Sunday, July 21, 2024
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3500 मंदिर तोड़े, 2400 महिलाओं का बलात्कार और नंगा करके परेड… बांग्लादेश में बाबरी से पहले ही शुरू हो गया था आतंक, पुलिस के सामने आग लगा रही थी इस्लामी भीड़

रिपोर्ट में कहा गया कि 1989-90 में बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ जो हिंसा हुई उसे दंगा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये एक ही पक्ष द्वारा किया गया था 1964 की तरह। इन अत्याचारों में तब की सत्ताधारी पार्टियाँ भी शामिल थीं।

6 दिसंबर, 1992 – ये वो तारीख़ है जिसकी बरसी हर साल हिन्दू संगठनों द्वारा ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। हालाँकि, हिन्दू विरोधी इस दिन हिन्दुओं को ये एहसास दिलाने की कोशिश करते हैं कि उन्होंने एक दूसरे मजहब के इबादतगाह को ध्वस्त कर दिया। जबकि सचाई ये है कि उस ढाँचे को इस्लामी आक्रांताओं द्वारा राम मंदिर को ध्वस्त कर के बनवाया गया है। इस दौरान यही वामपंथी-लिबरल गिरोह ये भूल जाता है कि जब हिन्दू राम मंदिर के लिए संघर्ष कर रहे थे, उस दौरान बांग्लादेश में क्या हो रहा था।

असल में राम मंदिर के लिए जब भारत में संघर्ष चल रहा था और बाबरी ढाँचे के ध्वस्त होने की अफवाह भर फैली थी, तभी बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा शुरू हो गई थी। हिन्दुओं ने तो 5 शताब्दी तक संघर्ष कर के न्यायिक रास्ते से राम मंदिर का अधिकार प्राप्त किया, लेकिन इस्लामी भीड़ नियम-कायदे नहीं मानती है। 2 नवंबर, 1989 – ये वो दिन था जब प्रतीकात्मक रूप से राम मंदिर के लिए पहला पत्थर उस विवादित स्थल पर रखा गया था।

जैसे ही बांग्लादेश में इसकी खबर पहुँची, वहाँ हिंसा शुरू हो गई। अक्टूबर 1990 में ही बांग्लादेश की मीडिया द्वारा ये अफवाह फैला दी गई थी कि भारत में बाबरी ढाँचे को ध्वस्त कर दिया गया है। वहाँ की मीडिया ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई। बांग्लादेश में उस समय कैसा माहौल था उसे इसी से समझ सकते हैं कि 1988 में तत्कालीन तानाशाह राष्ट्रपति हुसैन मुहम्मद इरशाद ने इस्लाम को बांग्लादेश का आधिकारिक मजहब घोषित कर दिया। अब आते हैं 30 अक्टूबर, 1990 वाले दिन।

इरशाद उस दिन ‘बंग भवन’ में एक यूथ कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। वो कह रहे थे कि जब वो वो वहाँ हैं अल्पसंख्यकों के खिलाफ कोई हिंसा नहीं होगी। ठीक उसी समय कट्टरपंथी मुस्लिमों की भीड़ हिन्दुओं की दुकानों पर हमले कर रही थी। भीड़ ने गौरी मठ को निशाना बनाया। जो ‘बंग भवन’ के दक्षिण में स्थित था। यानी, इरशाद के कार्यक्रम से कुछ किलोमीटर की दूरी पर हिन्दुओं से जुड़ी संपत्तियों को आग के हवाले किया जा रहा था। ‘ह्यूमन राइट्स कॉन्ग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (HRCBM)’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ये सब पुलिस-प्रशासन के सामने हुआ।

रिपोर्ट में कहा गया कि 1989-90 में बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ जो हिंसा हुई उसे दंगा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये एक ही पक्ष द्वारा किया गया था 1964 की तरह। इन अत्याचारों में तब की सत्ताधारी पार्टियाँ भी शामिल थीं। 1992 में सत्ताधारी पार्टी BNP (बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी) का साथी जमात-ए-इस्लामी खुद हिंसा में शामिल था। रिपोर्ट में बताया गया है कि सिर्फ 1989-90 में 1000 से ज़्यादा महिलाओं का बलात्कार हुआ, सैकड़ों मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया और हिन्दू अल्पसंख्यकों के घरों को लूट कर आग के हवाले कर दिया गया।

6 दिसंबर, 1992 की रात को तो चटगाँव में हिन्दुओं के खिलाफ आतंक का नंगा नाच हुआ। कुतुब्दीया में 3 बच्चों को ज़िंदा जला दिया गया। इसके बाद राजधानी ढाका और मुल्क के अन्य हिस्सों में हिंसा फैली। HBCUC (हिन्दू, बौद्ध, क्रिस्चियन यूनिटी काउंसिल) ने ग्राउंड पर दौरा कर के रिपोर्ट तैयार की थी और नुकसान का पता लगाया था। इस रिपोर्ट में सामने आया था कि हिन्दुओं के 28000 घरों, 3500 मंदिरों/धार्मिक संस्थानों और 2500 व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को या तो नुकसान पहुँचाया गया था या उन्हें पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया था।

इस रिपोर्ट की मानें तो 15 लोगों की हत्या कर दी गई थी और 2400 हिन्दू महिलाओं का बलात्कार हुआ था। सरकार ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए न तो कोई प्रयास किया और न ही इस्लामी कट्टरपंथियों को रोकने की कोई कोशिश की। अनुमान लगाया गया था कि हिन्दुओं के 14.80 करोड़ टका की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। उस समय ये 46.25 लाख डॉलर के करीब होगा, जिसकी वैल्यू आज की तारीख़ में 39 करोड़ रुपए के आसपास होगी।

