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‘ऐसा तो हर जगह होता है’ से ‘कॉम्प्रोमाइज करना होगा’ तक: कैसे सामान्य बनाया जाता रहा कास्टिंग काउच का मुद्दा? संचिता उगले की मौत के बाद फिर उठे सवाल

कोरियोग्राफर सरोज खान ने एक विवादास्पद बयान देते हुए कहा था कि बॉलीवुड में कास्टिंग काउच नई बात नहीं, यह सदियों से चला आ रहा है। फिल्म इंडस्ट्री में दुष्कर्म के बाद लड़कियों को छोड़ नहीं दिया जाता, बल्कि उन्हें काम और रोजी-रोटी भी दी जाती है। यानी उनकी नजर में ऐसा होना स्वाभाविक है और इसे एक्सेप्ट कर लेना चाहिए।

मनोरंजन की दुनिया हर दिन लाखों लोगों को सपने बेचती है। टीवी स्क्रीन पर दिखते चेहरे, रेड कार्पेट, सोशल मीडिया की चमक, इंटरव्यू, फैन फॉलोइंग और सफलता की कहानियाँ, ये सब मिलकर एक ऐसी दुनिया की तस्वीर बनाते हैं जहाँ पहुँच जाना ही मानो जीत माना जाता है। लेकिन हर चमक के पीछे एक ऐसा हिस्सा भी होता है जो कैमरे से बाहर रहता है।

वहाँ संघर्ष है, असुरक्षा है, लगातार तुलना है, और कई बार ऐसी परिस्थितियाँ भी जिनके बारे में लोग खुलकर बात नहीं करना चाहते। हाल में अभिनेत्री संचिता उगले की मौत की खबर सामने आने के बाद एक बार फिर मनोरंजन उद्योग के भीतर के दबावों पर चर्चा शुरू हुई।

इस घटना के बाद अभिनेत्री आँचल खुराना ने जो कहा, उसने बहस को एक ऐसे विषय की तरफ मोड़ दिया जो वर्षों से मौजूद है, मगर हर बार नई घटना के साथ फिर लौट आता है।

आँचल ने अपने वीडियो में कहा कि लोग सिर्फ पर्दे पर दिखने वाली मुस्कान देखते हैं, लेकिन कलाकारों के हिस्से का डर, लगातार रिजेक्शन, काम खोने की चिंता और पेशेवर दबाव नहीं देखते। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार कलाकारों को ऐसे फैसलों के सामने खड़ा कर दिया जाता है जहाँ आत्मसम्मान और अवसर एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं।

यहीं से चर्चा फिर उस शब्द तक पहुँचती है, जो दशकों से फिल्म और टीवी इंडस्ट्री के साथ जुड़ता रहा है- कास्टिंग काउच। एक ऐसा शब्द, जो सिर्फ फिल्मी गॉसिप नहीं बल्कि उन अनुभवों, आरोपों और बहसों का हिस्सा बन गया, जिनमें काम, पहचान और व्यक्तिगत सीमाओं के बीच की रेखाएँ धुंधली होने लगती हैं।

एक शब्द जिसने पर्दे के पीछे की दुनिया को नाम दिया

‘कास्टिंग काउच’ ऐसे बर्ताव को माना जाता है, जिसमें किसी को काम दिलाने के बदले उससे यौन संबंध बनाने की माँग की जाती है। आज कास्टिंग काउच शब्द बहुत सामान्य लगता है, लेकिन इसकी कहानी पुरानी है। इस शब्द का शुरुआती दर्ज इस्तेमाल 24 नवंबर 1937 को अमेरिकी मनोरंजन पत्रिका Variety में माना जाता है।

उस समय इसे ऐसे संदर्भ में इस्तेमाल किया गया था जिससे संकेत मिलता था कि मनोरंजन उद्योग में काम के बदले निजी या यौन अपेक्षाएँ कोई अनजानी बात नहीं थीं।

इसके बाद 1956 में ब्रिटिश फिल्म मैगजीन Picturegoer ने चार हिस्सों की एक चर्चित रिपोर्ट प्रकाशित की- ‘The Perils of Show Business’। इसमें कई अभिनेत्रियों ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि कैसे करियर में तरक्की या एक मौके के लिए भी उन्हें डायरेक्टर और प्रोड्यूसर से यौन संबंध बनाने का वादा करना पड़ता था

Picturegoer पत्रिका ने 14 जुलाई, 1956 के अंक के कवर पेज पर फिल्म उद्योग की कास्टिंग काउच के बारे में अपनी चार-भाग वाली श्रृंखला की घोषणा की (फोटो साभार: slate)

