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‘द वायर’ के समर्थन में आई PM मोदी से बदसलूकी करने वाली नार्वे की प्रोपेगेंडाबाज हेले लिंग: जानें- कैसे विदेशी ‘एक्टिविस्ट’ और वामपंथी मीडिया मिलकर दे रहे भारत विरोधी नैरेटिव को हवा

चीन समर्थक नॉर्वे की तथाकथित 'पत्रकार' हेले लिंग द्वारा वामपंथी दुष्प्रचार पोर्टल 'द वायर' का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया है। यह पोर्टल भारत के खिलाफ गलत सूचना फैलाने और राजनीतिक रूप से प्रेरित बयानबाजी को बढ़ावा देने के लिए कुख्यात है।

PM मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान एक पब्लिसिटी स्टंट करके सुर्खियाँ बटोरने वाली नॉर्वे की तथाकथित ‘पत्रकार’ हेले लिंग ने वामपंथी प्रोपेगैंडा आउटलेट ‘द वायर’ का समर्थन किया है। उन्होंने भारत से जुड़ी जानकारी के लिए एक भरोसेमंद स्रोत के तौर ‘द वायर’ को माना है। इस समर्थन से ये साफ हो गया है कि पीएम मोदी के दौरे के दौरान नॉर्वे में जो हेले लिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से बदसलूकी थी, उसकी पटकथा पहले ही राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने के लिए वामपंथी प्रोपेगेंडाबाजों ने लिख रखी थी

हेले लिंग के ‘द वायर’ को दिए गए समर्थन ने एक बार फिर इस बात की चर्चा छेड़ दी है कि भारत का वाम-उदारवादी मीडिया तंत्र विदेशी टिप्पणीकारों और प्रकाशनों का उपयोग करके भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों और नेतृत्व को निशाना बनाने वाले दुष्प्रचार को बढ़ावा देता है।

ताजा विवाद तब शुरू हुआ जब द वायर ने शुक्रवार, 29 मई को X पर अपनी स्थापना के 11 साल पूरे होने का जश्न मनाते हुए एक पोस्ट किया, जबकि टेक फॉग और मेटा जैसे विवादों में भी यह पत्रिका फर्जी खबरों और गलत सूचनाओं से घिरी रही है। इस पोस्ट को साझा करते हुए नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग ने लिखा, “मैं द वायर की जितनी भी तारीफ करूँ कम है। भारत के बारे में पढ़ने के लिए मैं आगे भी इस पर ही भरोसा करूँगी।”

इस पोस्ट ने तुरंत लोगों का ध्यान आकर्षित किया, क्योंकि लिंग खुद इस महीने की शुरुआत में भारत को बदनाम करने की कोशिश कर चुकी हैं। उन्होंने जबरदस्ती प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए पीएम मोदी को परेशान करने की कोशिश की।

हेले लिंग कौन हैं, और वह अचानक इतनी प्रसिद्ध क्यों हो गईं?

नॉर्वेजियन प्रकाशन डैग्सविसन के साथ काम करने वाली हेले लिंग 18 मई तक सोशल मीडिया पर कोई नहीं जानता था। काफी कम उनके फॉलोवर्स थे। उन्होंने भारत-नॉर्वे के संयुक्त बयान कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी से बदसलूकी की।

उस समय, X पर लिंग के मुश्किल से 800 फॉलोअर्स थे, और उनका अकाउंट महीनों से निष्क्रिय था। हालांकि, भारत में कथित ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ के संबंध में प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछने को लेकर वामपंथी मीडिया काफी उत्साहित दिखा। घटना के वीडियो भारतीय विपक्षी हलकों और वाम-उदारवादी सोशल मीडिया नेटवर्क पर तेजी से वायरल किया गया।

संयुक्त बयान के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी बिना कोई जवाब दिए चले गए, तो लिंग ने चिल्लाकर कहा, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवाल का जवाब क्यों नहीं देते?” बाद में उन्होंने गर्व से ऑनलाइन पोस्ट किया कि उन्हें उनसे जवाब की उम्मीद भी नहीं थी।

इसके तुरंत बाद वह मोदी विरोधी टिप्पणीकारों और मीडिया में छा गई। कई विपक्षी नेताओं ने भी उनके वीडियो को खूब प्रचारित किया। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने क्लिप साझा करते हुए लिखा, “जब छिपाने के लिए कुछ नहीं होता, तो डरने के लिए भी कुछ नहीं होता।”

(साभार-एक्स)

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा और प्रचारक राणा अय्यूब ने भी लिंग की सराहना की। राणा अय्यूब ने पोस्ट किया, “प्रधानमंत्री मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान भारतीय लोकतंत्र का प्रदर्शन देखने को मिला।”

नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास ने बाद में स्पष्ट किया कि यह भारत और नॉर्वे के प्रधानमंत्रियों का संयुक्त बयान था। पत्रकारों के सवाल जवाब और मीडिया ब्रीफिंग शाम में विदेश मंत्रालय को करना पहले से तय था।

लिंग की अचानक भारत में बढ़ी दिलचस्पी

खास बात यह है कि लिंग ने पहले भारत को गहराई से अध्ययन भी नहीं किया था। भारत पर उसकी अधिकांश कवरेज टैरिफ, व्यापार या भूकंप जैसी सामान्य वैश्विक घटनाओं से जुड़ी थी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान वह अचानक भारत के लोकतंत्र और राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल उठाने लगी। खबरों को आक्रामक रूप से प्रकाशित करना शुरू कर दिया।

आलोचकों ने लिंग की सोशल मीडिया गतिविधियों की भी जानकारी दी। मई 2026 में उसने विवाद पर सोशल मीडिया में बहस से ठीक पहले, एक्स प्रीमियम वेरिफिकेशन खरीदा था। इससे साबित होता है कि उनके इर्द-गिर्द फैला वायरल अभियान स्वाभाविक नहीं था और इसे राजनीतिक संदेश के लिए सुनियोजित तरीके से बढ़ाया गया था। भारत की राजनीति और लोकतंत्र में अचानक गहरी दिलचस्पी दिखाने से पहले उन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर भारत के बारे में शायद ही कोई पोस्ट किया था, जिससे इस बात को लेकर अटकलें तेज हो गईं कि भारतीय मामलों पर उनकी इस नई सक्रियता के पीछे कौन या क्या हो सकता है।

(साभार-एक्स)

विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने लिंग को करारा जवाब दिया

नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास ने बाद में लिंग को विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित आधिकारिक मीडिया ब्रीफिंग में आमंत्रित किया । इस बातचीत के दौरान, लिंग ने एक बार फिर लोकतंत्र और मानवाधिकारों से संबंधित जटिल प्रश्न पूछकर भारतीय अधिकारियों को घेरने का प्रयास किया।

हालाँकि, विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज ने दृढ़ता से जवाब दिया और उन्हें बार-बार याद दिलाया कि जब वह जवाब दे रहे हों तो उन्हें बीच में दखल नहीं देना चाहिए।

जॉर्ज ने कहा, “आपने मुझसे सवाल पूछा है, मुझे इसका जवाब देने दीजिए,”

जब लिंग ने बार-बार टोकना जारी रखा, तो उन्होंने कहा, “कृपया मुझे बीच में न टोकें। यह मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस है।”

जॉर्ज ने भारत के संवैधानिक ढाँचे, व्यापक मतदाता भागीदारी और कोविड महामारी और जी20 की अध्यक्षता के दौरान देश के वैश्विक योगदान का हवाला देते हुए भारत की लोकतांत्रिक साख का बचाव किया।

उन्होंने कहा, “हमें इस बात पर गर्व है कि हम 5000 साल पुरानी सभ्यता वाला देश हैं।”

उन्होंने चुनिंदा रिपोर्टिंग को लेकर भी कहा, “लोग कुछ अज्ञानी और नासमझ गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रकाशित एक-दो समाचार रिपोर्ट पढ़ते हैं और फिर आकर सवाल पूछते हैं। चिंता मत कीजिए। हमें लोकतंत्र होने पर गर्व है।”

जब तक जॉर्ज ने अपना विस्तृत जवाब पूरा किया, तब तक खबरों के अनुसार लिंग कमरे से बाहर जा चुकी थी।

फर्जी खबरें फैलाने और मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने में उस्ताद है ‘द वायर’

हेले लिंग ने द वायर का समर्थन किया है। उसके ताजा बयान से ‘द वायर’ की पत्रकारिता से जुड़े रिकॉर्ड की आलोचना फिर से तेज हो गई है। पिछले कई वर्षों से, द वायर पर भ्रामक रिपोर्टें, अधूरी पुष्टि वाली खबरें और भारतीय सरकार तथा हिंदू संगठनों को निशाना बनाने वाली राजनीतिक रूप से प्रेरित कहानियाँ प्रकाशित करने के आरोप लगते रहे हैं।

यह प्लेटफॉर्म अक्सर तथ्यात्मक रिपोर्टिंग के बजाय कथा-निर्माण को प्राथमिकता देता है, खासकर संवेदनशील सांप्रदायिक या राजनीतिक मुद्दों में। इस प्रकाशन को पहले भी कई विवादास्पद रिपोर्टों के लिए कानूनी नोटिस, मानहानि के मुकदमे और सार्वजनिक खंडन का सामना करना पड़ा है।

