फैसले खुद लेता है और श्रेय की राजनीति का हिस्सा नहीं बनता है। इस तथ्य से ट्रंप के तमाम दावे अपनेआप ढह जाते हैं। अगर लड़ाई रोकने की गुहार पाकिस्तान ने लगाई औऱ फैसला भारत ने अपने विवेक से लिया, तो फिर किसी तीसरे देश के ‘युद्ध रुकवाने’ का दावा महज राजनीतिक आत्मप्रचार बनकर रह जाता है। UN में भारत ने यही बात बेहद सधे, लेकिन बेहद साफ शब्दों में दुनिया के सामने रख दी।
विपक्ष का भ्रम धाराशाही
यह पूरा तथ्य सिर्फ पाकिस्तान या ट्रंप तक सीमित नहीं था, बल्कि भारत के भीतर चल रही सियासी बहस पर भी सीधा हमला करता है। UN में भारत का यह स्पष्ट बयान विपक्षी दलों की उस सियासी छतरी में भी छेद करता है, जिसके नीचे बैठकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाया जाता रहा है। खासकर कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी का वो ‘नरेंद्र-सरेंडर‘ वाले भ्रम को धाराशाही करता है।
याद करना जरूरी है कि यही कॉन्ग्रेस थी, जिसके शासन में देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर 26/11 जैसे आतंकी हमले हुए। सैंकड़ों लोग मारे गए, लेकिन तब UPA सरकार में भारत का जवाब क्या था? इन्हीं लोगों ने तब विदेशी ताकतों के दबाव में आकर पाकिस्तान पर हमला नहीं किया।
आज वही विपक्ष में आकर प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल करते हैं कि उन्होंने ट्रंप की बयानबाजी का तुरंत जवाब क्यों नहीं दिया। उन्हें यह समझने में दिक्कत होती है कि हर प्रतिक्रया कैमरे के सामने दी जाने वाली नहीं होती। मोदी सरकार ने जो किया, वह करके दिखाया। मोदी सरकार में जब-जब भारत पर हमला हुआ, तो जवाब दिया गया। चाहे वह उरी सर्जिकल स्ट्राइक हो या ऑपरेशन सिंदूर।
इसीलिए यह सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंच पर दिया गया बयान नहीं था। यह भारत की आंतरिक राजनीति को संदेश भी था। विपक्ष चाहे कितना भी शोर मचा ले कि सीजफायर ट्रंप के कहने पर हुआ है, पर मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह भ्रम तोड़ दिया है। अब न फैसले विदेशी ताकतों के दबाव में होते हैं, बल्कि भारत के अपने आकलन पर होते हैं।