जब चुप्पियाँ टूटनी शुरू हुईं

भारत में लंबे समय तक कास्टिंग काउच को फिल्मी अफवाह या इंडस्ट्री की खुली हुई सच्चाई की तरह देखा जाता रहा। 2005 में एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हुई। बाद के वर्षों में कई कलाकारों ने अपने अनुभव साझा किए।

फिर 2017–18 में हॉलीवुड निर्माता हार्वे वाइंस्टीन विवाद और उसके बाद शुरू हुए #MeToo आंदोलन ने दुनिया भर में माहौल बदल दिया। हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने #MeToo को सोशल मीडिया पर व्यापक रूप दिया और इसके बाद हजारों महिलाओं ने अपने अनुभव सार्वजनिक किए।

भारत में भी इस अभियान के दौरान कई महिलाएँ सामने आईं। इसी दौरान अभिनेत्री और फिल्म निर्देशक नीना गुप्ता ने अपनी आत्मकथा ‘सच कहूँ तो’ में भी मनोरंजन जगत की उन परिस्थितियों का जिक्र किया, जिनका सामना महिलाओं को अपने करियर के दौरान करना पड़ सकता है

सभी मामलों में एक समान बात दिखी- पद, पहचान या प्रभाव रखने वाले लोगों पर निजी सीमाएँ पार कर सेक्सुअल फेवर माँगने, कपड़े उतारकर पूरा फिगर दिखाने के आरोप।

किसी ने साथ सोने तो किसी ने ब्रेस्ट दिखाने को किया मजबूर

समय के साथ कई अभिनेत्रियों और कलाकारों ने सार्वजनिक रूप से अपने अनुभव साझा किए। अंकिता लोखंडे ने बताया था, “मेरे साथ बॉम्बे में ही कास्टिंग काउच हुआ था। मैंने साउथ फिल्म के लिए ऑडिशन दिया था। मुझे कॉल आया कि आप साइन करने आ जाओ। मैं बहुत खुश थी, मुझे भी डाउट था कि इतनी आसानी से कैसे हुआ?”

उन्होंने आगे कहा,  “जब मैं साइन करने गई तो मुझे सिर्फ अंदर बुलाया गया और मेरी कॉर्डिनेटर को रुकने को कहा गया। मुझे बोला गया- तुम्हें कॉम्प्रोमाइज करना होगा’ मैं उस समय सिर्फ 19 साल की थी। तभी मेरा हिरोइन बनने वाला फेज चल रहा था। मैंने पूछा कि कौन सा कॉम्प्रोमाइज करना होगा। तो उन्होंने कहा कि आपको प्रोड्यूसर के साथ सोना पड़ेगा।”

इसी तरह सुरवीन चावला ने बताया था कि जब वो टेलीविजन जगत में अपना करियर बनाने की कोशिश कर रही थीं तब भी उन्होंने मुंबई में अपनी पहली फिल्म की मीटिंग के दौरान कास्टिंग काउच को फेस किया था। इस घटना के बाद उन्हें खुद पर डाउट हो गया था। उनसे उनकी अपीयरेंस, वजन, कमर, छाती के साइज पर प्रश्न किए गए थे।

आराधना शर्मा ने बताया था कि कास्टिंग एजेंटों में से एक ने उनके साथ गंदी हरकत की। इस घटना ने उनको जिंदगी भर के लिए इतना डरा दिया कि उनको किसी पर भी विश्वास नहीं होता था। यहाँ तक कि वो अपने पिता के साथ भी अनकंफर्टेबल हो गई थीं।

मुस्कान वार्ष्णेय ने बताया कि जब वह 16 साल की थी तब उन्होंने ऑनलाइन इंटरव्यू दिया, जिसमें उन्हें साड़ी पहनने के लिए बोला गया। और फिर ऑडिशन में उन्हें अचानक ब्लाउज उतारने को कहा गया। तब मुस्कान ने कहा कि वह सहज नहीं हैं। मुस्कान ने बताया कि एक ही व्यक्ति ने उन्हें बार-बार ऐसा करने को कहा।

सोनल वांगुलकर ने बताया था, साल 2018 में मुझे राजा बजाज के ऑफिस में एक रोल के लिए ऑडिशन के लिए बुलाया गया। राजा एक फेमस डायरेक्टर और फोटोग्राफर हैं। उस वक्त मैंने ऑडिशन दिया लेकिन पूरी तरह से तैयार न होने की वजह से मैं ठीक से डॉयलॉग बोल नहीं पाई। इसके बाद उन्होंने मुझे शूट में सहायता की ताकि मैं कुछ सीख पाऊँ।”