ओल्ड ढाका स्थित शंखरी बाजार में तो हिन्दुओं की एक भी दुकान को नहीं छोड़ा गया था। सिलहट जिले में तो अल्पसंख्यकों के साथ ऐसा बुरा बर्ताव हुआ कि उनकी आने वाली कई पीढ़ियों को ये याद रहेगा। भोला से तत्कालीन सांसद तौफ़ीद अहमद और ‘ऑल पार्टी अलायंस’ के सेक्रेटरी नरुल इस्लाम नाहिद का मानना था कि ऊपर जो आँकड़े हैं, वो कम ही थे। मतलब अत्याचार इससे ज़्यादा हुआ था। महिलाओं के साथ न सिर्फ सामूहिक बलात्कार हुआ था, बल्कि उन्हें सड़क पर नग्न चलने के लिए बाध्य कर दिया गया था।

कई कम उम्र की लड़कियों का भी बलात्कार हुआ, जिनमें 5 साल की लड़कियाँ भी शामिल थीं। कुछ गाँवों में तो 5 साल से लेकर 70 साल तक की किसी भी महिला को नहीं छोड़ा गया था। तस्लीमा नसरीन ने अपने उपन्यास ‘लज्जा’ में भी इसका जिक्र किया है कि कैसे 1992 में ढाकेश्वरी मंदिर पर हमला किया गया था। मुख्य मंदिर को फूँक दिया गया। देवी-देवताओं के मनोरंजन के लिए बने ‘नाटमंदिर’ को भी आग के हवाले कर दिया गया। मंदिर के पास स्थित श्रीदम घोष को भी जला दिया गया।

माधव गुड़िया मठ को भी ध्वस्त कर दिया गया। जयकाली मंदिर को भी नहीं छोड़ा गया। ब्रह्मो समाज के परिसर में घुस कर सब कुछ तबाह कर दिया गया। डेमरा में शोणि अखाड़ा मंदिर को लूट लिया गया। बृहभद्र और लोकी बाजार में जहाँ तक नज़र जाती थी तबाही ही दिखती थी। इस्लामपुर रोड पर छाता और आभूषण बेचने वाले दुकानों को लूट लिया गया। 300 आतंकियों ने मिल कर 25 घरों को निशाना बनाया। कई हिंदू दुकानों के नाम को उर्दू नामों से बदल दिया गया।

लेखिका तस्लीमा नसरीन ने इन घटनाओं का जिक्र ‘लज्जा’ में किया है। वो लिखती हैं कि कैसे नोबाबपुर रोड पर स्थित ‘मोरोचंद’ नाम की एक मिठाई की दुकान को तोड़ डाला गया। साथ ही रयेर बाजार स्थित माँ काली के मंदिर में उनकी प्रतिमा को तोड़ कर जमीन पर गिरा दिया गया। ठठरी बाजार में बट्टाली मंदिर को तबाह कर के लूट लिया गया। नोबाबपुर में ‘कामधोन पोशारी’ और ‘शुक्ल मिष्ठान्न भण्डार’ जैसी दुकानों को लूट लिया गया। जतिन एन्ड कंपनी की एक फैक्ट्री को ही आग के हवाले कर दिया गया।

सोडोरघट रोड पर स्थित रतन शंकर बाजार को पूरी तरह तबाह कर दिया गया। इसी तरह नाग देवता के मंदिर को धूल में मिला दिया गया। तस्लीमा नसरीन लिखती हैं कि ये दंगे नहीं थे, क्योंकि दंगा में दोनों पक्ष झगड़ते हैं। जबकि ये एक पक्ष द्वारा दूसरे समुदाय पर अत्याचार था। क्या आपने बाबरी पर हंगामा मचाने वालों को कभी इस तबाही का जिक्र करते हुए देखा है? जिस इस्लामी भीड़ ने बांग्लादेश में 1989-92 में ये तबाही मचाई, हिन्दुओं पर प्रताड़ित किया – इस पर बात क्यों नहीं की जाती है।

लालबाग रोड पर स्थित दुर्गा मंदिर, पुष्पराज साहा लेन पर स्थित गिरीगोवर्धन जीतू मंदिर, हरनाथ घोष लेन पर स्थित रघुनाथ जिउ अखाड़ा और लालबाग़ स्थित कमरांगीचर शमशान – इन सभी को 1990 में ही बर्बाद कर दिया गया था। भारतीय दूतावास की तरफ हजारों मुस्लिमों ने मार्च किया। इसी भारत ने बांग्लादेश को आज़ादी दिलाई थी। उस दौरान सूत्रपुर में 14 मंदिरों को ध्वस्त किया गया था। नगर बेलटोली लेन में 17 हिन्दुओं को चाकू घोंप दिया गया था।

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अनुपम कुमार सिंह
अनुपम कुमार सिंहhttp://anupamkrsin.wordpress.com
भारत की सनातन परंपरा के पुनर्जागरण के अभियान में 'गिलहरी योगदान' दे रहा एक छोटा सा सिपाही, जिसे भारतीय इतिहास, संस्कृति, राजनीति और सिनेमा की समझ है। पढ़ाई कम्प्यूटर साइंस से हुई, लेकिन यात्रा मीडिया की चल रही है। अपने लेखों के जरिए समसामयिक विषयों के विश्लेषण के साथ-साथ वो चीजें आपके समक्ष लाने का प्रयास करता हूँ, जिन पर मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा वर्ग पर्दा डालने की कोशिश में लगा रहता है।

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