Monday, September 21, 2020
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ऑपइंडिया के संपादकों और सीईओ के खिलाफ FIR पर SC की रोक, बंगाल सरकार से माँगा जवाब: मामले की पूरी डिटेल

पोर्टल पर पश्चिम बंगाल से संबंधित तीन अलग-अलग समाचार लेखों के संबंध में एफआईआर दर्ज की गई थी। इन्हें अन्य मीडिया संस्थानों ने भी प्रकाशित किया था। लेकिन ममता बनर्जी सरकार ने रिपोर्टों के लिए विशेष तौर पर केवल ऑपइंडिया को निशाना बनाया।

ऑपइंडिया पर प्रकाशित रिपोर्टों को लेकर पश्चिम बंगाल की सरकार ने चार लोगों पर तीन एफआईआर दर्ज की थी। इन पर शुक्रवार (जून 26, 2020) को सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी।

जिन पर एफआईआर दर्ज किया गया था, उनमें से तीन ऑपइंडिया से संबद्ध हैं। ये हैं वेबसाइट के सीईओ राहुल रौशन, अंग्रेजी की संपादक नुपूर शर्मा और हिंदी के संपादक अजीत भारती। एफआईआर में वैभव शर्मा का भी नाम है। वे नुपूर शर्मा के पति हैं। लेकिन उनका वेबसाइट से कोई संबंध नहीं है।

जस्टिस संजय किशन कौल और बीआर गवई की अवकाश पीठ ने शुक्रवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए चारों लोगों की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया।

इस आदेश के साथ ही पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार को भी नोटिस जारी किया। पोर्टल पर पश्चिम बंगाल से संबंधित तीन अलग-अलग समाचार लेखों के संबंध में एफआईआर दर्ज की गई थी। इन्हें अन्य मीडिया संस्थानों ने भी प्रकाशित किया था। लेकिन ममता बनर्जी सरकार ने रिपोर्टों के लिए विशेष तौर पर केवल ऑपइंडिया को निशाना बनाया।

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अपनी याचिका में चारों याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि पश्चिम बंगाल सरकार राज्य पुलिस का दुरुपयोग कर ईमानदार मीडिया समूह को धमकी देकर, डाँट-डपटकर, झूठ बोलकर अवैध सेंसरशिप लगाने की कोशिश कर रही है।

याचिका में कहा गया था, “ राज्य की यथास्थिति को जनता के संज्ञान में लाने वाली मीडिया रिपोर्ट्स को डिलीट करने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार और उनकी कोलकाता पुलिस एफआईआर और क्रूर पुलिस शक्तियों का दुरुपयोग करके न केवल पत्रकारों को डराने, धमकाने का काम कर रही है, बल्कि परिवार के वरिष्ठ सदस्यों को भी डरा धमकाकर शर्मिंदा कर रही है।”

याचिका में कहा गया था कि पुलिस ने याचिकाकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से डराने और परेशान करने के लिए सीआरपीसी की धारा 41 ए का प्रयोग कर उन्हें नोटिस भेजा। इतना ही नहीं, याचिकार्ताओं के कई अनुरोधों के बाद भी पुलिस ने एफआईआर की कॉपी उनके साथ साझा नहीं की और न ही उसे अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किया, जो कि सु्प्रीम कोर्ट के नियमों का उल्लंघन है।

इस संबंध में सबसे पहला केस ऑपइंडिया पर 14 मई को प्रकाशित एक खबर को लेकर हुआ था। इसमें भाजपा नेता व केंद्रीय मंत्री देबाश्री चौधरी के बयान का उल्लेख और टीएमसी नेताओं की प्रतिक्रिया थी।

दरअसल , रायगंज की भाजपा नेता व सांसद ने आरोप लगाया था कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल को इस्लामिक राज्य में बदलने और बांग्लादेश के साथ विलय करने की योजना बना रही है।

इसी बयान पर ऑपइंडिया ने रिपोर्ट की थी और कई मीडिया संस्थानों ने भी इसे कवर किया। लेकिन बंगाल सरकार ने ऑपइंडिया के अंग्रेजी संपादक और उनके पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का फैसला किया, जो कोलकाता के निवासी हैं। इसके बाद वैभव शर्मा को समन भेजकर 16 मई को पुलिस स्टेशन में बुलाया गया।