सोनल बताती हैं कि उन्हें पहले उस शूट का हिस्सा बनाया गया जिसकी वो हिस्सा नहीं थीं। बाद में उनसे कुछ कपड़े ट्राई करने को कहे गए। इस दौरान जबरन उनकी ब्रेस्ट पर क्रीम लगाई गई। उन्हें ये अजीब लगा और मन में डर बैठ गया। इसके बाद राजा ने उनके साथ भी घटिया हरकतें की।

उन्होंने कहा, “उसने मुझे कहा कि ये तंत्र विद्या मुझे उसके साथ बिना कपड़ों के करनी होगी। पूरी तरह से नग्न होकर मंत्र जाप करना होगा। मैं कुछ समझ पाती उससे पहले वो मेरी टीशर्ट उतारने लगा, लेकिन तब मैंने उसे धक्का देकर खुद को बचाया और वहाँ से भागने में कामयाब रही।”

शिव्या पठानिया ने कहा कि उनसे काम के बदले सेक्सुअल फेवर्स माँगे गए थे। इसी तरह मनीषा रानी ने बताया कि एक व्यक्ति ने खुद को बड़े शो से जुड़ा बताकर रात को उसके घर आने का दबाव बनाया। कनिष्का सोनी, प्रीती सूद और शालिनी पांडे जैसे कई नाम भी समय-समय पर अपने अनुभव साझा करते रहे हैं।

जब समझौते को सामान्य बताने वाले सरोज खान जैसे लोगों के बयान सामने आए

कास्टिंग काउच पर चर्चा जितनी पीड़ितों के अनुभवों से बनी, उतनी ही उन बयानों से भी बनी जिन्होंने लोगों को चौंकाया। 2018 में कोरियोग्राफर सरोज खान का बयान सबसे ज्यादा विवाद में आया। उन्होंने कहा था कि कास्टिंग काउच नई बात नहीं है और सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित नहीं है।

कोरियोग्राफर सरोज खान ने सांगली में एक न्यूज चैनल के कार्यक्रम में बॉलीवुड में कास्टिंग काउच होने की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि यह काम नया नहीं है। यह सदियों से चला आ रहा है। फिल्म इंडस्ट्री में दुष्कर्म के बाद लड़कियों को छोड़ नहीं दिया जाता, बल्कि उन्हें काम और रोजी-रोटी भी दी जाती है।

उनके समर्थन में कॉन्ग्रेस नेता रेणुका चौधरी ने कहा था कि ऐसी चीजें सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री नहीं बल्कि कई क्षेत्रों में मौजूद हैं और इसे कड़वी सच्चाई की तरह स्वीकार करना चाहिए।

दक्षिण भारतीय अभिनेता चिरंजीवी के एक बयान पर भी विवाद हुआ। उन्होंने कहा था, “ये एक बहुत अच्छी इंडस्ट्री है। अगर कुछ लोग यहाँ सफल नहीं हो पाए, या कुछ कहते हैं कि इंडस्ट्री में नकारात्मक लोग हैं, या किसी को बुरे अनुभव हुए हैं, तो मेरा मानना है कि इसके लिए कहीं न कहीं उनकी अपनी गलती भी होती है।”

उन्होंने आगे कहा, “अगर आप सख्त और गंभीर रहते हैं, तो कोई भी आपका गलत फायदा नहीं उठा सकता। तब कास्टिंग काउच जैसी कोई चीज नहीं होगी। ये आपके व्यवहार पर निर्भर करता है। आपकी असुरक्षा की वजह से आपको लग सकता है कि शायद ऐसे ही व्यवहार करना चाहिए। अगर आप प्रोफेशनल तरीके से पेश आते हैं, तो सामने वाला भी वैसा ही व्यवहार करेगा। ये इंडस्ट्री एक आईने की तरह है- आप जैसा दिखाते हैं, वही वापस दिखता है।”

कास्टिंग काउच पर राखी सावंत ने भी अजीबो-गरीब बयान दिया था। राखी ने अपने फिल्म इंड्रस्टी के शुरुआती दिनों के अनुभवों को साझा करते हुए कहा था, “मैंने भी कास्टिंग काउच का सामना कर के आगे बढ़ी हूँ। राखी सावंत ने कहा है कि बॉलीवुड में कास्टिंग काउच होता है, लेकिन यहाँ यह पूरी तरह इच्छा पर निर्भर है और कोई किसी का बलात्कार नहीं करता।”

राखी ने कहा कि उनकी पहचान की कई लड़कियों ने काम के लिए खुद को प्रोड्यूसर के आगे सौंप दिया, तो इसके लिए प्रोड्यूसर पर इलजाम नहीं लगाया जा सकता। इन बयानों ने एक बड़ा सवाल पैदा किया कि अगर किसी समस्या को ‘ऐसा तो हर जगह होता है’ कहकर सामान्य बना दिया जाए, तो क्या उससे समस्या कम होती है या उसकी गंभीरता हल्की पड़ जाती है?