इसके सबसे चर्चित विवादों में से एक गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह को निशाना बनाने वाली एक रिपोर्ट से जुड़ा था। इस रिपोर्ट के कारण द वायर के खिलाफ 100 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा दायर किया गया।

एक और बड़ा विवाद तब हुआ, जब इस प्लेटफॉर्म ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल पर पीरामल समूह में निवेश को लेकर वित्तीय गड़बड़ी का आरोप लगाया गया। इसमें दावा किया गया था कि उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय को पूरी तरह से अंधेरे में रखा।

पीरामल समूह ने तुरंत एक आधिकारिक बयान जारी कर रिपोर्ट को ‘पूरी तरह से निराधार’ और ‘सिद्धांतहीन’ बताया। स्वतंत्र मीडिया निगरानी संस्थाओं ने बाद में रिपोर्ट में वित्तीय गडबड़ी की बात को हटा कर संरचनात्मक अनियमितता की बात की। पोर्टल ने शिरडी इंडस्ट्रीज नामक एक डिफॉल्टिंग कंपनी के बारे में रोहिणी सिंह द्वारा लिखे गए एक लेख में गोयल पर फिर से निशाना साधा, लेकिन बुनियादी तथ्य-जाँच से पता चला कि संबंधित कॉर्पोरेट ऋण गोयल के सार्वजनिक पद संभालने से वर्षों पहले लिए गए थे।

केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) ने भी अतीत में अडानी समूह के बारे में ‘तथ्यात्मक और कानूनी रूप से गलत’ रिपोर्टिंग के लिए द वायर की सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी।

इस प्लेटफॉर्म को इससे जुड़े कुछ पत्रकारों और टिप्पणीकारों के आचरण और रिपोर्टिंग शैली के लिए भी बार-बार आलोचना का सामना करना पड़ा।

यह प्रकाशन वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग की बजाय कथा गढ़ने को प्राथमिकता देने की अपनी आदत के लिए जाना जाता है, खासकर जब बात मुस्लिम समुदाय के सदस्यों द्वारा किए गए जघन्य अपराधों की हो। वर्षों से यह संगठन लगातार ऐसी घटनाओं को छिपाने का प्रयास करता रहा है अक्सर अपराधियों को पीड़ित और वास्तविक पीड़ितों को हमलावर के रूप में पेश करता है।

यह पैटर्न नया नहीं है। 2002 के गोधरा नरसंहार और 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों से लेकर उदयपुर में कन्हैयालाल की क्रूर हत्या तक, ‘द वायर’ का इतिहास रहा है कि वह प्रतिक्रियावादी हिंदू आक्रोश को उन इस्लामी हमलों से कहीं बड़ा खतरा बताता है, जिन्होंने असल में आक्रोश को जन्म दिया था।

समन्वय और वैश्विक कथा-निर्माण से संबंधित प्रश्न

हेले लिंग ने जिस तरह से द वायर पर अपना विश्वास जताया है। इससे ये सवाल उठ रहा है कि कैसे कुछ अंतरराष्ट्रीय प्रचारक, तथाकथित पत्रकार और द वायर और न्यूजलॉन्ड्री जैसे वामपंथी भारतीय मीडिया के कुछ वर्ग मिलकर अक्सर भारत विरोधी आख्यानों को बढ़ावा देते हैं।

नॉर्वे यात्रा के दौरान कुछ भारतीय पत्रकारों और लिंग के बीच आपसी साँठगाँठ पर भी सवाल उठाए गए। लिंग ने हिंदू पत्रकार सुहासिनी हैदर से जुड़े वीडियो साझा किए, वहीं हैदर ने भी लिंग के वीडियो को ऑनलाइन प्रसारित किया।

इस तरह की घटनाएँ दर्शाती हैं कि कैसे भारत-विरोधी प्रोपेगेंडा प्रचारित करने वाले वैश्विक संस्थाएँ और लोग चुनिंदा भारतीय मीडिया प्लेटफार्मों पर तेजी से निर्भर होते जा रहे हैं।

द वायर और इसी तरह के कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म अक्सर उन विदेशी टिप्पणीकारों के लिए संदर्भ बिंदु बन जाते हैं जो वैश्विक मंच पर भारत को निशाना बनाना चाहते हैं।

इसलिए लिंग के समर्थन को लेकर खड़ा विवाद महज एक सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं रह गया है। यह एक व्यापक तंत्र को दर्शाता है जहाँ विदेशी टिप्पणीकार, विपक्षी राजनेता, सक्रिय पत्रकार और वैचारिक मीडिया मंच मिलकर भारत की छवि और संस्थानों के खिलाफ वैश्विक स्तर पर बयानबाजी करते हैं।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Shriti Sagar
Shriti Sagar
Journalist

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