गौरतलब हो कि वैभव शर्मा का ऑपइंडिया से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन एक फोन नंबर जिसका इस्तेमाल नुपूर करती हैं, वह उनके नाम पर है। केवल इसी फोन नंबर की वजह से पुलिस ने उनसे पूछताछ की।

16 मई को पूछताछ में पुलिस ने उन्हें धमकाया कि अगर रिपोर्ट डिलीट नहीं की गई, तो वह गिरफ्तार किए जाएँगे। इस बीच पुलिस ने नुपुर शर्मा के 68 वर्षीय पिता से भी बात की और उन्हें भी इसी प्रकार डराया। मगर, इस बीच जब एफआईआर की कॉपी माँगी तो पुलिस उसे देने से इनकार करती रही।

फिर, बंगाल पुलिस ने उसी दिन नुपुर और उनके पति को एक और नोटिस भेजा। इस नोटिस में उनसे 17 मई को प्रकाशित एक रिपोर्ट को लेकर दूसरे पुलिस थाने में हाजिरी लगाने को कहा गया। ये रिपोर्ट भी संडे गार्जियन की रिपोर्ट पर आधारित थी। इसमें दावा किया गया था कि पश्चिम बंगाल सरकार कोरोना से मरने वालों के शव का चुपके-चुपके निपटान कर रही है और वास्तविक आँकड़ों को छिपा रही है।

इसके बाद, पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा कोलकाता में पूछताछ के लिए राहुल रौशन और अजीत भारती को भी नोटिस जारी किए गए। लेकिन चूंकि उस समय लॉकडाउन लागू था और वे बंगाल से बाहर के राज्यों के निवासी थे, इसलिए उन्होंने यात्रा करने में असमर्थता जताई और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा पूछताछ करने का अनुरोध किया। लेकिन पुलिस ने अब तक उनके अनुरोध का जवाब नहीं दिया। साथ ही उन्हें एफआईआर की प्रतियाँ भी उपलब्ध नहीं कराई है।

इतने सब के बाद इसी महीने की 8 तारीख को ऑपइंडिया के खिलाफ एक और मामला दायर किया गया। इस बार यह मामला कोलकाता में दुर्गा पूजा पंडाल में हुई अज़ान पर एक पुरानी रिपोर्ट के लिए किया गया।

यह रिपोर्ट पिछले साल 7 अक्टूबर को प्रकाशित हुई थी। इसे कई राष्ट्रीय और स्थानीय मीडिया हाउसों द्वारा भी रिपोर्ट किया गया था। इसके अलावा, इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। लेकिन फिर भी इसे लेकर ऑपइंडिया पर निशाना बनाया गया और इस मामले में भी एफआईआर की प्रतियाँ माँगने पर ऑपइंडिया को उपलब्ध नहीं करवाई गई।

लगातार पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा निशाना बनाए जाने के बाद इन चारों लोगों ने सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया। इसी क्रम में उन्होंने 12 जून को वकील रवि शर्मा के जरिए एफआईआर ख़ारिज करने के लिए याचिका डाली।

याचिका में कहा गया कि उनकी सामग्री केवल इंटरनेट पर प्रकाशित हुई। इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई केवल सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69 ए के तहत केंद्र सरकार द्वारा की जा सकती है, और राज्य सरकार का उन पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि इंटरनेट से सामग्री को हटाने की माँग करने के लिए पुलिस के पास कानून नहीं है।

इसी पूरे मामले पर आज वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई हुई। कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और एफआईआर के लिए आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी। याचिकाकर्ताओं की ओर पैरवी वरिष्ठ एडवोकेट महेश जेठमलानी, संदीप कपूर, सिया चौधरी और मधुलिका राय ने की। सर्वोच्च न्यायालय ने इस संबंध में पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस भी दिया है। अब इस मामले पर अगली सुनवाई 14 अगस्त को होगी।

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ऑपइंडिया स्टाफ़http://www.opindia.in
कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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