यह कहानी सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं रही

कास्टिंग काउच की चर्चा अक्सर महिलाओं के संदर्भ में होती है, लेकिन कई पुरुष कलाकारों ने भी ऐसे अनुभव साझा किए हैं। टीवी अभिनेता अंकित सिवाच ने बताया कि वह भी कास्टिंग काउच का सामना कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि उनसे न्यूड फोटोज माँगे गए थे।

अंकित ने आगे बताया, “मुझसे ऐसी पार्टियों में आने के लिए कहा जाता था, जिसमें ​मेरा कोई काम ही नहीं होता था। यह एक तरह से प्रताड़ना थी, क्योंकि मैं इसके लिए तैयार नहीं था।”

इसके अलावा हैदराबाद के मॉडल कृष्णा मोनाला ने कास्टिंग काउच के बारे में बयान दिया था कि कुछ निर्देशकों ने उन्हें अपने साथ सोने के लिए कहा। वे अकेले ऐसे एक्टर नहीं, इससे पहले गायक सोनू निगम ने भी एक पत्रकार पर फिजिकल रिलेशन बनाने की कोशिश का आरोप लगाया था।

प्रियंका चोपड़ा ने भी एक बातचीत में कहा था कि पुरुष कलाकार भी कई बार ऐसे दबावों का सामना करते हैं, हालाँकि वे कम बोलते हैं। इससे एक और परत सामने आती है- शोषण हमेशा एक ही दिशा में नहीं होता, लेकिन शिकायत करने में डर लगभग हर जगह समान दिखता है।

निष्कर्ष: कास्टिंग काउच सिर्फ उस मानसिकता का सवाल है जो शोषण को सामान्य बनाती है

जब प्रभावशाली लोग यह कहते हैं कि ‘ऐसा तो हर जगह होता है’, ‘ये नया नहीं है’, ‘कोई मजबूर नहीं करता’, ‘अगर आप सख्त रहें तो कुछ नहीं होगा’, तब समस्या सिर्फ एक बयान नहीं रह जाती, वह एक मानसिकता बन जाती है। ऐसी मानसिकता शोषण की जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर डाल देती है जो पहले से कमजोर स्थिति में है।

कास्टिंग काउच को बढ़ावा सिर्फ वे लोग नहीं देते जो सत्ता या मौके का गलत इस्तेमाल करते हैं, बल्कि वे बयान भी देते हैं जो इस समस्या को सामान्य या व्यक्तिगत चुनाव बताकर उसकी गंभीरता कम कर देते हैं। जब सरोज खान इसे ‘सदियों से चल रही चीज’ बताकर यह कहती हैं कि यह सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित नहीं है, तो सवाल उठता है कि क्या किसी समस्या का पुराना होना उसे स्वीकार करने का कारण बन सकता है।

इसी तरह जब चिरंजीवी यह कहते हैं कि अगर कोई प्रोफेशनल और सख्त रहे तो उसका गलत फायदा नहीं उठाया जा सकता, तो इससे जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर चली जाती है जो पहले से अवसर और दबाव के बीच खड़ा है। वहीं राखी सावंत का यह कहना कि यह इच्छा पर निर्भर है और इसके लिए पूरी तरह प्रोड्यूसर को दोष नहीं दिया जा सकता, शक्ति के असंतुलन और करियर के दबाव को नजरअंदाज करता दिखाई देता है।

यही मानसिकता कास्टिंग काउच को खत्म करने के बजाय उसे जगह देती है। क्योंकि जब प्रभावशाली लोग शोषण को मजबूरी, समझौता या सामान्य प्रक्रिया की तरह पेश करते हैं, तब शिकायत करना और भी मुश्किल हो जाता है। किसी भी पेशेवर क्षेत्र में काम का आधार प्रतिभा और योग्यता होनी चाहिए, न कि पावर, दबाव या निजी समझौते।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
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